संजीव बख़्शी की रचनाएँ

गरियाबंद 

गरियाबंद के
तहसील आफ़िस वाले
शिवमंदिर में
ट्रेज़री का बड़ा बाबू
बिना नागा
प्रतिदिन एक दिया
जलाया करता

मेरी स्मृतियों में
वह हमेशा
वहाँ दिया जलाता रहेगा
चाहे आँधी हो या तूफ़ान ।

मेरी स्मृतियों में वह
बड़ा बाबू
कभी सेवानिवृत्त नहीं होगा।

हरी-हरी पत्तियाँ 

उसने दरवाज़ा खटखटाया और पूछा मेरा हाल
जैसे-तैसे मैंने क़िताब का वह पन्ना खोल लिया
जहाँ लिखा हुआ है—
आकाश

इस क़िताब में जहाँ
पृथ्वी, हवा, पानी या अग्नि लिखा हुआ है
ज़रूरत हो और खोल लूँ यह पन्ना इसलिए
कचनार की
पत्तियों को रख दिया है
पन्नों के बीच दबा कर ।

दरियाँ और चूल्हे की गर्मी

यूँ तो अब दरियों पर बैठना कम हो गया है
बैठा नहीं जाता पैर मोड़कर
दरियों पर

जब भी बैठें दरियों पर
जान लें कि बुनने वालों के परिवार इससे पलते हैं
इनके चूल्हे की गर्मी इन दरियों से आती है

जाइए और कहिए अपने चिकित्सक से
घुटना मोड़कर बैठना उतना ही ज़रूरी है
जितना खाना खाने के पहले
डायबिटिस की गोली खाना

जाइए जल्दी करिए
यह डायबिटीस की गोली भी कमबख़्त
असर छोड़ देती है कभी भी ।

चुप में रहती हैं

आवाज़ें नहीं मरतीं कभी
तो तय है
चुप भी नहीं मरती
चुप में तो रहती हैं
आवाज़ें

घोटुल

गाँव से दूर, सड़क से दूर
लेका, लेकी के नाम एक खोली, एक आँगन
वह सिर्फ खोली या आँगन नहीं
लेका, लेकी के उम्र बढ़ने की ख़बर है यह
ख़बर दरवाज़े, खिड़कियाँ, छप्पर से युक्त
मांदर, तोड़ी, गोड़ांदी के साथ
यह ख़बर धीरे से आती है गाँव से बाहर
घोटुल बन जाती है

गाँव भर की मोटियारिनें घोटुल को लीपती हैं
लीपती हैं अपने भविष्य, अपने सपनें
गाती हैं रीलो, रेला, हुलकी, लीपते, लीपते
फिर सजती हैं मोटियारिनें
सँवारती हैं घोटुल को
सजते हैं मांदर, बजते हैं ढोल
नाच उठते हैं सब साथ-साथ
काकसार, कोकरेंग पहर बाद, रात भर
यह दूर की आवाज़ है
मांदर की थाप है
मीलों तक जानते हैं, गाँव-भर ख़बर है
यह घोटुल का मांदर है, यह घोटुल का शोर है

झाँकता है चाँद कभी पहाड़ की ओट से
कभी खेलता है पेड़ों से आँख-मिचौली
उतर आता है आख़िर वह घोटुल के आँगन
चंदन से भर देता घोटुल को, आँगन को
तब का घोटुल था चंदेनी का घोटुल
तब था घोटुल एक जश्न का नाम
आज घोटुल एक प्रश्न का नाम है

तब की बात और है,
तब का मांदर, तब का ढोल
तब की मोटियारिनें,
तब की उमंगे
अब
जब जाती हैं मोटियारिनें हाट
जाते-जाते क्षण भर रुकती हैं
घोटुल के पास
रूकती हैं, ताकती हैं घोटुल के बंद दरवाज़े को
उठाती हैं पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े
दरवाज़े पर मारती हैं
नहीं खुलता बंद दरवाज़ा
खट की आवाज़ आती है
जिसे सुनती हैं मोटियारिनें
एक साथ खिलखिलाकर हँसती हैं
और हाट चल देती है

तिनका

जब तिनका उड़ा था
धूल से ऊपर
तो पीछा किया था धूल ने
कुछ ऊँचाई तक
तब
धूल को वापस जाते देख
इतराया था तिनका
हवा में इठलाते
पर हवा के थमते ही
सब कुछ थम गया
मानो सब कुछ बदल गया
उसे अब भार का एहसास हुआ था
वह बेबस होकर
धूल की ओर मुड़ा था
उसे अब मालूम हुआ
जिस गति का अहंकार था उसे
वह उसका अपना नहीं था
हवा से जुड़ा था
काश ऊपर उड़ते-उड़ते
वह अपने को पहचाना होता
तो उसमें और
धूल के कणों में
इतनी दूरी न होती
उसके साथ आज
मज़बूरी न होती

ताकता है पहाड़

हवा का
संगीतमय हो जाना
पत्तियों का
चिडियों के साथ
चहचहाना
पेड़ पौधों का
फल-फूल के साथ हर्षाना
नदियों की झर-झर
शाम को समुद्र का
चुप-सा हो जाना
यह सब
आकार देता हुआ लगता है
प्रकृति की बोल को
पर पता नहीं क्यों
पहाड़ हमेशा पीठ किए लगता है
मेरी खुदगर्ज़ का बोल
कहता है
की ताकता है पहाड़
मेरे दुश्मनों को

मेरे ड्राइंग रूम में 

मेरे ड्राइंग-रूम में
महीनों से
बिना नागा
आने वाली चिड़ियों को
मै
थोड़ा भी नहीं पहचानता
इतना भी नहीं
जितना
वे चिड़िया शायद
मुझे
पहचानती होंगी

एक चाहत आसमान भर

एक चिड़िया
गोल-गोल आँखों से
गर्दन घुमा-घुमा
देखती है एक हेलिकोप्टर को ।

देखती है
उसमे ईंधन का डालना,
पायलट का स्विच आन करना,
और गड़गड़ाहट के साथ
बड़े-बड़े पंखो का घूमना
क्षण भर में
हेलीकाप्टर का हो जाना ओझल
उसकी आँखों से ।

देखती है यह, वह चिड़िया,
जाती है पोखर
चोंच भर पीती है पानी,
दो गुनी रफ़्तार से उड़ जाती है
आसमान की ओर फुर्र….।

पाँच सितारा अस्पताल

पाँच-सितारा सुविधायुक्त एक अस्पताल
भव्य मुख्य-द्वार
उस भव्य मुख्य-द्वार के सामने
बेतरतीब पड़े जूते, जूतियाँ,चप्पलें,
बदहाल जूते, जूतियाँ, और चप्पलें
घिसे, फटे, पुराने अधिकांश

कितनी जल्दी में या ज़रूरी में रहा होगा वह
जिसकी एक चप्पल यहाँ है तो दूसरी दस क़दम दूर
अलग-अलग दिशाओं को बताते हुए
बहुत ही तरतीब से एक किनारे पर
सुरक्षित ढंग से रखी है कुछ क़ीमती जूतियाँ और चप्पलें

चाहे जो हो एकाएक जब मेरी नज़र पड़ी थी
घिसे, फटे, पुराने जूतों, जूतियों और चप्पलों पर
तो एकबारगी मैं ख़ुश हो गया था कि
झुग्गियाँ भी पीछे नहीं है
कि इस भव्य अस्पताल की सेवाएँ नहीं है केवल अमीरों के नाम
क़दम से क़दम मिला कर अब चलतें हैं सब के सब
यह लोकतंत्र है
तब ही मैं मायूस हो गया यह सोच कर कि
ज़मीन बिक गई होगी या घर को रहन में रख दिया गया होगा शायद
बचा कर रखे होंगे जो गहने बिक गए होंगे
या माँग जाँच कर कहीं से जुगाड़ किया गया होगा
और घिस गई होंगी चप्पलें इन सब के चलते
और अब पड़े हुए हैं भले ही बेतरतीब
इंतज़ार कर रहे हैं कि जब वह बाहर निकले तो मैं उन्हें तुरत मिल जाऊँ
और उनकी हर भाग-दौड़ में साथ रहूँ ।

भैया बाल…. 

पीछे बस्ती के बच्चे
चार से दस साल के
खेलते हैं क्रिकेट तो खेलते हैं और
हल्ला भी बोलते हैं

यह सरकारी कालोनी है
चारों ओर क्वार्टर, बीच की खाली जगह
यह है मैदान क्रिकेट का
पड़ते हैं चौके, छक्के
यह रोज़ की बात है
सूर्योदय से सूर्यास्त और उसके बाद तक की
जब तक बॉल दिखना बंद न हो जाए
और बल्कि उसके बाद भी

अक्सर बॉल मेरे कैम्पस में घुस आता है
तब गेट पर होते हैं बच्चे
चार से दस के सब के सब

भैया बॉल, भैया बॉल….

पास एक मझोले से मेले में बड़ी भीड़ है
बस्तियाँ सारी खाली हो गई लगता है आज
पर
कोई नहीं दिख रहा जाना पहचाना
कि रुक कर बात ही कर लें
नए-नए चेहरे

मैं सोच में था ही कि देखता हूँ एक बच्चा
कोई छह साल का
पीले-लाल कपड़ों में
सिर पर एक कपड़ा बँधा
मुझे देख वह मुस्कराया
यह जान पहचान वाली मुस्कान
कोई दोस्ताना रिश्ता हो इस तरह
पर
कहाँ मैं छप्पन का और कहाँ वह छह का

अभी वह माँ की अँगुली पकड़े मुस्करा रहा था
और क़रीब से निकल रहा था
अभी मेरा ध्यान उसकी ओर ही था कि उसने
धीरे से कहा

भैया बॉल ….

चमकीली आँखों वाली मछली

एक चमकीली आँखों वाली मछली
पानी के ऊपर उछलती है
पूरी ताक़त के साथ
एक छोर पर मैं खड़ा था यों ही
कि अचानक मुझे लगता है
मछली की नज़र मुझ पर थी
बस नज़रें मिली
और छपाक से मछली पानी में घुस गई

पानी में एक हलचल पैदा हुई
शांत हो गई ।

मेरी आँखें एक तरफ़ा
बतियाती रहीं मछली से
इस बातचीत में मछली की मूक आँखें
शामिल थीं

ऐ मछली !
तुमने क्या देखा मेरी आँखों में ?
मुझे क्या जाना इस आधे क्षण में ?
इस किनारे खड़े सभी लोग
तुम्हें एक जैसे लगे होंगे
कैसा दिखा होऊँगा मैं ?
कैसा दिखा होगा वह पेटू ?
गोल-गोल आँखों से
कैसा दिखता होगा यह संसार ?

मैं अपनी आँखें गोल-गोल बनाता हूँ
पेटू को घूरता हूँ
बड़ा बेपरवाह खड़ा है पेटू
बस आधे क्षण के लिए मिलती है नज़रें कि
अचानक महसूस होता है
मैं पानी के ऊपर अभी उछाल में हूँ
और अब पानी के भीतर छपाक से
घुसने वाला हूँ
दूसरे क्षण पेटू ग़ायब था
मैं शायद
बहुत गहरे पानी में नीचे

वहाँ जो थे उन्हें मैं मछलियाँ नहीं कह रहा था
मेरी तरह गोल-गोल आँखों वालों की
भीड़ थी
पानी मुझे पानी जैसा महसूस नहीं हो रहा था
इच्छा हो रही थी उछाल भरूँ पानी के ऊपर
ज़रा देखूँ कौन-कौन खड़े हैं मेरी प्रतीक्षा में
इच्छा हुई उछाल भरूँ
गहरी हुई इच्छा, और गहरी
यह सब कुछ एक ऊर्जा में तबदील हो गई
माँसपेशियों पर जैसे कुछ बल पड़ा
आधे क्षण के लिए
पूरा शरीर था हवा में
सपने की तरह किनारा था
वहाँ हँसती-खिलखिलाती मछलियाँ थी
मैं देख रहा था
उनकी आँखें गोल-गोल नहीं थी
अजीब-सी भूख दिख रही थी उनकी आँखों में
वह मछली भी थी वहाँ
‘चमकीली आँखों वाली’

आश्चर्य था घोर आश्चर्य
हतप्रभ था मैं यह सब देख-देख

खोजी आँखों ने पूरा किनारा देख लिया
काश कहीं कोई इन्सान होता
भले ही कोई जाल लिए, गरी लिए

मेरी आँखें नम थी
आँखों में भर आए पानी ने
सारा दृश्य धुँधला किया हुआ था
जाल की तरह एक बार रुमाल लहराता हूँ
और आँखें पोंछ लेता हूँ

किनारे पेटू के हाथ में अब एक गरी थी
पास झोले में कुछ मछलियाँ ।

यह देखिए, यह देखिए

यह देखिए
हाथ पैर न चलाइए
कपड़े साफ़

यह देखिए
मिनटों में
पूरे घर की सफ़ाई

यह देखिए
यह बोलता है
यह सुनता है

यह देखिए
बस स्विच आन करिए
पूरा खाना तैयार
यह इलेक्ट्रानिक उपकरण
यह इम्पोर्टेड

यह सब
यह सब

बताते-बताते गुलाबी हुआ जाता
उनका चेहरा
बताते-बताते सफ़ेद हो जाता है

यह देखिए
मेरा जिगर, मेरा गुर्दा

लक्खा-लक्खा

लक्खा
को पूछिए उसकी उम्र
अपनी उम्र वह किलोमीटर में बताता है

लक्खा
जब होता है अपने घर
अपनी उम्र भूल जाता है

ट्रक से उतरते ही
पुकारता है ट्रक
लक्खा-लक्खा
पलटकर जाता है वह ट्रक के पास हर बार
बोनट को छूता है, हल्की-सी थपकी देता है

नए जूते की महक और मेरा क़द

पता नहीं क्यों
अक्सर जी करता है
याद करूँ
बचपन के उस क्षण को
काका ने लिवाया था मुझे
एक नया जूता का जोड़ा ।

नए जूते की महक को
पहली बार जाना था
काला जूता, चमकीला
पूरे मन को भा गया था
काका की हामी ने मेरा दिल भर दिया था

जैसे मेरे लिए ही बना था यह जूता
क्यूँ न याद करूँ उस क्षण को
पहली बार तो हो रहा था मैं
ज़मीन से थोड़ा ऊपर
जब मैं पहन कर जूता
पहली बार खड़ा हुआ था
ज़मीन पर

सब के सब क्षण भर में
थोड़े छोटे लगने लगे थे
झेंप गया था काका को देखकर मैं
भाँप लिया था काका ने इसे
कैसा है?
थोड़ा चलकर भी देखो
कहा था तत्काल ।

कहेंगे धन्यवाद

मई की तपती शाम
ठंडे पानी से
पत्तियों को पोंछते हुए
सोचता हूँ—
इसकी चर्चा जड़ों तक ज़रूर होगी

कहेंगे धन्यवाद कुछ इस तरह
कि खिलेंगे पीले फूल कुछ और
आएगी ख़ुशबू कुछ और

जंगल का सागौन 

दिखाए जाते हैं
सर्कस में जंगल के शेर आज
बहुत कुछ उनके बारे
बताया जाता है

कल सागौन, शीशम दिखाए जाएँगे
साथ में रखी जाएगी वह मिट्टी,
बताया जाएगा
सागौन, शीशम उगा करते थे
इसी मिट्टी में

देखने की लगेगी टिकिट
बच्चे पास जाकर छुएँगे, देखेंगे
कहेंगे पापा-पापा

जंगल का सागौन
जंगल का शीशम
हमने छू लिया

हम डरे नहीं ।

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