संज्ञा सिंह की रचनाएँ

नमक

बादलों
धैर्य मत खोना
अभी मेरे होंठों में
नमी बरकरार है

उमड़ते-घुमड़ते
गरज़ते और दौड़ते रहना
आँखों में झलक रहा है
पानी अभी

खाया हुआ नमक
घुल रहा है रग-रग में
संचरित हो रहा है ख़ून

आँखें
पठारी शक्ल अख़्तियार कर लें
सूख जाएँ होंठ
तब बरस जाना
कि ज़िन्दगी भर घुलता रहे
मेरी ही रगों में
खाया हुआ नमक

जियालाल

जियालाल रास मंडल मानिक चौक (जौनपुर) का एक रिक्शा वाला है

सुबह के साथ
चौराहे पर होने की बात
करता है वह

रिक्शा
खड़ा करके
हर गुज़रते आदमी की
निग़ाह पढ़ता है

शाम होने पर थका-हारा
जाता है अपनी झोपडी में
पत्नी- बच्चों की निग़ाह में
खो जाती है उसकी
थकान

रचनाकाल : 1994, जौनपुर

कहीं न कहीं

कुहासा
गहरा हुआ है जब-जब
धुएँ के समंदर में बदलती गई है सुबह

धूप
जब-जब चढ़ी है अपनी ऊँचाई पर
सोने की चादर की तरह झलमलाई है दोपहर

अन्धेरा
उतरा है आख़िरी गहराई तक जब-जब
काजल-काजल होता चला गया है परिदृश्य

फिर भी-फिर भी
रहा है सूरज कहीं न कहीं
कहीं न कहीं रही है थोड़ी बहुत छाँव
थोडा बहुत उजाला रहा है कहीं न कहीं तब भी

रचनाकाल : 1994, जौनपुर

अनुराग तुम्हारा

अखंडित
अनुराग तुम्हारा
राग बना रहा मेरे लिए

खंडित दलित
प्यार मेरा
कहीं से भार नहीं बना
तुम्हारे लिए

तुम सब कुछ करते रहे
आह में चाह के स्वर
सहेजे

मै
तुम्हारे लिए
न बचा सकी
ख़ुद को

रचनाकाल : 1995, विदिशा

शाम से पहले 

धूप उतरने वाली है
चिड़िया के चहचहाने की आवाज़ है यह

चिड़िया के चोंच में
कोई सन्देश है तुम्हारे लिए

मुमकिन है
हो जाए वह शाम से पहले
किसी बाज़ का शिकार
और न ला पाए
कोई सन्देश किसी के लिए
कल

रचनाकाल : 1995, विदिशा

हमेशा

विश्वास का स्तम्भ
हिला है जहाँ कहीं
अचरज से फ़ैल गई है सबकी आँखें

नंगी सच्चाई के पक्ष में
जब-जब खुली है जबान
सनसनी मच गई है पूरे के पूरे माहौल में

स्थिर पानी में
फूटे है जब-जब बुलबुले
भंग हो गई है शान्ति पूरे तालाब की

मनचाही राह पर
चले हैं पाँव जब-जब
शंका के भूत पैदा होते रहे है हमेशा

रचनाकाल : 1994, जौनपुर

एक-एक नींद

एक नींद पूरी हुई चिड़िया की
हिली डुली अपने स्थान पर
इधर- उधर मारी चोंच
फैलाया पखना
समेटा थोडा-थोडा अपना सिर

एक नींद पूरी हुई बच्चे की
कुनमुनाया अपनी तरह
उंनीदी आँखों से देखा इधर-उधर
शुरू करता हुआ
नींद की एक और यात्रा

एक नींद पूरी हुई स्त्री की
खड़ी होती हुई
इच्छाओं-अनिच्छओं के साथ
चलने के लिए
अनंत यातनाओं वाली यात्रा पर….

रचनाकाल : 1994, विदिशा

अब भी

पेड़ के
आख़िरी पात की तरह
हिलना चाह रहा है
कोई विचार

बरसात के
आख़िरी बादल की तरह
उठाना चाह रहा है
कोई सपना

ज़िन्दगी की
आख़िरी साँस की तरह
आना चाह रही है
कोई उम्मीद

रचनाकाल : 1994, जौनपुर

रात का अन्धेरा

रात का अन्धेरा
सन्नाटा उगलता हुआ
हिला देता है मुझको

घड़ी की खटकती सुई
घरघराती साँस किसी की
सुनती हूँ चुपचाप

कब और न जाने कैसे
नींद आ गई
रजाई में घुसकर
सपने देखती

उबलते- ऊँघते और ख़ुश होते
सुबह हुई
अन्धेरे के बाद

स्मृति में गाँव

मेरी बचपन की यादों में
जुगाली करते हैं
धुले-नहाए दो बैल
खड़े होकर

द्वार के किसी कोने में
खड़ा होता है हल
कहीं रखी होती हैं
पानी भरी दो बाल्टियाँ

चरवाहा
चरी काट कर लाता है खेत से अब भी
तपती हुई धूप में
आज भी जलते हैं
हरवाहिनों के नंगे पाँव
लू में
नंगे बदन कोई बच्चा
दौड रहा होता है माँ के पीछे-पीछे
हरवाहा जोत रहा है उनका हुआ खेत

मेरी सुबह

सुबह होगी
नीम के कुछ फूल होंगे
ज़मीन पर
पत्तियाँ दो चार-चार
इधर-उधर
बिस्तर पर पड़ी होंगी

सुबह होगी
एक फूल गुलाब का
खिला-अधखिला
तुम्हारे पास होगा
तुम्हारे हाथों
एक फूल वाली सुबह
मेरे हाथों में उतर आएगी
सुबह होगी मेरी इस तरह

नई सृष्टि का ताल

राग की तरह धारण करना चाहती हूँ तुमको मैं
ग्रहण करना चाहती हूँ पराग की तरह
खिले हुए फूल से उठा कर

सूरज की शक़्ल में देखना चाहती हूँ अपना अनुराग
कुँवारेपन का सुहाग एक अनन्त नीले विस्तार में
तब्दील कर देना चाहती हूँ मैं
हो जाना चाहती हूँ एक कभी न बुझने वाली आग
तुम्हारे लिए

इतनी छोटी उम्र में मेरा यूँ दिखना
तुम्हारी निग़ाहों का कमल है
ब्रम्हा की नई सृष्टि का ताल है शायद यह
रंग-रंग होता हुआ सुगंधमय शाश्‍वत…

नीम के दो पेड़

द्वार का खालीपन भरते
नीम के दो पेड़
ख़ूबसूरत होते जा रहे हैं
अपनी-अपनी छाया के साथ

बराबर चल रही है
एक-दूसरे से बड़ा हो जाने की कोशिश
बरकरार है एक अघोषित प्रतियोगिता दिन-रात

अपनी सुन्दरता और हरियाली में समान
समान अपनी लम्बाई और फैलाव में
मुश्किल हो गई है इनकी छटाई
कटाई मुश्किल हो गई है इनकी हर किसी के लिए

ज़मीन को ढकने और आसमान बनने की कोशिश में
मिलते जा रहे हैं दोनों एक दूसरे से
बाँहों में डालते हुए बाँहें
घर की छत से ऊपर
ऊपर अगल-बगल के तमाम पेड़ों से
कुएँ की तरफ बढ़ रहे हैं दोनों
अपनी झूमती टहनियों को देखने के लिए
पानी में

कल तक पतझड़ से निपटते हुए
खड़े थे दोनों बनकर ठूँठ
पत्तियों से पाटते हुए
अपने नीचे की ज़मीन पूरी की पूरी

आज बसंत की शुरुआत पर
वहरती हुई अपनी नन्हीं पत्तियों के साथ
संसार का स्वागत कर रहे हैं
भरते हुए निरंतर द्वार का खालीपन

याद 

जब भी आ जाती है
तुम्हारी याद
बरस जाती हैं आँखे रोकते-रोकते जब भी आ जाती है
तुम्हारी याद
भर आता है गला
शब्दहीन हो जाती है जुबान

सकते में आ जाती हूँ यूँ ही
कुछ भी अच्छा नहीं लगता
कहीं भी शायद सिरे से हट जाती है
पूरी दुनिया मेरे लिए ।

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