संतलाल करुण की रचनाएँ

चाँद और सूरज दोनों में ग्रहण

चाँद और सूरज दोनों में ग्रहण-जैसा
काला कलंक है समलैंगिकता।

दुनिया में कुशाग्र बुद्धि
और हृदयवान जाति के
नर-मादाओं पर
पड़नेवाली यह भद्दी गाली
कितना दंश मारती है समूची मानवता को।

एक बहुत बड़ा आकाशीय
काला चश्मा पहने
यूरोप-अमेरिका की विराट आँखों ने
जब से दुनिया को देखा
ऐसी भद्दी गालियों की
बाढ़-सी आ गई।

उनकी विस्फारित
सेटेलाइट आँखों ने
खजुराहो में
बाहरी दीवारों पर उभरी
अनर्गल मैथुन-मूर्तियों को तो देखा
पर भीतर गर्भगृह में बैठे
शिव और उनकी शिवता तक
न पहुँच सकीं।

विश्वजेता चक्कर लगाने की
अहिर्निश कवायद के बाद
ज्ञान-विज्ञान-मनोविज्ञान की
इतनी आख्या-व्याख्या के बाद
आखिर, कितना दूर रह गया
अर्द्धनारीश्वर का अभिप्राय!

उल्टे मानव-निसर्ग के
कुछ लुके-छिपे, बीमार,
विषैले कीड़े-मकोड़े
जो सर्वजनीन हामी से
हमेशा बाहर फेंके जाते रहे
अपवादों के
कंधे चढ़, खड़े हो गए;
कुछ धुर काले, मुहँझौंसे,
कुलैंगिक भूत-विभूत
जो जीवन की
आम खुशनुमा गलबाँही से
सदैव निष्कासित थे
वीडीओ, कम्प्यूटर,
लैपटॉप, नोटपैड की स्क्रीन पर
एक साथ
डिस्को की तान में आ गए।

हद तो तब हो गई
जब यथावसर
समलैंगिक लैंगिक हो गए
और दिल्ली से
दूर-दराज़ के गाँवों तक की दूरी नाप ली
न दामिनी को छोड़ा
न गुड़िया को
न ही चंगुल में फँसी
किसी भी कमसिन
जवान या वृद्धा को।

नारी-जीवन ताज़ा काटे गए
बड़ी कुल्हाड़ी से चीरे-फाड़े गए
हरे पेड़ की
गीली जलौनी का
जहाँ-तहाँ बिखरा पड़ा ढेर हो गया;
मानवता हलाल की गई
ऊपर से हाड़-मांस,
खाल की दुर्गति झेलती
बूचड़-खम्भे से टँगी
सिर-कटी बकरी हो गई;
लेकिन वाशिंगटन से दिल्ली तक
मैले-कुचैले पृष्ठों पर
छल-कपट भरा
हस्ताक्षर करनेवाले नियंता
बस, ‘रेअर और रेअरस्ट’ पर
सविस्तार चर्चा करते रहे।

आज दिल्ली-चेन्नई
मुम्बई-कोलकाता ही नहीं
दूर-सुदूर गाँवों तक
कितने लैंगिक हो गए हैं
बच्चों से बूढ़ों तक के हाथ
कि उनके हाथों में
नए जनरेशन का मोबाइल है
और हाथों से निगाहों तक
महज़ एक चिप की बदौलत
मृत, पाषाणी नहीं, जीता-जागता-सा,
सचल, रंगीन, किन्तु शिवत्व-हीन
खजुराहो कुलाँचें भरता है।

और आज भी
चक्कर लगा रही हैं
यूरोपीय-अमेरिकन सेटेलाइट आँखें
खजुराहो के बाहरी
भूगोल का बार-बार।

और आज भी
लैंगिकों-समलैंगिकों की अंधी हवस में
बम-विस्फोट से
काँपती दिशाओं की तरह भयातुर
गिरती-पड़ती, बिलखती,
चीखती-चिल्लाती, गुहार लगा रहीं हैं
दामिनियाँ, गुड़ियाएँ
बहन-बेटी के उसी आर्त्तनाद में।

जबकि महामहिमों का कहना है
कि समाज को देखना होगा
कि समस्या की जड़ें आखिर कहाँ हैं!

शंबूक की खोपड़ी 

पंडितों की दृष्टि में शंबूक का सिर
मेघनाद के सिर-सा नहीं था
न ही कुम्भकर्ण के सिर-सा
न ही रावण के सिर-सा
पंडितों ने रामकथा-वटवृक्ष के नीचे
रावणों के सिरों को
श्रद्धा-सम्मान सहित दफ़नाया
पर शंबूक की खोपड़ी को
नीच बता उसी वटवृक्ष पर टांग दिया।

तपोवृद्ध ऋषि सत्याग्रही
कोपभाजन पंडितों का बन गया।
संवेदना सिर्फ़ रामों की पीड़ा समझती
सुलोचनाओं की महार्घ पात्रता
कनक-प्रासादों में निबद्ध थी
लेखनी उपनयन में थी बँधी
नहीं तो शंबूक सिर हतभाग्य भी
सिद्ध होता तपोगति गौरव अमर्त्य।
रक्तरंजित जा गिरा उत्तरापथ में
अंत-श्रद्धा का भी न प्रारब्ध पाया
युग-विधाता पंडितों के नीति-बल से
रामकथा-वृक्ष पर टाँगा गया।

शिरोच्छेदन का सबक पा गया था
संतोष नहीं था पंडितों को
शंबूक तो शंबूक ठहरा
उसकी नराधम खोपड़ी तक को
सिखाना चाहते थे पाठ ऐसा
वंशज भी कोई न कर सके साहस कभी।
खोजी पंडितों ने टाँग दी
उसी वट में खोपड़ी शंबूक की
जिसकी जड़ों पर पीठ पावन
सत्य का, सद्धर्म का, सन्मार्ग का
प्रतिष्ठित कीर्ति-प्रतिमा राम की
झुकाते शीश सुर, नर, मुनि
चढ़ाते देवराज पुष्प
त्रिदेव भी करबद्ध वंदना करते
जहाँ उस पीठ के समतुल
दफ़न थे रावणों के सिर।

समय की शिला पर से
युगों के भारी क़दम-के-क़दम गुज़रे
कूट-चिह्न मिटे नहीं पंडितों के
आज भी कथावृक्ष पर टँगी वह खोपड़ी
आज भी वहीँ प्रतिष्ठित कीर्ति-प्रतिमा राम की
आज भी वहीं समादृत रावणों के सिर सभी।

पर शंबूक की खोपड़ी
हँसती ठहाके की हँसी
युग-युगीन यातना के बाद भी
नसीहत नहीं स्वीकार की
हँसती सदा भेदक हँसी – –
“धन्य, धन्य, राम! धन्य राम-पंडितो!”
लगाती कहकहे बार-बार
हँसना उसकी नियति हो जैसे
हँसना उसका कर्म हो जैसे
हँसना उसका कर्म-फल हो जैसे।

वह हँसती जब पंडित कोई
उसे टाँगता एक से दूसरी डाल पर
जब छद्म की रस्सी टूट जाने से
डालों से टकराती
गिर आती नीचे
जब नए पंडित
उसे फिर टाँग देते नए जतन से
जब बड़े पंडित
छेड़ते धर्म, दर्शन, व्यवस्था, अध्यात्म की
बड़ी-बड़ी लग्गियों से।
जब मझोले पंडित
उसे न छेड़ने की देते सलाह
जब अधुनातन पंडित
उसे सदा के लिए डाल से उतार
ज़मीन की गहराईं में
गाड़ देने की चलाते हाल की चर्चा
जब सनातन पंडित
उसे ऊपर ही टाँग रखने की
परम्परा पर देते ज़ोर।

क्या कहा जाए शंबूक की
चोटी-नाक मुंडित निगोड़ी खोपड़ी को
पंडितों के ब्रह्ममान्य इंगित पर
राम-जैसे राजा के राजदण्ड का
उनके-जैसे न्यायी के न्याय का
उनके परम अचूक बाण का
मज़ा चखकर भी हँसती है।

वह शंबूकों पर भी हँसती
शंबूकों के लिए बेतरह
नम आँखे दिखानेवालों पर भी
ऐसे शंबूकों पर भी जो शंबूक की तरह
न जी सकते, न मर सकते
ऐसे भी जो शंबूक से पंडित हो
आपाद-मस्तक पंडित हो गए।

वह खुलकर ख़ूब हँसी
जब द्रोण ने
एकलव्य से अंगुष्ठ-दक्षिणा माँगी
जब मंगल पाण्डेय को
ब्रिटिश पंडितों ने फाँसी चढ़ाया
जब नमक-सत्याग्रही गांधी को
उन्होंने बंदी बनाया।
जब फुले ने
आर्यावर्त की धरती पर पाठशाला खोली
जब अम्बेडकर ने
मनुस्मृतिवाले देश का संविधान लिखा
जब लिंबाराम को
बीसवीं सदी के हस्तिनापुर ने स्वीकार किया
वह हँसती रही, हँसती रही
ऊँचे कानों को बाँग देती अज़ान पागल हँसी
अनेक कालातीत गुंबदों से अनवरत।

शंबूक की खोपड़ी की
अज़ान पागल हँसी से
ऊँचे कानवाले भी
पागल हुए बिना न रह सके
एक समय तो उसकी लाज़वाब हँसी से
पंडितों की चौहद्दी काँप उठी।
फिर उसे रामकथा के बरगद से उतार
ज़मीन में गाड़ने का टोटका शुरू हुआ
पर उसे सूंघकर खोद निकालनेवाले
फिर से उसी पेड़ पर टाँगनेवाले
उसी पेड़ के नीचे
रामराज्य की स्थापना में
ठोकरें लगा-लगाकर खेलनेवाले
पंडितों की भी कमी नहीं रही।
वह कभी पेड़ पर
कभी ज़मीन पर
कभी ज़मीन के भीतर
त्रिताप झेलती हुई
कभी हँसती, कभी मौन
कभी ठोकरें खाती
कभी अपने, कभी राम के
कभी रामपंडितों के
कथा-गुंफ में शाश्वत उत्तर-सी
जीती रही, जीती रही, जीती रही।

तुलसी बाबा ने आसन जमाने से पहले
रामकथा के वटवृक्ष से चुपचाप उतार
ज़मीन की गहराई में गाड़ दी खोपड़ी
मगर बाबा पंडित ही नहीं महापंडित थे
बड़ी सफ़ाई से लेनी चाही ख़बर
खोपड़ी की आद-औलाद तक की।
जब बाबा लगे फेंकने
शब्द-बाण अप्रत्यक्ष —
“शूद्र गँवार ढोल पशु नारी”
खोपड़ी भीतर से ही हँस पड़ी ठठाकर।
जब बाबा की सर्वजनीन मंगलाशा
व्यक्त होने लगी
कौटिल्य की तर्ज़ पर —
“शूद्र न गुन गन ग्यान प्रवीना”
तो फिर उन पर पुरज़ोर ठठाई।
जब बाबा ने पैंतरा बदला —
“नीच-नीच सब तरि गए
जे रहे नाम लवलीन”
तो हँस पड़ी फिर एक बार
ज़मीन-फाड़ हँसी —
किसके नाम में बाबा, भगवान के
या भगवान के पंडितों के!

तुलसी, याज्ञवल्क्य, कौटिल्य, मनु
कोई भी नहीं बचा
शंबूक की खोपड़ी से
वह सब पर हँसती आ रही
आज नए तुलसी, नए याज्ञवल्क्य
नए कौटिल्य, नए मनु की बिसात क्या!
अब तो राम-कथा के
शाखा-पत्रों पर भी
लिपिबद्ध होने लगा
उसकी हँसी का मर्म —
मेरे सत्याग्रह पर
रामबाण सधवानेवाले पंडितो!
मुझे धड़ से अलग करवाकर
तुम सतत पराजित हो चुके हो
वह सिर तो तुम्हारे निशाने पर ही था।
वह छाती तो नंगी थी ही
तुम कितने ही गांधियों को भूनो
सत्याग्रह कभी नहीं मरता, कभी नहीं
वह दिनोंदिन और अमर होता है
फैलता-उठता, अपना वितान तानता हर कहीं।

अब तो रामकथा के शाखा-पत्र
बाँचने भी लगे हैं
उसकी हँसी का मर्म —
युग-विधाता पंडितो!
मैं शंबूक की खोपड़ी
शोषित मानवता की पुरातन शक्ति हूँ
यदि शोषकों के कँटीले हाथ
दुनिया से जाने का नाम नहीं लेते
तो मैं भी रामकथा की ऊँचाई से
उनके कँटीले हाथो को
अपनी अपराजेय हँसी से आहत करती
कभी चुप नहीं रहूँगी।

बिक रही हैं लड़कियाँ

बिक रही हैं लड़कियाँ
धड़ल्ले से वेश-वृति में
बस उनका ख़रीद-फ़रोख्त
कोठे-मुजरे से हटकर
सौन्दर्य के नाम पर
अंग-प्रतियोगिताओं
अंग-मॉडलिंग, अंग-सिनेमा
अंग-प्रदर्शन के और तमाम
नए-से-नए कामुक लक-दक में
बड़ी सफ़ाई से
तब्दील हो गया है।

बिक रही हैं लड़कियाँ
धड़ल्ले से वेश-वृति में
शिखर आधुनिकता के
शौकीन महाजनों की
अति सम्मानित, भद्र भड़ुओं की
पारखी निगाहें
उनकी जवानी पर
उनके अंग-अंग पर
अंगों के उतर-चढ़ाव पर
अच्छी तरह लगी हुई हैं
सहभागी डिज़ाइनरों ने
उनके ख़ातिर
ऊँची एड़ी की सैंडल
कामुकता के उत्थान में
इसलिए डिज़ाइन की
कि चलते समय
वक्षोज और आगे उभर आएँ
नितम्ब और पीछे उभर जाएँ
कमर में और अधिक लचक आ जाए
चाल हंस की तरह हो जाए
जिससे बिकवाली में तेज़ी आए
सेंसेक्स ऊपर उठे
और निवेशकों के कारोबार में
भारी इज़ाफ़ा हो।

बिक रही हैं लड़कियाँ
धड़ल्ले से वेश-वृति में
अब तो उनके वज़न
लम्बाई–कमर
टांगों-जाघों के
बाकायदा मानदण्ड निर्धारित किए गए हैं
निर्धारित मानदण्ड के लिए
‘योगा’, व्यायाम, डायटिंग की
लोकल, राष्ट्रीय, अंतर-राष्ट्रीय दुकानें
तेज़ी के साथ फल–फूल रही हैं।

रंडी शब्द अपने आप में
कितना अश्लील है
कितना भोंडा है
कितना बिकाऊ अर्थात् लिये हुए है
समाज में इसकी बेहतरी के लिए
कारपोरेट-जगत के
देवताओं के इशारों पर
मॉर्डन बाज़ारवाद के नाम से
पुलिस पुराने ढंग के कोठों पर
रे’ड डालती है
पीटती है
पुराने ढंग की रंडियों को
उनके पुराने पड़ गए भड़ुओं को
लेकिन नए ज़माने का लाइसेंस लिये
भारी भीड़ के सामने
भरी जवानी में
अंगों का शो करनेवाली लड़कियाँ
पुलिस के सुरक्षा घेरे में चलती हैं
कमाती हैं लाखों-करोड़ों
पाती हैं बड़े-बड़े पुरस्कार
उनके टीम के
गाजे-बाजों के
उनके सारे तमाशों के
आधुनिक आयोजकों को
मिलता है बड़ा-बड़ा नाम
नोटों की बड़ी-बड़ी गड्डियाँ।

बिक रही हैं लड़कियाँ
धड़ल्ले से वेश-वृति में
उनके अंग-प्रत्यंग
अलग-अलग कोणों से
नए-नए फ़ैशन-ग्लैमर के साथ
वैभव की ऊँची-से-ऊँची
खिलखिलाती साज़-सज्जा में
रंगीन रोशनी के घने चकमक में
जुटाई गई
ख़ास भीड़ के सामने
अर्ध नग्न बिकते हैं
ऊपर-नीचे के लज्जा-अंग
बहुत महीन, बहुत पारदर्शी, बहुत कम
डिज़ाइन किए गए कपड़ों में
बहुतायत से बिकने लगे हैं
जबकि कमतरीन कपड़ों को
बर्ख़ास्त कर
अत्याधुनिक शैली के चहेते
सैर-सपाटे के खुलेपन तक
पूरी नग्नता के फ़ैशन की
एक और नई किस्म
खोज चुके हैं
बाज़ार में उस नई किस्म के
आने भर की देर है।

नामदारों के हस्ताक्षर
क्या नहीं कर सकते
पैसा और यौवन और बुद्धि और बल
अगर एक ही ध्रुव पर
इकट्ठे हो जाएँ
उनकी सुरक्षा का पहरा
शासन के हाथ में हो
तो किसकी मजाल
तनिक मुँह बिचका सके
उन पर उँगली उठा सके
इसलिए बिक रही हैं लड़कियाँ
धड़ल्ले से वेश-वृति में।

यह क्या हो गया है!

यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है
कि इस पर से सजी-सँवरी धूप का विश्वास उठ रहा है
इससे सोंधी मिट्टी की आशा टूट रही है
इस पर नक्षत्र चढ़ते कदम भरोसा नहीं करते
इससे नई निगाहों को आगे राह नहीं दिखती।

यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है
कि इसके रहते एक सफ़ेद मुँहचढ़ी ज़बान
देश की अलिजिह्वा तक का रंग
सफ़ेद डाई की तरह बदल रही है
वह शब्दों के तैलीय तरण-ताल में नहाकर
गावों तक आधुनिकता की कुलाँचे मार रही है
जगह-जगह भूमण्डलीकरण के कैम्प लगाकर
सब की नसों में कोकीन डाल रही है
और एक अरब लोगों की चेतना कोम्-आ में पहुँचाकर
उनके ख़ून-पसीने की सारी रंगत दुह रही है।

यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है
कि इसके ऊपर एक तेज़ी से फैलनेवाली बहुत महीन
असाध्य, परजीवी पर्त उग आई है
जो दिनोंदिन और ढीठ होती जा रही है।
सिर पर मँडरा रही है
आँखों में धूल झोंक रही है
कानों में कौड़ी डाल रही है
होंठों पे थिरक रही है
छाती पर मूँग दल रही है
जो हाथों को धोखे से बाँध रही है
पैरों पर कुल्हाड़ी चला रही है
और जो विषकन्या की तरह
हमारे देश के साथ अपघात कर रही है।

यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है
कि केवल पन्द्रह वर्षों का झाँसा देनेवाली
जैसे अब घर-बैठा बैठने पर तुल गई है
वह आज भी हमारी जीभ पर
षड्यन्त्र का कच्चा जमींकंद पीस रही है
हमारी सारी सोच-समझ हलक़ के गर्त में ढकेल
ख़ुद बाहर बेलगाम हो रही है
जो हमारे मन की नहीं कहती
हमारे मुख को नहीं खोलती
हमारे चेहरे की नहीं लगती
और जो आकाशबेल की तरह
हमारे देश के मानसवृक्ष पर फैलती जा रही है।

यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है
कि इसे सभी राजनगर हर साल एक बार
अपनी कमर झुकाकर प्रणाम करते हैं
स्तुति का आयोजन करते हैं
गले में वचन-मालाएँ लाद देते हैं
कुछ दिनों के तर्पण से कितना तृप्त करते हैं
फिर पूरे साल यह पिछलग्गू बनी दौड़ी फिरती है
राजमहिषी का पद छोड़ चाकरी करती है
और जो दूसरी सिरचढ़ी है, जिसकी तूती बोलती है
देश की बोलती बंद करने का दहशत फैलाती है।

यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है
जो रूपवान-गुणवती भिखारिन की तरह
गली-कूचे में धक्के खा रही है
हर कहीं बे-आबरू हो रही है
हर मोड़ पर आँसू बहा रही है
जिसे देख पालतू कुत्ते भौंकते हैं
आवारा दौड़ा-दौड़कर नोचते हैं
आख़िर, यह सब क्या हो गया है
यह हमारी ज़बान को क्या हो गया है।

एलिसी पैलेस से लौटे राष्ट्राध्यक्ष

मैं एक अछूत हूँ
अछूत राष्ट्रपति के रूप में भी
मेरी फ्रांस-यात्रा ऐतिहासिक रही
वहाँ के लोग
जाति-व्यवस्था से परिचित नहीं
पर यहाँ के लोगों ने
जानकारी देने में कोई कसर नहीं छोड़ी
नहीं तो मेरा अछूतपन इस तरह
कहाँ उजागर हो पाता!

वहाँ के अख़बारों ने वही लिखा
जो भारतीय अख़बार
पिछले तीन सालों से लिखते रहे
मुझे ऐसी टिप्पणियों से
फ़र्क़ नहीं पड़ता
मैं इनका आदी हो चुका हूँ
अब तो फ्रांसवाले भी जान गए
कि भारत में अस्पृश्यता
राष्ट्रपति-भवन तक
पीछा नहीं छोड़ती।

मुझे शंबूकों-एकलव्यों-जैसे
अपने चहरे-मोहरे का पता है
मुझे अच्छी तरह पता है
मेरा देश अछूतपन के बिना
मुझे सटीक पहचान नहीं देता
मैं अध्यापन, पत्रकारिता, राजनय
कुलाचार्यत्व के कर्मों से
जीवन भर जुड़ा रहकर भी
अछूत-का-अछूत ही रहा
मैं इंग्लैण्ड, आस्ट्रेलिया, वियतनाम
चीन, तुर्की, थाइलैण्ड
और जहाँ कहीं भी गया
अछूतपन से मेरा पिण्ड कहाँ छूटा।

व्यवस्था की आड़ में
राज, समाज, धर्म को खड़ाकर
मेरे जीवन को बाँधे रखने की
अनेक नागपाश नीतियाँ
कब नहीं प्रायोजित की गईं
जिन्हें अपने जीवन से बार-बार मेटकर भी
मैं अछूतपन से कब उबर पाया
शिक्षा-दीक्षा, धन-धाम, पद-प्रतिष्ठा
किसी से भी मेरा कितना उद्धार हो सका
कोई मुझे भीतर तक छूकर
देख सके तो देखे
मैं इस देश का
सबसे बड़ा अछूत हूँ।

मैं एक अछूत हूँ
मुझ-जैसे अछूतों का यह हाल है
तो उन अछूतों का क्या होता होगा
जो अछूतपन के चक्रव्यूह में
चारों ओर से घिरे हैं
जिनके ख़ून-पसीने का रंग
यहाँ सबसे सस्ता है
जिनके बच्चों के गले में
पैदा होते ही
अछूत के नाम का पट्टा
डाल दिया जाता है
अपना मतलब गाँठने के लिए।

मैं एक अछूत हूँ
मैं दुनिया से नहीं डरता
दुनिया के बड़े-से-बड़े
झूठ से नहीं डरता
ज्ञान, संघर्ष, विवेक सब मुझसे
बराबर हाथ मिलाते हैं
पर मैं इस देश को
अपने ही देश को
छूने से डरता हूँ
मेरे निकट मत आओ
मेरे पास मत बैठो
मुझे छुओ मत
मुझे छूने भर से पाप लगता है
मेरा छुआ
अन्न, जल, भूमि सब कुछ
अपवित्र हो जाता है
अब तो मैं घर-बाहर, देश-विदेश
हर कहीं अछूत हूँ।

दूसरा चेहरा 

धरती
नारी
प्रकृति
मेरी हवस का
सबसे ज़्यादा शिकार हुईं।
आकाश
पर्वत
समुद्र
मैंने किसी को
नहीं छोड़ा।
अंतरिक्ष
चाँद-सितारे
ग्रह-उपग्रह
सब मेरी पहुँच के
दायरे में हैं।
मैं निचोड़ता हूँ
ब्रह्माण्ड
अपने सुख के लिए।

अंधे-मरकहे
बैल की
सींग-जैसी
अपनी महत्त्वाकांक्षा के
तपते-भुनते
तंग चौबारे से
मैं अपने
भारी-भरकम
आणविक शब्द
दुनिया के
कानों पर
विस्फोट करता हूँ।
मैं कभी
धर्म
कभी आपद्धर्म
और कभी
धर्मयुद्ध के
जैव-रासायनिक अस्त्र
फेकता हूँ
उनकी सोच की
मुँडेरों पर
जो मेरे द्वारा
गढ़ी गई परिभाषाएँ
लाँघने की
जुर्अत करते हैं।

राज
उसकी गद्दी
समाज
उसके चबूतरे
मैंने बनाए हैं
कल-बल-छल के
तंबू-कनात
मैंने खड़े किए हैं
मंदिर-मस्जिद के
छतखम्भ
मैंने तराशे हैं
मज़बूत गाड़े हैं।
प्रतिबद्ध देवता
उनकी सत्ता
शैतान-मसान
उनका भय
सब को
अस्तित्व
मैंने दिया है
सब पर
सत्य-असत्य की
कलई
मैंने चढ़ाई है।

धरती माँ है
आसमान पिता है
मुझे पता है
पर मेरी निगाह
आसमान पर
अच्छी तरह है
और धरती
मेरे पैरों के
नीचे है
उसकी कोख पर
उसकी गोद पर
गोद की
किलकारियों पर
मेरे तेवर
निगरानी रखते हैं
सब को
मेरे हिसाब से
बड़ा होना है
जो बड़े हैं
मेरे हिसाब से
हँसना-रोना है
या मेरी
त्योरियों के कोप से
नेपथ्य में
दफ़न होना है।

जब मुझे
पुरुषार्थ कोई
दूर नज़र आता है
बाधाएँ बढ़-चढ़कर
लाग-डाँट करती हैं
तब मेरी
आँखों में
ख़ून उतर आता है
मुख-विवर
विषदंत काढ़
फैल-फैल जाता है
हाथ-पैर
बहुगुने हो
हिंसक हो जाते हैं
तब इंसान क्या
उसकी दो पल की
जान क्या
सारा आचार-विचार
सारी इंसानियत
मेरे लिए
महज़ मूली-गाजर
हो जाती है
मैं उसे
बथुए की तरह
एक झटके में
उखाड़ फेंकता हूँ।

मैं बहुत सभ्य
ऊपर-ऊपर हूँ
भीतर नाख़ून बड़े
दाँत बड़े
आँत बड़ी
पशु-जैसे बाल बड़े
मन के
अँधेरे में
काले पहाड़ बड़े
अंधी गुफाएँ हैं
जंगल हैं
विकट बड़े
भीतर-ही-भीतर
मैं नग्न
विकल रीछ-सा
बाहर से
दिखने में
मर्द की औलाद हूँ।

मैं समय के
घोड़े पर
चाबुक बरसाता हूँ
दौड़ाता हूँ
अपनी मनमानी राह पर
गाँव पड़े
शहर पड़े
सुख-चैन
नींद पड़े
दर्द-आह
चीख पड़े
बेकाबू टाप
कहाँ रुकते हैं
बनते-बिगड़ते हैं
राज व समाज
मेरे कदमों के साथ
मगर ख़ून के
निशान छोड़
आगे बढ़ जाता हूँ।

आते उग बाल
जब सुअर के
मेरी आँखों में
पिता-पुत्र
भ्राता-पति
कोई नहीं होता मैं
अपने-पराए का
भेद नहीं होता कुछ
आते हैं मौके तो
ख़ुद को
खा जाता हूँ।
न इस पार का
न उस पार का
लोक-परलोक
मैं कहीं का
कभी होता नहीं
न राजा का
न प्रजा का
न घर का
न बनिज का
हर घेरे-बसेरे में
मतलब का यार हूँ।

झुकते संबंध सब
आकर
मेरी शर्तों पर
बाकी को
झाड़ू लगा
कूड़े की राह
दिखा देता हूँ
सब की आशा
सब की निष्ठा
सब की सेवा
नाम-दाम वाली
ऊँची बोली के
झटपट बाज़ार में
बेच-बाचकर
मैं अपने
मन के नाचघर में
अहं की
नर्तकी के आगे
घोर निजता का
मदप्याला थामे
बस झूमता
रहता हूँ
झूमता रहता हूँ।

प्रश्न यह नहीं है
कि मैं
किस देश का हूँ
किस धर्म का हूँ
किस जाति का हूँ
प्रश्न यह है
कि इस
भीड़-भाड़ में
मेरी पक्की
पहचान क्या है
और यह पूरी भीड़
जो मेरी
धमा-चौकड़ी से
एड़ी से चोटी तक
लहू-लुहान है
मेरी पहचान
मेरी लुप्तमुद्रा की
पक्की पहचान
ज़रा मैं भी तो सुनूँ
बताती क्या है।

“नीच! नराधम!
दुरात्मा!”
क्या कहा ?
अरे भाई,
मैं आदमी नहीं हूँ
मैं कोई
पापी-दुराचारी नहीं
कोई दुष्कर्म
मैंने नहीं किया
दुनिया का
कोई अधर्म-अपराध
मेरे नाम
नहीं लिखा जा सकता
मैं पूरी तरह
बेदाग़ हूँ।

मैं न आदमी हूँ
न ही नर-कापालिक
न ही मैं
नर-पिशाच हूँ
मैं तो सिर्फ़
चेहरा हूँ, चेहरा
वह भी गायब चेहरा
जो अक्सर
दिखाई नहीं देता
लेकिन होता है
सभ्य आदमी के
पास होता है
उसका चेहरा
उसका दूसरा चेहरा।

दूसरा चेहरा 

धरती
नारी
प्रकृति
मेरी हवस का
सबसे ज़्यादा शिकार हुईं।
आकाश
पर्वत
समुद्र
मैंने किसी को
नहीं छोड़ा।
अंतरिक्ष
चाँद-सितारे
ग्रह-उपग्रह
सब मेरी पहुँच के
दायरे में हैं।
मैं निचोड़ता हूँ
ब्रह्माण्ड
अपने सुख के लिए।

अंधे-मरकहे
बैल की
सींग-जैसी
अपनी महत्त्वाकांक्षा के
तपते-भुनते
तंग चौबारे से
मैं अपने
भारी-भरकम
आणविक शब्द
दुनिया के
कानों पर
विस्फोट करता हूँ।
मैं कभी
धर्म
कभी आपद्धर्म
और कभी
धर्मयुद्ध के
जैव-रासायनिक अस्त्र
फेकता हूँ
उनकी सोच की
मुँडेरों पर
जो मेरे द्वारा
गढ़ी गई परिभाषाएँ
लाँघने की
जुर्अत करते हैं।

राज
उसकी गद्दी
समाज
उसके चबूतरे
मैंने बनाए हैं
कल-बल-छल के
तंबू-कनात
मैंने खड़े किए हैं
मंदिर-मस्जिद के
छतखम्भ
मैंने तराशे हैं
मज़बूत गाड़े हैं।
प्रतिबद्ध देवता
उनकी सत्ता
शैतान-मसान
उनका भय
सब को
अस्तित्व
मैंने दिया है
सब पर
सत्य-असत्य की
कलई
मैंने चढ़ाई है।

धरती माँ है
आसमान पिता है
मुझे पता है
पर मेरी निगाह
आसमान पर
अच्छी तरह है
और धरती
मेरे पैरों के
नीचे है
उसकी कोख पर
उसकी गोद पर
गोद की
किलकारियों पर
मेरे तेवर
निगरानी रखते हैं
सब को
मेरे हिसाब से
बड़ा होना है
जो बड़े हैं
मेरे हिसाब से
हँसना-रोना है
या मेरी
त्योरियों के कोप से
नेपथ्य में
दफ़न होना है।

जब मुझे
पुरुषार्थ कोई
दूर नज़र आता है
बाधाएँ बढ़-चढ़कर
लाग-डाँट करती हैं
तब मेरी
आँखों में
ख़ून उतर आता है
मुख-विवर
विषदंत काढ़
फैल-फैल जाता है
हाथ-पैर
बहुगुने हो
हिंसक हो जाते हैं
तब इंसान क्या
उसकी दो पल की
जान क्या
सारा आचार-विचार
सारी इंसानियत
मेरे लिए
महज़ मूली-गाजर
हो जाती है
मैं उसे
बथुए की तरह
एक झटके में
उखाड़ फेंकता हूँ।

मैं बहुत सभ्य
ऊपर-ऊपर हूँ
भीतर नाख़ून बड़े
दाँत बड़े
आँत बड़ी
पशु-जैसे बाल बड़े
मन के
अँधेरे में
काले पहाड़ बड़े
अंधी गुफाएँ हैं
जंगल हैं
विकट बड़े
भीतर-ही-भीतर
मैं नग्न
विकल रीछ-सा
बाहर से
दिखने में
मर्द की औलाद हूँ।

मैं समय के
घोड़े पर
चाबुक बरसाता हूँ
दौड़ाता हूँ
अपनी मनमानी राह पर
गाँव पड़े
शहर पड़े
सुख-चैन
नींद पड़े
दर्द-आह
चीख पड़े
बेकाबू टाप
कहाँ रुकते हैं
बनते-बिगड़ते हैं
राज व समाज
मेरे कदमों के साथ
मगर ख़ून के
निशान छोड़
आगे बढ़ जाता हूँ।

आते उग बाल
जब सुअर के
मेरी आँखों में
पिता-पुत्र
भ्राता-पति
कोई नहीं होता मैं
अपने-पराए का
भेद नहीं होता कुछ
आते हैं मौके तो
ख़ुद को
खा जाता हूँ।
न इस पार का
न उस पार का
लोक-परलोक
मैं कहीं का
कभी होता नहीं
न राजा का
न प्रजा का
न घर का
न बनिज का
हर घेरे-बसेरे में
मतलब का यार हूँ।

झुकते संबंध सब
आकर
मेरी शर्तों पर
बाकी को
झाड़ू लगा
कूड़े की राह
दिखा देता हूँ
सब की आशा
सब की निष्ठा
सब की सेवा
नाम-दाम वाली
ऊँची बोली के
झटपट बाज़ार में
बेच-बाचकर
मैं अपने
मन के नाचघर में
अहं की
नर्तकी के आगे
घोर निजता का
मदप्याला थामे
बस झूमता
रहता हूँ
झूमता रहता हूँ।

प्रश्न यह नहीं है
कि मैं
किस देश का हूँ
किस धर्म का हूँ
किस जाति का हूँ
प्रश्न यह है
कि इस
भीड़-भाड़ में
मेरी पक्की
पहचान क्या है
और यह पूरी भीड़
जो मेरी
धमा-चौकड़ी से
एड़ी से चोटी तक
लहू-लुहान है
मेरी पहचान
मेरी लुप्तमुद्रा की
पक्की पहचान
ज़रा मैं भी तो सुनूँ
बताती क्या है।

“नीच! नराधम!
दुरात्मा!”
क्या कहा ?
अरे भाई,
मैं आदमी नहीं हूँ
मैं कोई
पापी-दुराचारी नहीं
कोई दुष्कर्म
मैंने नहीं किया
दुनिया का
कोई अधर्म-अपराध
मेरे नाम
नहीं लिखा जा सकता
मैं पूरी तरह
बेदाग़ हूँ।

मैं न आदमी हूँ
न ही नर-कापालिक
न ही मैं
नर-पिशाच हूँ
मैं तो सिर्फ़
चेहरा हूँ, चेहरा
वह भी गायब चेहरा
जो अक्सर
दिखाई नहीं देता
लेकिन होता है
सभ्य आदमी के
पास होता है
उसका चेहरा
उसका दूसरा चेहरा।

पहचानों मैं कौन हूँ!

कभी जाड़े की धूप
कभी बरसाती घाम
कभी दुपहरिया गर्मी की होती हूँ
रहती हूँ वैसे
पूसी चाँदनी के भेष में।

आँचल में दूध नहीं
डिब्बे का दूध है
आँखों में पानी नहीं
पूसी बरसात है
स्मित में सुबह नहीं
ज़हर छहर जाता है
हाथों में कोंपल नहीं
शूलों की चुभन है
वक्ष के घरौंदे में
फूल नहीं, कली नहीं, मौसम नहीं
किसी मूरत की गढ़न नहीं
पत्थर-ही-पत्थर है।

पाँव तले रहते
चौराहों के पाँवड़े
रहती हूँ नए
कन्हइयों के गाँव रे
बुद्धि-गोरू-सी
नंगेपन में आसक्ति है
रुपहली-जगमगी
दुनिया से भक्ति है।

पैरों में रुनझुन नहीं
मेंहदी की विहँस नहीं
फिर भी तो बहुत-से
पीछे लगे रहते हैं
घूँघट-आली नहीं हूँ
नक़ाबवाली नहीं हूँ
क्रीम से, पाउडर से, सेंट से
कजरारी धार से
लिपिस्टिक की गाढ़ से
अभिनव संस्कार से
छाती के दाग़ छिपा लेती हूँ
चेहरे पर रंग चढ़ा लेती हूँ।

कठमस्त आँखों से
चाँद नहीं दिखता
अमावस के तारे ही
चुनती-बदलती हूँ
वैसे तो अधरों का
डिनर बहुत भाता है
फिर भी कोई स्वाद
नहीं टिकता
नाचते हैं उँगलियों पर
बहुतेरे लीलाकलम
इकहरे सुगन्ध से
मन नहीं भरता
कोई दिल तक
नहीं उतरता।

बच्चों की झंझट की
होती कम चाह मुझे
रंग उतर जाता है
साख बिगड़ जाती है
होते जो मुझे नहीं
आया को रोते-निहारते हैं
मेरे हसबैंड रात एक बजे
झूमते-झामते घर पहुँचते हैं
उनके मुखड़े पर
काजल के सब चीन्हे
लाली के सब धब्बे
देखती हूँ अच्छी तरह
पूछती नहीं।

शिव के इकार में
सिंदूरी भार में
कितना कुछ बची हूँ
कितना चुक गई हूँ
इसका एहसास यही—
कोकीनी राहों में
गर्त-गर्त हो-होकर
चढ़ती हूँ डोली पर
गन्ने की खोई-सी
आगे फिर पेरते हैं
सेंठे-सा सूखा मन
लौट वही अँधियारे
फिर उन्हीं मुखौटों से
फिर उन्हीं गलियारों में।

बेहया की पौध हुई
चलनी-सी प्यास मेरी
बुझा नहीं पाते जिसे
अपनों के फ़ासले
रिश्ते-नातों के
डीह पड़े मक़बरे
बाहरी उजालों में
जो कुछ भी हाथ लगा
हाँफ रही उसे लिये
भाग रही शहर-शहर।

भोगे हुए सच
मुझे बेगाने लगते हैं
बीते की पाटी पर
किसी भी पल के
कहीं कोई चिह्न नहीं रुक पाते
फिर भी निचोड़ती हूँ
रीते निश्शेष को
कटी पतंग की तरह
ओर-छोर विहीन
बे-सिर-पैर की ज़िंदगी
बेहद पसंद मुझे।

मैं पार्वती नहीं
मरती रहूँ जनम-जनम
एक बौरहे पर
सोने की लंका में
बाट जोहूँ सीता नहीं
संख्या में बँध जाऊँ
सम्मुख समाज के
ऐसी द्रोपदी नहीं
उर्वशी नहीं
जो एक पुरूरवा के लिए
इन्द्रपुरी छोड़ दूँ
छल्ले की क्या बिसात
कई दुष्यंत हैं
मेरी निगाहों में।

मैं विकृति हूँ
सिनेमा-हॉल की
बहुरंगी रूपसी
चौपाटी-ढाल की
घटती हूँ छद्म–सी
तिलस्म-सी, ऐय्यारी-सी
पावों में टूट गए
नागफनी काँटे-सी
कभी-कभी पेड़ पर
छाई अमरबेल-सी
कभी-कभी मुँहबोली
लिपट गई घुँघची-सी
और कभी राह चले
सिगरेटी धुआँ-सी
रत्ती भर दर्द को
क्षण का भी टुकड़ा नहीं
सुख की दहलीज़ पर
मनचाही यायावरी।

मैं नागरी राधा बताती हूँ
अपने हर चहेते से
पर सखियों से तनिक भी
इज़हार नहीं करती हूँ
हर छलिया कृष्ण का
कुछ ही समय भोगती हूँ
किसी के छलावे की
आह नहीं भरती हूँ।

वार-वनिता नहीं हूँ
पूरी तरह घरेलू भी नहीं
पर बाज़ार हूँ
अब तो बताओ
मैं कितनी साकार हूँ
कितनी मौलिक हूँ
कितनी नवीन हूँ ?

क्या नहीं जानते
पहचानते नहीं
मैं कितनी सर्वमान्य हूँ
नवजन-आकर्ष की
विकसित आन-बान हूँ!
आखिर क्यों नहीं बोलते
क्या अब भी अजनबी हूँ
सोच क्या रहे हो –
मैं पंचवटी की छलना हूँ ?
अपने ही अस्तित्व की विरोधिनी
युग-युगीन परित: पोषित नारी-अतिमा ?

नहीं, नहीं —
देखो मेरी कितनी लंबी नाक है
रोज़-बरोज़ बढ़ रही है
मुझे पहचानने के लिए भी
नव दृष्टि चाहिए
सब के बस की नहीं
नवीनों की प्यारी हूँ
ओवर-सूटवालों की
हिप्पी हेयरवालों की
डिस्को-बिअर वालों की
कैबरे मतवालों की
तुम से तो बाज आई
ओ भारत-भोंदू,
बाय! बाय!

वह कौन-सी निश्छलता है!

संसार में आम के पेड़ बहुत हैं
तो बबूल के भी कम नहीं
या यों कहें
बबूल के पेड़ बहुत हैं
तो आम के भी हैं
ग्रह-नक्षत्रों से भरा आकाश
पराया तो नहीं
पर कितना अपना है
हाथ उठाने पर पता चलता है।

पीड़ा जब सुई बनकर हृदय में सालती है
तो पलकें बोझिल हो जाती हैं
आँखों पर स्याह पर्दा छाने लगता है
मन गहराने लगता है
हाथ-पाँव बँध-से जाते हैं
और ज़िन्दगी-जैसे कफ़न ओढ़कर लेट जाती है
हठ करके न उठने के लिए।

कौन होता है तब उस समय पास
कोई तो नहीं
भरे-पूरे संसार में सगे-से-सगा भी नहीं
न अपना, न पराया, न धन-दौलत
न घर-बार, न पद-प्रतिष्ठा
कोई नहीं, कुछ भी नहीं
तन-मन तक उस समय
साथ छोड़े हुए होते हैं।

उस उचाट में इस लोक से
भागने की विचित्र इच्छा होती है
पर ऐसा क्यों होता है
यह पता नहीं होता
भूख-प्यास कुछ नहीं लगती
रोना भी नहीं आता, न कुछ कह पाना
बस बहुत गहरी नींद में
सो जाने की अधूरी कोशिश होती है।

मैंने आम के पेड़ से
एक परी उतरते देखा
साँवले झाँईदार चेहरेवाली परी
घुटने तक अधोवस्त्र
हाथों में मंजरी लिये हुए
वह कौन-सी निश्छलता है
जिसे बाँहों में भरकर मैं रोता हूँ
वह देर तक सीने से लगी रही।

फिर एक बियाबान
एक रास्ता, एक पगडण्डी
जिस पर बैलगाड़ी के चक्कों की लकीरें हैं
दूर-दूर इक्की-दुक्की झोपड़ियाँ
बबूल के तमाम काँटेदार बड़े-बड़े झपके पेड़
नदी का ऊबड़-खाबड़ कछार
जहाँ हर साल बाढ़ आती है
उसी में वह कहीं खो गई।

पहले तो मैं उसे इधर-उधर खोजता हूँ
आवाजें लगता हूँ
पर जब वह नहीं मिलती
तो बबूल की टहनियाँ नोचने लगता हूँ
काँटों को कोसने लगता हूँ
बड़बड़ाने लगता हूँ
पागलों-जैसी हरकतें करने लगता हूँ

तभी बबूल की कुछ टहनियाँ मेरी ओर बढ़ीं
मुझे पकड़कर ऊपर हवा में उठा लिया
आकाश की ऊँचाई तक ले गईं
ग्रह-नक्षत्र हँसते रहे
फिर फटकारते हुए नीचे पटक दिया –
मरना है तो मरो
पर इस तरह चीखो-चिल्लाओ नहीं
तुम्हें पता नहीं, तुम्हारी इन हरकतों से
वातावरण भंग होता है।

मेरे पास आँकड़ा नहीं है!

मेरे पास
आँकड़ा नहीं है
कि छल-कपट, धोखा
फिर बलात्कार
फिर ह्त्या के लिए
उच्चतम न्यायालय से
मौत की सज़ा पाए
कितने ह्रिंस हैवानों को
राष्ट्रपति-भवन ने
क्षमा-दान दे दिया।

मेरे पास
छब्बीस जनवरी
उन्नीस सौ पचास से
अब तक का
आँकड़ा नहीं है।

नहीं है
मेरे पास आँकड़ा
कि कितनी दामिनियों की
मौत से जुड़ी
अंत पीड़ा
कठोर, अश्लील यातना
अपमान
राष्ट्रपति-भवन को
निर्मूल्य
बेमतलब लगे
और क्रूर कामुकता के
कितने कातिल गैंडों को
अब तक
बक्शा गया।

उच्चतम न्यायालय से
दुष्कर्म के लिए
सज़ायाफ्ता
निर्दय, हत्यारे
बलात्कारियों को
मृत्यु-दंड का
क्षमा-दान!
क्या बलात्कारियों की
बेरहम जमात को
रक्तबीज की तरह
बढ़ावा नहीं देता ?
क्या आए दिन
आधी आबादी से
कुछ और सुकोमल
इच्छाओं-भावनाओं को
खून के आँसू
नहीं रुलाता ?
क्या रोज-रोज
कुछ और
दामिनियों की
अकाल, दानवी बलि
नहीं लेता ?

पुलिस
डॉक्टर
वकील
जज
सब-के-सब
‘रेअर और रेअरेस्ट’ की
बात करते हैं
पर कितनी
‘रेअर और रेअरेस्ट’
दामिनियीं रहीं
कि जिनकी
चीख-पुकार
और गुहार
और आँसू
और पीड़ा
और अपमान
और शोक
उच्चतम न्यायालय के
न्याय के बावजूद
राष्ट्रपति-भवन को
नासमझ लगे।

मेरे पास
आँकड़ा नहीं है
बीते चौसठ सालों का
कि रेअरेस्ट
नारी व उसकी आत्मा
कब-कब
और कहाँ-कहाँ
सातों सागरों को
भर देने जितना
आँसू बहाती रही
दुनिया की सारी
अदालतों के
कानों को
गुँजा देनेवाली
पुकार-गुहार लगाती रही
और आखिरकार
राष्ट्रपति-भवन
पसीजा भी तो
नीच, कुकर्मी
लम्पटों, गुण्डे-बदमाशों
हैवानों के लिए।

मैं बेटी का रोना
समझता हूँ
क्योंकि मैं एक पिता हूँ
मैं बहन का दर्द
जानता हूँ
क्योंकि मैं एक भाई हूँ
मैं पत्नी का मान
मानता हूँ
क्योंकि मैं एक पति हूँ
और माँ
माँ तो माँ होती है
संतानवती
वेश्या भी
ममत्व का
आगार ढोती है।
इसलिए
मेरा सीना
छलनी-छलनी होता है
कि नारी के
चारों रूपों में
समाहित नारीत्व
नर से नारायण तक को
सनेह अमृत की
सौगात देता नारीत्व
देश की
स्वतंत्रता
संप्रभुता
महान संविधान के
संरक्षण में भी
आज तक सुरक्षित
क्यों न हो सका।

मेरे पास
आँकड़ा नहीं है
उच्चतम लोक-सदन
उच्चतम न्याय-सदन
उच्चतम राज-सदन
आँखों पे क़ानून की
पट्टी बाँधे
बस वही रेअरेस्ट का
रट्टा लगा रहे हैं
जबकि रेअरेस्टों के
तमाम गुनहगार
ठिठोली उड़ा रहे हैं
मेरी रेअरेस्ट माँओं
रेअरेस्ट बहनों
रेअरेस्ट बेटियों की
उनकी निर्मम मौत
और उनकी
चीखें मारती आत्मा की
ऊपर से घूम रहे हैं
सीना ताने सरे बाज़ार
या जेलों में
पाले जा रहे हैं
मरकहे साँड़ की तरह।

…और मेरे पास
आँकड़ा नहीं है,
नहीं है
मेरे पास आँकड़ा!

काली नदी के उस पार

जो मैं खोजता रहा अपने आकाश का घनसार-पाटल
अपनी धरती का कँवल-पंख
तो बस मैं खोजता ही रहा
सबकुछ उड़ाए लिए जाती हवाओं के बहकावे में
एकटक आँखों में सूना आसमान साधे
कटी नाभिवाले अधमरे जवान मृग की तरह।

काले बदलों ने चाँद ढक लिया
पहले अधाधुंध अंधड़
दसों दिशाएँ मिलकर एक हो गई
फिर मूसलाधार वर्षा जिसने रात-दिन एक कर दिया
जिसमें भीगता-भागता, गिरता-पड़ता
उखड़े-पुखड़े पेड़-पौधों पर आँसू बहाता
मैं बस नापता रहा मृत्यु-पथ
कहीं कोई मददगार न मिला।

एक-एक कर सारे रास्ते आँखें मूँदने लगे
न मोड़, न चौराहे, न कोई अंत
काँटों, रोड़ों, कत्तलों से लहूलुहान
मेरे धड़ाम से ढेर हुए पत्थर हो गए बोझ को छोड़
समय चलता चला गया दूर बहुत दूर
न तो उसने मुड़कर देखा
न रुका
न मेरी गुहार सुनी।

सुना है किसी दूर देश में
मेरे मन का हरसिंगार खिलता है
अपने रंग-सगंध के साथ
मैं वहाँ जाना चाहता हूँ
बड़ा अनोखा मौसम है उस देश का
मैं निहारना चाहता हूँ उस देश का आकाश
देखना चाहता हूँ उस देश की धरती
मैं हृदय से छूना चाहता हूँ
उस पुष्पवृक्ष का तना, डालें, पत्तियाँ और मन
जिसके बिना मैं यहाँ पत्थर-सा रह गया हूँ।

मेरे और उस देश के बीच
एक नदी बहती है
काली नदी
जो हर साँझ, हर सुबह
वासंती हो जाती है
जन्म लेने लगती है उसमें सुनहरी तरंगें
और वह नदी हँस उठती है
बाकी समय उसकी स्याह सूरत से
बहुत डर लगता है
साहस नहीं होता उसके तट तक जाने का।

पर अब साँझ को
या सुबह को क्या देखना
अब क्या देखना घड़ी की सुइयाँ बार-बार
मैंने कर्म के देवता को करीब से जाना है
भाग्य के देवता को बहुत परखा है
अब तो हर समय साँझ है
हर समय सुबह है मेरे लिए
मैं इस झूठी धरती
इस झूठे आकाश
और इन झूठी हवाओं के बहकावे में
अब और नहीं ठरना चाहता।

रक्तदीप

वह रक्तदीप जलता आया
सारी उम्र
अँधेरों से जूझता
कभी झूठ तो कभी
झूठे सच से घिरा
निपट अकेला
भीड़–भाड़ भरी बस्ती में।

वह मंदिर का
धातु का बना
देवत्व उजागर करता
पवित्र घृतदीप नहीं।
न तेल, न बाती, न दीवट
कच्ची बेरंग मिट्टी का
छोटा-सा रक्तदीप
जो माटी के घरौंदे में
झुक-झुक जाता
लहर सँभालता
तिल-तिल संघर्ष करता
बस जलता आया।

जिन हाथों ने बाती दी
स्नेह डाला
ज्योति जगाई
हथेली से ओट किया
उनके साए उठ गए
जो झूमती लौ के साथ
कुछ क्षण मुस्कुराए
छोड़कर जाने कहाँ चले गए
काठ का जर्जर दीवट
दो दिन टिका, ढह गया
औचक गिरा ज़मीन पर
तेल-बाती सब बिखर गए
पर जलता आया
वह जीवट का धनी रक्तदीप।

अपना रक्त पीता
वह हठी रक्तदीप
रोशनी की भाँग खाए
बस जलता आया।
सितारे हँसते
चाँद हँसता
जुगनू कानों तक हँस-हँस जाते
कभी-कभी अभागेपन की
मार से आहत
संज्ञाहीन होकर
वह स्वयं पागल हँसी हँसता
पर जलता आया, जलता आया
जलता ही आया।

वह रक्दीप
छलनाओं के आगे आँख मूँदे
निरन्तर जलता आया
अबोध विश्वास के साथ
आलोक-पथ के लिए
तत्वज्ञान के लिए
संसार-सार के लिए
और छलनाएँ ठगी–ठगी देखती रहीं
उसे जलते हुए।

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