संतोष आनन्द की रचनाएँ

ओ मेघा रे, मेघा रे

ओ मेघा रे, मेघा रे

ओ मेघा रे, मेघा रे मत परदेस जा रे
आज तू प्रेम का संदेश बरसा रे |
मेरे गम की तू दवा दे
आज तू प्रेम का संदेश बरसा रे |

चलो और दुनिया बसाएँगे हम-तुम
यह जन्मों का नाता निभाएँगे हम-तुम
ओ मेघा रे, मेघा रे हमको तू दुआ दे
आज तू प्रेम का संदेश बरसा रे

ओ मेघा रे मेघा रे……

फ़िल्म : प्यासा सावन (1981)

इक प्यार का नग़मा है 

इक प्यार का नग़मा है, मौज़ों की रवानी है
ज़िन्दगी और कुछ भी नही,तेरी मेरी कहानी है…

कुछ पा कर खोना है, कुछ खो कर पाना है
जीवन का मतलब तो ,आना और जाना है
दो पल के जीवन से इक उम्र चुरानी है..

तू धार है नदिया की, मैं तेरा किनारा हूँ
तू मेरा सहारा है, मै तेरा सहारा हूँ
आँखो मे समन्दर है, आशाओ का पानी है..

तूफ़ान तो आना है, आकर चले जाना है
बादल है यह कुछ पल का, छा कर ढल जाना है
परछाईयाँ रह जाती, रह जाती निशानी है..

जो दिल को तसल्ली दे वो साज़ उठा लाओ
दम घुटने से पहले ही आवाज़ उठा लाओ
ख़ुशियों की तमन्ना है, अश्को की रवानी है ..

ज़िन्दगी और कुछ भी नही, तेरी मेरी कहानी है…

फ़िल्म : शोर (1972)

मै ना भूलूँगा

मै न भूलूँगा
मै न भूलूँगी
इन रस्मों को, इन क़समों को, इन रिश्ते-नातों को

चलो जग भूलें, ख्यालों मे झूलें
बहारो मे डोले, सितारों को छू लें
आ तेरी मै माँग सँवारूँ तू दुल्हन बन जाए
माँग से जो दुल्हन का रिश्ता मै न भूलूँगी…

समय की धारा मे उमर बह जानी है
जो घड़ी जी लेंगे वही रह जानी है
मै बन जाऊँ साँस आख़िरी, तू जीवन बन जाए
जीवन से साँसो का रिश्ता मै न भूलूँगी

गगन बनकर झूमे, पवन बनकर झूमे
चलो हम राह मोड़ें, कभी न संग छोड़ें
तरस चख जाना है, नज़र चख जाना है
कहीं पे बस जाएँगे, यह दिन कट जाएँगे
अरे क्या बात चली, वो देखो रात ढली
यह बातें चलती रहें, यह रातें ढलती रहें

मै न भूलूँगा, मै न भूलूँगी…

फ़िल्म : रोटी, कपड़ा और मकान (1974)

तेरा साथ है तो

तेरा साथ है तो, मुझे क्या कमी है
अँधेरो से भी मिल रही रोशनी है
कुछ भी नही तो कोई ग़म नही
हाय एक बेबसी बन गई चाँदनी है

टूटी है कश्ती तेज़ है धारा
कभी ना कभी तो मिलेगा किनारा
बही जा रही यह समय की नदी है
इसे पार करने की आशा जगी है

हर इक मुश्किल सरल लग रही है
मुझे झोपड़ी भी महल लग रही है
इन आँखों मे माना नमी ही नमी है
मगर इस नमी पर ही दुनिया थमी है

मेरे साथ तुम मुस्कुरा के तो देखो
उदासी का बादल हटा के तो देखो
कभी हैं यह आँसू कभी यह हँसी हैं
मेरे हमसफ़र बस यही ज़िन्दगी है|

फ़िल्म : प्यासा सावन (1981)

मैं हूँ प्रेम रोगी

अरे कुछ नहीं, कुछ नहीं
फिर कुछ नहीं है भाता, जब रोग ये लग जाता
मैं हूँ प्रेमरोगी, मेरी दवा तो कराओ
जाओ, जाओ, जाओ, किसी वैद्य को बुलाओ

सोच रहा हूँ जग क्या होता, इसमें अगर ये प्यार न होता
मौसम का अहसास न होता, गुल-गुलशन गुलज़ार न होता
होने को कुछ भी होता पर, ये सुन्दर संसार न होता
मेरे इन ख़यालों में तुम भी डूब जाओ…

यारो ! है वो क़िस्मत वाला, प्रेमरोग जिसे लग जाता है
सुख-दुख का उसे होश नहीं है, अपनी लौ में रम जाता है
हर पल ख़ुद ही ख़ुद हँसता है, हर पल ख़ुद ही ख़ुद रोता है
यह रोग लाइलाज सही, फिर भी कुछ कराओ…

और नहीं तो कुछ, मेरे यार को बुलाओ, दवा तो कराओ
मैं हूँ प्रेमरोगी, मेरी दवा तो कराओ
जाओ, जाओ, जाओ, किसी वैद्य को बुलाओ…

फ़िल्म : प्रेमरोग (1982)

इन हसीन वादियों से दो-चार नज़ारे चुरा लूँ तो चलें 

इन हसीन वादियों से दो-चार नज़ारे चुरा लें तो चलें
इतना बड़ा गगन है, दो-चार सितारे चुरा लें तो चलें

कहीं कोई झरना ग़ज़ल गा रहा है
कहीं कोई बुलबुल तराना सुनाए
यहाँ हाल यह है कि साँसों की लय पर
ख़यालों में खोया बदन गुनगुनाए
इन नाजीज़ झुरमुटों से दो चार शरारे चुरा लें तो चलें…

हमारी कहानी शुरू हो गई है
समझ लो जवानी शुरू हो गई है
कई मोड़ हमने तय कर लिए हैं
नई ज़िन्दगानी शुरू हो गई है
इन मदभरे मंज़रों से दो-चार सहारे चुरा लें तो चलें…

फ़िल्म : प्यासा सावन (1981)

हाय-हाय ये मज़बूरी, ये मौसम और ये दूरी

हाय-हाय ये मज़बूरी, ये मौसम और ये दूरी, मुझे पल-पल है तड़पाए
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी, मेरा लाखों का सावन जाए

कितने सावन बीत गए, बैठी हूँ आस लगाए
जिस सावन में मिले सजनवा, वो सावन कब आए
मधुर मिलन का यह सावन हाथों से निकला जाए…

प्रेम का ऐसा बँधन है, जो बँध कर फिर न टूटे
अरे नौकरी का है क्या भरोसा, आज मिले कल छूटे
अम्बर में है रचा स्वयंवर, फिर भी तू घबराए…

फ़िल्म : रोटी, कपड़ा और मकान (1974)

दुश्मन-ए-जाँ को हम अपनी जाँ बना बै

दुश्मने-ए-जाँ को हम अपनी जाँ बना बैठे,
ओ चुपके-चुपके
दिल बना बैठे, तुम्हें अपना ख़ुदा बना बैठे,
ओ चुपके-चुपके

प्यार पर किसका ज़ोर चलता है,
हर क़दम पर ये दिल मचलता है
दिल की राहों में हम आशियाँ बना बैठे, ओ चुपके-चुपके

अपनी आवाज़ है पहाड़ों में
एक गर्मी है अब तो जाड़ों में
आँखों-आँखों में हम दास्ताँ सुना बैठे, ओ चुपके-चुपके

फ़िल्म : नागमणि(1991)

और नहीं, बस और नहीं, ग़म के प्याले और नहीं

और नहीं, बस, और नहीं, ग़म के प्याले और नहीं
दिल में जगह नहीं बाक़ी, रोक नज़र अपनी साकी
और नहीं, बस, और नहीं, ग़म के प्याले और नहीं…

सपने नहीं यहाँ तेरे, अपने नहीं यहाँ तेरे
सच्चाई का मोल नहीं, चुप हो जा कुछ बोल नहीं
प्यार-प्रीत चिल्लाएगा तो अपना गला गँवाएगा
पत्थर रख ले सीने पर क़समें खा ले जीने पर

ग़ौर नहीं है, ग़ौर नहीं, परवानों पर ग़ौर नहीं
आँसू-आँसू ढलते हैं, अँगारों पर चलते हैं
और नहीं, बस, और नहीं, ग़म के प्याले और नहीं…

कितना पढ़ूँ ज़माने को, कितना गढ़ूँ ज़माने को
कौन गुणों को गिनता है, कौन दुखों को चुनता है
हमदर्दी काफ़ूर हुई, नेकी चकनाचूर हुई
जी करता बस, खो जाऊँ, कफ़न ओढ़ कर सो जाऊँ

दौर नहीं, ये दौर नहीं, इंसानों का दौर नहीं
फ़र्ज़ यहाँ पर फ़रजी है, असली तो बस ख़ुदगर्ज़ी है
और नहीं, बस, और नहीं, ग़म के प्याले और नहीं…

बीमार हो गई दुनिया, बेकार हो गई दुनिया
मरने लगी शरम अब तो, बिकने लगे सनम अब तो
ये रात है नज़ारों की, ग़ैरों के साथ यारों की
तो डीहें बिगाड़ दूँ सारी, दुनिया उजाड़ दूँ सारी

ज़ोर नहीं है, ज़ोर नहीं, दिल पे किसी का ज़ोर नहीं
कोई आग मचल जाए तो सारा आलम जल जाए
और नहीं, बस, और नहीं, ग़म के प्याले और नहीं…

फ़िल्म : रोटी, कपड़ा और मकान (1974)

लोगों ने मुझे लूटा है मेहमान बना के

सब जल गए अरमान मेरी जान में आ के
लोगों ने मुझे लूटा है मेहमान बना के।

खुशियों के खजानों से कभी जुड़ न सके हम
आजाद परिंदों की तरह उड़ न सके हम।
आंसू को हटाते हैं मुस्कान सजा के
लोगों ने मुझे लूटा है मेहमान बना के।

मतलब यही बताती है हर हुस्न की किताब
मौसम में तो काटों पे भी आ जाता है शबाब।
छीला है कालेजा मेरा एहसान जता के
लोगों ने मुझे टूटा है मेहमान बना के।

मिलते ही मुझे जिंदगी बीमार हो गई
चारागरों की सब दवा बेकार हो गई।
जीने की तमन्ना जगी श्मशान में जाके
लोगों ने मुझे लूटा है मेहमान बना के।

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा
जिसमें मिला दो लगे उस जैसा

इस दुनिया में जीनेवाले ऐसे भी हैं जीते
रूखी-सुखी खाते हैं और ठंडा पानी पीते।
तेरे एक ही घूँट में मिलता जन्नत का आराम
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा
भूखे की भूख और प्यास जैसा।

गंगा से जब मिले तो बनता गंगाजल तू पावन
बादल से तू मिले तो रिमझिम बरसे सावन
सावन आया सावन आया रिमझिम बरसे पानी
आग ओढ़कर आग पहनकर, पिघली जाए जवानी
कहीं पे देखो छत टपकती, जीना हुआ हराम
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा
दुनिया बनाने वाले रब जैसा।

वैसे तो हर रंग में तेरा जलवा रंग जमाए
जब तू फिरे उम्मीदों पर तेरा रंग समझ ना आए
कली खिले तो झट आ जाए पतझड़ का पैगाम
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा
सौ साल जीने की उम्मीदों जैसा।

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