संतोष श्रीवास्तव की रचनाएँ

बचा लेता है 

कागज
वज़नदार होता है
जब नोट बन जाता है

रौंद डालता है
सारे आदर्श, मानवीयता, रिश्ते
निगल लेता है जीवन मूल्य
झोपड़ी से लेकर महलों तक
राज करता है वज़नदार कागज़

लेकिन उससे भी ज़्यादा
वज़नदार हो जाता है
जब समा जाता है किताबों में
बचा लेता है
आदर्श, मानवीयता, रिश्ते
जीवन मूल्यों को

सदा के लिए अमर
हो जाता है
कागज़
किताब का पन्ना बन

टीस

कभी-कभी मैं
खुद को
तुम्हारे मोह भरे
शीशों में देखती हूं
जिसके अक्स में
मेरा ज़िद्दी लड़कपन
उम्मीदों की बेशुमार भीड़
थाह लेते सपने
बेवजह बदी जाती शर्तें
कैसी बचकानी
कि यह हो गया तो तुम मेरे
यह नहीं हुआ तो …तो… तो

तब नहीं जाना था
कड़वे यथार्थ के पन्नों पर
लिखा मेरा अकेलापन ,संघर्ष
और मुट्ठी में दबी रेत सा
धीरे-धीरे
तुम्हें खोते चले जाना

अब भी हथेली की नमी में
रह गए इक्का-दुक्का रेत कण
बहुत टीसते है

जिल्द

मेरी जिंदगी के साल दर साल
जैसे किताब के पन्ने…..
हर पन्ना आश्चर्य ,हादसा और पीड़ा की
समवेत दास्तान…………
कब खत्म होगी यह किताब ???
कब मेरे नज़दीक होगा
आँख मूंदकर खोला गया वो पन्ना
जिस पर ज़ख्मों के सिरे
सिरे से गायब होंगे
और मेरी टूटन गवाह होगी
कि जुगनुओं को करीब ले
मैंने अंधेरे पार किए हैं
और अरमानों को गलाकर,कूटकर ,छानकर
उसके रेशों से
किताब की जिल्द बनाई है

नम हुए सपने 

तुम्हारी याद
आंखों में फुहार बन उतरी
संग साथ के जाने कितने
दिलकश मंज़र गुज़र गए
जिनकी बेतरतीब आवाजाही
दिल की वीरानियों में
दस्तक देती रही
बमुश्किल दिल को सम्हाला
आहिस्ता-आहिस्ता
पलकों पर सांकल चढ़ा ली
और मुंदी आंखों में
नम हुए सपनों को
देर तलक थामे रही
पर क्या सपने थमते हैं
दीवारें जल्द ही भरभर गई
जिनका मलबा बटोरती रही
मैं भोर तलक

धूप एक एहसास

तुम्हारे आसपास की
ऊष्मा सी
शिशिर की कुनकुनी धूप
लिपट रही है रोयेंदार शॉल सी
मेरे कांपते जिस्म के
आसपास
मन कबीर हो उठा है
बुनने लगा है
धूप के धागों से
ख्वाबों की चदरिया
आज आसमान मेहमान हुआ
धूप के वितानों का

मुखौटा

पहचान लेता है
हर चेहरा मुखौटा

दिल में मरोड़ी जाती तमन्नाओं को,
कहकहों में छुपे अश्कों के समंदर को

समझता है खूब
वक्त और हालात के चेहरे
जो मजबूर हैं
तपाक से कुर्सी का हुक्म बजा लेने को
और उन्हें भी जो
कुर्सी को नचा लेते हैं
अपना हुक्म बजा लाने को

समझता है खूब
जिनके चेहरों पर
चढ़े हैं सच्चाई के मुखौटे
झूठ औ मक्कारी छुपाए
तमाम दांवपेच सहित
वोट पाने को

हैरान है चेहरों की
गुम हुई पहचान से
ढूंढ रहा है मुखौटों के इस शहर में
असली चेहरे को
मुखौटा

फिर भी शाँत है झील

सुरमई अंधेरे के पहले
सूरज की लाल परछाइयां
मीठे पानी से नहलाती
झील की सतह हो गई है लाल

तब भी हो गई थी लाल
जब हुक्मरानों ने
बेवजह कत्लेआम कर
फेंके थे मृत शरीर
झील में

झील की तलहटी से
मछलियों और सीपों के
मृत नमूने तो तलाशे हैं
गोताखोरों ने
पर क्यों नहीं तलाश पाए
शहीदों की कुर्बानियां
शहादत के नमूने ?

सदियों पुराना इतिहास
कहता है झील का पानी
आदिवासी कबीलों का
विदेशी हुकूमत का
आज़ादी का
लोक कथाओं और साहित्य का
पूरा का पूरा इतिहास
अपनी तलहटी में समेटे
बह रही है शांत झील

अवाक हूं
इतना ज्वलंत खजाना
फिर भी शांत ,निस्प्रह !!!

खूबसूरत वजह 

मीलों फैले मरू में
कदम धँस धँस जाते
मंज़िल कभी पास नज़र आती
कभी दूर

देखती हूं मरु के तजुर्बे
और टटोलती हूं अपने सपने

देखती हूं हर कण में रची
महाकाव्य की चरम पीड़ा
झर झर करती रेत में
सदानीरा पाने की बेचैन चाह

लड़खड़ा जाती हूँ
अनबुझी प्यास से
धँस जाती हूं मरू मेँ भीतर तक

कि एक बादल उड़ता आता है
सिहर जाती हैं
मरु की बोलती आँखें
आतुर हो बगूले उड़ते हैं
ऊंचे और ऊंचे

बादल चला जाता है
मरु को देकर इंतज़ार
और मुझे देकर
मंजिल तक पहुँचने की
खूबसूरत वजह

उगेगा नया सूरज

यह है वृंदावन का प्रेम मंदिर
जिसकी सीढ़ियों पर
सात दिन की मेरी उम्र में
तू मुझे छोड़ कर चली गई थी

मेरा क्या कसूर था माँ ?
इस धरती पर जन्मने का
क्या मेरा अधिकार न था?

ईश्वर ने इस दुनिया को संभालने के लिए
अपना प्रतिरूप माँ दी
माँ के आंचल की छांव दी
तूने मुझसे वह छाँव छीन ली
मुझ दुधमुंही से
अपने दूध की सौगात छीन ली

कब से रो रही हूं माँ
तेरे अमृत दूध को तरस रही हूं
मेरे आंसुओं से भीग चुका है प्रेम मंदिर
तू भी रो रही है न माँ ?
तड़प रही है न मेरे लिए ?

तू बड़ी कमजोर निकली माँ
जो घुटने टेक दिए गलत के,
गुनाह के सामने

तूने ही नहीं इन सब की माँओं ने भी
जो दो ,चार या दस दिन की उम्र में
छोड़ दी गई थी यहाँ

मेरे आँसुओं के संग उनके आँसू मिल
सैलाब लाएंगे
तू देखेगी माँ
वो सैलाब उस सब कुछ को
बहा ले जाएगा
जो सारे के सारे
बेटियों को मिटा डालने के लिए
रचे गए थे

तू देखेगी माँ
उगेगा नया सूरज
बेटियां सूरजमुखी सा हंसेंगी
अपने जीने का अधिकार पा के माँ!!

ढूंढती है ज़िंदगी

पिता थे तो साथ थी
घने बरगद की छाँव सिर पर
हमेशा बरसता था नेह का नूर

सजा रहता था माँ का हर पहर
माँ के हाथों के कंगन थे पिता
सिन्दूर,मेंहदी, बिछुआ,पायल थे पिता
नेग, दस्तूर और त्योहार थे पिता

चौके चूल्हे की बहार थे पिता
नही लगता था हमको डर किसी से
अभावों में भी खुशियाँ थीं हमेशा
पिता पुचकार लेते थे
भरोसा हमको देते थे

नही वाकिफ थे हम मजबूरियों से
कि आँसू वे हमारे
झेल लेते थे हथेली पर

सोख लेते थे वो खारापन
गलाकर खुद को
धरते थे हथेली पर
सुखों के कई सारे पल

पिता थे था हमारे साथ जीवन
जिसे अब ढूँढती है ज़िन्दगी

जिंदगी बनकर 

हजार दस्तकें पहुँचीं
द्वार पर
बेशुमार आहटें
सजधज कर पहुँचते रहे
नए नए पैगाम उल्फत के लेकिन मेरा द्वार
खुला नही
न ही मेरा दिल
खुद को बचाए रखा
मतलबपरस्तियो से
आँगन से खुलते द्वार से
मैं निकल गई दूर
बहुत दूर
देखा एक वीरान सी
घाटी मे
तुम बाँसुरी पर
गा रहे थे शून्य को
मै चुपके से पहुँची
और धुन बन गई
तुम्हारी उँगलियो पर
नाचती हुई
तुम्हारी खुशबू होकर
रच बस गई मै
हर फूल में, हर पत्ती में
दरख्तों ने शाखें हिलाईं दुआओं की
फूलों से भर गई मेरी माँग
प्रकृति के इस पैगाम ने
थोड़ी सी मोहलत
और दे दी
ज़िन्दगी को

वह लम्हा

वह लम्हा
जब मुझसे जुदा हुआ
जब उसे बांध लेना था मुझे
बंधन में
और मैं सदियों वीरानी जी रही हूँ

वह धूप था …..गर्म… चटकता सा
मैंने खुद को खुद पर बिछ जाने दिया था
और धूप की गर्म देह को ओढ़ लिया था
उसकी छुअन का रेशमी एहसास
जैसे बादलों को लपेटा हो
मैंने सूँघा उन हथेलियों को
जो अभी-अभी मेरे गालों पर
चंपा खिला गई थीं

वह मेरे हृदय तक उमड़ा
फूटती चिंगारियों सा
मैं पिघलने लगी पूरी की पूरी
नैन नक्श सहित पिघलने लगी
खुद-ब-खुद उसमें गिरने लगी
तैरने लगी, उड़ने लगी
वह मुझ में डूबता चला गया

मैं धरती बन गई
उसकी छुअन के भीतर
मैं जल बन गई
उसके हृदय में मचलता
मैं अग्नि बन गई
उसके तेज को पीती
मैं वायु बन गई
उसके आर पार बहती
मैं गगन बन गई
उसके विराट रुप को समेटती
वह तेज हीन हो गया

क्या मैं जानती थी
कि वह लम्हा बीत जाने पर
जिंदगी बदल जाएगी
मैं …. मैं नहीं रहूंगी
एक पूरा का पूरा सफा ठिठक जाएगा मुझमें
ठिठका रहेगा वो बीता सच
अब जो बंध गया है मुझमें
जबकि वह फिर से तेजमय हो जाएगा

हां वह तेजमय हो जुदा हो गया
मुझे अंधेरा सौंप
और मैं सदियों वीरानी जीती रही

आषाढ

खिड़की के शीशों पर
अनवरत दस्तक देती हैं
आषाढ़ की बूँदें

धारासार बारिश में
दौड़ते शहर के पैरों में
बेड़ियां पहना
भय और रोमांच की जुगलबंदी
कराती हैं
आषाढ़ की बूँदें

लिखना चाहती हूँ
पर न भाव जुटते, न छंद
निरर्थक शब्दों के इक्का-दुक्का
पड़ाव आते हैं
मेघ के टुकड़े बन
फिर समा जाती हैं
अथाह मेरे अकेलेपन की मर्मर में
आषाढ़ की बूँदें

विरही यक्ष विचलित है
पहाड़ पर लोटते बादलों को देख
ढूंढना चाहता है दूत
जो यक्षिणी तक पहुंचा सके
विरह की वेदना
मिलते ही यक्ष को मेघदूत
थिरक उठती हैं
आषाढ़ की बूँदें

घन घटाओं से लैस
आषाढ़ का पहला दिन
शहतूत की कोंपलों पर
वनचंपा के पराग पर
मधुमालती की लचक पर
तिरती हैं
आषाढ़ की बूँदें

मेरी उंगलियों के बीच
फंसी है कलम
भावों की कुलबुलाहट में
छिटक जाती हैं
आषाढ़ की बूँदें

कलम माँग बैठती है
पानी नहीं ,आग आग चाहिए
ठिठक गई हैं जहाँ की तहाँ
आषाढ़ की बूँदें

कब तक छली जाओगी द्रौपदी

तुम समय सीमा से
परे हो द्रौपदी
द्वापर युग से अनवरत
चलते चलते
आधुनिक युग में
आ पहुंची हो

इतने युगों बाद भी
तुम अपनी मर्जी से
अर्जुन का वरण कहाँ कर पाती हो खाप अदालत का ख़ौफ़ तुम्हें
पुरुष सत्ता के आगे
बिखेर देता है
तुम बिखर जाती हो द्रौपदी

दुर्योधन की जंघा पर
बलपूर्वक बिठाई जाकर
रिश्तो की हार ,क्रूरता की जीत
देखने पर विवश हो द्रौपदी

गलता है तुम्हारा शरीर
आहिस्ता आहिस्ता
स्वर्ग की राह पर
एक प्रतिरोध गुजरता है
तुमसे होकर
पर तुम अपने इंद्रप्रस्थ
अपने पांचों पति ह्रदय में धारे
पूरी तरह
गल भी नहीं पातीं द्रौपदी

आज भी कितने समझौतों से
गुजरती हो तुम
तब बख्शी जाती है पहचान
आज भी क्रूरता का तांडव जारी है
चीर हरण का तांडव जारी है
अनचाहे रिश्तो का बोझ
आज भी ढो रही हो तुम
कब तक छली जाओगी द्रौपदी ?

गौतम से राम तक

गौतम ने तुम्हे पुत्रीवत
पाल पोसकर बडा किया
और अपनी अंकशायिनी बनाया
तुम चुप रहीं
मन ही मन जिसे(इन्द्र) प्रेम करती थीं
उसे पाने की लालसा के बावजूद
विरोध न कर सकीं
चुप रहीं
उस दिन इन्द्र को सामने पा
रुक नहीं पाई तुम
खुद को ढह जाने दिया
उसकी बाहों में
यह तुम्हारा अधिकार भी तो था
प्यार करने का अधिकार
पर इसके एवज
गौतम के आरोप,प्रत्यारोप
तिरस्कार,शाप?
तुम्हे नहीं लगा कि वह
गौतम का
तुम पर एकाधिकार की समाप्ति का
घायल अहंकार,कायरता और दुर्बलता थी?
तुम चुप रहीं
मूक पत्थर हो गईं
पत्थर बन तुम सहती रहीं
लाचारी,बेबसी,घुटन
बदन को गीली लकडी सा सुलगाती
अपमान की ज्वाला को
तुम्हारे पाषाण वास में
तुम्हारी पीडा के हित
न गौतम आये न इन्द्र
राम ने तुम्हे पैरों से छुआ
तुम पिघल गईं
खामोशी से पदाघात सह गईं
सोचो अहल्या
गौतम से राम तक की
तुम्हारी यात्रा
पुरुष सत्ता की बिसात पर
औरत को मोहरा नहीं बनाती?

चलो ऐसा करें

बहुत मुश्किल है
मुट्ठी में समो लेना रंगों को
अभी तो घाव ताज़े है
नुकीले तेज खंजर के
अभी तो तरबतर विश्वास
सरहद के लहू से

चलो हम एकजुट होकर
मंजर ही बदल दें
नफरत के सलीबों पे
अमन का राग छेड़े

चलो पूनम से उजली चांदनी ले
प्यार के कुछ बीज बो ले
चलो अब पोछ दें आंसू
शहीदों के घरों के

तभी तो मुट्ठियों में भर सकेगा
परस्पर प्रेम औ अनुराग का रंग
तभी तो सज उठेंगे
रंग फागुन से मिलन के

सुनरहे हैं न आप

कल रात भर
समन्दर मुझे पुकारता रहा
दबे पाँव उसकी आहट
मेरे ज़ेहन से टकराती रही
सुबह देखा तो बस
दूर तलक पानी का विस्तार

कहाँ है इस आवाज़ की शक़्ल
जो रात भर मुझे
अपने पाश में
जकड़ती चली गई थी

मैं देख रही हूँ अनझिप
पानी पर उमड़ती लहरें
जिस पर लहरा रहा
मेरा, आपका, हम सबका भविष्य
क्योंकि सत्ता भी बेशक़्ल है

उसकी भयानक आवाज़
सुन रहे हैं न आप ???

तिलस्म

कितना तिलिस्मी लगता है
सांझ का धुंधलका
फिजाओं में बिखरे
धुंधले से रंग
सलेटी ,ज़रा ज़रा से नारंगी
समंदर अनुरागी नज़र आता है
प्रेम के रंग के
झीने आवरण में
धीरे-धीरे धुंधलका
हटने लगता है
और प्रेम के ज़ख्म
उभरने लगते हैं
जख्मों को इंतजार है नर्म फाहे का
जो सदियों पहले
जख्मों की बढ़ती तादाद में
खत्म हो चुका
रह गया सिर्फ धुंधलका
जो ज़ख्मों को अपने में समेट
कितना अपना लगता है

मैंने प्रेम को जिया

सिखाता है प्रेम
ब्रह्मांड भी जिसके लिए छोटा है
प्रेम बटोर लेता है
छोटे-छोटे पलों से कितना कुछ
जिंदगी के हर मोड़ पर
थमा देता है भरी झोली
हम समझ भी नहीं पाते
जिंदगी का सूरज अस्त होने तक
अपनी रिक्त किंतु समृद्ध हथेलियों को
आसमान की तरफ उठा कर
तमाम शिराओं को
निस्पंद होते महसूस कर
हम पुकार उठते हैं
हे ईश्वर ,अल्लाह, जीसस
मैंने प्रेम को जिया
मैंने समर्पण को जिया
अब ये आखिरी सांस
मृत्युंजय तुझे समर्पित

उमर भर के लिए

बस एक शाम ऐसी हो
जो तेरे साथ गुजरे
कि जा बैठे हम
नदी के किनारे
चांदनी भर ले हमें
आगोश में
सर्द पानी की धाराएं
जिस्म को आकर छू लें
हवा संग
तेरी सांसों की खुशबू
समा जाए रूह तलक
मेरे जज्बात ,खयालात
यूँ हो जाए रवाँ
और मैं ठिठक जाऊं
बस उस शाम
उम्र भर के लिए
काश ऐसा हो

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