संदीप द्विवेदी की रचनाएँ

मैं धन्य हूँ जन्मा यहाँ

भारत भुवन की नींव में है
शौर्य की उत्रिष्ठ प्रतिमा
भारत के कंठों में भरी है
वीरता की दिव्य गरिमा

भगवान की अद्वितीय कृतियाँ
हुई हैं जिस देश में
संस्कृति के बीज निर्मल
अंकुर हुए ऋषि भूमि में
प्रकृति ने ही स्वयं आकर
दे गयी हों अमिट छवियाँ
गगन धरती जल हवाएं
दिन रात गाएं जिसकी महिमा
अखिल आदि अद्वितीय भारत
मै धन्य हूँ जन्मा यहाँ

योग ,विद्या कला साहित्य
धर्म शासन नीतियां
वाणिज्य,वैदिक, अंक,भौतिक
उभरी यहाँ ये विभूतियाँ
हर क्षण है जिसका प्रेरणा
हर स्वर है जिसकी वन्दना
अखिल आदि अद्वितीय भारत
मैं धन्य हूँ जन्मा यहाँ

सादगी सद्भाव सेवा
संस्कृति सुशोभित सदा
विश्वव्यापी वेद वैभव
विनम्र विराट विशेषता
धन्य धरती धन्य धर्ता
धन्य धर्म की धीरता
अखिल आदि अद्वितीय भारत
मैं धन्य हूँ जन्मा यहाँ

मैं व्यथा का कवि नही हूँ

ना समझना
रोते हुए किस्से लिखूंगा
उम्मीद हरदम रहेगी
मेरी लेखनी में
मत पढो
ग़र दिल तेरा टूटा हुआ हो
कुछ न हासिल होगा मेरी पंक्तियों में
हाँ, ग़र संभलना हो तो मेरे पास आना
साथ बैठ के रोऊँ मैं वो कवि नही हूँ
मैं व्यथा का कवि नही हूँ…

उलझ कर सुलझे हुए हो तो बताओ
गिर गए थे फिर उठे हो तो बताओ
तूफां के आगे टिक न पाए भले लेकिन
आखिरी दम तक लड़े हो तो बताओ
छिप गए थे तुम वो किस्से मत सुनाना
अफ़सोस में डूबा हुआ मैं कवि नही हूँ
मैं व्यथा का कवि नही हूँ

वो प्रेम
जो उम्र सा ढलता रहे
जरूरतों का ठग उसे ठगता रहे
वो प्रेम
जो एक अड़चन सह ना पाए
वो प्रेम
जो ह्रदय को छलता रहे
प्रेम यदि बस देह का हो
तो कोई और देखो
वासनामय प्रेम का मैं कवि नही हूँ
मैं व्यथा का कवि नही हूँ

तुम ही हो बस टूटे हुए
ऐसा नही है
मुश्किलें तो जहाँ में सबको मिली है
राम थे अवतार सबको पता है
पर कब उनकी राह फूलों की रही है
न लड़ सको तो तुम मेरे पन्ने पलट दो
याचना करना सिखाऊं
मैं व्यथा का कवि नही हूँ…

उस पल की बात करते हैं

चलो आज थोडा कल की बात करते हैं
जो बिन बताये गुज़र गया उस पल की बात करते हैं …
ये ब्रेकिंग न्यूज़ को छोड़कर पुराने अख़बार की बात करते हैं …

एक वक्त था जब हम दौड़े चले आते थे
उस गली में बस देखने की खातिर
कई कई-कई चक्कर लगा आते थे
पर अब इतना इंतजार नही होता
उतना वकत अब अपने पास नही होता
वो जेब में सलीके से रखा प्रेम पत्र
वो झिझक , वो शर्म
सब बहुत याद आता है …
चलो इस धूप में उस बारिश की बात करते हैं
जो बिना बताये गुज़र गया उस पल की बात करते हैं

नही मिलती अब वो रोटियां
जिसमे माँ के प्यार की खुशबु आती थी
और आज इन लुक्सेरी गाडियों के बीच वो साईकल
जो स्कूल में मेरा रुतबा जमाती थी
सब बहुत याद आता है
वो हाफ पेंट, वो लप लप घडी
सब बहुत याद आता है
चलो आज कॉफ़ी हाउस छोड़कर
थोड़ी देर उस नुक्कड़ की बात करते हैं
जो बिन बताये गुज़र गया उस पल की बात करते है…

जो माँगा था वो तो सब मिल गया
पर शायद इस फेर में मेरा बचपना छिन गया
वो कभी न थकने वाला पल छिन गया
वो फुर्सत छिन गई वो सब छिन गया
वो बस में खिड़की तरफ बैठने की जिद
वो किताबो में अख़बार वाला जिल्द
सब बहुत याद आता है ..

माँ! तेरी ख़ुशी क्या है

बचपन की उछलती गोद में
अनेकों सुरीले सपने लिए
उन्ही सपनो के बीच
जाने क्या सोचता
और अक्सर पूछता अपनी माँ से
माँ तेरी ख़ुशी क्या है ?
मुस्कुराकर होती तब गुफ्तगू
न जाने इसमें जवाब क्या है ?
माँ तेरी ख़ुशी क्या है ?

स्कूल की खिड़की से
बाहर झांकता हुआ
सड़क पर आते जाते लोगों के बीच
माँ को ताकता हुआ
फिर उभर आया वही प्रश्न
मेरी माँ की ख़ुशी क्या है ?
फिर बड़ी सुकून भरी हथेली में
देकर अपना छोटा हाथ
फिर पूछा मैंने
माँ तेरी ख़ुशी क्या है ?
फिर प्यार से चूमा उसने तब
थाम लिया मेरा बैग
न जाने इसमें जवाब क्या है ?
माँ तेरी ख़ुशी क्या है ?

बढती उम्र ने दी
तोहफे में थोड़ी समझदारी
छूट गई थी अब तक
गुड्डे गुड़ियों की यारी
सुलझ गये थे अब तक कई प्रश्न जिन्दगी के
पर आज भी था वही प्रश्न अनसुलझा
मेरी माँ की ख़ुशी क्या है ?
फिर पूछा मैंने
माँ तेरी ख़ुशी क्या है ?
फिर वही मुस्कराहट
फिर वही गले लगा लेना
न जाने इसमें जवाब क्या है
माँ तेरी ख़ुशी क्या है ?
टल गयी फिर ये बात
मेरी माँ की ख़ुशी क्या है ?

फिर एक लम्बा वक्त गुज़र गया
मेरा हाथ मेरी माँ के हाथ से
जाने कब बड़ा हो गया
पीछे रह गया बचपना कई साल
लेकिन अब तक साथ था वो प्रश्न
मेरी माँ की ख़ुशी क्या है ?
आज झल्लाकर,गुस्साकर
फिर पूछा मैंने
माँ ! तेरी ख़ुशी क्या है ?
माँ ने उँगलियों से सवारे मेरे बाल
करती हुयी ठीक मेरे शर्ट की कालर
मेरी माँ ने कहा
बेटा..तेरी ख़ुशी क्या है ?
जैसे प्रश्न ही था जवाब
कमी थी अब तक जैसे
माँ के बोलने की
कल तक लगाती थी
वो मुझे सीने से
आज कद में मैं बड़ा था
आज मैंने लगा लिया
छलकती रह गयी मेरी आंखें
जाने क्या सोचती हुयी
फिर कभी नही पूछा माँ से
माँ तेरी ख़ुशी क्या है ?
फिर कभी नही पूछा..

कुछ इस तरह 

पल जब इंतजार का हो
कुछ इस तरह इंतजार करना
जैसे जहाँ में तेरे लिए
बस मैं ही हूँ…बस मैं ही हूँ

दुनिया की भागादौड़ी में
उलझा जो तुमको दिखूं मैं
कुछ ऐसे मुझे समेट लेना
जैसे तेरे एकांत में
बस मैं ही हूँ…बस मैं ही हूँ..

ग़र मैं कभी गिर पडूं
वक्त के दिए हालात से
ऐसे मुझे समेट लेना
जैसे कि तेरा हौसला
बस मैं ही हूँ….बस मैं ही हूँ

ग़र भीग न पाऊं तेरे संग
वक्त के दिए हालात से
ऐसे मेरा एहसास करना
तुम पर टपकती बूँद में
बस मैं ही हूँ…बस मैं ही हूँ

दुनिया के हजारो रंगों में
ग़र मैं कभी फ़ीका लगूं
ये सोच अकेला ना छोड़ना
जैसे तुम्हारी रंगीनियत
बस मैं ही हूँ….बस मैं ही हूँ..

उलझे पथ कैसे सुलझाऊं

जीवन पथ कैसे सुलझाऊं
उलझे पथ कैसे सुलझाऊं
सपने हैं सब आँखें बिछाए
राह कौन सी अपनाऊं
उलझे पथ कैसे सुलझाऊं..

उम्रों का अम्बार रखा था
तय कर लूँगा ये सोच खड़ा था
रह गया सोचते फिर जब देखा
जीवन बस कुछ शेष बचा था
अब है पश्चाताप मगर
किस युक्ति समय विपरीत घुमाऊं
उलझे पथ कैसे सुलझाऊं..

धरती ने चलकर सतत राह
दिन,सदियाँ ,साल बदल डाले
दुनिया ने खुद को कई बार
कितने रंगों में रंग डाले
मुझमे भी था वो कलाकार
अब कैसे वो हुनर दिखा पाऊं
उलझे पथ कैसे सुलझाऊं..

चल छोडें नदिया के धारे
रुक कर एक पतवार बना दें
जो सही है मैंने उथल पुथल
उससे कल का दौर बचा दें
जो छूट गया उसको भूलूं
जो है उसको मीत बनाऊं
उलझे पथ ऐसे सुलझाऊं
दे दूं जग को जो दे सकता हूँ
उनका पथ सरल बना जाऊं
उलझे पथ कैसे सुलझाऊं..

जो भी है चलता जाता है

क्यों पीट रहा सर उस चौखट पर
जिसे समय की सीमा लाँघ गयी
रुकना है रुक पर याद रहे
ठहरेगा कोई साथ नही
जिस राह निकल कर गया समय
वो राह कहाँ दोहराता है
जो आज है कल क्या होगा
ये वही समय बतलाता है
जो भी है चलता जाता है

क्यों कहू कि उड़ता वो पंछी
बस तिनके लेकर जाता है
मै तो कहता वह रोज सुबह
सूरज से मिलकर आता है
उन्नति का कारोबार सदा
सपनो के दम पर चलता है
बीज लगे जैसा दिल पर
फल वैसा लगता जाता है ..
जो भी है चलता जाता है

द्रोण को पहचानिए

झरनों के जल झंकार में
शिला पृष्ठ को जानिए
अर्जुन के लक्ष्य विवेध में
द्रोण को पहचानिए..

नदियों की बहती अथक धारा
चलती मधुर एक साज पर
सागर से होता मिलन कैसे
रहती नही जो ढाल पर
ग़र कोई आगे बढ़ा है
अपने कदमो में खड़ा है
होती है कोई ढाल ही
जिसने उसे पहचान दी
मेहनत के महलों में छिपे
उत्साह को पहचानिए
अर्जुन के लक्ष्य विवेध में
द्रोण को पहचानिए….

बिन तराशे रत्न की
कब चमक दुगुनी हुई है
कब दिए की लौ कहीं
निर्वात में रोशन हुई है
आंच गुरु की बिन पड़े
निखरी नही प्रतिभा कोई

जो दीप्त हो गुरु के बिना
है नही आभा कोई
हर लक्ष्य में छिपे
उत्साह को पहचानिए
अर्जुन के लक्ष्य विवेध में
द्रोण को पहचानिए…

हम अमानव क्यों बनें

वेदों में जो ज्ञान है
शक्ति शाश्वत लक्ष्मी
पत्थर में जिसको देखकर
करते हो जिसकी स्तुति
मंत्रो में सौ गुणगान कर
लिखते हो गरिमा की कड़ी
भगवती तुल्य स्वरुप पर
हम अत्याचार क्यों करें
हम अमानव क्यों बनें

जिसकी गोद में तू पला
पायी है जन्नत की ख़ुशी
धागे की छोटी डोर पर
महफूज़ है दुनिया तेरी
हाथ थाम जो तेरे संग
हंसती रही रोती रही
जो हर जगह और कहीं
रिश्तों में सदा मिलती रही
ऐसे ही उसके रूप पर
नीयत से अपनी क्यों गिरें
हम अमानव क्यों बनें

जिस संस्कृति में हम पले
क्या उसका यही व्यव्हार है
संस्कार जो उससे मिला
क्या यही इसका सार है ?
स्वर्णिम धरा के श्रेष्ठ मानव
फिर कर्म ऐसे क्यों करें
जिसकी वजह से श्रेष्ठ हैं
उस संस्कृति को लज्जित क्यों करें
हम अमानव क्यों बनें?

देखा है सफलता को उछलते मैंने

जहां को इसके आगे रंग बदलते मैंने
देखा है सफलता को उछलते मैंने..

जिनके संग है बीता बचपन
जिनके साए में होता था अपनापन
दोनों ने छुआ उस पायदान को
जिनको कि तरसता है जीवन
जीवन के इसी मोड़ पर देखा है
सफलता को सफलता से उलझते मैंने
देखा है सफलता को उछलते मैंने …

कभी नजरें मिली तो उनकी नजरें मुड गई
राहों में देखा कभी चलते तो उनकी मंजिल मुड़ गई
मिला करते थे जो मुझे कल तक
सावन में रेन से
उनकी ये मुलाकात क्या से क्या हो गई
फिर क्यों न कहूँ देखा है
सफलता से जहां को बदलते मैंने
देखा है सफलता को उछलते मैंने ..

जिनकी मुट्ठी में थी हसीं जन्नत
पा लेते थे जो थी उनकी चाहत
कल तक रहा करते थे जो जहां की ऊँचाइयों में
गिरते देखा है मैंने आज उनको खाइयों में
फिर क्यों न कहूँ देखा है
सफलता को असफलता में बदलते मैंने
देखा है सफलता को उछलते मैंने…

कौन कहे उन सूखे बाग़ में
आँखें तक न फेरी जहां बादल ने
कौन कहे उन हरी वादियों को
झुकाए हैं सिर जहाँ बादल ने
फिर क्यों न कहूं देखा है
सफलता को असफलता में बदलते मैंने
देखा है सफलता को उछलते मैंने…

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