सतीश शुक्ला ‘रक़ीब’ की रचनाएँ

वो जुदा हो के रह न पाया है

वो जुदा हो के रह न पाया है
रूठकर खुद मुझे मनाया है

ज़िंदगी धूप में कटी यारो
बस घड़ी दो घड़ी का साया है

सोचिये, बेशुमार मालो-ज़र
पास उसके कहाँ से आया है

हाँ ! ग़ज़ल से है प्यार उसको भी
मुद्दतों बाद ये बताया है

चारसू दिख रहा है अपनापन
कौन है, जो यहां पराया है

बाग़ के बेहतरीन फूलों से
आज गुलदान को सजाया है

रात, सपने में कह गया कोई
छोड़ दे सब ‘रक़ीब’ माया है

माँ यशोदा का जो दुलारा था

माँ यशोदा का जो दुलारा था
कम नहीं देवकी को प्यारा था

गोपियाँ, ग्वाल-बाल और गौवें
कृष्ण आँखों का सब की तारा था

दे दिया सब बग़ैर मांगे ही
घर सुदामा का यूँ संवारा था

पादुका छोड़ कर चले आए
द्रौपदी ने जहां पुकारा था

ज्ञान गीता का दे के अर्जुन को
मोह के गर्त से उबारा था

अन्ततः हो गया महाभारत
धर्म जीता, अधर्म हारा था

कौरवों के ‘रक़ीब’ अर्जुन को
द्वारिकाधीश का सहारा था

जब कभी मिला करो 

जब कभी मिला करो
कुछ कहा सुना करो

हुस्न की शिकायतें
इश्क़ से किया करो

बाँट कर किसी के ग़म
राहतें दिया करो

कह के सोचना नहीं
सोचकर कहा करो

मुफ़्त कुछ न लो कभी
कीमतें दिया करो

इक फ़क़ीर कह गया
बंदगी किया करो

मंज़िलों की चाह में
रात-दिन चला करो

नेमतें हुईं अता
शुक्र तो अदा करो

वो नहीं ‘रक़ीब’ है
प्यार से मिला करो

मेहनत से तू यारी रख

मेहनत से तू यारी रख
कोने में मक्कारी रख

मां है , दूध पिलाएगी
बच्चे , रोना जारी रख

सौंप दिया ताला चाबी
कहकर, ये बीमारी रख

जेब में, जब बाहर निकले
काग़ज़ कुछ सरकारी रख

बाहर भी मत खा पगले
घर भी शाकाहारी रख

जाना है सबको इक दिन
बेहतर है तैयारी रख

घर में पूजा-पाठ करे
एक ‘रक़ीब’ पुजारी रख

दास्ताँ सुनो यारो लामकाँ मकीनों की

दास्ताँ सुनो यारो लामकाँ मकीनों की
बात हो रही है अब इल्म के ज़ख़ीरों की

लामकाँ मकीनों की, सूफियों की पीरों की
बात कर रहे हैं हम इल्म के ज़ख़ीरों की

हर ख़ुशी क़दम चूमे कायनात की उसके
रास आ गईं जिसको सुह्बतें फ़क़ीरों की

सूर, जायसी, तुलसी और कबीर, ख़ुसरो को
बेबसी से तकती हैं दौलतें अमीरों की

जिस्म की सजावट में रह गए उलझकर जो
रूह तक नहीं पहुँची फ़िक़्र उन हक़ीरों की

हाथ ही में कातिब ने लिख दिया है मुस्तकबिल
इल्म हो जिसे पढ़ ले ये ज़बां लकीरों की

राहे हक़ पे चलकर ही मंज़िलें मिलेंगी अब
है नहीं जगह कोई बेसबब नज़ीरों की

देख ले ‘रक़ीब’ आकर गर नहीं यकीं तुझको
इक गुनाह से पहले जिंदगी असीरों की

अनल में प्रीत की जलने दिया कब

अनल में प्रीत की जलने दिया कब
दहकती आग को बुझने दिया कब

न जाने कौन कब होगा पराया
समय ने एक सा रहने दिया कब

हताहत कर दिया इक तीर ही से
अराजकता गिरी, उड़ने दिया कब

बहुत दिन से, बहुत कुछ चल रहा था
बहुत दिन आपने, चलने दिया कब

पुजारी था हमेशा अम्न का जो
उसे भी चैन से मरने दिया कब

कली कुचली गयी है फिर चमन में
दरिंदे ने उसे खिलने दिया कब

अता होगा ज़रूरत के मुताबिक
‘रक़ीब’ उसने कभी कहने दिया कब

गया, जाते जाते ख़ला दे गया

गया, जाते जाते ख़ला दे गया
मुसलसल ग़मों की बला दे गया

दुआएँ यक़ीनन करेंगी असर
बज़ाहिर हमें हौसला दे गया

सुकूँ ही सुकूँ था जहाँ दूर तक
वहाँ पुरअसर ज़लज़ला दे गया

न दें गालियाँ पीठ पीछे उसे
मुक़द्दर जिसे बरमला दे गया

तलातुम से जिसको निकाला था कल
वही आज मौजे-बला दे गया

हमेशा रहेगा दिलों में असर
अजब ग़म, ग़मे-करबला दे गया

सुना है ‘रक़ीब’ इस ज़मीं पर नहीं
ग़ज़ल, आज जो दिलजला दे गया

रस्मन हैं साथ-साथ, वो चाहत नहीं है अब

रस्मन हैं साथ-साथ, वो चाहत नहीं है अब
रिश्तों में पहले जैसी तमाज़त नहीं है अब

लगता है वक़्त ले गया उसकी भी शोख़ियाँ
आँखों में वो चमक वो शरारत नहीं है अब

ख़ामोशियाँ कुछ ऐसी उन्हें आ गयीं पसन्द
महफ़िल में बोलने की भी आदत नहीं है अब

दे दी थीं अस्थियाँ भी कभी जिसने इन्द्र को
वो ऋषि दधीचि जैसी सख़ावत नहीं है अब

देसी, दसहरी आम हैं हापुस के भाव में
महँगाई के सबब वो हलावत नहीं है अब

मिलकर तो और तेज़ हुआ इश्क़ का बुख़ार
ताउम्र ये रहेगा हरारत नहीं है अब

क़ाइल थे जिसके नाज़ो-अदा के ‘रक़ीब’ भी
कहता हूँ मैं क़सम से नज़ाकत नहीं है अब

तेरे द्वारे आऊँ माँ

-: सरस्वती वंदना :-

तेरे द्वारे आऊँ माँ
नितनित शीश नवाऊँ माँ

कुछ अपनी, कुछ जग बीती
दुनिया को बतलाऊँ माँ

ग़ज़लों के गुलदस्ते मैं
चरणों तक पहुँचाऊँ माँ

वाणी में बस जाना तुम
गीत, ग़ज़ल जब गाऊँ माँ

मेरी अभिलाषा है ये
तेरा सुत कहलाऊँ माँ

याद करे दुनिया जिससे
ऐसा कुछ कह जाऊँ माँ

लोग ‘रक़ीब’ समझते हैं
क्या उनको समझाऊँ माँ

— सतीश शुक्ला ‘रक़ीब’

उर्दू है मेरी जान, अभी सीख रहा हूँ 

उर्दू है मिरी जान अभी सीख रहा हूँ
तहज़ीब की पहचान अभी सीख रहा हूँ

हसरत है कि गेसू-ए-ग़ज़ल मैं भी संवारूँ
ये बह्र ये अरकान अभी सीख रहा हूँ

होने की फरिश्ता नहीं ख़्वाहिश मुझे हरगिज़
बनना ही मैं इंसान अभी सीख रहा हूँ

आग़ाज़े महब्बत में ये ग़मज़े ये अदाएं
ले लें न कहीं जान अभी सीख रहा हूँ

कुर्बत तिरी जी का मिरे जंजाल न बन जाए
हर शय से हूँ अंजान अभी सीख रहा हूँ

महफ़ूज़ न रख पाऊँगा दौलत के ख़ज़ीने
कहता है ये दरबान अभी सीख रहा हूँ

मैं तो हूँ ‘रक़ीब’ आज भी इक तिफ़्ल अदब में
पढ़-पढ़ के मैं दीवान अभी सीख रहा हूँ

अभावों से ग्रसित ये बस्तियाँ हैं

अभावों से ग्रसित ये बस्तियाँ हैं
कुँवारी निर्धनों की बेटियाँ हैं

पता देती हैं सावन का सभी को
कलाई में हरी जो चूड़ियाँ हैं

भटकता फिर रहा जिसने कहा था
गृहस्थ-आश्रम नहीं ये बेड़ियां हैं

बसी है जान कृषकों की इन्हीं में
सुनहरी खेत में जो बालियाँ हैं

हृदय में कामनाएं प्रिय मिलन की
“नयन में अश्रु की चौपाइयां हैं”

सुगन्धित कर दिया वातावरण को
बहुत सोंधी तवे पर रोटियाँ हैं

चली जाए न आकर ऋतु सुहानी
अभी उपवन में उड़ती तितलियाँ हैं

बढ़ाएगा मनोबल क्या किसी का
वो जिसके हाथ में बैसाखियाँ हैं

‘रक़ीब’ आये न अच्छे दिन अभी तक
गिनाने के लिए उपलब्धियाँ हैं

बेवफ़ाई का सिला भी जो वफ़ा देते हैं

बेवफ़ाई का सिला भी जो वफ़ा देते हैं
अपनी फ़ितरत का ज़माने को पता देते हैं

आप बाहोश रहें सोच-समझ कर बोलें
तल्ख़ जुमले भी यहां आग लगा देते हैं

आह मजलूम की मुंसिफ़ को न जीने देगी
गर वो नाक़र्दा गुनाहों की सज़ा देते हैं

देर से जाऊँगा दफ़्तर तो कटेगी तनख़्वाह
वो इसी डर से मुझे रोज़ जगा देते हैं

यूँ इशारों से मुझे पास बुलाते क्यों हो
लोग तो तिल का यहाँ ताड़ बना देते हैं

ज़ह्नो-दिल ज़ब्त से खाली हैं यक़ीनन उनके
“कर के अहसान किसी पर जो जता देते हैं”

याद आती है बहुत पास न हों बच्चे तो
घर में आते ही जो कोहराम मचा देते हैं

उनके किरदार का सानी ही नहीं दुनिया में
जब भी बिगड़ी है कोई बात, बना देते हैं

हक़ में बीमार के करते हैं दुआएं भी तबीब
कुछ ‘रक़ीब’ ऐसे हैं जो सिर्फ़ दवा देते हैं

कल जो कहते रहे आएंगे न जाने वाले

कल जो कहते रहे आएंगे न जाने वाले
मुन्तज़िर वो भी हैं, वो आज हैं आने वाले

बेस क़ीमत है यहाँ बूँद भी इक पानी की
याद रक्खें इसे, बेवज़ह बहाने वाले

शम्स ता क़मर, ज़मीं, झील कि दरिया, पर्वत
हैं मनाज़िर ये सभी दिल को लुभाने वाले

कुछ नहीं बदला है क्या?, हाँ! तो बदल दो ये भी
साल-दर-साल सितम क्यों हैं पुराने वाले

तल्ख़ लहजे से न कर अपनों को तू बेगाना
रूठ जाएँ न कहीं तुझको मनाने वाले

ऐ ख़ुदा उनके मुक़द्दर भी मुनव्वर कर दे
हैं सरे राह दिये रोज़ जलाने वाले

क़िस्सा-ए-जीस्त सुनाए हैं बहुत तुझको ‘रक़ीब’
अब जो बाक़ी हैं, नहीं तुझको सुनाने वाले

ख़ुशी हो तो घर उनके हम कभी जाया नहीं करते

ख़ुशी हो तो घर उनके हम कभी जाया नहीं करते
मेरे घर जो कभी ग़म में बशर आया नहीं करते

सुनाई दे रही है ग़ैब से आती सदा मुझको
बहुत ही क़ीमती है वक़्त ये ज़ाया नहीं करते

बज़िद थे इसलिए तुमको मना लाये मगर सुनलो
ज़रा सी बात पर यूँ रूठकर जाया नहीं करते

उन्हीं के नाम का चर्चा हुआ है और होगा भी
जो सहते हैं सितम लेकिन सितम ढाया नहीं करते

यहाँ कुछ लोग वाक़िफ़ ही नहीं आदाबे-महफ़िल से
भरी महफ़िल से उठकर यूँ कभी जाया नहीं करते

गए हैं, जा रहे हैं लोग जायेंगे क़यामत तक
जहाँ से लौट कर वापस कभी आया नहीं करते

सुने को अनसुना कर दे मुसीबत में किसी की जो
‘रक़ीब’ ऐसे बशर के पास हम जाया नहीं करते

सर्द रातों में भी काँपते काँपते

सर्द रातों में भी काँपते काँपते
मुफ़लिसी चल पड़ी हाँफते हाँफते

चार पैसों की ख़ातिर वह बीमार माँ
जा रही है कहीं खाँसते खाँसते

खा के दिन में भी सोयें, तो काटें कई
रात भी भूक से जागते जागते

सूद के बदले जबरन मवेशी ही वह
खोलकर, ले गया हाँकते हाँकते

खाइयाँ नफ़रतों की बढ़ीं इस क़दर
मुद्दतें लग गयीं पाटते पाटते

फ़लसफ़ा ज़िंदगी का बयाँ कर गया
एक दर्ज़ी बटन टाँकते टाँकते

लफ़्ज़ “माँ” सुन के टीचर चली आई है
छोड़कर कापियाँ जाँचते जाँचते

दौलते इल्म से वक़्त कट जाएगा
रात-दिन मुफ़्त में बाँटते बाँटते

नाफ़ में जिसकी केसर हो आहू ‘रक़ीब’
थक गया है बहुत ढूँढते ढूँढते

बदलें मौसम, बदलें हम

बदले मौसम, बदलें हम
सुख-दुःख अपना समझें हम

फ़ुरसत हो तो आ जाओ
कुछ सुनलें कुछ, कहलें हम

इक दूजे की आँखों से
दिल में क्या है, पढ़लें हम

रोएँगे तन्हाई में
क़ुर्बत में तो, हंसलें हम

छोटी-छोटी चीज़ों से
बच्चों जैसे, बहलें हम

दुनिया भर के ग़म सारे
हँसते-हँसते, सहलें हम

आओ ‘रक़ीब’ दुआओं से
ख़ाली झोली, भरलें हम

बेकार है फ़ितूर दिले-बेक़रार में

बेकार है फ़ितूर दिले-बेक़रार में
कुछ भी नहीं रखा है मुए प्यार-व्यार में

क्या रह गया है इश्क़ में, चाहत में, प्यार में
बेकार सी कशिश है दि ले बे-क़रार में

बदलेगा वक़्त आएंगी ख़ुद मंज़िलें क़रीब
यह सोचकर खड़े हैं कई इंतेज़ार में

छाई ख़िज़ां है रुख पे हँसी है बनावटी
संजीदगी का रंग है फ़स्ल-ए-बहार में

दिन का सुकून हो कि हो रातों का वो क़रार
“कुछ भी नहीं रहा है मेरे इख़्तियार में”

देखो बिछड़ के उसकी सभी रौनकें गयीं
तन्हा ही रह गया है वो उजड़े दयार में

अब पूछने लगी है ये हमसे उमीदे-दिल
ताउम्र क्या खड़े ही रहेंगे क़तार में

हर एक का हबीब है बस नाम है ‘रक़ीब’
लेकिन ये बात आती नहीं इश्तेहार में

लोकप्रिय साहित्य को जब हम समर्पित हो गये

लोकप्रिय साहित्य को जब हम समर्पित हो गये
काव्यमय अभिव्यक्ति से तन-मन प्रफुल्लित हो गये

मोह-माया तज के अर्जुन ने उठाया जब धनुष
श्लोक गीता के सभी तब सारगर्भित हो गये

पीठ पीछे की प्रशंसा, ही प्रशंसा जानिये
सामने आलोचना से लोग विकसित हो गये

बाँट लें संपत्ति, बेटों ने कहा, बापू की अब
अस्थियाँ और पुष्प गंगा में विसर्जित हो गये

गर्व क्यों कर हो न अपने बाल-बच्चों पर उन्हें
आचरण से जिनके अब माँ-बाप चर्चित हो गये

गाँव ही में छोड़ आये थे जिन्हें बचपन में हम
कौन जाने? हैं अभी, या काल-कवलित हो गये

देख कैसे पायेगा उन दीन-दुखियों को ‘रक़ीब’
चक्षु, सुनकर ही व्यथा जब अश्रुपूरित हो गये

काश! इक बार मिल सकूँ उससे

काश! इक बार मिल सकूँ उससे
अपनी पहली ग़ज़ल सुनूँ उससे

कुछ तो होगा सबब जुदाई का
पूछ कर आज क्या करूँ उससे

जब वो बाहों में मेरी आ जाए
इक सबक प्यार का पढ़ूँ उससे

जिसके एहसान में दबा हूँ मैं
कहिए, कैसे भला लडूँ उससे

कट के आयी पतंग कहती है
है अनाड़ी तो क्यों उडूँ उससे

जो नहीं ऐतिबार के क़ाबिल
क्यों न मैं दूर ही रहूँ उससे

फ़ैसला मैंने कर लिया है ‘रक़ीब’
कुछ न पूछूँ न कुछ कहूँ उससे

कुछ को तो शबो-रोज़ कमाने की पड़ी है

कुछ को तो शबो-रोज़ कमाने की पड़ी है
पानी की तरह कुछ को बहाने की पड़ी है

झुकती ही चली जाए कमर बोझ से फिर भी
मुफ़लिस को अभी और उठाने की पड़ी है

मुद्दत से बिला बात ही तुम रूठे रहे हो
क्या बात है? अब मुझको मनाने की पड़ी है

बनने ही को है काम बिगड़ जाएगा सारा
इस वक़्त तुझे लौट के आने की पड़ी है

ऐ रूह बदन को है अभी तेरी ज़रूरत
उजलत है तुझे आज ही, जाने की पड़ी है

होता ही नहीं काम कोई वक़्त पे उनसे
अब सरसों हथेली पे उगाने कि पड़ी है

ऐ काश! मेरा ख़्वाब हो शर्मिंद-ए-ताबीर
नफ़रत कि मुझे आग बुझाने कि पड़ी है

खाने के लिए जीना, नहीं है कोई जीना
समझेंगे वो कैसे जिन्हें खाने की पड़ी है

सुनता है ‘रक़ीब’ आपकी बातों को वो लेकिन
सुनने की नहीं उसको सुनाने की पड़ी है

आँसुओं से अपना दामन तर-बतर होने के बाद

आँसुओं से अपना दामन तर-बतर होने के बाद
ख़ुश्क होता है हवाओं को ख़बर होने के बाद

ये हमारी बेबसी है या मुक़द्दर का सितम
क़ैद होकर रह गए बे-बालो-पर होने के बाद

अहले महफ़िल ने तो की थी हमसे फरमाइश बहुत
गीत कोई कैसे गाते नौहागर होने के बाद

लिखने वाले ने कुछ ऐसे दास्ताने-ग़म लिखी
पढ़ने वाले रो पड़े दिल पर असर होने के बाद

सुब्ह दम सूरज की किरनों का असर भी ख़ूब है
दर्दे-दिल थम सा गया है रात भर होने के बाद

कब तलक तरसेंगे ये लब इक तबस्सुम के लिए
बारहा पूछें ये खुशियाँ चश्म तर होने के बाद

हो गया जीने का सामाँ मिल गई मंज़िल ‘रक़ीब’
दर तिरा पाया जबीं ने दर-बदर होने के बाद

पहले तो बिगड़े समाँ पर बोलना है

पहले तो बिगड़े समाँ पर बोलना है
फिर ज़मीनो आसमाँ पर बोलना है

बोल भी सकता नहीं है ठीक से जो
उसके अंदाज़े-बयाँ पर बोलना है

बेबसी है, बाग़ में यह, बाग़बाँ की
मौसमे गुल में ख़ज़ाँ पर बोलना है

माजरा क्या है भला, क्यों ग़मज़दा हो
क्या तुम्हें आहो-फुगां पर बोलना है

ज़ख्म दिल के, खोलकर हमने रखे हैं
जब कहा, दर्दे-निहाँ पर बोलना है

थे बहत्तर, अह्ले-बेयत, जिस में शामिल
उस मुक़द्दस कारवाँ पर बोलना है

ख़ामुशी ही से ‘रक़ीब’ इस बज़्म में अब
ज़िंदगी की दास्तां पर बोलना है

है आदि काल से मानव का आचरण मित्रो

है आदि काल से मानव का आचरण मित्रो
ये छोड़ पाया न इच्छा को एक क्षण मित्रो

सहेजते हैं जो हर दिन हरेक क्षण मित्रो
प्रशंसनीय है ऐसों का आचरण मित्रो

बहू की चाल ने सबके ह्रदय को मोह लिया
बिना हटाए ही मुखड़े से आवरण मित्रो

जो पूजनीय हों, पैरों को उनके, पैर नहीं
हमे सिखाया गया है, कहो चरण मित्रो

किसी भी आँख से आँसू निकाल सकता है
पड़े जो आँख में छोटा सा एक कण मित्रो

बहुत ही त्रस्त हैं निर्धन, है ऐसी मँहगाई
बिगड़ गए हैं बचत के समीकरण मित्रो

पता नहीं है ककहरा भी जिसको उपवन का
“वो तितलियों को सिखाता है व्याकरण मित्रो”

छपा न कोई जो आए, अगस्त है सोलह
सहारा, आज, नभाटा या जागरण मित्रो

किये हैं आपने उपकार अनगिनत मुझ पर
न भूल पाउँगा मैं जिसको आमरण मित्रो

नहीं करेंगे जो शोषण वो होंगे शोषित ही
‘रक़ीब’ जैसे हैं लाखों उदाहरण मित्रो

चुप कहाँ रहना, कहाँ पर बोलना है

चुप कहाँ रहना, कहाँ पर बोलना है
आप बतलायें हमें यह प्रार्थना है

कर सको जितनी अधिक सेवा करो बस
भूल मत जाना उसे जिसने जना है

ज्ञान की गंगा बहाये जो धरा पर
वह भगीरथ अब हमें फिर ढूँढना है

जानते हैं हम बहुत बलवान हो तुम
पर विरोधी को नहीं कम आंकना है

चार पैसे क्या हुये उड़ने लगे वह
मत उड़ें इतना यहीं सब छोड़ना है

नींद आँखों में भरी है, सोएगा कब
साथ सूरज के तुझे फिर जागना है

सुन ‘रक़ीब’ ईश्वर सभी का हित करेगा
ध्यान में रखना, तुझे जो माँगना है

बात हक़ की हो तो क्यों चन्द मकाँ तक पहुँचे.

बात हक़ की हो तो क्यों चन्द मकाँ तक पहुँचे
इस क़दर फैले कि वह सारे जहाँ तक पहुँचे

आँखों आँखों में हुआ करती हैं बातें अब तक
जाने कब गुफ़्तगू आँखों से ज़ुबाँ तक पहुँचे

गामज़न यूँ तो सभी जानिबे मंज़िल हैं मगर
ये अलग बात, कि अब कोई, कहाँ तक पहुँचे

लोग भी कहते हैं, है भी वो यक़ीनन मुजरिम
इतना शातिर है, कोई कैसे गुमाँ तक पहुँचे

वक़्त-बेवक़्त चली आती हैं यादें अब भी
यह तसव्वुर लिए हम राज़े-निहाँ तक पहुँचे

यूँ तो कुछ भी नहीं औक़ात हमारी लेकिन
रहमते हक़ के सहारे ही यहाँ तक पहुँचे

ज़ोर इंसाँ का नहीं बादे सबा के रुख़ पर
ख़ुशबुए गुल का है क्या, चाहे जहाँ तक पहुँचे

है तो मसरूफ़ बहुत क़त्ल की तफ्तीश में वह
यह ज़रूरी नहीं क़ातिल के निशाँ तक पहुँचे

दीनो मज़हब की न ता-उम्र जिन्हें फ़िक्र रही
वक़्त-ए-आख़िर वही आवाज़े अज़ाँ तक पहुँचे

रोक रक्खा है भरे अश्क़ों को इन आँखों में
इस से पहले कि ये दिल आहो-फुगां तक पहुँचे

रेत के ज़र्रों में पानी का गुमाँ ले के ‘रक़ीब’
तिश्नालब कैसे भला आबे-रवाँ तक पहुँचे

फिर से शहनाइयाँ, शामियाने में हैं

फिर से शहनाइयाँ, शामियाने में हैं
दो बड़ी कुर्सियाँ, शामियाने में हैं

रस्मे-जयमाल, फूलों की बरसात और
गूँजती तालियाँ, शामियाने में हैं

साथ सखियों के मिलकर सताती हैं जो
चुलबुली भाभियाँ, शामियाने में हैं

सालियाँ लाएंगी, नेग दो, वर्ना ख़ुद,
ढूंढ लो, जूतियाँ, शामियाने में हैं

प्यार की फब्तियाँ, प्यार की गालियाँ
रात भर मस्तियाँ, शामियाने में हैं

वक़्त-ए-रुख़सत है अब जा रही है दुल्हन
हर तरफ़ सिसकियाँ, शामियाने में हैं

ये छुड़ाता है घर, गाँव, सखियाँ ‘रक़ीब’
बस यही ख़ामियाँ शामियाने में हैं

अंजान हैं, इक दूजे से पहचान करेंगे 

अंजान हैं, इक दूजे से पहचान करेंगे
मुश्किल है ये जीवन, इसे आसान करेंगे

खाई है क़सम साथ निभाने की हमेशा
हम आज सरेआम ये एलान करेंगे

इज़्ज़त हो बुज़ुर्गों की तो बच्चों से रहे नेह
हर एक के माँ-बाप का सम्मान करेंगे

हम त्याग, सदाचार, भरोसे की मदद से
हर हाल में परिवार का उत्थान करेंगे

आपस ही में रक्खेंगे फ़क़त, ख़ास वो रिश्ते
हरगिज़ न किसी और का हम ध्यान करेंगे

हर धर्म निभाएंगे हम इक साथ है वादा
तन्हा न कोई आज से अभियान करेंगे

सुख-दुख हो, बुरा वक़्त हो, या कोई मुसीबत
मिल बैठ के हम सबका समाधान करेंगे

जीना है हक़ीक़त के धरातल पे ये जीवन
सपनोँ से न हम ख़ुद को परेशान करेंगे

जन्नत को उतारेंगे यही मंत्र ज़मीं पर
सब मिल के ‘रक़ीब’ इनका जो गुणगान करेंगे

वह सताता है दूर जा जा कर

वह सताता है दूर जा जा कर
ख़्वाब में फिर क़रीब आ आ कर

याद कर सुब्ह से उसे कोयल
जाने क्या कह रही है गा गा कर

आख़िरश हो गया बहुत मग़रूर
चार दिन में, ख़िताब पा पा कर

क़त्ल करता है वह निगाहों से
लुत्फ़ लेता है ज़ुल्म ढा ढा कर

दस्ते मुफ़लिस पे कुछ तो रखना सीख
कम, ज़ियादा भले हो, ना ना कर

उसके दिल में है क्या वही जाने
गिफ़्ट देता है रोज़ ला ला कर

अपना रिश्ता जनम जनम तक है
चल न देना कहीं तू टा टा कर

चुप करायेगी माँ ही बच्चों को
देर से रो रहे हैं हा हा कर

माँ बचाती थी धूप, बारिश से
सर पे आँचल को मेरे छा छा कर

कितने मरते हैं भूक से, कितने
साँड़ जैसे हुए हैं खा खा कर

कोई आता नहीं मदद को ‘रक़ीब’
देखते सब हैं दर को वा वा कर

जलवा-ए-हुस्न तो जिगर तक है

जलवा-ए-हुस्न तो जिगर तक है
हम तो समझे थे बस नज़र तक है

इल्म-ओ-फ़न की नहीं है क़द्र यहाँ
गोशाए – ज़ह्न के हुनर तक है

फ़ख्र क्यों कर हो मुल्क पर अपने
सोच की हद भी अब सिफर तक है

चाह बाक़ी नहीं उमीदों की
ज़िन्दगी बेसबब सहर तक है

फिर मिलें हम, मिलें, मिलें न मिलें
“साथ अपना तो बस सफ़र तक है”

ग़ैब का इल्म कब था बाबर को
मुग़लिया सल्तनत जफ़र तक है

कैसे मुफ़लिस ने ब्याह दी बेटी
किसको मालूम गिरवी घर तक है

शोर घर में बहुत है टी वी का
बैठना फिर भी दर्दे-सर तक है

घर को देखा जो आग की ज़द में
सहमा आँगन का ये शजर तक है

उसका जलवा ‘रक़ीब’ है हरसू
यह न समझो फ़क़त क़मर तक है

पास आने की बात करते हैं

पास आने की बात करते हैं
मुस्कुराने की बात करते हैं

लूट कर दौलते सुकूँ आख़िर
किस ख़ज़ाने की बात करते हैं

दिल तो मानिन्दे संग है फिर भी
दिल लगाने की बात करते हैं

रूठने का नहीं है ढब जिनको
वो मनाने की बात करते हैं

जब किया ही नहीं कोई वादा
क्या निभाने की बात करते हैं

सादगी से भुला के ख़्वाबों में
याद आने की बात करते हैं

मालो-ज़र के लिए फ़क़त देखो
गिड़गिड़ाने की बात करते हैं

छोड़ जाना ही गर है याँ सब कुछ
क्यों बचाने की बात करते हैं

चोट लगती है मेरे दिल पे ‘रक़ीब’
जब वो जाने की बात करते हैं

हर एक लफ़्ज़ पे वो जाँ निसार करता है

हर एक लफ़्ज़ पे वो जाँ निसार करता है
अदब नवाज़ है उर्दू से प्यार करता है

हमेशा चलते ही रहने की कैफ़ियत अच्छी
ठहर के वक़्त कहाँ इंतज़ार करता है

क़रीब आके मेरे दिल में झाँक कर देखे
नज़र के तीर से क्यों कर वो वार करता है

तअल्लुक़ात का मौसम अजीब है मौसम
कभी ये ख़ुश्क कभी ख़ुशगवार करता है

फ़रेबो-मक्र से मारा है पीठ में ख़न्जर
वगरना, मर्द तो सीने पे वार करता है

उसी के वास्ते रब ने बनाई है जन्नत
जो काम नेक यहाँ बेशुमार करता है

अता हुई है, हमेशा ही रहनुमाई ‘रक़ीब’
जो सर निगूँ दरे-परवर दिगार करता है

तीन दिन में आपको दुनिया दिखाने आए हैं

तीन दिन में आपको दुनिया दिखाने आए हैं
कब, कहाँ, कैसे है जाना, ये बताने आए हैं

चौंतीस मुल्कों और भारत के यहाँ छब्बिस प्रदेश
सात सौ इसमें प्रदर्शक भाग लेने आए हैं

लेके कारें, हर तरह की, आए हैं छोटी बड़ी
बैक पुश वाली बसें, लेकर घुमाने आए हैं

तीन से हैं सात तक, कुछ हैं सितारों के बिना
हैं बजट होटल कहाँ पर, ये बताने आए हैं

चार दिन और तीन रातों का है पैकेज टूर कम
क्या हनी क्या मून होगा, ये बढ़ाने आए हैं

लौटकर आ जाएगा घाटी में फिर चैनो-अमन
देवियों, देवों को रूठे, हम मनाने आए हैं

दूरदर्शन या सिनेमा ना किसी तस्वीर में
जंगली जीवों को जंगल में दिखाने आए हैं

हो के हिन्दू , ना लगाईं डुबकियां ना जल पिया
इसलिए, फिर ज्ञान की गंगा बहाने आए हैं

करके आने, जाने, रहने, खाने का सब इंतजाम
सैलानियों, यायावरों को हम बुलाने आए हैं

देख लो दुनिया है जितनी जब तलक है दम में दम
कल की है किसको ख़बर हम ये बताने आए हैं

तितलियों के साथ उड़ते हैं ख़याल उनको ‘रक़ीब’
गूंथकर अल्फाज़ की माला बनाने आए हैं

प्यार से पौदा कोई आप लगाएं तो सही 

प्यार से पौदा कोई आप लगाएं तो सही
फूल बंजर सी ज़मीं पर भी खिलाएं तो सही

पैकरे-सब्र कहाँ सबको अता होता है
ये हुनर बच्चों को हम-आप सिखाएं तो सही

हँसते – हँसते भी कभी आँख से आँसू निकलें
दे के खुशियाँ मुझे बेहद, वो रुलाएं तो सही

हो के मजबूर ही, इक़रार नहीं उसने किया
करने इनकार मेरे, सामने आएं तो सही

यूं तो चेहरे पे लिखी है तेरे दिल की हालत
हाले-दिल, अपनी ज़ुबां से भी सुनाएं तो सही

मंजिलें, आपको आसान लगेंगी कुछ और
मेरे क़दमों से क़दम आप मिलाएं तो सही

अपनी हठधर्मी से परहेज़ करेगा ये ‘रक़ीब’
गैर की बाहों में रहकर वो जलाएं तो सही

ये न हरगिज़ सोचना तुम, हम कमाने आए हैं

ये न हरगिज़ सोचना तुम, हम कमाने आए हैं
अब तलक जो भी बचाया है, लुटाने आए हैं

मुद्दतों तन्हाई में जो गुनगुनाए थे कभी
खुद-ब-खुद उनके लबों पर वो तराने आए हैं

एक हो जाएंगे जिस्मो-जाँ फक़त एहसास से
दो दिलों में प्यार की शमआ जलाने आए हैं

देख लो दुनिया है जितनी जब तलक है दम में दम
कल की है किसको ख़बर हम ये बताने आए हैं

बन के गीदड़ रह न जाए आने वाली नस्ल ये
शेर के एहसास से वाकिफ़ कराने आए हैं

रोज़आता था लगाने डुबकियाँ गंगा में ख़ुद
लोग उसकी अस्थियाँ, इसमें बहाने आए हैं

रूठकर वो चल दिए, कहकर, न आएंगे ‘रक़ीब’
एक अर्से बाद आखिर ख़ुद मनाने आए हैं

क्यों जुबां पर मेरी आ गयी हैं प्रिये

क्यों ज़ुबाँ पर मेरी आ गयी हैं प्रिये
थीं छुपानी जो बातें, कही हैं प्रिये

तेरी आमद से गुलशन महकने लगा
कलियाँ हर शाख़ की खिल उठी हैं प्रिये

मेरे जीवन में खुशियाँ तेरे संग ही
देखते-देखते आ गयी हैं प्रिये

यक-ब-यक बज़्म में आपको देखकर
सब की नज़रें उठी की उठी हैं प्रिये

ग़म नहीं दर खुले ना खुले अब कोई
शुक्र है, खिड़कियाँ तो खुली हैं प्रिये

आँसुओं की लगा दी अभी से झड़ी
दास्तानें कई अनकही हैं प्रिये

दौरे माज़ी की बातें भुला दे ‘रक़ीब’
अब तलक दिल में जितनी बची हैं प्रिये

करमचंद और पुतलीबाई के बेटे थे गाँधी जी

करमचंद और पुतलीबाई के बेटे थे गाँधी जी
‘बा’ के पति परमेश्वर थे जो, राष्ट्रपिता हैं गाँधी जी

सन अट्ठारह सौ उनहत्तर , दो अक्टूबर को आए
कहाँ पोरबंदर भारत में? फिर गुजरात याद आए

सात समुन्दर पार गया था कौन वकालत पढ़ने को?
दक्षिण अफ्रीकी जनता के हित की रक्षा करने को?

तन ढकने को वस्त्र न थे, खाने को नहीं था दाना भी
देख गरीबी चम्पारण की, त्याग दिया था कुर्ता भी

भेद मिटाकर जात-पात का सबको गले लगाया था
सत्य अहिंसा के बल-बूते झंडा भी फहराया था

जल, थल, नभ पर राज है किसका?, कौन मिटाए सबकी पीर?
छोटे-बड़े सभी नोटों पर छपी हुई जिसकी तस्वीर

सेतु, भवन, क़स्बे और सड़कें नाम से हैं गाँधी के पर
राह बताई जो बापू ने, लोग चलें अब कम उस पर

गाँधी जी ने झूम के गाया, “रघुपति राघव राजाराम”
लाठी, चष्मा छोड़ के जग में चले गए कहकर “हे राम”

मिलकर आओ खाएं क़सम, और कभी क़सम नहीं तोड़ेंगे
गाँधी जी के आदर्शों को कभी नहीं हम छोड़ेंगे

ऐसे दिल से मेरे धुवाँ निक

ऐसे दिल से मेरे धुवाँ निकले
जैसे यादों का कारवाँ निकले

उसकी नज़रों के तीर आँखों से
जाने कब छोड़कर कमाँ निकले

आए क्योंकर बहार गुलशन में
मुन्तज़िर है कि कब खिजाँ निकले

ग़ालिबो-मीर और दाग़-ओ-फ़िराक
कैसे – कैसे थे खुशबयाँ निकले

कोई उनतीस था नहीं उनमें
वाँ तो सब तीसमारखाँ निकले

कैसे ढूँढ़े कोई पता उसका
घर जो बेसक्फो-सायबाँ निकले

छोड़कर तुम ‘रक़ीब’ मत जाओ
दिल के अरमाँ अभी कहाँ निकले

होटों पे कभी जिनके दुआ तक नहीं आती

होटों पे कभी जिनके दुआ तक नहीं आती
जीने की उन्हें कोई अदा तक नहीं आती

हो दिल का मरज़ दूर भला कैसे कि अब तो
महँगाई को मुफ़लिस पे दया तक नहीं आती

मुश्किल से महीने में बचाता है वो जितना
उतने में तो खाँसी की दवा तक नहीं आती

जिस्मों की नुमाइश ने उसे कर दिया रुसवा
करनी पे मगर उसको हया तक नहीं आती

किसको हैं ज़माने की मयस्सर सभी ख़ुशियाँ
तक़दीर में मुफ़लिस के क़बा तक नहीं आती

विज्ञान के आलिम हैं मगर हाल है ऐसा
इस दौर में जीने की कला तक नहीं आती

पछताएगा, मज़लूम पे ज़ालिम न जफ़ा कर
क़ुदरत की तो लाठी की सदा तक नहीं आती

है नाम ‘रक़ीब’ अपना तभी तो मेरे नज़दीक
आफ़त का हो क्या ज़िक्र, बला तक नहीं आती

रख के मेज़ों पे जो भारत का अलम बैठे हैं

रख के मेज़ों पे जो भारत का अलम बैठे हैं
जाहिरन खा के वो ओहदे की क़सम बैठे हैं

बिन बुलाए ही चली आती हैं जो शाम ढले
दीदानम सिर्फ़ उन्हीं यादों में हम बैठे हैं

खुश्क होटों पे जबां फेर के कब प्यास बुझी
अश्क पीते हैं यहाँ खा के जो ग़म बैठे हैं

बस यही सोच के हम राह में ठहरे ही नहीं
लुत्फ़ मंज़िल का उठाते हैं जो कम बैठे हैं

चारसू आग है नफ़रत की न जाने फिर क्यों
“हाथ पर हाथ धरे अहले क़लम बैठे हैं”

आज की रात मेरे दिल पे गिरेगी बिजली
सोलह सिंगार किए मेरे सनम बैठे हैं

बुझ रहे हुस्न के हुक्के को तेरे अब भी ‘रक़ीब’
गुड़गुड़ाने के लिए भर के चिलम बैठे हैं

फिर अम्न के पैकर की फिज़ा क्यों नहीं आती

फिर अम्न के पैकर की फ़ज़ा क्यों नहीं आती
इन फ़िरक़ा-परस्तों को कज़ा क्यों नहीं आती

गोशे में कहीं दिल के खनकती तो है चूड़ी
कानों में खनकने की सदा क्यों नहीं आती

साक़ी तू पिलाता है सदा जाम से मुझको
आँखों से पिलाने की अदा क्यों नहीं आती

तुझको मेरी बेलौस मोहब्बत की क़सम है
आती हूँ अभी कहके, बता क्यों नहीं आती

जब तुझको नहीं रस्मे मोहब्बत को निभाना
यादों के ख़ुतूत उसके जला क्यों नहीं आती

यूँ शीशए-दिल तोड़ के जाता नहीं कोई
करनी पे उसे अपनी हया क्यों नहीं आती

पूछूँगा मैं लुक़मान से ये रोज़े-क़यामत
कैसा है मरज़ इश्क़, दवा क्यों नहीं आती

क्यों छोड़ दिया साथ मेरे जिस्म का तू ने
ऐ रूह तुझे, मुझपे दया क्यों नहीं आती

जीवन में ‘रक़ीब’ अपने हैं जब चार अनासिर
“यारो मेरे हिस्से में हवा क्यों नहीं आती”

लाखों अरमान थे काग़ज़ पे, निकाले कितने

लाखों अरमान थे काग़ज़ पे निकाले कितने
खूने-दिल से जो लिखे ख़त वो संभाले कितने

आपसे हो तो करें, हम से तो होगा न शुमार
उजले दिल कितने यहाँ, और हैं काले कितने

ख़्वाब दौलत के यूँ ही पूरे नहीं तूने किये
मुँह से मुफ़लिस के भी छीने हैं निवाले कितने

इक अयोध्या के लिए क्यूँ हैं परेशाँ दोनों
मस्जिदें और भी हैं, और शिवाले कितने

मुश्किलें रेत की मानिन्द फिसल जाती हैं
अक्ल की चाबी ने वा कर दिए ताले कितने

तीरगी में है घिरी ऐसे हयाते – फ़ानी
मुझसे कतरा के निकलते हैं उजाले कितने

बे-असर हो नहीं सकते कभी अशआर मेरे
यूँ तो शायर हैं बहुत लखनऊ वाले कितने

शे’र तो शे’र हैं पहुंचेंगे सभी रूहों तक
ज़िंदा हैं ज़ह्न में लोगों के मक़ाले कितने

फ़िक्र मंज़िल पे पहुँचने की है सबको इतनी
किसको फ़ुरसत है गिने पाँव में छाले कितने

शे’रगोई में हूँ मैं अदना सा शायर लेकिन
लफ़्ज़ तनक़ीद के यारों ने उछाले कितने

अब तो मजमूए की तू शक्ल इन्हें दे दे ‘रक़ीब’
तेरी ग़ज़लों को संभालेंगे रिसाले कितने

जब दुबारा कभी मिलूँ उससे

जब दुबारा कभी मिलूँ उससे
अपनी पहली ग़ज़ल सुनूँ उससे

कुछ तो होगा सबब जुदाई का
पूछ कर आज क्या करूँ उससे

जब वो बाहों में मेरी आ जाए
इक सबक प्यार का पढ़ूँ उससे

जिसके एहसान में दबा हूँ मैं
किस तरह से भला लडूँ उससे

कट के आयी पतंग ये कहती है
है अनाड़ी तो क्यों उडूं उससे

जो नहीं ऐतबार के क़ाबिल
दूर ही दूर मैं रहूँ उससे

फ़ैसला मैंने कर लिया है ‘रक़ीब’
कुछ न पूछूँ न कुछ कहूँ उससे

ये हक़ीक़त या ख़्वाब है कोई

ये हक़ीक़त कि ख़्वाब है कोई
सामने बेनक़ाब है कोई

है तसव्वुर में हुस्ने दोशीज़ा
या पुरानी शराब है कोई

भेजना कर के सैकड़ों पुर्ज़े
ख़त का यह भी जवाब है कोई

ज़िन्दगी क़ैदे-बा-मशक़्क़त है
इससे बढ़कर अज़ाब है कोई ?

बन्दगी में तेरी किफ़ायत क्यों
रहमतों का हिसाब है कोई

चाँद पर छाये ऐसे बादल हैं
रुख़ पे जैसे नक़ाब है कोई

है सरापा शबाब से लबरेज़
माह रुख़ या गुलाब है कोई

जिसको देखो ‘रक़ीब’ पढ़ता है
जैसे चेहरा किताब है कोई

लब पे भूले से मेरा नाम जो आया होगा 

लब पे भूले से मेरा नाम जो आया होगा
दिल की बेताब उमंगों को छिपाया होगा

तुझपे अहसाँ न किया मुझपे बकाया होगा
पिछले जन्मों का कोई क़र्ज़ चुकाया होगा

जब्त होता ही नहीं अपने करम का उनसे
सैकड़ों बार तो अहसान जताया होगा

नाम लेकर न बुज़ुर्गों को पुकारो अपने
जाने किसने तुझे गोदी में खिलाया होगा

उनसे लड़ना है मुझे सोच रहे हैं अर्जुन
जिसने बचपन में कभी लड़ना सिखाया होगा

तेरी मुश्किल को बना देंगी दुआएं आसाँ
सर पे माँ-बाप का जब तक तेरे साया होगा

ज़ाहिरन उसने नहीं ख़्वाब की वादी में सही
कोई न कोई कभी गुल तो खिलाया होगा

काटकर साँप, सपेरे को बहुत रोया था
सोचकर उसने मुझे दूध पिलाया होगा

अश्क आँखों में उमड़ पड़ते रहे होंगे ‘रक़ीब’
दर्दे-दिल जब भी कभी उसको सुनाया होगा

भटका हुआ था राहनुमा मिल गया मुझे

भटका हुआ था राहनुमा मिल गया मुझे
ऐसा लगा कि जैसे ख़ुदा मिल गया मुझे

ख़्वाबों में आ के जो मेरा दामन भिगो गया
वो सुब्ह दम बगल में खड़ा मिल गया मुझे

कुछ इस अदा से तान के अंगड़ाई उसने ली
बेताब ख़्वाहिशों का मज़ा मिल गया मुझे

बाहों में भर लिया तो सुकूं क़ल्ब को मिला
रातों को जागने का सिला मिल गया मुझे

दैरो-हरम मिले न मिले मुझको ग़म नहीं
खुश हूँ कि मैकदे का पता मिल गया मुझे

पहले के ज़ख़्म तेरे दिए, थे अभी हरे
ऐसे में ज़ख़्म दिल पे नया मिल गया मुझे

कलियों को तोड़ने की मनाही थी बाग़ में
क़िस्मत से एक फूल खिला मिल गया मुझे

मांगे मिली न भीक उसे बाख़ुदा मगर
नोटों से भरा बैग पड़ा मिल गया मुझे

मुद्दत के बाद मिल गयी मंज़िल मुझे ‘रक़ीब’
उसके ही घर से घर भी लगा मिल गया मुझे

रुख से ज़ुल्फ़ें जब महे-कामिल में सरकाते हैं वो

रुख से ज़ुल्फ़ें जब महे-कामिल में सरकाते हैं वो
तीरगी सदियों की पल में दूर कर जाते हैं वो

इक झलक के वास्ते बेचैन रहता हूँ सदा
देखकर हालत मेरी चुपके से मुस्काते हैं वो

मुस्कुरा कर वह बढ़ा देते हैं बेचैनी मेरी
क्यों दिल-बेताब को हर रोज़ तड़पाते हैं वो

एक नागिन की तरह लहराता है उनका बदन
आ के बाहों में मेरी कुछ ऐसे बल खाते हैं वो

बेख़ुदी में उनकी जानिब जब कभी खिंचता हूँ मैं
बेरुख़ी के जाम को आँखों से छलकाते हैं वो

वह तरन्नुम है कि सुनकर झूम उठती है फ़ज़ा
जब भी महफ़िल में मेरे नग़मात को गाते हैं वो

ख़्वाहिशे-दिल पूरी कर पाया न जीते जी ‘रक़ीब’
ख़्वाब में लेकिन तमन्ना पूरी कर जाते हैं वो

सभी के हक़ के लिए लड़े जो, उसे नयी ज़िन्दगी मिलेगी 

सभी के हक़ के लिए लड़े जो उसे नयी ज़िन्दगी मिलेगी
वतन परस्तों के दिल पे उसको ख़ुदा क़सम ख्वाज़गी मिलेगी

मशाल हाथों में रहनुमाई की ले के देखो जो चल रहे हैं
लिबास उजले हैं उनके लेकिन ख़याल में गन्दगी मिलेगी

अजल से अब तक यही रहा है, रहेगा शायद ये ता-क़यामत
खिली हुई चाँदनी कहीं तो, कहीं फ़क़त तीरगी मिलेगी

अता किया है जो रब ने तुझको संवार दे तू नसीबे-मुफ़लिस
यतीम बच्चों की परवरिश में, तुझे भी आसूदगी मिलेगी

ख़ुदा को दैरो-हरम में कब से, तलाशते हैं ख़ुदा के बन्दे
ज़मीं के ज़र्रों के लब पे खालिक की चारसू बन्दगी मिलेगी

हमारा बज्मे हसद में घुटता है दम फिजा में है बरहमी सी
चलो, चलें उस चमन की जानिब, जहां हमें ताज़गी मिलेगी

रिहाई की दिल में रख के हसरत कफ़स में मर-मर के जीने वाले
ख़ुदा हुआ मेहरबान जिस दिन ज़रूर आवारगी मिलेगी

जहाने फ़ानी में रस्मे-उल्फ़त का ख्व़ाब लेकर ‘रक़ीब’ आया
नहीं पता था, नहीं ख़बर थी, यहाँ भी बेगानगी मिलेगी

जी में आया है, मुझे आज वो, कर जाने दे

जी में आया है, मुझे आज वो, कर जाने दे
अपनी ज़ुल्फ़ें मेरे शानों पे बिख़र जाने दे

ले के जा बादे-सबा जिस्म की ख़ुशबू मेरी
मुझसे पहले मेरे आने की ख़बर जाने दे

शाख से कर न जुदा सब्र भी कर ऐ गुलचीं
हुस्न कलियों का ज़रा और निखर जाने दे

दो घड़ी और ठहर, देख लूँ चेहरा तेरा
अक्स आँखों से, मेरे दिल में उतर जाने दे

तेरी आगोश में, मैं ख़ुद ही चला आऊँगा
आज, अरमानों की कश्ती को, ‘भंवर’ जाने दे

तुझ से मैं रह के जुदा, ज़िन्दगी कैसे कर लूँ
जान भी, जिस्म से, ऐ जाने जिगर, जाने दे

रूठे दिलबर को यक़ीनन ही मनाएगा ‘रक़ीब’
बस ज़रा उसके मुक़द्दर को संवर जाने दे

कुछ न पूछूँ न कुछ कहूँ उससे

कुछ न पूछूँ न कुछ कहूँ उससे
रंजो-ग़म सारे बाँट लूँ उससे

बाद मुद्दत के जब मिलूँ उससे
कोई अच्छी ग़ज़ल सुनू उससे

जब वो बाहों में मेरी आ जाए
इक सबक प्यार का पढ़ूँ उससे

जो नहीं ऐतबार के क़ाबिल
दूर ही दूर मैं रहूँ उससे

हाथ को जोड़कर वो देता है
कहती गैरत है कुछ न लूँ उससे

रू-ब-रू उससे हाल पूछूंगा
क्यों फक़त ख़्वाब में मिलूँ उससे

कट के आयी पतंग ये कहती है
है अनाड़ी तो क्यों उडूं उससे

जिसके एहसान में दबा हूँ मैं
किस तरह से भला लडूँ उससे

ले तेरे पास आज आ ही गया
जोशे-उल्फत में ये कहूँ उससे

हमक़दम दोस्त है, ‘रक़ीब’ नहीं
फ़ासला रख के क्यों चलूँ उससे

जुस्तजू बोसा-ए-दिलदार नहीं थी, कि जो है

जुस्तजू बोसा-ए-दिलदार नहीं थी, कि जो है
ज़िन्दगी हुस्न परस्तार नहीं थी, कि जो है

सब इसी मुल्क में रहते थे कभी मिल जुलकर
दरमियां धर्म की दीवार नहीं थी, कि जो है

डाका डाला है मेरी नींद पे भी, चैन पे भी
वो मेरे दिल की गुनहगार नहीं थी, कि जो है

हम तो आए हैं कहा मान के टूटे दिल का
पहले तो ख्वाहिशे दीदार नहीं थी, कि जो है

मुझसे रूठी है मेरी जाने-तमन्ना जब से
ज़िन्दगी रूठ के पुरखार नहीं थी, कि जो है

जी, जलाने को यहाँ आए हैं कुछ खाना खराब
दोस्ती में यही दीवार नहीं थी, कि जो है

उनके आने से ‘रक़ीब’ आई है जीवन में बहार
हक़ में दुनिया मेरे गुलज़ार नहीं थी, कि जो है

कोई इस शहर में अपना नज़र आता ही नहीं

कोई इस शहर में अपना नज़र आता ही नहीं
कोई दरवाज़ा मोहब्बत का यहाँ वा ही नहीं

घर के दर पे जो तेरा नाम था वो मिट तो गया
और दिल पर जो तेरा नाम है मिटता ही नहीं

ज़ुल्फ़ की छाँव में कुछ देर कहीं रुक जाओ
प्यार भी चाहिए इंसान को रुपया ही नहीं

ज़हनो दिल में है मेरे फ़िक्र का सूरज रौशन
और मेरे घर में मोहब्बत का उजाला ही नहीं

हाथ जिसने मेरा देखा है वो ये कहता है
के तेरे हाथ में सुख चैन की रेखा ही नहीं

बत्तियाँ बुझ गईं होने को है सुब्हा शायद
राह तकने में कटी रात वो आया ही नहीं

लिख्खे साहिल पे जो उंगली से मिटाती मौजें
नाम दिल पे है लिखा किससे जो मिटता ही नहीं

उसकी तस्वीर थी महफूज़ तेरी आँखों में
“आईना तूने कभी गौर से देखा ही नहीं”

मुंबई शहर की मिट्टी की है तासीर अजब
जो ‘रक़ीब’ आता है वो लौट के जाता ही नहीं

मिक़नातीसी सी है ये मुंबई की खाक ‘रक़ीब’
जो यहाँ आता है वो लौट के जाता ही नहीं

दौलत का चंद रोज़ में यूं जादू चल गया

दौलत का चंद रोज़ में यूं जादू चल गया
कल तक जो आदमी था वो पत्थर में ढल गया

आने से उनके घर में मेरे रौशनी हुई
कल रात मेरे घर से अँधेरा निकल गया

मैं तो गमे-हयात से बेज़ार बैठा था
आई जो तेरी याद मेरा जी बहल गया

फिर यूँ हुआ के धर्म की दीवार आ गयी
उसने भी आँखें फेर लीं मैं भी बदल गया

ये आग सारी उम्र मुझे याद रहेगी
इस आग में तो प्यार, वफ़ा, दिल भी जल गया

अब आप आए हो मेरा अहवाल पूछने
जब थम गया तूफ़ान बुरा वक़्त टल गया

कुछ देर बाद चाँद निकल आएगा ‘रक़ीब’
अब शाम होने वाली है सूरज तो ढल गया

दिलों पर वार करने वालों को क़ातिल समझ लेना

दिलों पर वार करने वालों को क़ातिल समझ लेना
ये है हुस्ने सितम इसको न तुम मुश्किल समझ लेना

कहे आधा घड़ा खाली उसे जाहिल समझ लेना
भरा आधा कहे जो भी उसे काबिल समझ लेना

तेरे कूँचे में आए हैं दिखाने को हसीं जलवे
नज़ारा रंग लाएगा सरे महफ़िल समझ लेना

जुबां ख़ामोश थी ऐसी लबों पर जैसे ताला हो
मेरे आँखों की सुर्खी को दिले बिस्मिल समझ लेना

सफ़र की मंजिलें तो आरज़ी हैं ज़िन्दगानी में
“जहाँ पर टूट जाए दम उसे मंजिल समझ लेना”

भले ही बाँट ले खुशियों के पर्वत सारी दुनिया से
मगर राई से ग़म में मुझको तू शामिल समझ लेना

नज़र आती नहीं मर्दानगी इसमें सियासत दाँ
बहाए खूँ जो मुफ़लिस का उसे बुजदिल समझ लेना

महल जो घूस ले लेकर बनाए, मीडिया वाले
उधेड़ेंगे तेरी बखिया सरे-महफ़िल समझ लेना

निकल आए भंवर से और तूफानों से जब कश्ती
‘रक़ीब’-ए-बेनवा मझधार को साहिल समझ लेना

ज़र है जन्नत, ज़र न दोज़ख, हाए हम आए कहाँ

ज़र है जन्नत, ज़र न दोज़ख, हाए हम आए कहाँ
“सर छुपाने के लिए मुफलिस भला जाए कहाँ”

दिल का दामन तर-बतर था चश्म फिर भी खुश्क थे
सुर्ख़ियों में जब्त आँसू आँख में आए कहाँ

छुप-छुपाकर बिजलियों से जुस्तजू-ए-यार में
ले के सर पर फिर रहा छप्पर मगर छाए कहाँ

चैन से रोटी न खाने दी सितमगर ने कभी
ज़िन्दगी हो या जहन्नुम चैन वो पाए कहाँ

करवटों में रात काटी गर्म साँसें सर्द शब
जिनको आना था न आए हम भी गरमाए कहाँ

कम पड़े जब हाथ मेरे माँ का आँचल मिल गया
है पशेमां भी सितमगर जुल्म अब ढाए कहाँ

चारसू बम के धमाके हो रहे हैं शहर में
छोड़कर अपना मुक़द्दर जाए तो जाए कहाँ

वो सुराहीदार गर्दन और वो पतली कमर
रास्ता सीधा कमर खाए तो बलखाए कहाँ

भोग छप्पन, सेब और अंगूरो केले सब ‘रक़ीब’
ख्वाब में देखा किए हरदम मगर खाए कहाँ

आज़ादी की सालगिरह पर, तुम सबका अभिनन्दन है

आज़ादी की सालगिरह पर, तुम सबका अभिनन्दन है
जीवन पथ पर बढ़ो हमेशा, यही हमारा वंदन है

मत भूलो गांधी, नेहरू को, याद सदा उनको रखना
लड़ें लड़ाई आज़ादी की, भगतसिंह का था सपना

भेद भाव बाकी न रहा जब, आज़ादी के मतवालों में
रानी झांसी ज्वाला बनकर कूद पड़ी मैदानों में

तनिक वेदना याद करो आज़ाद, लाजपत, सुखदेवों की
लाठी, गोली, फांसी खाकर की है सेवा जन मानस की

अस्त्र-शस्त्र से लड़ें सभी पर हिम्मत गांधी जी की देखो
सत्य अहिंसा के बूते पर दिला गए आज़ादी हमको

बुरे नहीं अंगरेज़ कभी थे, बसी बुराई मन उनके
इक आँगन बांटा वर्गों में हम भी कितने नादाँ थे

तमिलनाडु से काश्मीर तक भारतवर्ष हमारा है
मातृभूमि का कण-कण हमको जान से बढ़कर प्यारा है

(प्रथम प्रकाशित रचना-राष्ट्रीय सहारा, लखनऊ, शनिवार 15 अगस्त 1992)

ज़िन्दगी तेरी कहानी भी कहानी है कोई

ज़िन्दगी तेरी कहानी भी कहानी है कोई
तुझपे आई है मगर ये भी जवानी है कोई

मैंने तो मान लिया तुझको सभी कुछ अपना
ये बता दे तेरा दिलबर तेरा जानी है कोई

अपने किरदार से औरों की बना दे पहले
बात बिगड़ी हुई अपनी जो बनानी है कोई

अस्थियाँ दे दीं दधीची ने सभी इन्दर को
उससे बढ़कर भला संसार में दानी है कोई

ढूंढता है वो कई रोज से वीरान ज़मीं
क़त्ल करके उसे फिर लाश दबानी है कोई

ले के ख़त उसने कहा हँस के मेरे क़ासिद से
उनका पैगाम तेरे पास जबानी है कोई

तेरा दावा है उसे तुझसे मुहब्बत थी बहुत
क्या तेरे पास मुहब्बत की निशानी है कोई

लिखने वाले मेरी क़िस्मत के बता दे मुझको
मेरी क़िस्मत में भी क्या रूप की रानी है कोई

ये हक़ीक़त है तेरे शे’र तो अच्छे हैं ‘रक़ीब’
ये जो शे’रों में रवानी है रवानी है कोई

हम कहते हैं बात बराबर

हम कहते हैं बात बराबर
छोटी बड़ी है जात बराबर

माँ और बाप हैं इक जुड़वां के
पैदा साथ न तात बराबर

दोनों हैं इक डाल के पत्ते
दोनों की क्या बात बराबर

देखो गज मूषक में अन्तर
कब दोनों के दांत बराबर

बाप हैं दस के निर्वंसी भी
होंगे कैसे नात बराबर

काक और कोयल दोनों बोलें
कहिये क्यों न गात बराबर

होता है इक रोज बरस में
जिसका दिन और रात बराबर

चाहे खा लें काजू पिस्ता
है सबकी अवकात बराबर

कोइ न जाने किस जा खड़ी है
मौत लगाए घात बराबर

नैन ‘रक़ीब’ सजल हैं तेरे
क्यों ना हो फिर मात बराबर

न चल, के चलती है जैसे हिरन ख़ुदा के लिए

न चल, के चलती है जैसे हिरन ख़ुदा के लिए
बदल दे, अच्छा नहीं ये चलन ख़ुदा के लिए

न पलने देना कभी साँप आस्तीनों में
कुचलते रहना यूँ ही फन पे फन ख़ुदा के लिए

लगा भी ले मुझे सीने से रूप की देवी
बुझा भी दे मेरे मन की अगन ख़ुदा के लिए

सुनो ऐ जुगनुओ तुम जाओ जा के सो जाओ
मेरे नसीब में है जागरन, ख़ुदा के लिए

ख़ुदा से प्यार है तुझको जो तेरा दावा है
सदा रहे तेरा जीवन-मरन ख़ुदा के लिए

हर इक शहीद जहाँ से गया ये कहता हुआ
लुटा न देना मता-ए-वतन ख़ुदा के लिए

‘रक़ीब’ ख़ार सिफत लोग मुश्तइल होंगे
“न छेड़ जिक्रे-गुले खंदजन ख़ुदा के लिए”

यूं तो लोगों के बीच रहता हूँ

यूं तो लोगों के बीच रहता हूँ
ये हक़ीक़त है मैं अकेला हूँ

मुझको सच्चाई से अलग रक्खो
दोस्तो एक झूठा सपना हूँ

हाँ तुझे डूबने नहीं दूंगा
मैंने माना के एक तिनका हूँ

तेरा मेरा निबाह मुश्किल है
तू है पत्थर सनम मैं शीशा हूँ

फिर मुलाक़ात हो कहीं शायद
तुम भी घर जाओ मैं भी चलता हूँ

मुझको दुनिया ‘रक़ीब’ कहती है
क्या बताऊँ किसी को मैं क्या हूँ

मिलती नहीं है चाल कोई मेरी चाल से

मिलती नहीं है चाल कोई मेरी चाल से
रहते हैं लोग दूर इसी इक ख़याल से

मेरे भी सर पे धूप है तेरे भी सर पे धूप
अच्छा नहीं है हाल मेरा तेरे हाल से

खुलने को खुल गया मगर अच्छा नहीं हुआ
जो राज़, राज़, राज़ रहा सालह साल से

संगीत मेरा हो तो तेरा गीत हो कोई
मिल जाएँ सुर से सुर तो मिले ताल ताल से

बाग़ों में आम पक गए, आने लगी है अब
कोयल के कूकने की सदा डाल-डाल से

बाहों से उसने मेरी निकल कर कहा, पकड़
मछली निकल गयी है मछेरे के जाल से

भारत में है अनाज बहुत अब मेरे ‘रक़ीब’
कितने ही लोग मरते थे पहले अकाल से

मौत इक दिखावा है मर के भी नहीं मरते

मौत इक दिखावा है मर के भी नहीं मरते
ज़िन्दगी के दीवाने मौत से नहीं डरते

डर है तुमको दुनिया का इश्क़ क्या करोगे तुम
इश्क़ में जो डरते हैं इश्क़ वो नहीं करते

वो भी क्या करें उन पर मेहरबाँ जवानी है
पाँव वो ज़मीं पर अब इसलिए नहीं रखते

प्यार करते हो, मुझे ज़िन्दगी भी कहते हो
फिर मेरी सितारों से माँग क्यों नहीं भरते

जान अपनी देते हैं भूख में मगर फिर भी
कुछ दरिन्द ऐसे हैं घास जो नहीं चरते

नफ़रतों के सागर में जो हसीन डूबे हैं
आँसुओं से वह आँचल तर कभी नहीं करते

मैं हबीब समझा था तुम ‘रक़ीब’ हो शायद
इसलिए मोहब्बत का दम कभी नहीं भरते

मैं हूँ ज़माने की हर शय से बेख़बर फिर भी

मैं हूँ ज़माने की हर शय से बेख़बर फिर भी
ज़माने वालों की मुझपे ही है नज़र फिर भी

मैं उसके हुस्न की तारीफ़ कर के हार गया
लबों पे जारी है उसके अगर मगर फिर भी

फ़रेब खा के भी बदज़न नहीं हुआ क्योंकर
समझता आया है दिल उसको मोतबर फिर भी

फ़रिश्ता लाख इबादत करे फ़रिश्ता है
गुनाह लाख करे, है बशर, बशर फिर भी

ख़बर है मुल्के – अदम से वो आ नहीं सकते
तलाशे-यार है जारी इधर-उधर फिर भी

पता है उसको के इन्सानियत का खूँ होगा
लगाता आग है ज़ालिम नगर-नगर फिर भी

‘रक़ीब’ इल्म की दौलत से मालामाल तो है
बराए-रिज़्क भटकता है दर-बदर फिर भी

जिगर से गर जिगर ख़ुद का, मिला देते तो अच्छा था

जिगर से गर जिगर ख़ुद का, मिला देते तो अच्छा था
हुई थी गर ख़ता कोई, भुला देते तो अच्छा था

लिखा है जो मुक़द्दर में, यक़ीनन वो अता होगा
मगर औलाद से गुलशन, सजा देते तो अच्छा था

फ़रिश्ते ने कहा क्या दूँ, था ग़ुरबत में कहा उसने
फटी है ज़ेब कुर्ते की, सिला देते तो अच्छा था

करो मत फिक्र हम तो हैं, ये कहते तो बहुत लेकिन
कभी राहों में पलकें भी, बिछा देते तो अच्छा था

कभी पी थी निगाहों से, न उतरा वो ख़ुमार अब तक
वही फिर मस्त आँखों से, पिला देते तो अच्छा था

दिए तो घर कई तू ने, शिकायत है मगर या रब
किसी घर में कोई दीपक, जला देते तो अच्छा था

हबीब आए हैं महफ़िल में, नहीं कोई ‘रक़ीब’ आया
अगर ये फ़ासले दिल के मिटा देते तो अच्छा था

मुझे कोई परेशानी नहीं है

मुझे कोई परेशानी नहीं है
ज़रा सी भी तो हैरानी नहीं है

लुटेरे ही लुटेरे हैं यहाँ सब
कोई भी शक्ल अनजानी नहीं है

मेरी क़िस्मत में सहरा का सफ़र है
लिखी है प्यास और पानी नहीं है

जो मेरे साथ चलना है, चले आओ
रहे-उल्फ़त में वीरानी नहीं है

‘रक़ीब’-ए-दिल पे फिर बिजली गिराई
समझकर ये, कि दिल फ़ानी नहीं है

पी के आँखों से मसरूर हो जाएंगे

पी के आँखों से मसरूर हो जाएंगे
सारी दुनियां में मशहूर हो जाएंगे

आप मंजिल पे मुझको अगर मिल गए
छाले पैरों के काफ़ूर हो जाएंगे

ज़ख़्म दिल के हरे थे हरे हैं अभी
दो दवा वरना नासूर हो जाएंगे

आप आ जाएंगे पास मेरे अगर
दिल में जितने हैं ग़म दूर हो जाएंगे

जब ख़यालों से ख़्वाबों में आने लगे
तुमसे मिलने को मजबूर हो जाएंगे

तुम से यूं ही जो नज़रें मिलाते रहे
बिन पिये हम तो मख़मूर हो जाएंगे

नज़्म उनपे न कहना ‘रक़ीब’ अब कभी
कुछ तो हैं और मग़रूर हो जाएंगे

राहे-वफ़ा में जब भी कोई आदमी चले

राहे-वफ़ा में जब भी कोई आदमी चले
हमराह उसके सारे जहाँ की ख़ुशी चले

छोड़ो भी दिन की बात मिलन की ये रात है
जब बात रात की है तो बस रात की चले

बुलबुल के लब पे आज हैं नग़में बहार के
सहने चमन में यूँ ही सदा नग़मगीं चले

तय्यार हूँ मैं चलने को हर पल ख़ुदा के घर
लेकर मुझे जो साथ मेरी बेख़ुदी चले

रहती है मेरे साथ सफ़र में बला की धूप
इक शब कभी तो साथ मेरे चांदनी चले

मैं जा रहा हूँ तेरा शहर छोड़ कर ‘रक़ीब’
आना हो जिसको साथ मेरे वो अभी चले

राहे वफ़ा में जो चलता है तनहा तनहा 

राहे वफ़ा में जो चलता है तनहा तनहा
सूरज पश्चिम में ढलता है तनहा तनहा

उजियारे के चाहने वालो सोचा भी है
दीपक क्या कोई जलता है तनहा तनहा

होटों पर मुस्कान है फ़ीकी, पलकें सूखी
मन में कोई दुःख पलता है तनहा तनहा

तेरे इतराने हँसने पर सब हँसते हैं
मुझको जाने क्यों खलता है तनहा तनहा

साये के संग तेरी यादें भी होती हैं
मेरा साया जब चलता है तनहा तनहा

मौका पाकर जो खोता है सुन लो ‘रक़ीब’
हाथ हमेशा वो मलता है तनहा तनहा

रत्तीभर झूठ नहीं इसमें, सपनों में मेरे आते हो तुम 

रत्तीभर झूठ नहीं इसमें, सपनों में मेरे आते हो तुम
फिर देख के चौबारे में मुझे, मुहँ फेर के क्यों जाते हो तुम

होटों पे तुम्हारे ख़ामोशी, सारा सारा दिन रहती है
क्या गीत, ग़ज़ल रातों को तुम, ख़्वाबों में बस गाते हो तुम

नींद आती नहीं रातों को मुझे, बस चाँद को तकता रहता हूँ
और बन के चकोरी चन्दा की, मन मेरा बहलाते हो तुम

कहती है ये ठंडी पुरवाई, आ जाओ गले से लग जाओ
दाँतों में होंट दबाकर यूँ, क्यों मुझसे शरमाते हो तुम

क्या बिगड़ेगा खिल जाएँगी, दिल के गुलशन में कलियाँ जो
खुलकर ज़रा मुस्काओ जानम, मन ही मन मुस्काते हो तुम

देखें क्यों बेगाने जोबन, यौवन को नज़र लग जाएगी
क्यों धूप में, मेरा सर अपने, यूँ आँचल में छाते हो तुम

थी बाली उमर नादानी थी, चंचल था मन हैरानी थी
क्या अपने शाने पर मेरा, सर रखकर समझाते हो तुम

दुनिया तुम्हें कुछ भी कहती है, कहने दो इसे ये दुनिया है
कुरआन की सूरत मन में हो, गीता की तरह भाते हो तुम

भड़की है आग रक़ाबत की, उस आग में मन जलता है ‘रक़ीब’
दामन से हवा ख़ुद दे दे कर, क्यों आग को भड़काते हो तुम

सच कहता हूँ पानी कि फ़ितरत में रवानी है

सच कहता हूँ पानी कि फ़ितरत में रवानी है
“जम जाए तो खूँ समझो, बह जाए तो पानी है”

घर दिल में बनाया है जिस रूप की देवी ने
उस रूप की देवी की क्या खूब कहानी है

क्या फिर से इरादा है दरिया में नहाने का
क्या आग तुझे ज़ालिम पानी में लगानी है

तुम मेरे हो मेरे हो है प्यार मुझे तुमसे
बिगड़ी हुई क़िस्मत भी तुम ही को बनानी है

जब कोई ख़ुशी पाई महसूस हुआ मुझको
ग़म दिल में जो पलता है क़ुदरत की निशानी है

मुझको तो निभाना है ये फ़र्ज़ मुहब्बत का
वादा भी निभाना है, चाहत भी निभानी है

इन्सां की जो फ़ितरत है बदली है न बदलेगी
लिक्खी है किताबों में ये बात पुरानी है

रोते हैं ‘रक़ीब’ अक्सर इंसां हो, के हैवाँ हो
ऐ वीर अभीमन्यू तेरी वो कहानी है

तज़करा है तेरा मिसालों में

तज़करा है तेरा मिसालों में
तू है बेशक परी जमालों में

नींद क्योंकर ख़फ़ा है आँखों से
अब तो आती है बस ख़यालों में

फूल बनना मुझे गवारा है
तू जो मुझको लगाए बालों में

कुछ ज़वाबात ऐसे होते हैं
जो छुपे होते हैं सवालों में

रंग लें, क्यों न अपने जीवन को
आज रंगों में और गुलालों में

कल अंधेरों में लोग लुटते थे
आज लुटने लगे उजालों में

आज उकता के चल दिए देखो
छोड़कर ज़िन्दगी बवालों में

हर कोई जाएगा यहाँ से ‘रक़ीब’
हम भी हैं याँ से जाने वालों में

तेरे सर से तेरी बला जाए जब तक

तेरे सर से तेरी बला जाए जब तक
छले जा छले जा छला जाए जब तक

गला तेरा अच्छाई घोंटेगी इक दिन
बुराई में पल तू पला जाए जब तक

मुहब्बत की राहों में चलना है बेहतर
चला जा चला जा चला जाए जब तक

शबे-वस्ल है ऐ मुहब्बत की शम-आ
सनम तू जले जा जला जाए जब तक

‘रक़ीब’ आतिशे ग़म बना देगी कुन्दन
गले जाओ पल पल गला जाए जब तक

तेरी यादें हैं सहारा मेरी तन्हाई का

तेरी यादें हैं सहारा मेरी तन्हाई का
“भूलता ही नहीं आलम तेरी अंगड़ाई का”

ज़िक्र पर मेरे सहेली से कहा ये उसने
तज़करा मुझसे न करना किसी हरजाई का

प्यार सागर से भी गहरा है ज़माने वालो
फ़लसफ़ा समझो अगर प्यार की गहराई का

मेरे मातम पे हँसी मेरी उड़ाने वाले
टूट जाए न कहीं सुर तेरी शहनाई का

दोस्तो, ऐसी हर इक बज़्म को है मेरा सलाम
दिल जहाँ तोड़ दिया जाए तमन्नाई का

ये अलग बात है उससे नहीं बनती मेरी
मेरा दुश्मन है, जो दुश्मन है मेरे भाई का

कर दूँ इज़हार मुहब्बत का तेरी मैं तो ‘रक़ीब’
खौफ़ है मुझको मगर प्यार की रुसवाई का

तेरी बातें मैंने मानी

तेरी बातें मैंने मानी
ये मेरी चाहत की निशानी

तू ही तू है मेरे दिल में
कोई नहीं है तेरा सानी

जब साजन की याद सताए
भर आए आँखों में पानी

योरप में रहती है लेकिन
वो लड़की है हिन्दुस्तानी

एक हुए जब दिल दोनों के
दिल की दिल ने की अगवानी

चलती गाड़ी से जो उतरा
बेशक़ उसने की नादानी

मुझसे बस तू दूर ही रहना
आग बुझा देता है पानी

क़समें खाते थे यारी की
वो हैं मेरे दुश्मन जानी

तू है ‘रक़ीब’ का प्रेमी यारा
अमर है तेरी प्रेम कहानी

तुझको दिलबर तो मिला था, क्या हुआ

तुझको दिलबर तो मिला था, क्या हुआ
प्यार का गुल तो खिला था, क्या हुआ

दूर रहकर ज़िन्दगी की आरज़ू
ख़्वाब ही में देखता था, क्या हुआ

मंज़िलें अपनी अलग क्यों हो गयीं
जब के इक ही रास्ता था, क्या हुआ

कारवाँ जाकर भी वापस आ गया
मैं वहीं तन्हा खड़ा था, क्या हुआ

ज़िन्दगी में और भी ग़म थे बहुत
ग़म तेरा तनहा नहीं था, क्या हुआ

बेबसी के आँसुओं का ग़म न कर
एक तू तन्हा नहीं था, क्या हुआ

जुस्तज़ू है उम्र भर की तू मेरी
मैं तुझे ढूँढा किया था, क्या हुआ

कल जो अपना था, अब अपना है ‘रक़ीब’
दिल तो उसका आईना था, क्या हुआ

वो पास अगर मेरे होती, भर लेता उसे मैं बाहों में

वो पास अगर मेरे होती, भर लेता उसे मैं बाहों में
उड़ती हुई जो आती है नज़र, दिन रात सुहाने ख़्वाबों में

मशहूर है उसकी चंचलता, माना है शरारत की देवी
आता है नज़र भोलापन भी, कुछ उसकी शोख़ अदाओं में

ग़ुरबत भी थी और बेकारी भी, ग़ुरबत में मोहब्बत कर बैठे
इक और बला ने घेर लिया, पहले से घिरे थे बलाओं में

इज़हारे-मोहब्बत कर न सके, हम जिनसे मोहब्बत करते थे
डरते थे के वो क्या सोचेंगे, गिर जाएं न उनकी निगाहों में

गुलशन में गुलों से क्या शिकवा, काँटे भी तो मुझपर हंसते हैं
दुश्मन है फ़ज़ा भी अब मेरी, नफ़रत का असर है हवाओं में

सुख और दुःख के तुम साथी थे, क्यों रूठ गए क्या बात हुई
अब तुम ही कहो मैं कैसे चलूँ तनहा जीवन की राहों में

छोड़ा न कहीं का भी मुझको, चाहत ने तुझे पा लेने की
मैं हद से गुज़र कर इंसां की, ले डूब गया हूँ गुनाहों में

वो जिनसे मोहब्बत है मुझको, मैं ढूंढ रहा हूँ मुद्दत से
घर जिनका है मेरी आँखों में, रहते हैं जो मेरी आहों में

अब कोई हमारा कोई नहीं, अब कोई हमारा कोई ‘रक़ीब’
ख़ुशियों से बहुत डर लगता है, रहते हैं ग़म की पनाहों में

वतन पे वीर हमेशा निसार होते हैं

वतन पे वीर हमेशा निसार होते हैं
“चमन के फूल चमन की बहार होते हैं”

कभी न मिलने पे होते थे बेक़रार बहुत
अब उनसे मिल के भी हम बेक़रार होते हैं

बनो तो मुफ़लिसो-नादार के बनो मेहमाँ
वो मेहजबान बड़े ग़मगुसार होते हैं

ये तेरी ज़ुल्फ़ बिखरती है जब तेरे रुख़ पर
निसार होते हैं, मौसम निसार होते हैं

जो बात आती है होटों पे हुस्न वालों के
उस एक बात के मतलब हज़ार होते हैं

तमाम रात वो तारे शुमार करता रहा
भला किसी से ये तारे शुमार होते हैं

‘रक़ीब’ होते हैं वो लोग पैकरे-उल्फ़त
के जिनके दामने-दिल तार-तार होते हैं

तुम्हारे शहर में मशहूर नाम किसका था

तुम्हारे शहर में मशहूर नाम किसका था
मेरा नहीं था तो फिर एहतराम किसका था

न पूछ मुझसे ये बेहतर है मयकशों से पूछ
सुराही किसकी थी महफ़िल में जाम किसका था

बता सको तो बताओ ये क़ाफ़िले वालो
कि तुमसे पहले यहाँ पर क़याम किसका था

रहे हयात से किसने हटा दिया पत्थर
मुझे ख़बर नहीं ये नेक काम किसका था

तमाम गोपियाँ करती थीं प्यार नटखट से
जो राधिका का नहीं था तो श्याम किसका था

वो कल जो बज़्मे-सुख़न में सुनाया था तू ने
बहुत हसीन था लेकिन क़लाम किसका था

हबीब मेरे ज़रा सोचकर बता मुझको
‘रक़ीब’ को जो मिला है मक़ाम किसका था

याद आया मुझे तू ऐ मेरे वतन

याद आया मुझे तू ऐ मेरे वतन
हैं तहे दिल से तुझको हज़ारों नमन

रो रही है ज़मीं जल रहा है गगन
ना ये धरती रहे ना रहे ये गगन
सब लगे नाचने आज होके मगन
याद आया मुझे तू ऐ मेरे वतन

लहलहाते हुए खेत और क्यारियाँ
गाँव, पीपल, कुआँ और पनहारियाँ
याद आती है बरखा वह ठंडी पवन
याद आया मुझे तू ऐ मेरे वतन

याद आती है रिम-झिम वह बरसात की
झोपड़ी, खेत और चान्दनी रात की
और सवेरे के सूरज की पहली किरन
याद आया मुझे तू ऐ मेरे वतन

गाँव के मेले और बैठकें गाँव की
खेल और कूद वो फुरसतें गाँव की
रात का चैन और दिन की सारी थकन
याद आया मुझे तू ऐ मेरे वतन

बाद बरखा के आकाश पर वह धनक
चूड़ियों की खनक पायलों की झनक
गोरे गोरे थिरकते हुए वह बदन
याद आया मुझे तू ऐ मेरे वतन

वो नदी के किनारे बसी बस्तियाँ
रात-दिन चलती रहती वो पनचक्कियाँ
दूर, याद आ के करती हैं मन की थकन
याद आया मुझे तू ऐ मेरे वतन

क़तआत

क़तआत
क़तआत
01
बिखरे पड़े हैं बेर ज़मीं पर हरे हरे
बेरी की डाल किसने हिलाई है कौन है
अन्याय किसने नन्हें फलों पर किया है ये
दुर्गत भला ये किसने बनाई है कौन है
02
चाँद सा चेहरा तेरे चहरे को मैं कैसे कहूँ
क्यों कि तू है आदमी, और आदमी है बेमिसाल
ये जो सूरज है, नहीं कुछ आदमी के सामने
आदमी इश्वर की रचना में है सबसे बाकमाल
03
चन्द्रमा पर तू बाद में जाना
पहले धरती बदल समाज बदल
सुन समय की पुकार सुन ऐ ‘रक़ीब’
कल की मत सोच आज, आज बदल
04
दर हकीक़त आदमी का फ़र्ज़ है
आदमी को रब से डरना चाहिए
माँ की इज्ज़त है ज़रूरी दोस्तो
बाप का आदर भी करना चाहिए
05
दूर से देखते ही रोज सलाम
उसकी ख़िदमत में अर्ज़ करता हूँ
कोई लेता नहीं सलाम न ले
मैं अदा अपना फर्ज़ करता हूँ
06
एक हो जायेंगे इक दिन जहनो – दिल जुड़ जायेंगे
और मुसाफिर अपने-अपने मोड़ पर मुड़ जायेंगे
बालो – पर भीगे हुए हैं, सूख जाने दो जरा
पेड़ पर बैठे परिंदे , खुद-ब-खुद उड़ जायेंगे
07
गाल गुलाबी, बाल सुनहरे, और अदा में भोलापन
मेरे साक़ी की आँखें हैं नीली नीली थोड़ी सी
अर्ज़ करूँ क्या तुमसे लोगो, मैं कोई मयनोश नहीं
साक़ी की बातों में आकर, मैंने पी ली थोड़ी सी
08
हादसों से खुशी हादसों से है ग़म
हादसों से भला कौन है बच सका
हादसों में घिरी ही रही जिन्दगी
जिसमे तू बन के आई बड़ा हादसा
09
हम भी बहुत गरीब हैं, तुम भी तुम भी बहुत गरीब
शायर ने हँस के ये कहा इक दिन अदीब से
मजबूर हो के करते हैं इजहारे-हाले-दिल
हम क्या करें हैं हमको, मोहब्बत ‘रक़ीब’ से
10
इन्सानियत की आँखों से आँसू निकल पड़े
ज़ुल्मों – सितम की देश में बरसात देखकर
रोता है बात करने से पहले वो आदमी
आया है जो भी हालते गुजरात देखकर
11
जिस्म दो हैं मगर एक है ज़िन्दगी
ग़म भी दोनों का इक, दोनों की इक खुशी
मैं हूँ एक चाँद आकाश पर प्यार के
और तू है मेरी जाँ मेरी चांदनी
12
लहू से सींचती है, दूध, माँ जिसको पिलाती है
बड़ा होकर वो बच्चा, माँ का क्यों आदर नहीं करता
सबब इसका है कुछ माहौल, और कुछ परवरिश उसकी
जो माँ के सामने अपना, वो नीचा सर नहीं करता
13
माँ को मौसी, मौसी को माँ कहिये तो कोई बात नहीं
माँ के मरने पर बच्चे को मौसी पाला करती है
ममता से भर देती हैं मन खाला हर इक बच्चे की
कोई नहीं कर सकता ख़िदमत जितनी खाला करती है
14
मुफलिसी का तजकरा करता है क्यों हर बात पर
शुक्र कर, तू जो भी है, जैसे भी हैं हालात पर
एक दिन तक़दीर सँवरेगी तेरी भी ऐ ‘रक़ीब’
नेकनीयत और भरोसा रख ख़ुदा की जात पर
15
नित नये अन्दाज से ये जिस्म अपना बेचने
शाम हो जाते ही आते हैं सभी फुटपाथ पर
दोष इनका कुछ नहीं है ये तो है क़िस्मत का खेल
कोई महलों में हुआ पैदा कोई फुटपाथ पर
16
न्याय कीजेगा तो ये अन्याय ख़ुद मिट जाएगा
स्वर्ग बन जाएगा भारत और भारत की ज़मीं
प्यार की बारिश से हो जाएंगे सब ठंढे दिमाग़
आग नफ़रत की न भड़केगी न भड़केगी कभी
17
पिन खोली और मुँह में दबाई
हाथ उठाए सँवारे बाल
खेल हवा ने खेला था जब
बिखर गए थे सारे बाल
18
रामायन, गीता और बायबल
गुरु ग्रन्थ यहाँ कुर-आन यहाँ
क्यों आग लगी चारों जानिब
हर्फे – नफ़रत लिक्खा है कहाँ
19
सवेरे के सूरज की पहली किरन तू
दिया है मुझे तू ने अपना उजाला
तेरे हुस्न पर शे’र कहता रहूँगा
तेरा हुस्न है हर हसीं से निराला
20
सीने पर जो हाथ रखा तो
जल गयी हर इक रेखा
हाथ दिखाया ज्योतिष को तो
ज्योतिष ने क्या देखा
21
शबनमी शब में चांदनी निखरी
ग़म के साये में हर ख़ुशी निखरी
मौत का शुक्रिया ‘रक़ीब’ के वो
याद आयी तो ज़िन्दगी निखरी
22
आपकी बात ही क्या, आप तो हैं हिन्दी दां
हाँ, मगर हमको है इस उर्दू जुबां से उल्फत
सर के ऊपर से निकल जाती है मुश्किल हिन्दी
और उर्दू से मुझे मिलती है बेहद लज़्ज़त
23
हो दिल मरज़ दूर भला कैसे के अब तो
मँहगाई को मुफ़लिस पे दया तक नहीं आती
मुश्किल से महीने में बचाता है वह जितना
उतने में तो खाँसी की दवा तक नहीं आती
24
ज़िन्दगी के दिन कटे आओ जवाँ रातें करें
बंदिशें अब ख़त्म सारी बेसदा बातें करें
जिस्म का रिश्ता था फ़ानी, रूह तो है जाविदां
जब, जहाँ, जी भर के चाहें हम मुलाक़ातें करें
25
दिल की गहराई से यारब हम तुम्हें करते हैं याद
हर घड़ी, हर लम्हा रखना फूल से बच्चे को शाद
जन्मदिन पर ‘आप’ को आशीष देता है ‘रक़ीब’
नानियों, माता-पिता, मौसी व मामाओं के बाद
26
रंग, अबीर, गुलाल लगाकर फूलों की बौछार करें
फ़ागुन आया छोड़ के नफ़रत प्यार करें, बस प्यार करें
छोटों को दें, बड़ों से लेकर, आशीर्वाद आज के दिन
होगा बहुत मुनाफ़ा इस में आज यही व्योपार करें
27
आ जा तू किनारे पे न कर मुझको परेशान
तोड़ा है जो सिगनल तो करूँगा तेरा चालान
ग़लती से भी आइन्दा कभी ऐसा न करना
ट्रैफिक के सिपाही से बचेगी न तेरी जान
28
गुज़र गया है जो बचपन वो याद कर लेना
मिले जो वक़्त कभी हमको याद कर लेना
फ़लक के चाँद सितारे भी तुझको छूने हैं
मगर ज़मीन के ज़र्रों को याद कर लेना
29
वो कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है मियाँ
हाले-दिल मेरा उस पर अयाँ है मियाँ
ढूँढती हैं निगाहेँ जिसे रात-दिन
कोई बतलाये मुझको जहां है मियाँ
30
ये सवाली जवाब क्या जाने
ख्वाहिशे-दिल गुलाब क्या जाने
शिद्दते-दीद चश्मे नम की ‘रक़ीब’
“उसके रुख़ का नक़ाब क्या जाने”
31
चालाक भाभी – होली में मस्ती
भिगोलो दूर से मुझको, उड़ालो रंग जी भरकर
कहा भाभी ने देवर से, न छूना मेरे “वो” दिन हैं
32
“दिखाई देती हैं खुशियाँ तमाम आँखों में
हैं बेक़रार बहुत लब न जाने क्या कह दें”
33
“पलभर की हँसी से बनी तस्वीर बहुत खूब
बेहतर हो ये जीवन, जो हमेशा ही रहें खुश”
34
उजाला कम है, समझ में ये बात आती है
भरम है सबको अंधेरा नहीं “चराग़” तले
35
बेकार भटकती है कहाँ, सुन तू हवा ले चल
ऊपर से समुन्दर के मुझको तू उड़ा ले चल
प्यासी है बहुत धरती, हम प्यास बुझाएंगे
ज़िद छोड़ हवा मुझको बादल ने कहा ले चल
36
अब किसी भी बात का कोई बुरा माने नहीं
ऐ जहां वालो सुनो हम हो गए हैं साठ के
37
न खाई न झूठी क़सम खाएंगे हम
जुदा हो के तुझसे न रह पाएंगे हम
यक़ीं गर न हो देख लो आज़माकर
बिछड़ने से पहले ही मर जाएंगे हम
38
सज गया है फ़लक चाँद की दीद है
हो मुबारक तुम्हें, ईद है, ईद है
सब मोहब्बत करें, हो न बुग़ज़ो-हसद
इस मुबारक घड़ी की ये ताकीद है

ले के ख़ुशबू सू -ए-सहरा रोज़ो-शब जाते हैं हम

ले के ख़ुशबू सू -ए-सहरा रोज़ो-शब जाते हैं हम
और महक से ज़र्रा ज़र्रा खूब महकाते हैं हम

हम क़सम खाकर ये कहते हैं कि उनसे प्यार है
वह समझते हैं कि बस झूठी क़सम खाते हैं हम

अक्ल पर पत्थर हमारी पड़ गए हैं इसलिए
ख़ुद समझते ही नहीं औरों को समझाते हैं हम

जब भी ज़िद करते हैं रोते हैं खिलौनों के लिए
कल के वादे पे सदा बच्चों को बहलाते हैं हम

दूसरों पर तंज़ करना आम सी इक बात है
अपने कर्तव्यों को फिर क्यों भूल से जाते हैं हम

रंजो-ग़म अपने किसी पर भी अयाँ करते नहीं
साज़े-दिल पर अपने नग़मा झूम कर गाते हैं हम

लुत्फ़ आता है सितम तक़दीर के सहकर बहुत
मेहरबाँ तक़दीर होती है तो घबराते हैं हम

वो हमारे हैं न हम उनके हैं ऐ लोगो ‘रक़ीब’
वो हमें भाते हैं और उनको बहुत भाते हैं हम

लौट कर आना था, लो आ गया, आने वाला

लौट कर आना था, लो आ गया, आने वाला
“छोड़ कर घर को कहाँ जाएगा जाने वाला”

भूल कर शिकवे गिले आ जा मेरी बाहों में
मैं ही हूँ जग में तुम्हें दिल से लगाने वाला

उम्र भर साथ निभाने की क़सम खाई है
एक मैं ही हूँ तेरा साथ निभाने वाला

माँ तो सोई है जनम दे के हमेशा के लिए
लोरियां गा के है अब कौन सुलाने वाला

तुम ये क्या रूठे के वो रूठ गया दुनिया से
अब न आएगा कभी तुमको मनाने वाला

बोझ ग़म का है गरीबों ही की क़िस्मत में ‘रक़ीब’
कोइ ज़रदार ये कब बोझ उठाने वाला

कोई भी चल न सका, साहिबे अफ़कार चले

कोई भी चल न सका, साहिबे अफ़कार चले
राह वह तल्ख़ है जिस राह पे फ़नकार चले

क्या करे कोई मुक़द्दर में जो बनवास लिखा
छोड़ के अपना ही घर मालिको-मुख़तार चले

जिनसे उम्मीद थी साहिल पे लगा देंगे मुझे
छोड़ कर कश्ती, वही छोड़ के पतवार चले

जाम दो-चार उतरते ही गले से नीचे
झूमते झामते गाते हुए मयख्वार चले

कल गुलों से जो कहा करते थे बस दूर रहो
अपने दामन में समेटे हुए वह ख़ार चले

जो सियासत में कई बार हुए हैं नाकाम
ऐसे वुज़रा से भला किस तरह सरकार चले

जिन चराग़ों ने कहा था के जलेंगे शब भर
बुझ गए तेज़ हवाओं से, सभी हार चले

थक के मैं बैठ गया, थी अभी मंज़िल कुछ दूर
मुंतज़िर था के कोई काफ़िला उस पार चले

गुलशने-हुस्न में देखा है ये अक्सर ऐ ‘रक़ीब’
पावं से रौंद के सब कलियों को ज़रदार चले

मिलकर आओ हम सैर करें, इस मेगामाल में निफ़टी की

मिलकर आओ हम सैर करें, इस मेगामाल में निफ़टी की
हो महासमर जब नोटों का, इस मेगामाल में निफ़टी की
गोनी में लेकर आओगे , लारी भर-भर ले जाओगे
फ़ुरसत न मिलेगी गिनने की , इस मेगामाल में निफ़टी की

टाटा स्टील, टी सी एस और टाटा पावर, टाटा मोटर
ये चार दुकानें टाटा की, इस मेगामाल में निफ़टी की
अंबानी बंधु चलायें जो , पहले है आर आई एल फिर
कैपिटल, कोम, इन्फ्रा, पॉवर इस मेगामाल में निफ़टी की
एच डी एफ़ सी बैंक है इक, दूजा केवल एच डी एफ़ सी
हिंडालको इंडस्ट्रीज़ भी है , इस मेगामाल में निफ़टी की
एनटीपीसी, ओएनजीसी, इनफ़ोसिस, विपरो, एलएनटी
भारती एअरटेल, एबीबी, इस मेगामाल में निफ़टी की
स्टरलाईट, सुजलान भी हैं, और रैनबैक्सी पावर ग्रिड
सीमेंट अम्बुजा, एसीसी इस मेगामाल में निफ़टी की

सीएनबीसी चैनल में सुनो तुम लता, मिताली, उदयन को
लो, बेचो अपनी मर्ज़ी से इस मेगामाल में निफ़टी की
नौ नक़द मिलें तो झपट पड़ो, कल तेरह का चक्कर छोड़ो
लोवर सर्किट भी लगता है इस मेगामाल में निफ़टी की

हिन्दुस्तान यूनीलीवर , मारुती सुज़ूकी, डी एल एफ़
है जयप्रकाश एसोसिएट, इस मेगामाल में निफ़टी की
पंजाब नेशनल , अक्सिस और इस्टेट बैंक , हीरो हांडा
हैं सेल, गेल और भेल यहाँ , इस मेगामाल में निफ़टी की
बी पी सी एल , सीमेंस यहाँ केअर्न यूनिटेक सन फरमा
जिंदल इस्टील ओ पावर भी, इस मेगामाल में निफ़टी की
आइडिया सेल्यूलर , आईटीसी , एचसीएल टेकनोलोजी भी
आईडीएफसी , ग्रासिम , सिपला इस मेगामाल में निफ़टी की
बस एक महिंद्रा काफ़ी है दो बार वही क्यों बात कहें
आई सी आई बैंक भी है इस मेगामाल में निफ़टी की

तक़दीर, भाग्य, क़िस्मत , नसीब कहते हैं जिसे मुक़द्दर क्या
हो जाएगा मालूम तुम्हें , इस मेगामाल में निफ़टी की
कुछ आज हुए , कुछ कल होंगे , कोई आगे , कोई पीछे
सब होंगे मालामाल ‘रक़ीब’ , इस मेगामाल में निफ़टी की

जब भी तू मेहरबान होता है

जब भी तू मेहरबान होता है
दिल मेरा बदगुमान होता है

प्यार है देन एक क़ुदरत की
पाए, जो भागवान होता है

लोग उसको सलाम करते हैं
जिसका ऊँचा मकान होता है

अपना बिस्तर ज़मीन, रातों को
आसमाँ सायबान होता है

जीत लेता है दुश्मनों के दिल
जो कोई ख़ुशबयान होता है

रोज ख़तरों से खेलने वाला
साहिबे आन-बान होता है

हूरे जन्नत है ज़िन्दगी मेरी
हुस्न क़ुदरत का दान होता है

पुख्तगी हो अगर इरादों में
आदमी कामरान होता है

हो जो शाइर हक़ीक़तन ऐ ‘रक़ीब’
वो ही अहले ज़बान होता है

गर तुम्हें साथ मेरा गवारा नहीं

गर तुम्हें साथ मेरा गवारा नहीं
मासेवा एक के कोई चारा नहीं

बिन तुम्हारे मिरा अब गुज़ारा नहीं
ये समझ लो कोई और चारा नहीं

जाने वाला कभी लौट आएगा ख़ुद
इसलिए मैंने उसको पुकारा नहीं

क्यों ख़फ़ा हो गए क्या ख़ता है मिरी
हक़ तुम्हारा कभी हमने मारा नहीं

हसरते-दीद दिल की, रही दिल में ही
तू ने ज़ुल्फ़ों को अपनी संवारा नहीं

बू-ए-गुल की तरह है मिरी ज़िन्दगी
मेरी आहों में हरगिज़ शरारा नहीं

उसको ख़ुशियों की मंज़िल मुक़द्दर ने दी
मुश्किलों से जो इन्सान हारा नहीं

आज है कौन दुनिया में ऐसा ‘रक़ीब’
गर्दिशे वक़्त ने जिसको मारा नहीं

इल्तिजा कर रहा हूँ मैं तुमसे यही, नंगे पाँवों गली में न आया करो

इल्तिजा कर रहा हूँ मैं तुमसे यही, नंगे पाँवों गली में न आया करो
बच के काँटों से रक्खा करो तुम क़दम, पैर नाज़ुक है उसको बचाया करो

तुम हसीनों में सबसे जुदा हो सनम, लोग यूं तो नहाते हैं पानी से सब
नर्म नाज़ुक बदन है तुम्हारा बहुत, दूध से तुम मेरी जाँ नहाया करो

आपके घर से मंदिर नहीं दूर कुछ, मैं भी आता हूँ हर रोज़ मंदिर सनम
होगी पूजा बहाना मुलाक़ात का, बस वहीं जलवा अपना दिखाया करो

घर से श्रिंगार करके निकलती तो हो, हाँ मगर इतनी सी इल्तिजा है मेरी
गाल पर एक तिल सा बनाया करो, जब भी नैनो में काजल लगाया करो

तुमने मुझको लिखा था जो ख़त प्यार का, जो भी उसमें लिखा था वो अच्छा लगा
यूँ न नैनो से निंदिया चुराया करो, आ के सपनों में मुझको सताया करो

घर की अंगनाई में या के तन्हाई में, जब तुम्हें याद मेरी सताने लगे
भूलकर दूरियां मन ही मन जानेमन, फूल की तरह तुम मुस्कराया करो

याद करके तुम्हें गीत लिखता हूँ मैं, मेरा हर गीत है बस तुम्हारे लिए
चैन आ जाएगा मन बहल जाएगा, गीत मेरा सदा गुनगुनाया करो

प्यार है तो कहो बेरुख़ी किसलिए, किस ख़ता पर मेरी है शिकायत तुम्हें
मेरी नज़रों से नज़रें मिलाकर कहो, शर्म से सर न अपना झुकाया करो

प्यार करता हूँ तुमसे ख़ुदा की क़सम, प्यार की राह में हैं बड़े पेचो-ख़म
है ‘रक़ीबे’-जहाँ की यही इल्तिजा, जो भी वादा करो वो निभाया करो

मैं हूँ तेरी यादें हैं सागर का किनारा है 

मैं हूँ तेरी यादें हैं सागर का किनारा है
आ मेरे गले लग जा पानी ने पुकारा है

है दूर बहुत मुझसे तू पास नहीं लेकिन
कुछ आस मिलन की है कुछ आस नहीं लेकिन
फीका तेरे बिन जानम हर एक नज़ारा है
मैं हूँ तेरी यादें हैं सागर का किनारा है……

सागर में उठी मौजें आ तुझको बुलाती हैं
पानी में उठी लहरें मन मेरा जलाती हैं
जीते जी मुझे तेरी तन्हाई ने मारा है
मैं हूँ तेरी यादें हैं सागर का किनारा है……

सोचा है मोहब्बत की अब हद से गुज़र जाऊँ
पानी का कहा मानू सागर में उतर जाऊँ
मेरे लिए अब जीवन शोला है शरारा है

मैं हूँ तेरी यादें हैं सागर का किनारा है
आ मेरे गले लग जा पानी ने पुकारा है

तू जो मुझसे प्यार करता, तू जो मेरा यार होता

तू जो मुझसे प्यार करता, तू जो मेरा यार होता
मेरी आशिक़ी का चर्चा, भी न बेशुमार होता

मुझे जो न होती चाहत कोई करता क्यों हुकूमत
मेरे दिल पे दर-हक़ीक़त तेरा इक़तिदार होता

मेरे शहर वाले, मेरी भला क्यों हँसी उड़ाते
मेरा दामने-मुहब्बत, जो न तार-तार होता

जो किए थे तुमने वादे, वो सभी जो तुम निभाते
दिलो-जाँ से तुमपे सारा, ये जहाँ निसार होता

तेरा शुक्रिया के तू ने, मुझे ठोकरों पे रक्खा
मेरी आरज़ू थी तेरे, मैं गले का हार होता

तेरे बाद सारी दुनिया, तुझे याद करके रोती
जो ‘रक़ीब’ तू न होता, जो वफा-शियार होता

ज़रा सा हौसला होता तो तूफां से गुज़र जाते

ज़रा सा हौसला होता तो तूफां से गुज़र जाते
यक़ीनन आप कश्ती से सरे साहिल उतर जाते

मुहब्बत पाक थी, नापाक हो जाती तो क्या होता
किसी के क़ुर्ब में रहकर अगर हद से गुज़र जाते

मुक़द्दर साथ देता तो मज़ा जीने का आ जाता
ख़ुशी हर इक इधर आ जाती सारे ग़म उधर जाते

हक़ीक़त आ गयी थी दो दिलों के दरमियां वरना
मुहब्बत के फ़साने में बहुत से रंग भर जाते

करम फ़रमाई उनकी जाग उट्ठी मेहरबानी है
ख़ुदा ने ख़ैर की वरना कई जिस्मों से सर जाते

कभी जीने नहीं देते ये हरगिज़ चैन से हमको
अगर हम लम्हा भर को भी जहां वालों से डर जाते

हबीबे बावफ़ा ने ज़िन्दगी बख्शी मुहब्बत को
‘रक़ीब’-ए-बेनवा वरना तेरे जज़बात मर जाते

मेरा दिल जिस दिन मचलेगा, यार तुझे बहलाना होगा

मेरा दिल जिस दिन मचलेगा, यार तुझे बहलाना होगा
मुझपे इनायत करनी होगी, और करम फ़रमाना होगा

रोक सके तो रोक ले कोई, पालने वाले की किरपा से
उड़ कर आ जाएगा मुहं में, जो क़िस्मत का दाना होगा

किसको पता था, किसको ख़बर थी, आएगा इक दिन ऐसा भी
पीने होंगे आंसू भी कुछ, और कुछ ग़म भी खाना होगा

अपनी मोहब्बत के चर्चे भी, होंगे महफ़िल महफ़िल में कल
हम तो नहीं होंगे दुनिया में, पर अपना अफसाना होगा

सुनते थे बचपन में क़िस्से, अपने दादी-दादा से हम
ऐसे भी दिन आएँगे जब धन, सुख-दुःख का पैमाना होगा

बच्चों को सुख देना है तो, फिर मेहनत भी करनी होगी
जाकर रोज़ सवेरे घर से, रात गए ही आना होगा

तुम हो ‘रक़ीब’-ए-अहले मुहब्बत, तुमको सज़ा दी जाती है ये
साज़ पे ग़म के गीत खुशी का, अब तुम ही को गाना होगा

मीठे अल्फ़ाज़ की जज़्बात पे बारिश करना 

मीठे अल्फ़ाज़ की जज़्बात पे बारिश करना
भा गया दिल को मेरे उसका नवाज़िश करना

जिसकी फ़ितरत थी हमेशा से सताइश करना
क्या पता कैसे उसे आ गया साज़िश करना

फ़ितरते-हुस्न में शामिल है सितम आशिक़ पर
फ़ितरते-इश्क़, सितम सह के है नाज़िश करना

मैंने जब उसकी सहेली से कहा, हँसने लगी
रात को छत पे मिले, उससे गुज़ारिश करना

दिल तो दिल है ये अदाओं पे भी आ सकता है
क्या ज़रूरी है बदन की यूँ नुमाइश करना

जिसने उम्मीद का आईना कुचल डाला हो
उससे बेकार है दिल, प्यार की ख़्वाहिश करना

मैं तो शाइर हूँ किया नज़्म तुझे मैंने ‘रक़ीब’
“कोई आसां नहीं औरों की सताइश करना”

जो कहते थे के देंगे जान भी हम प्यार की ख़ाति

जो कहते थे के देंगे जान भी हम प्यार की ख़ातिर
“न आए वो अना में आख़िरी दीदार की ख़ातिर”

बहे अब दिल से खूँ क्यूं कर जलाया उसको ख़ुद तू ने
न इक क़तरा बचा खूँ का तेरी तलवार की ख़ातिर

लगाया दिल तो क्या पाया उसे भी तो नहीं पाया
न करना था, किया वो भी किसी दिलदार की ख़ातिर

यहाँ इक घर बनाया था मगर अब ऐसा लगता है
के अब जाएगी जाँ मेरी दरो-दीवार की ख़ातिर

मेरे लीडर ‘रक़ीब’-ए-मन बता क्या काम है तेरा
अगर कुछ है, “तेरी ख़ातिर, तेरी सरकार की ख़ातिर”

है ग़ैब की सदा जो सुनाई न दे मुझे 

है ग़ैब की सदा जो सुनाई न दे मुझे
वो सामने है और दिखाई न दे मुझे

तेरे किताबे रुख़ पे जो अश्क़ों ने लिख दिया
नज़रों से पढ़ चुका हूँ सफाई न दे मुझे

सौदा दिलों का होता नहीं ज़र से मेरी जाँ
ये दिल का कारोबार है पाई न दे मुझे

इज़हारे इश्क़ करके कहाँ खो गया है तू
अब आ जा, और ज़हरे जुदाई न दे मुझे

रुकता नहीं है अश्के रवानी का सिलसिला
ग़म पीने की ख़ुदारा दवाई न दे मुझे

यूं बेख़बर वजूद के एहसास से हुआ
“अपने ही दिल की बात सुनाई न दे मुझे”

केवल ज़मीनों ज़र नहीं माँ-बाप भी बटे
ऐसे ‘रक़ीब’ भाई से, भाई न दे मुझे

दो सज़ा शौक़ से सज़ा क्या है

दो सज़ा शौक़ से सज़ा क्या है
ये बताकर मेरी ख़ता क्या है

है ज़रूरी बहुत समझ लेना
बन्दगी क्या है और ख़ुदा क्या है

प्यार करता हूँ मैं नहीं मालूम
नारवा क्या है और रवा क्या है

है अमानत ये ज़िन्दगी उस की
ये बताओ की आपका क्या है

उसने शरमा के कान में मेरे
कुछ कहा है मगर कहा क्या है

दिल किसी का कभी नहीं रखता
इक मुसीबत है, आईना क्या है

एक मंज़िल हो जिनकी, इक मक़सद
साथ चलने में फिर बुरा क्या है

जब तसव्वर में हुस्न हो न ‘रक़ीब’
शेर गोई में इस मज़ा क्या है

दिल से रक्खेंगे लगाकर हर निशानी आपकी 

दिल से रक्खेंगे लगाकर हर निशानी आपकी
हम न भूलेंगे कभी भी मेह्र्बानी आपकी

तोड़ डाले सारे वादे सारी क़समें तोड़ दीं
तू ने तो मुझसे कहा था हूँ दिवानी आपकी

ज़िन्दगानी में कोई तो काम ऐसा कीजिये
हो मिसाली इस जहाँ में ज़िन्दगानी आपकी

आपने चाहा मुझे मैं आपके क़ाबिल न था
ख़ूब है महबूब मेरे क़द्रदानी आपकी

कह दिया मैंने ख़ता मेरी है, लेकिन थी नहीं
सोचकर ये बढ़ न जाए बदगुमानी आपकी

आपकी रूदाद सुनकर चाँद-तारे रो दिए
क्यों न रोते सुन रहे थे मुँह-ज़बानी आपकी

भूल जाएगा ज़माना लैला-मजनूं को ‘रक़ीब’
जब सुनेगा हर किसी से ये कहानी आपकी

दिल में घर किए अपना ग़म हज़ार बैठे 

दिल में घर किए अपना ग़म हज़ार बैठे हैं
बेख़ुदी में क्यों उनको हम पुकार बैठे हैं

थे जिन्हें गिले शिकवे अब नहीं रहे हमसे
वो हमारी राहों में बेक़रार बैठे हैं

दिल को एक मुद्दत से हम संभाले बैठे थे
आज दिल मुक़द्दर से अपना हार बैठे हैं

तज़करा है क्या दिल का जान अपनी हाज़िर है
मुन्तज़िर इशारे के जाँनिसार बैठे हैं

क्या ख़बर वो ख़्वाबों में कब हमारे अब आएं
हम उन्हें हक़ीक़त में अब उतार बैठे हैं

हाल है बुरा उनका जो हैं आसमानों पर
ग़म नहीं ज़मीं पर कुछ ख़ाक़सार बैठे हैं

कल ‘रक़ीब’ वो क्या थे आज क्या हैं क्या कहिये
भीड़ में फ़कीरों की ताजदार बैठे हैं

दूर रहना तो अब दूर की बात है, पास भी अब तो आया नहीं जाएगा

दूर रहना तो अब दूर की बात है, पास भी अब तो आया नहीं जाएगा
हमने तुमसे जो वादा किया था कभी, अब वो वादा निभाया नहीं जाएगा

दिन तो कट जाएगा दूर रहकर सनम, रात आई तो बढ़ जाएंगे दिल के ग़म
याद आकर मुझे तेरी तड़पाएगी, कोई भी गीत गाया नहीं जाएगा

आशिकों की गिज़ा ये ही दिन रैन है, ग़म हैं खाने को और अश्क़ पीने को हैं
देन है ये विधाता की, इस देन से, यार दामन बचाया नहीं जाएगा

पहले शरमाए, मुस्काए, पास आए कुछ, मेरी अर्ज़े-तमन्ना पे कहने लगे
दूर से बात कीजेगा बस दूर से, अब गले से लगाया नहीं जाएगा

हम न बह जाएं दुनिया के सैलाब में, क्या ही अच्छा हो बचने की कोशिश करें
ज़द में सैलाब की हम अगर आ गए, तो कनारे पे लाया नहीं जाएगा

डांटकर बाप बच्चे से कहने लगा, ले खिलौना, खिलौना नहीं तोड़ना
दिन गरीबी के हैं पास पैसा नहीं, और खिलौना दिलाया नहीं जाएगा

लोगो ईशवर की इच्छा के आगे कभी, आपकी और मेरी चलेगी नहीं
उसकी इच्छा न हो, लाख कोशिश करें, हमसे पत्ता हिलाया नहीं जाएगा

मैं ‘रक़ीब’-ए-हक़ीक़त नहीं दोस्तो, लोग जो कुछ भी कहते हैं कहते रहें
तुम न कहना कभी, तुम कहोगे तो फिर, मुझसे ये ग़म उठाया नहीं जाएगा

देखकर बस इक नज़र उसको दिवाना कर दिया

देखकर बस इक नज़र उसको दिवाना कर दिया
“मार डाला मरने वाले को के अच्छा कर दिया”

डूबने वाले को तिनके का सहारा है बहुत
शुक्रिया, तूफ़ान का, उसने किनारा कर दिया

जब भी जाना उसके घर तो कहना मेरा भी सलाम
और ये कहना के जो उसने कहा था, कर दिया

उम्र भर सब पर रहेगा क़र्ज़ माँ के दूध का
कोई कह सकता नहीं ये क़र्ज़ चुकता कर दिया

कुछ हुआ करता था तेरा और कुछ मेरा ‘रक़ीब’
दो मुलाक़ातों ने देखो सब हमारा कर दिया

छा जाए घटा जब ज़ुल्फ़ों की 

छा जाए घटा जब ज़ुल्फ़ों की
ले ले के बलाएँ पलकों की

याद आती है वो चंचल चितवन
और शोख़ अदाएं भोलापन
धक धक करता है मेरा मन
गहराई में तू है सांसों की

छा जाए घटा जब ज़ुल्फ़ों की……

जो दुःख भी है तुझसे दूर रहे
तू बन के परी और हूर रहे
जो मांग मे है सिन्दूर रहे
जलती रहे ज्योती नैनों की

छा जाए घटा जब ज़ुल्फ़ों की……

जब प्रेम जगत पर छाऊंगा
मन को मैं तेरे भाऊँगा
चाहा है तुझे मैं पाऊँगा
है मेरी तपस्या बरसों की

छा जाए घटा जब ज़ुल्फ़ों की
ले ले के बलाएँ पलकों की

बिजलियों सी चमक है तेरी 

बिजलियों सी चमक है तेरी
ज़ाफ़रानी महक है तेरी

दिल पे छाई धनक है तिरी
ज़ाफ़रानी महक है तिरी

मेरे ख़्वाबों ख़यालों में बस
चूड़ियों की खनक है तिरी

ख़ामुशी, बाग़ में अब कहाँ
क़ुमरियों सी चहक है तिरी

सीप सागर के तुझ पर फ़िदा
मोतियों में दमक है तिरी

शाख़े-गुल का हो जिस पर गुमां
वो कमर की लचक है तिरी

धूप करती है तुझको सलाम
चांदनी में झलक है तिरी

तेरे दिल में मिरा दर्द है
मेरे दिल में कसक है तिरी

सच तो ये है मुझे ऐ ‘रक़ीब’
अब रक़ाबत पे शक है तिरी

भारत के शहनशाहों में एक ऐसा बशर था

भारत के शहनशाहों में एक ऐसा बशर था
शाइर था, सुख़नवर था, मुज़फ्फर था, जफ़र था

इक दूजे से हम दूर रहे फिर भी रहे ख़ुश
ये साथ गुज़ारे हुए लम्हों का असर था

आधा ही छुपा रक्खा था चेहरा भी किसी ने
वो रात भी आधी ही थी आधा ही क़मर था

अच्छा ही हुआ धूप निकल आई बला की
अश्कों से मेरा दामने-दिल दोस्तो तर था

मुफ़लिस को थी उम्मीद मुदारात की जिससे
मालूम हुआ उसका भी फ़ाकों पे गुज़र था

कोई भी न थी नामा-ए-आमाल में नेकी
नेकी की जगह खाना-ए-नेकी में सिफ़र था

इक बात बता मुझको ‘रक़ीब’ आज ख़ुदारा
क्या दिल में तेरे भी कई असनाम का घर था

बेवफ़ा को भी जहाँ में बावफ़ा मिल जाएगा

बेवफ़ा को भी जहाँ में बावफ़ा मिल जाएगा
नफ़रतों से प्यार का उसको सिला मिल जाएगा

शेख़, हम होंगे जुदा वादा बिरहमन यार का
जब मुझे भगवान या तुझको ख़ुदा मिल जाएगा

फूल बनकर ही खुलेगा बन्द कलियों का नसीब
सर चढ़ेगा, कोई क़दमों में पड़ा मिल जाएगा

बन्द हैं सब खिड़कियाँ और बन्द हैं सारे किवाड़
घर में कैसे मुफ़लिसी को दाख़िला मिल जाएगा

थक के वो बैठा ही था, फिर चल पड़ा ये सोचकर
कोई न कोई कहीं तो दर खुला मिल जाएगा

कम नहीं होंगे सितम, बेहतर है साथी ढूंढ ले
“ज़ुल्म से लड़ने का दिल को हौसला मिल जाएगा”

है तो मुश्किल, कोशिशों से तू बना मुमकिन ‘रक़ीब’
सर छिपाने को कहीं भी घोंसला मिल जाएगा

बेकसों को सताने से क्या फ़ायदा

बेकसों को सताने से क्या फ़ायदा
दिल किसी का दुखाने से क्या फ़ायदा

साज़े-दिल के हैं सब तार टूटे हुए
फिर कोई गीत गाने से क्या फ़ायदा

है ज़रूरी इबादत में दिल भी झुके
बेसबब सर झुकाने से क्या फ़ायदा

दिल चुरा ही लिया है ये तुमने तो फिर
अब ये नज़रें चुराने से क्या फ़ायदा

ज़ह्न में जो भी है साफ़ कह दीजिये
बात दिल में छुपाने से क्या फ़ायदा

आते ही रट लगाई है जाने की बस
ऐसे आने न आने से क्या फ़ायदा

उनसे कह दो कि आ जाएँ दिल में ‘रक़ीब’
नाज़-नख़रे दिखाने से क्या फ़ायदा

ऐ काश मेरी भी बन जाए, जो बात है, बातों बातों में

.ऐ काश मेरी भी बन जाए, जो बात है, बातों बातों में
इज़हार मुहब्बत का कर ले इक रोज़ वो आँखों आँखों में

ईशवर की करम फरमाई है, बस मन को वो मेरे भाई है
इक सुन्दर सुन्दर सी लड़की जो मुझको मिली थी मेलों में

आई हैं बहारें घर मेरे, रंगीं हैं नज़ारे घर मेरे
मैं फूल चमन में खिलते हुए देखा करता हूँ ख़्वाबों में

हर एक के मन भाता है इस फूल की क़िस्मत तो देखो
चढ़ता है किसी के क़दमों पर, सजता है किसी के बालों में

सोचा तो बहुत हमने लेकिन ये बात समझ में आई नहीं
क्यों प्रेम के दुश्मन युग युग से रहते हैं हमारी घातों में

कहती है वो मुझको प्रेम कवी मैं प्यार में जिसके पागल हूँ
चरचा है ‘रक़ीब’ उस देवी का मेरे लिखे सारे गीतों में

आँचल जब भी लहराते हो

आँचल जब भी लहराते हो
जादू दिल पर कर जाते हो

जिस चीज़ में है जीवन अमृत
उस चीज़ को तुम ठुकराते हो

जो तोड़ दे दिलवालों के दिल
क्यों ऐसी बात सुनाते हो

तुम दिल में लगाकर आग मेरे
क्यों और इसे भड़काते हो

जब भीड़ में अनजानेपन से
छू जाए कोई डर जाते हो

जो कहना है वो साफ़ कहो
क्यों कहते हुए रुक जाते हो

दिल टूटने वाला रोता है
दिल तोड़ के तुम मुस्काते हो

बच्चे हैं ‘रक़ीब’ तो खेलेंगे
बेकार उन्हें समझाते हो

जाए जाकर, बेवफाई, कोई उनसे सीख आए 

जाए जाकर, बेवफ़ाई, कोई उनसे सीख आय
जिसको कहते हैं बुराई, कोई उनसे सीख आय

किस तरह उल्फ़त लुटाते हैं अता करते हैं प्यार
जाके तर्ज़े दिलरुबाई, कोई उनसे सीख आय

वस्ल की शब के सभी आदाब से वाक़िफ़ हैं वो
कैसे पकड़ेंगे कलाई?, कोई उनसे सीख आय

हैं ज़माने के बड़े मशहूर वो नग़मासरा
मुस्तनद नग़मा सराई, कोई उनसे सीख आय

शैख़ हों या हों बिरहमन दोनो ही हैं पारसा
ये अदा-ए-पारसाई, कोई उनसे सीख आय

दो महाजन हैं मोहल्ले में हमारे, किस तरह
जोड़ते हैं पाई पाई, कोई उनसे सीख आय

वो हसीं हैं और सितम शेवा है उनका ऐ ‘रक़ीब’
चीज़ क्या है कजअदाई, कोई उनसे सीख आय

जब प्यार तेरा मुझको मयस्सर न हुआ था

जब प्यार तेरा मुझको मयस्सर न हुआ था
ग़म कहते हैं जिसको वो मुकद्दर न हुआ था

आँखों से तो अश्कों की हुआ करती थी बरसात
पहले तो कभी दामने-दिल तर न हुआ था

वीरान था जब तेरी मोहब्बत से मेरा दिल
आबाद था, बरबाद मेरा घर न हुआ था

भूलूंगा मैं किस तरहा भला पहली मुलाक़ात
तब आपका दिल फूल था पत्थर न हुआ था

अब नर्क है संसार, कभी स्वर्ग था लोगो
जब आदमी कोई भी सितमगर न हुआ था

सीने से लगाकर मुझे महका दिया तुमने
वरना मैं कभी इतना मुअत्तर न हुआ था

कहते हैं ‘रक़ीब’ अब है मुक़द्दर का सिकन्दर
इस तरहा ये ज़र्रा कभी अख्तर न हुआ था

ख़ुद को तुम मेरी कायनात कहो

ख़ुद को तुम मेरी कायनात कहो
दिल को जो छूले ऐसी बात कहो

आज मौसम की पहली बारिश में
तन्हा कैसे कटेगी रात कहो

पास बैठो कभी तो पहलू में
कुछ हमारी कुछ अपनी बात कहो

आज वो बेनक़ाब निकले हैं
आज की रात चाँद रात कहो

हो गया होगा रो के दिल हल्का
ग़म से क्या मिल गयी नजात कहो

ज़िन्दगी में कहाँ सुकूने-दिल
मौत को राहते-हयात कहो

ख़ाक हासिद हुआ है जल के ‘रक़ीब’
किसने खाई है किससे मात कहो

आप से तुम, तुम से तू , कहने ल

आप से तुम, तुम से तू , कहने लगे
छू के मुझको, मुझको छू, कहने लगे

पहले अपनी जान कहते थे मुझे
अब वो जाने आरज़ू कहने लगे

आपको देखा तो कुछ ऐसा लगा
मिलते थे हम कू-ब-कू कहने लगे

तुम हो मेरी ज़िंदगी का माहसल
आज कल वो रूबरू कहने लगे

दिल से दिल जब मिल गए, सब मिल गया
हो गए हम सुर्ख़रू कहने लगे

है हमे तुमसे मुहब्बत वो भी अब
हाथ उठाकर क़िबला-रू कहने लगे

इश्क़ में ऐसी थी कैफ़ीयत ‘रक़ीब’
ख़ामुशी को गुफ़्तगू कहने लगे

जिस्मे खाक़ी में क्या बला है वो 

जिस्मे ख़ाकी में क्या बला है वो
है कोई चीज़ या हवा है वो

ख़ुद को तुम मेरी कायनात कहो
दिल को जो छूले ऐसी बात कहो

आज मौसम की पहली बारिश में
तन्हा कैसे कटेगी रात कहो

पास बैठो कभी तो पहलू में
कुछ हमारी कुछ अपनी बात कहो

आज वो बेनक़ाब निकले हैं
आज की रात चाँद रात कहो

हो गया होगा रो के दिल हल्का
ग़म से क्या मिल गयी नजात कहो

ज़िन्दगी में कहाँ सुकूने-दिल
मौत को राहते-हयात कहो

ख़ाक हासिद हुआ है जल के ‘रक़ीब’
किसने खाई है किससे मात कहो

तुम लाजवाब थे और लाजवाब हो

तुम लाजवाब थे और लाजवाब हो
ये किसने कह दिया तुम्हें तुम ख़राब हो

कलियों सा ढंग है, फूलों सा रंग है
और चाँद की तरह, तुम पुर-शबाब हो

पढ़ता रहा तुम्हें, पढ़ता रहूँगा मैं
कल भी किताब थे, अब भी किताब हो

मैं तुमसे आशना, तुम मुझसे आशना
फिर आज शर्म से, क्यों आब आब हो

क्या नाम तुमको दूं , और क्या मिसाल दूं
तुम आफताब हो, तुम माहताब हो

दुनिया में लोग जो, दुश्मन हों प्यार के
इक दिन ख़ुदा करे, उन पर अज़ाब हो

होते हुए ‘रक़ीब’, तुम दिल के हो क़रीब
तुम पर करम ख़ुदा, का बेहिसाब हो

बताऊँ क्यों अजीब हूँ

बताऊँ क्यों अजीब हूँ
मैं शायर-ओ-अदीब हूँ

हैं आप मेरे हमसफ़र
मैं कितना खुशनसीब हूँ

मैं खुद से दूर हो गया
हुज़ूर से क़रीब हूँ

धनी हूँ बात का सनम
भले ही मैं ग़रीब हूँ

कफ़स में हूँ हयात की
मैं एक अन्दलीब हूँ

ए जानेमन यक़ीन कर
फ़क़त तेरा हबीब हूँ

ग़ज़ल ही सिन्फ़ है मेरी
ग़ज़ल ही का तबीब हूँ

कभी-कभी ये लगता है
मैं अपना ही ‘रक़ीब’ हूँ

अपनी ज़ुल्फ़ें जब महे-कामिल में सरकाते हैं वो

अपनी ज़ुल्फ़ें जब महे-कामिल में सरकाते हैं वो
तीरगी सदियों की पल में दूर कर जाते हैं वो

जब भी मिलता हूँ मैं उनसे लब मेरे खुलते नहीं
अपने दिल की बात हंसकर मुझसे कह जाते हैं वो

मुस्कुरा कर बख्श देते हैं मुझे बेचैनियाँ
उनसे पूछो किसलिए दिल मेरा तड़पाते हैं वो

क्या कहा जाए बदन उनका है नागिन की तरह
जब भी बाहों में मेरी आते हैं बल खाते हैं वो

बेख़ुदी की इन्तिहाँ कहते हैं इसको दोस्तों
पी के सो जाता हूँ मैं आँखों से छलकाते हैं वो

सुनने वाले गीत सुनकर झूम उठते हैं सभी
गीत मेरा जब किसी महफ़िल में भी गाते हैं वो

दर हक़ीक़त जो भी हाज़िर है हबीब अमने ‘रक़ीब’
अश्क़ ही पीते हैं अपने और ग़म खाते हैं वो

“रुख से ज़ुल्फ़ें जब महे-कामिल में सरकाते हैं वो”
(इस ग़ज़ल में परिवर्तन के पश्चात उक्त शीर्षक से पुनः पोस्ट किया गया है)

आपकी शरारत भी आपकी इनायत है

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आपकी शरारत भी आपकी इनायत है
जो भी है मेरे दिलबर आपकी मुहब्बत है

ये सियाह ज़ुल्फ़ें ही इक निक़ाब है तेरा
ये जो रुख़ से हट जाएँ, सब कहें, “क़यामत है”

बज़्मे-नाज़ में बेशक दिल तेरा धड़कता है
ज़ब्त हो मगर इक पल वक़्त की नज़ाकत है

जो लिखा है क़िस्मत में बस वही अता होगा
फिर भी आपको इससे, उससे क्यों शिकायत है

सोचता हूँ यारों ने दिल ही मेरा तोड़ा है
शुक्र है ख़ुदा मेरे, सर मेरा सलामत है

मौत इक हक़ीक़त है पर मेरे वतन वालो
जो वतन की ख़ातिर हो ऐसी मौत नेमत है

नाम में है क्या रक्खा सब हबीब हैं बेहुब्ब
मैं ‘रक़ीब’ हूँ बेशक पर कहाँ रक़ाबत है

छोड़ा था जहाँ मुझको उसी जा पे खड़ा हूँ

छोड़ा था जहाँ मुझको उसी जा पे खड़ा हूँ
हर लमहा तेरे आने की रह देख रहा हूँ

क्यों बादे-सबा ख़ुशबू चुरा लेती है मेरी
मैं फूल हूँ, काँटों की हिफ़ाज़त में पला हूँ

काटे नहीं कटती हैं ये तन्हाई की रातें
एहसास की शिद्दत को मैं अब जान चुका हूँ

बनकर जो उड़ा भाप तो बरसात में लौटा
इक बूँद हूँ पानी की समन्दर में मिला हूँ

हर रोज़ यहाँ मरने को जीना कहे दुनिया
ये मुझको ही मालूम है मैं कैसे जिया हूँ

हँस-हँस के सितम क्यों नहीं, अपनों के मैं झेलूं
“रिश्तों की अज़ीयत का सफ़र काट रहा हूँ”

फ़ितरत में रक़ाबत की ‘रक़ीब’ आई न कुछ बात
मैं फ़ेलो अमल में यहाँ बहुतों से भला हूँ

होता नहीं है प्यार भी अब प्यार की तरह

होता नहीं है प्यार भी अब प्यार की तरह
करने लगे हैं लोग ये ब्योपार की तरह

सूखे गुलाब, अधजले तस्वीर और ख़ुतूत
चूमे गए कभी लबो रुख़सार की तरह

इन्साफ़ की दुकान है मुंसिफ़ दुकानदार
बिकने लगा है जाओ खरीदार की तरह

मन्दिर है दूर ग़म नहीं मस्जिद तो है क़रीब
नेमत लुटा रहा है वो दिलदार की तरह

रिश्ता गुलों से है न गुलिश्तां से रब्त है
गुलशन में जी रहे हैं मगर ख़ार की तरह

यूं तो दिलो दिमाग़ में आए बहुत ख़याल
उतरे वरक़ पे चंद ही अशआर की तरह

मानी बदल गए यहाँ नेकी के जब ‘रक़ीब’
“हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह”

अब हमें टाटा का तोहफ़ा, ख़ुशनुमा मिल जाएगा

अब हमें टाटा का तोहफ़ा, ख़ुशनुमा मिल जाएगा
इक रतन, ख़्वाब-ए-रतन का, दिलरुबा मिल जाएगा

हर जवाँ, बच्चे व बूढ़े, मर्द या ख़ातून को
सैर की ख़ातिर खिलौना, अब बड़ा मिल जाएगा

खिड़कियाँ हैं, कुर्सियां भी, छत भी है, थोड़ी ज़मीं
लाख में, ये भागने वाला क़िला मिल जाएगा

चिलचिलाती धूप हो, या सर्दियों की सुबहो-शाम
शुक्रिया, टाटा हमें, साधन नया मिल जाएगा

हर बड़ी मोटर का मालिक, रश्क़ से देखेगा जब
भीड़ में नेनो को पहले, रास्ता मिल जायेगा

चार पहिया ख़्वाब थे, पर अब नहीं रह जायेंगे
था किसे मालूम ऐसा, रहनुमा मिल जाएगा

भीड़ को, सिग्नल पे आयी देखने नेनो ‘रक़ीब’
लालबत्ती का सिपाही, डाँटता मिल जायेगा

ख़ामोश रहेंगी पीपल पर, बैठी हुई ये चिड़ियाँ कब तक

ख़ामोश रहेंगी पीपल पर, बैठी हुई ये चिड़ियाँ कब तक
और फूल बनेंगी गुलशन में, अरमानो की कलियाँ कब तक

तुम दिल पर अपने हाथ रखो, फिर बोलो क्या आसान है ये
कैसे मैं गुजारूँ दिन तुम बिन, सूनी रखूँ ये रतियाँ कब तक

ऐ चाँद सितारों तुम ही कहो, वो किस नगरी में रहते हैं
दरशन को उनके तरसेंगी, प्यासी मेरी अँखियाँ कब तक

तुमने तो कहा था आने को, और वादा कर के भूल गए
मैं सोच रही हूँ क्या होगा, छेड़ेंगी मुझे सखियाँ कब तक

कोयल तेरी बोली मीठी है, पर मन मेरा कब तक तरसेगा
मिसरी कानों में घोलेंगी, प्रियतम की मेरे बतियाँ कब तक

मिलने तो मैं उनसे जाऊँगी, तू इतना बता दे मुझको सखी
बरसात भला कब ठहरेगी, उतरेंगी भला नदियाँ कब तक

कहते हैं अदीब और शाइर ये गुज़रेगा इधर से कोई ‘रक़ीब’
अब देखना है ये देखेंगे, सूनी हैं तेरी गलियाँ कब तक

नदी किनारे पानी में लड़की एक नहाती है

नदी किनारे पानी में लड़की एक नहाती है
देख देख के अपने आप को शरमाती लाजियाती है

खेल रही है वो पानी से और उससे पानी
ऐसा लगता है जलपरियों की कोई रानी
गोरे गोरे बदन से उसके निकल रहे हैं शोले
डोल रही है उसकी जवानी खाती है हिचकोले

मस्त जवानी से नदिया के पानी को गरमाती है
नदी किनारे पानी में लड़की एक नहाती है

पानी उसके बदन को चूमे, चूम चूम कर झूमे
मछली की तरहा तैरे वह इधर उधर भी घूमे
नागिन की तरहा पानी की लहरों पे लहराए
पेड़ पे जैसे कोई डाली फूलों की बलखाए

पानी ले ले कर हाथों में नदिया का उछ्लाती है
नदी किनारे पानी में लड़की एक नहाती है

भीगी साड़ी के पीछे से झाँक रहा है जोबन
सोच रही है देखे कोई आकर उसका यौवन
कोई मुझको अंग लगाए कोई मुझसे खेले
अंग अंग छुए वह मेरा और बाहों में ले ले

तन को थिरकाती है अपने और मन को बहलाती है
नदी किनारे पानी में लड़की एक नहाती है

परेशाँ है मेरा दिल, मेरी आँखें भी हैं नम कुछ-कुछ 

परेशाँ है मेरा दिल, मेरी आँखें भी हैं नम कुछ-कुछ
असर-अन्दाज़ मुझ पर हो रहा है तेरा ग़म कुछ-कुछ

वो अरमाँ अब तो निकलेंगे, रहे जो मुद्दतों दिल में
ख़ुदा के फ़ज़्ल से चलने लगा मेरा क़लम कुछ-कुछ

ख़बर सुनकर मेरे आने की, सखियों से वो कहती है
ख़ुशी से दिल धड़कता है मोहब्बत की क़सम कुछ-कुछ

ज़रूरी तो नहीं है ख़्वाहिशें सब दिल की पूरी हों
मगर मुमकिन है, गर शामिल ख़ुदा का हो करम कुछ-कुछ

ज़मीं पर पाँव रखते भी, कभी देखा नहीं जिनको
हैं उनके पाँव में छाले, तो लरज़ीदा क़दम कुछ-कुछ

मेरे एहसास पर भी छा गई वहदानियत देखो
मुझे भी आ रही है अब तो, ख़ुशबू-ए-हरम कुछ-कुछ

क़रीब अपने जो आएगा, वो चाहे हो ‘रक़ीब’ अपना
मगर रक्खेंगे हम उसकी, मोहब्बत का भरम कुछ-कुछ

ज़हनो दिल में हर इक के उतर जाइए

ज़हनो दिल में हर इक के उतर जाइए
बन के ख़ुशबू फ़जाँ में बिखर जाइए

ये तो सच है नहीं कुछ कमी आप में
दिल ये कहता है और कुछ सँवर जाइए

गर्दिशे वक़्त ख़ुद ही पशेमान हो
राहे पुरखार से यूं गुजर जाइए

ठीक है, मुझ से मिलना, न चाहें अगर
मेरे दुश्मन के हरगिज़ न घर जाइए

जा रहे हैं तो, दे जाइए ज़हर कुछ
आप इतना करम मुझ पे कर जाइए

खुद ही सीने से अपने लगा लेगा वह
उसके कूचे में बा-चश्मे-तर जाइए

आपको जो समझता है अपना ‘रक़ीब’
उसकी खातिर ख़ुदारा न मर जाइए

शहीदे वतन का नहीं कोई सानी

शहीदे वतन का नहीं कोई सानी
वतन वालों पर उनकी है मेहरबानी

वतन पर निछावर किया अपना सब कुछ
लड़कपन का आलम बुढ़ापा जवानी

किया दिल से हर फ़ैसला ज़िंदगी का
कोई बात समझी, न बूझी, न जानी

लड़े खून की आख़िरी बूँद तक वो
लहू की नदी भी पड़ी है बहानी

कफ़न की कसम, “हो हिफाज़त वतन की”
वसीयत शहीदों की है मुहँजबानी

वतन के लिए जो फ़ना हो गए हैं
तिरंगा उन्हीं की सुनाता कहानी

‘रक़ीब’ उनका क्यों ज़िक्र दो दिन बरस में
वो हैं जाविदाँ ज़िक्र भी जाविदानी

गुज़री है रात कैसे सबसे कहेंगी आँखें 

गुज़री है रात कैसे सबसे कहेंगी आँखें
शरमा के ख़ुद से ख़ुद ही यारो झुकेंगी आँखें

महबूब मेरे मुझको तस्वीर अपनी दे जा
तन्हाइयों में उससे बातें करेंगी आँखें

उसने कहा था मुझसे परदेस जाने वाले
जब तक न आएगा तू रस्ता तकेंगी आँखें

मन में रहेगा मेरे बस प्यार का उजाला
हर राह ज़िन्दगी की रोशन करेंगी आँखें

हाथों में मेरे मेहँदी कब तक नहीं लगेगी
तन्हाइयों के खूँ से कब तक रचेंगी आँखें

सुख-दुःख हैं इसके पहलू ये ज़िन्दगी है सिक्का
हालात ज़िन्दगी के ख़ुद ही कहेंगी आँखें

तू भी ‘रक़ीब’ सो जा होने को है सवेरा
वरना हथेली दिन भर मलती रहेंगी आँखें

हवा के दोश पे किस गुलबदन की ख़ुशबू है

हवा के दोश पे किस गुलबदन की ख़ुशबू है
गुमान होता है सारे चमन की ख़ुशबू है

मिरे वजूद को मख्मूर कर दिया इसने
बड़ी अनोखी तिरे पैरहन की ख़ुशबू है

करीब पा के तुझे झूमता है मन मेरा
जो तेरे तन की है वो मेरे मन की ख़ुशबू है

बला की शोख़ है सूरज की एक-एक किरन
पयामे ज़िंदगी हर इक किरन की ख़ुशबू है

गले मिली कभी उर्दू जहाँ पे हिंदी से
मिरे मिज़ाज में उस अंजुमन की ख़ुशबू है

ये बात पूछे तो मेहनतकशों जा के कोई
कि रात चीज़ है क्या, क्या थकन कि ख़ुशबू है

मिलेगी मंज़िले- मक़सूद एक दिन मुझको
कि मेरे अज़्मो-अमल में लगन कि ख़ुशबू है

बहुत संभाल के रखा है इनको मैंने ‘रक़ीब’
एक एक लफ़्ज़ में ख़त के वतन की ख़ुशबू है

दिलों में फिर वो पहली सी, मोहब्बत हो अगर पैदा

दिलों में फिर वो पहली सी, मोहब्बत हो अगर पैदा
यक़ीनन हो नहीं सकता, जहाँ में कोई शर पैदा

फज़ाओं में जो तल्ख़ी है जला कर ख़ाक कर डालो
बुझाओ फिर उसे ऐसे, न हो कोई शरर पैदा

कहो वो बात जो कानो से, सीने में उतर जाए
असर दिल पर जो कर जाए, करो ऐसी नज़र पैदा

सिवाए ख़ार के हासिल न होगा कुछ बबूलों से
शजर ऐसे लगाओ जिनपे हों मीठे समर पैदा

इलाजे रंजो-ग़म वो ही, करेगा अब मुसीबत में
दिया है दर्दे दिल जिसने, किया दर्दे जिगर पैदा

तेरे भटके हुए बन्दों को, जो रस्ता दिखा जायें
कुछ ऐसे लोग दुनिया में, ख़ुदाया फिर से कर पैदा

कोई, तन्हाई में उससे कहे, ‘मैं मौत हूँ तेरी’
‘रक़ीब’ उस शख्स के दिल में, सरासर होगा डर पैदा

उफ़! मिटा पाए न उसकी याद अपने दिल से हम

उफ़! मिटा पाए न उसकी याद अपने दिल से हम
प्यार करते हैं बहुत जिस हुस्ने-लाहासिल से हम

गर्मिए लब की तपिश से सुब्ह पाते हैं हयात
क़त्ल हो जाते हैं शब को, अबरुए क़ातिल से हम

बस! ख़ुदा का शुक्र कह कर, टाल देता है हमें
हाल जब भी पूछते हैं इस दिले-बिस्मिल से हम

आएगा भी या नहीं अब वो सफ़ीना लौटकर
बारहा पूछा किये मंझधार और साहिल से हम

कुछ तो है, जो कुछ नहीं तो, फिर ये उठता है सवाल
पास रहकर दूर क्यों हैं दोस्तो मंज़िल से हम

आरज़ू-ए-दीद में, बैठे हैं, कैसे जाएंगे ?
इक झलक देखे बिना उठकर तेरी महफ़िल से हम

देखकर लब पर तबस्सुम, खा गए धोका ‘रक़ीब’
दिल लगा बैठे किसी मग़रूर पत्थर दिल से हम

आँखों ने कह दिया जो कभी कह न पाए लब 

आँखों ने कह दिया जो कभी कह न पाए लब
हालाँकि उस ने बारहा अपने हिलाए लब

चेहरे से जब नक़ाब हवा ने उलट दिया
देखा मुझे तो दाँत से उसने दबाए लब

मेरी तलाश पूरी हुई देखकर उसे
आँखों से आँखें चार हुईं मुस्कुराए लब

रूदादे-ग़म सुनाऊँ तो किसको सुनाऊँ मैं ?
इज़हारे ग़म को यूँ तो बहुत तिलमिलाए लब

सहरा में आँसुओं के समन्दर को देखकर
संजीदगी की धुन पे बहुत गुनगुनाए लब

लाली लगा के होंठ पे चमकी लगाई जो
तारों भरे गगन की तरह झिलमिलाए लब

दिल में ‘रक़ीब’ खोट थी शायद इसीलिए
इज़हारे इश्क़ करते हुए थरथराए लब

खाक़ में मिल गए हम अगर देखिए 

खाक़ में मिल गए हम अगर देखिए
होने पाए न उनको खबर देखिए

आप देते रहे हैं दुआएँ हमें
उन दुआओं का हम पर असर देखिए

रेगजारों[1] में भी फूल खिल जाएँगे
मुस्कुरा कर फक़त इक नज़र देखिए

अब लहू दिल में बाकी नहीं, जो बहे
खोलकर, मेरा ज़ख्मे-जिग़र देखिए

देखकर गाल पर तिल, तड़क ही गया
हुस्न का आइने पर असर देखिए

आग लग जाए न तन बदन में कहीं
छू न होटों से जाएँ अधर देखिए

उसने हँसकर कहा, फिर मिलेंगे ‘रक़ीब’
अब तो होने को आई सहर[2] देखिए

इनकार मोहब्बत का करेगा तू कहाँ तक

इनकार मोहब्बत का करेगा तू कहाँ तक
आएगा कभी नाम मेरा तेरी जुबाँ तक

सीने में सुलगती रही इक आग अजब-सी
उठता हुआ देखा न कभी मैंने धुवाँ तक

मिल जुल के चलो प्यार का संसार बसाएँ
तनहा न बना पाएँगे हम एक मकाँ तक

ये राह मोहब्बत की, मोहब्बत का सफ़र है
इस राह पे ले चल तू मुझे चाहे जहाँ तक

शातिर हो बड़े प्यार की शतरंज में तुम भी
देखेंगे न खाओगे भला मात कहाँ तक

निकली है सदा मेरे तड़पते हुए दिल से
पहुँचेगी जमाने में हर इक पीरो-जवाँ तक

कहते हो ‘रक़ीब’ अपना हबीब आज मुझे तुम
ये बात तो अच्छी है मगर सिर्फ़ बयाँ तक

सुब्ह नौ की है तू रौशनी भी सनम

सुब्ह नौ की है तू रौशनी भी सनम
चौदवीं रात की चाँदनी भी सनम

रोज़ रातों को, ख़्वाबों में आना तेरा
आशिक़ी भी है, आवारगी भी सनम

पैरहन और ख़ुशरंग हो जाएगा
कासनी हो अगर, ओढ़नी भी सनम

फ़र्क कुछ भी नहीं, है अमल एक ही
नाम पूजा का है, बन्दगी भी सनम

सौ बरस तक जियो, क्या दुआ दें जहाँ
मौत से कम नहीं, ज़िन्दगी भी सनम

जाँ गई तो गई, आबरू भी गई
ले गई नर्क में, ख़ुदकुशी भी सनम

यूँ फसाने तो लिखता रहा है ‘रक़ीब’
अब वो करने लगा, शाइरी भी सनम

आज माहौल दुनिया का खूंरेज़ है

आज माहौल दुनिया का खूँरेज़ है
है हलाकू कोई, कोई चंगेज़ है

गैर के रंग में, रंग गए लोग कुछ
रूह में बस गया जिनके अँगरेज़ है

गौर से देखिये गुलशने हुस्न की
“हर कली खूबसूरत है नौखेज़ है”

मुस्कुरा कर सहेली ने उस से कहा
उड़ न जाए दुपट्टा हवा तेज़ है

उम्र भर जो रहे देखते आइना
आइने से उन्हें आज परहेज़ है

डर है दुनिया का नक्शा न बदले कहीं
रंगरेज़ी पे आमादा रंगरेज़ है

वक़्त है कर ले तौबा ख़ुदा से ‘रक़ीब’
साग़रे ज़िंदगी तेरा लबरेज़ है

अश्के ग़म से अपना दामन तर-बतर होने के बाद

अश्के ग़म से अपना दामन तर-बतर होने के बाद
खुश्क होता है हवाओं को ख़बर होने के बाद

ये हमारी बेबसी है या मुक़द्दर का सितम
क़ैद होकर रह गए बे-बालो-पर होने के बाद

अहले महफ़िल ने तो की थी हमसे फरमाइश बहुत
गीत कोई कैसे गाते नौहागर होने के बाद

लिखने वाले ने कुछ ऐसी दस्ताने-ग़म लिखी
पढ़ने वाले रो पड़े दिल पर असर होने के बाद

सुब्ह दम सूरज की किरनो का असर भी खूब है
दर्दे-दिल कुछ कम हुआ है रात भर होने के बाद

खुश हुआ दिल उन लबों पर इक तबस्सुम देखकर
लौट आयीं फिर से खुशियाँ चश्म तर होने के बाद

हो गया जीने का सामाँ मिल गई मंज़िल ‘रक़ीब’
दर तेरा पाया जबीं ने दर-बदर होने के बाद

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