सफ़ी औरंगाबादी की रचनाएँ

न अपने बस में है रोना न हाए हँस देना

न अपने बस में है रोना न हाए हँस देना
कोई रूलाए तो रोना हँसाए हँस देना

वो बातों बातों में भर आना अपनी आँखों का
वो उस का देख के सूरत को है हँस देना

किसी के ज़ुल्म हैं कुछ ऐसे बे-महल हम पर
कि जी में आता है रोने की जाए हँस देना

वो ख़ुद हँसाए तो कम-बख़्त दिल ये ज़िद्दी दिल
ये वज़आ-दारी है क्यूँ हाए-हाए हँस देना

अदूल-ए-हुकमी-ए-दर्द-ए-जिगर की अब ऐ चश्म
जो लाख बार वो उठ कर रूलाए हँस देना

कोई जो तुझ पे हँसे बर्क़-पाश आलम-ए-सोज़
तो फिर हर एक पे तू भूल जाए हँस देना

वो हम से पूछते हैं तुम हमारे आशिक़ हो
जवाब क्या है अब इस के सिवाए हँस देना

‘सफ़ी’ कहाँ की शिकायत कहाँ का ग़म गुस्सा
किसी का ऐन लड़ाई में हाए हँस देना

दिल के खो जाने से मैं किस वास्ते रोया करूँ

दिल के खो जाने से मैं किस वास्ते रोया करूँ
खो गया तो आप ने खोया उसे मैं क्या करूँ

गिर्या-ए-बे-साख़्ता पर सोच में था क्या करूँ
वो भी बरहम हो चला तो हाए अब कैसा करूँ

कोई मश्रिक़ में बताता है तो मग्रिब में कोई
रोज़ किस किस से तेरे घर का पता पूछा करूँ

दर्द-मंदों को तसल्ली या तशफ़्फी दीजिए
ये कहाँ की बात सीखी आप ने मैं क्या करूँ

बात मुँह में है की मतलब तक पहुँच जाता है वो
कहिए फिर ऐसे से इज़हार-ए-तमन्ना क्या करूँ

सामने आया तो उस को देख सकता भी नहीं
आरज़ू ही आरज़ू है बस उसे देखा करूँ

कौन सा आफत-ज़दा रहता है कूचे में तेरे
शब को इक आवाज़ आती है इलाही क्या करूँ

रात को तकलीफ़-ए-मेहमानी है सिर्फ़ इस वास्ते
सुब्ह जब उट्ठूँ तो सूरत आप की देखा करूँ

ऐ ‘सफ़ी’ बस अब तो मैं ने ठान ली है एक बात
सब की सुनने को तो सुन लूँ काम करने का करूँ

ग़म-ए-जिगर न दवा-ए-जिगर लेना

ग़म-ए-जिगर न दवा-ए-जिगर लेना
जिस पसंद करें वो पसंद कर लेना

ख़बर न थी की ये दुनिया है ऐश से ख़ाली
दिन अपनी उम्र के भरने हैं जब तो भर लेना

हुई है ख़ाना-बदोशी ग़म-ए-मोहब्बत की
ज़माना आप से सीखे किसी का घर लेना

तुम्हारी तरह का इक आईने के घर में है
जो हो सके तो ज़रा देखना ख़बर लेना

कोई घिरा है अकेला तेरी अदाओं में
शिकार हाथ से जाने न पाए धर लेना

अगरचे उस की जुदाई की दिल को ताब नहीं
जो आ पड़ी है तो अब सब्र ओ शुक्र कर लेना

हमारे दाव हमीं पर चलाए जाते हैं
भला वो और किसी बात का असर लेना

दुआ हमारी दुआ क्या दुआ कहाँ की दुआ
नहीं है चीज़ ये लेने की तुम मगर लेना

ख़ुदा ने सब्र दिया लाख लाख शुक्र ‘सफ़ी’
किसी दिन उन को भी झुक कर सलाम कर लेना

हम ने कल तक जो दिल में ठानी थी

हम ने कल तक जो दिल में ठानी थी
आज उन की वो सब ज़ुबानी थी

और माशुक़ भी थे दुनिया में
क्या तबीअत उन्हीं पे आनी थी

पच गई शैख़ ही को वरना शराब
तेज़ थी तुंद थी पुरानी थी

किस पे तुम कस रहे थे कल फ़िक़रे
और क्या मुझे से छेड़-खानी थी

दिल की हालत पे रंज होता है
उस की आई मुझी को आनी थी

हिज्र का दाग़ भी नहीं दिल में
ये भी इक आप की निशानी थी

न थी उल्फ़त कुछ ऐसी राज़ की बात
हाँ मगर आप से छुपानी थी

हम से मिलता ही क्या किसी का दिल
चार दिन की तो ज़िंदगानी थी

उन की दहलीज़ प किए सज्दे
हम को तक़्दीर आज़्मानी थी

ऐ ‘सफ़ी’ आशिक़ी में ये ज़िल्लत
तू ने कोई मुराद मानी थी

जो ये नहीं तो भला लुत्फ़-ए-आश्नाई क्या 

जो ये नहीं तो भला लुत्फ़-ए-आश्नाई क्या
मज़े की चीज़ है या रब ग़म-ए-जुदाई क्या

तू अपने अक्स से भी बच तो हम करें तस्लीम
इधर तो देख की ख़ुद-बीं ये ख़ुद-नुमाई क्या

किसी से हसरत-ए-दीदार तो छुपा न सके
ये देखना है कि देात है अब दिखाई क्या

इसी अदा-ए-तग़ाफुल पे जान देता हूँ
मलाल बढ़ गया उन से हुई सफ़ाई क्या

लिया था मशविरा तुम ने जो ऐ ‘सफ़ी’ हम से
है ज़ेर-ए-ग़ौर अभी तक वो कारवाई क्या

ख़याल भी कभी आए न चाह करने का 

ख़याल भी कभी आए न चाह करने का
इलाही इश्क़ है नाम अब गुनाह करने का

उसे जो मौक़ा मिला इश्तिबाह करने का
जनाब-ए-दिल ये नतीजा है आह करने का

किसी के दिल को लिया है तो उस को दिल समझो
नहीं है माल ये ऐसा तबाह करने का

सराह कर उन्हें मग़रूर कर दिया सब ने
नतीज़ा ख़ूब हुआ वाह वाह करने का

न पूछ हम से हक़ीक़त शराब की वाइज़
नहीं है तुझ में सलीक़ा गुनाह करने का

ख़याल में किसी काफ़िर के ज़ुल्म-ए-बे-जा पर
ख़याल आया ख़ुदा को गवाह करने का

‘सफ़ी’ वो कब किसी ख़त का जवाब देते हैं
मरज़ है तुझ को भी काग़ज़ सियाह करने का

महरूम हूँ जवाब से तुझ को पुकार कर

महरूम हूँ जवाब से तुझ को पुकार कर
परवर-दिगार दौर मेरा ख़ल्फ़िशार कर

कुछ इख़्तियार है तो वो काम इख़्तियार कर
हर काम को दुल्हन जो बनावे सँवार कर

कर दी तेरी अदा-ए-करम ने ज़ुबान बंद
उम्मीद-वार रह गए दामन पसार कर

दस्त-ए-जुनूँ से छूटती अगर अपनी आस्तीं
दामन की ख़ैर माँगते दामन पसार कर

बे-फ़ाएदा किसी को सताने से फ़ाएदा
तुझ को क़रार हो तो मुझे बे-क़रार कर

सीने के ज़ख़्म तो नहीं मेरे जिगर के दाग़
हम दम दिखाऊँ क्या तुझे कुर्ता उतार कर

मिल कर गले मिज़ाज ही उन का नहीं मिला
तेवर बिगड़ गए मेरी बिगड़ी सँवार कर

भट्टी के हैं उरूज ओ ज़वाल ऐसे पीर जी
मय-कश चढ़ा के ख़ुश है तो मय-गर उतार कर

होते ही बे-गुनाह ‘सफ़ी’ सारिक़न-ए-शेर
लिखते हैं जिस कलम से वो होता है पारकर

उन के जिने ज़ुल्म थे सब उन के मुँह पर कह दिया 

उन के जिने ज़ुल्म थे सब उन के मुँह पर कह दिया
जो कहा था हम ने औरों से बराबर कह दिया

हज़रात-ए-दिल तुम ने उस को दोस्त जाना किस तरह
क्या फरिश्तों ने तुम्हें चुपके से आ कर कह दिया

दोस्त उन के बे-वफ़ा कि वास्ते होने चले
उन को कहना था मुझे औरों पे रख कर कह दिया

हर किसी से मेल-जोल अब आप का है इख़्तियार
जो मुझे कहना था वो ऐ बंदा-परवर कह दिया

शेर सुन सुन कर ‘सफ़ी’ के आप क्यूँ बरहम हुए
वो तो ऐसा है की जो आया ज़ुबाँ पर कह दिया

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