सब्त अली सबा की रचनाएँ

आँधी चली तो गर्द से हर चीज़ उड़ गई

आँधी चली तो गर्द से हर चीज़ उड़ गई
दीवार से लगी तिरी तस्वीर फट गई

लम्हों की तेज़ दौड़ में मैं भी शरीक था
मैं थक के रूक गया तो मिरी उम्र घट गई

इस ज़िंदगी की जंग में हर इक महाज़ पर
मेरे मुक़ाबले में मिरी ज़ात डट गई

सूरज की बर्छियों से मिरा जिस्म छिद गया
ज़ख़्मों की सूलियों पे मिरी रात कट गई

एहसास की किरन से लहू गर्म हो गया
सोचूँ के दाइरों में तिरी याद बट गई

गाँव गाँव ख़ामोशी सर्द सब अलाव हैं

गाँव गाँव ख़ामोशी सर्द सब अलाव हैं
रह-रव-ए-रह-ए-हस्ती कितने अब पड़ाव हैं

रात की अदालत में जाने फै़सला क्या हो
फूल फूल चेहरों पे नाख़ुनों के घाव हैं

अपने लाडलों से भी झूठ बोलते रहना
ज़िंदगी की राहों में हर क़दम पे दाओं हैं

रौशनी के सौदागर हर गली में आ पहुँचे
ज़िंदगी की किरनों के आसमाँ पे भाव हैं

चाहतों के सब पंछी गए पराई ओर
नफ़रतों के गाँव में जिस्म-जिस्म घाव हैं

हर इक क़दम पे ज़ख़्म नए खाए किस तरह

हर इक क़दम पे ज़ख़्म नए खाए किस तरह
रिंदों की अंजुमन में कोई जाए किस तरह

सहरा की वुसअतों में रहा उम्र भर जो गुम
सहरा की वहशतों से वो घबराए किस तरह

जिस ने भी तुझ को चाहा दिया उस को तू ने ग़म
दुनिया तिर फ़रेब कोई खाए किस तरह

ज़िंदाँ पे तीरगी के हैं पहरे लगे हुए
पुर-हौल ख़्वाब-गाह में नींद आए किस तरह

ज़ंजीर-ए-पा कटी तो जवानी गुज़र गई
होंटों पे तेरा नाम-ए-‘सबा’ लाए किस तरह

लब-ए-इज़हार पे जब हर्फ़-ए-गवाही आए 

लब-ए-इज़हार पे जब हर्फ़-ए-गवाही आए
आहनी हार लिए दर पे सिपाही आए

वो किरन भी तो मिरे नाम से मंसूब करो
जिस के लुटने से मिरे घर में सियाही आए

मेरे ही अह्द में सूरज की तमाज़त जागे
बर्फ़ का शहर चटख़ने की सदा ही आए

इतनी पुर-हौल सियाही कभी देखी तो न थी
शब की दहलीज़ पे जलने को दिया ही आए

रह-रव-ए-मंज़िल-ए-मक़्तल हूँ मिरे साथ ‘सबा’
जो भी आए वो कफ़न ओढ़ के राही आए

मुसाफ़िरों में अभी तल्ख़ियाँ पुरानी हैं

मुसाफ़िरों में अभी तल्ख़ियाँ पुरानी हैं
सफ़र नया है मगर कश्तियाँ पुरानी हैं

ये कह के उस ने शजर को तने से काट दिया
कि इस दरख़्त में कुछ टहनियाँ पुरानी हैं

हम इस लिए भी नए हम-सफ़र तलाश करें
हमारे हाथ में बैसाखियाँ पुरानी हैं

अजीब सोच है इस शहर के मकीनों की
मकाँ नए हैं मगर खिड़कियाँ पुरानी हैं

पलट के गाँव में मैं इस लिए नहीं आया
मिरे बदन पे अभी धज्जियाँ पुरानी हैं

सफ़र-पसंद तबीअत को ख़ौफ़-ए-सहरा क्या
‘सबा’ हवा की वही सीटियाँ पुरानी हैं

ज़र्द चेहरों से निकलती रौशनी अच्छी नहीं

ज़र्द चेहरों से निकलती रौशनी अच्छी नहीं
शहर की गलियों में अब आवारगी अच्छी नहीं

ज़िंदा रहना है तो हर बहरूपिए के साथ चल
मक्र की तीरा-फ़ज़ा में सादगी अच्छी नहीं

किस ने इज़्न-ए-क़त्ल दे कर सादगी से कह दिया
आदमी की आदमी से दुश्मनी अच्छी नहीं

जब मिरे बच्चे मिरे वारिस हैं उन के जिस्म में
सोचता हूँ हिद्द ख़ूँ की कमी अच्छी नहीं

गोश बर-आवाज़ हैं कमरे की दीवारें ‘सबा’
तख़लिए में ख़ुद से अच्छी बात भी अच्छी नहीं

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