सरदार अंजुम की रचनाएँ

हैदराबाद धमाकों पर

1).
अपाहिज बनके जीने की अदा अच्छी नहीं लगती
जो सूली तक न ले जाए सजा अच्छी नहीं लगती

2).
ये धमाके आम हों तो क्या करें
मौत का पैगाम हों तो क्या करें
मिल गयी थी जब हमें इनकी खबर,
कोशिशें नाकाम हों तो क्या करें
हादसे जिनमे छिपी हो दुश्मनी,
दोस्ती के नाम हों तो क्या करें

दे के आवाज़ ग़म के मारो को 

दे के आवाज़ ग़म के मारो को
मत परेशाँ करो बहारों को

इनसे शायद मिले सुरागे-हयात
आओ सज़दा करें मज़ारों को

वो ख़िज़ा से है आज शर्मिन्दा
जिसने रुसवा किया बहारों को

दिलकशी देख कर तालातुम की
हमनें देखा नहीं क़िनारों को

हम ख़िज़ा से गले मिले “अंजुम”
लोग रोते रहे बहारों को

जब कभी तेरा नाम लेते हैं

जब कभी तेरा नाम लेते हैं
दिल से हम इन्तक़ाम लेते हैं

मेरी बर्बादियों के अफ़साने
मेरे यारों का नाम लेते हैं

बस यही एक जुर्म् है अपना
हम मुहब्बत से काम लेते हैं

हर क़दम पर गिरे पर सीखा
कैसे गिरतों को थाम लेते हैं

हम भटक कर जुनूँ की राहों में
अक़्ल से इन्तक़ाम लेते हैं

चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ायें

चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ायें
ना तुम याद आओ ना हम याद आयें

सभी ने लगाया है चेहरे पे चेहरा
किसे याद रखें किसे भूल जायें

उन्हें क्या ख़बर हो आनेवाला ना आया
बरसती रहीं रात भर ये घटायें

ग़म-ए-हयात का झगड़ा मिटा रहा है कोई

ग़म-ए-हयात का झगड़ा मिटा रहा है कोई
चले भी आओ के दुनिया से जा रहा है कोई

कहो अजल से ज़रा दो घड़ी ठहर् जाये
सुना है आने का वादा निभा रहा है कोई

वो आज लिपटे हैं किस नाज़ुकी से लाशे को
के जैसे रूठों हुओं को मना रहा है कोई

कहीं पलट के न आ जाये साँस नब्ज़ों में
हसीन हाथों से मय्यत सजा रहा है कोई

हमसफ़र होता कोई तो बाँट लेते दूरियाँ

हमसफ़र होता कोई तो बाँट लेते दूरियाँ
राह चलते लोग क्या समझें मेरी मजबूरियाँ

मुस्कुराते ख़्वाब चुनती गुनगुनाती ये नज़र
किस तरह समझे मेरी क़िस्मत की नामंज़ूरियाँ

हादसों की भीड़ है चलता हुआ ये कारवाँ
ज़िन्दगी का नाम है लाचारियाँ मजबूरियाँ

फिर किसी ने आज छेड़ा ज़िक्र-ए-मंजिल इस तरह
दिल के दामन से लिपटने आ गई हैं दूरियाँ

ग़मों ने घेर लिया है मुझे तो क्या ग़म है 

ग़मों ने घेर लिया है मुझे तो क्या ग़म है
मैं मुस्कुरा के जियूँगा तेरी ख़ुशी के लिये
कभी कभी तू मुझे याद कर तो लेती है
सुकून इतना सा काफ़ी है ज़िन्दगी के लिये

ये वक़्त जिस ने पलट कर कभी नहीं देखा
ये वक़्त अब भी मुरादों के फल लाता है
वो मोड़ जिस ने हमें अजनबी बना डाला
उस एक मोड़ पे दिल अब भी गुनगुनाता है

फ़िज़ायें रुकती हैं राहों पर जिन से हम गुज़रे
घटायें आज भी झुक कर सलाम करती हैं
हर एक शब ये सुना है फ़लक से कुछ् परियाँ
वफ़ा का चाँद हमारे ही नाम करती हैं

ये मत कहो कि मुहब्बत से कुछ नहीं पाया
ये मेरे गीत मेरे ज़ख़्म-ए-दिल की रुलाई
जिन्हें तरसती रही अन्जुमन की रंगीनी
मुझ मिली है मुक़द्दर से ऐसी तन्हाई

तेरा मेरा झगड़ा क्या जब इक आँगन की मिट्टी है

तेरा मेरा झगड़ा क्या जब इक आँगन की मिट्टी है
अपने बदन को देख ले छूकर मेरे बदन की मिट्टी है

भूखी प्यासी भटक रही है दिल में कहीं उम्मीद् लिये
हम और तुम जिस में खाते थे उस बर्तन की मिट्टी है

ग़ैरों ने कुछ् ख़्वाब दिखाकर नींद चुरा ली आँखों से
लोरी दे दे हार गई जो घर आँगन की मिट्टी है

सोच समझकर तुम ने जिस के सभी घरोन्दे तोड़ दिये
अपने साथ जो खेल रहा था उस बचपन की मिट्टी है

चल नफ़रत को छोड़ के ‘अंजुम’ दिल के रिश्ते जोड़ के ‘अंजुम’
इस मिट्टी का क़र्ज़ उतारें अपने वतन की मिट्टी है

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