सरोज परमार की रचनाएँ

टूटे पंखों वाली चिड़िया

अलसुबह जब तुम नर्म घास घास पर
हल्के-से पाँव रखते हो
तुम्हारे पिछवाड़े की गली में
नगर पालिका के नल पर
घड़ों,बाल्टियों,कनस्तरों और डिब्बों
के बीच बतियाते लोग
अक्सर बहस पर उतर आते हैं
उनके शब्दों में झरने लगती हैं चिन्ताएँ.
तुम्हारी हवाख़ोरी के बीच
चाय की चुस्कियों के बीच
अख़बार की सुर्खियों के बीच
अक्सर राजनीति का कोई टेढ़ा
पेच कवायद करता रहता है
और आदतन गाली निकल जाती है
मगर तुम्हारी नज़र टिकी है
टूटे पंखों वाली चिड़िया पर
कहीं उड़ना तो नहीं सीख रही.

अमर्त्य सेन

ज़मीनी सोच के पंखों पर
तिर रहा है
सिरफिरा अमर्त्य लिख रहा है
धकियाने पर भी लिख रहा है
एक दिन अन्तर्राष्ट्रीय होता है
बंगभाषी अमर्त्य.
राश्ग्ट्रीय अस्मिता की पहचान
आन,बान,शान
मंच सज्जा का सामान
हो जाता है अमर्त्य.
उसे सुना जाता है
अपनी -अपनी सहूलियतों से
समझा जाता है
अमल में लाने की ज़रूरत
शायद कतई नहीं.
उनकी उपलब्धियों पर
इठलाएँगे सदियों तक हम.
मुझे भय है , धीमे-धीमे
विश्व पटल पर सजा दिए जाएँगे अमर्त्य
भारत का मुलम्मा चढ़ा कर
उनके सिद्धान्तों को डाल
दिया जाएगा चाँदी मढ़े
सन्दूकों में
धरोहर की तरह
माहिर हैं हम
इतिहास बनाने
औ आरती सजाने में.

उसका दु:ख 

बच्चे की जलती बुझती आँखों में
नहीं हैं सपने
देर से लौटती थकी-माँदी
माँ का इन्तज़ार है.
उसे पूछने हैं कई सवाल
कहनी हैं कई छिटपुट बातें.
वो भी जानने लगा है
आँखें चुराकर घुस जाएगी चौके में माँ
वह निहारता रहेगा उसकी बाट
तब तक जब तक
आँखें भारी न हो जाएँ.
बच्चा नहीं कह पाता वो सब
जो सिर्फ़ उसे माँ से कहना है.
माँ समझती है दु:ख उसका
पर उसका दु:ख महीने के राशन
से उसे हल्का लगता है.

माँ

ख़ाली हो गई है
कमरे के कोने में पड़ी चारपाई
आँगन में पड़ी नेवाड़ की
भूरी कुर्सी
गायब है
बार-बार बक्सा खोलते
बार-बार अलमारी टटोलते
हाथ.
यूँ तो खूँटी पर टँगा है
आज भी दुपट्टा
मेज़ पर पड़ा है चश्मा
प्याले में पड़े हैं दाँत भी
दहलीज़ पर दुबकी-सी पड़ी है
चप्पल भी
नहीं हैं बहुत कुछ बोलने वाली आँखें
बार-बार छाती से लगाने वाली बाँहें
सिर पर हाथ फिराने वाली उँगलियाँ
शिकवे शिकायतों आशीषों की झड़ियाँ
माँ कहानी हो गई है.
जिसके उद्धरण जब तक
घ्टनाक्रमों में पिरोती है
अनुभूतियों और विश्वासों को
अपनी कोख जाई में जगाती हूँ
माँ सितारा हो गई है
उसकी रोशनी में लाँघ जाती हूँ
अँधियारे की कई नदियाँ
और बुन लेती हूँ सपनों की जाली
कभी शिराओं में सरसराती है
चिन्ताओं में कुलबुलाती है
उनकी सोच को ओढ़ते-बिछाते
मैं माँ हुई जाती हूँ.

मेरा घर 

उतरे है चाँदनी चुपके-से
जिसकी ढलुआँ छत पर
ओस-नहाए सुर्ख गुलाब
सजाए बन्दनवार अक्सर
ठिठुरते आँगन में जिसके
पसरे है रिश्तों की धूप
दहलीज़ पर बैठी अम्मा
प्यार बाँटती अंजुरी भर.
सदा आमन्त्रन देते से
बाँहें फलाए जिसके दर
वो मेरा घर ! हाँ मेरा घर.

समय से भिड़ने के लिए

मौसम में उमस है
हवा में साज़िशें
फ़िज़ा में घुल गया वहशियाना रंग
मन की हरियाली को
निगल रहा अकेला पन
समय से भिड़ने के लिए
जो शब्द जुटाए थे
बामशक्कत बचाए थे
उन्हें पैना करो
कल जब सपने टँग जाएँगे
सलीब पर
शब्द की धार ही
काटेगी हवा को.

गुलाब की पंखुरियाँ

ये नीली सलवार वाली लड़की
फुग्गा फुला उस छत पर फेंक रही है
उसकी आँखों में झर रही हैं
गुलाब की पंखुरियाँ.

माँजा डोर थामे
खुले बटनों वाला लड़का
उड़ रहा पतंग के संग-संग
उसकी छत के हर कोने से
बटोर लाया गुलाब की पंखुरियाँ.

मुँडेरों की भरी सभा में
चकरघिन्नी खाती मछली की
आँख को बींध दिया
पतंग के झूमर से.

किवाड़ों की ओट से
कई चेहरे हकबकाए
कुछ झरोखों में टँगे
कुलबुलाए
कुछ ने बिचकाए होंठ
कईयों ने फेरी जीभ
ख़ुश्क हो चली ज़मीर पर

उस बेपरवाह के गालों पर
पहली बार ही उतरा सुरूर
उसकी कुँआरी चाल में
झलका है हल्का ग़ुरूर
ओढ़नी नीली पर छिटक गईं
गुलाब की पंखुरियाँ

पेड़

१.
उसे हरी बेल समझ
उँगली पकड़ चलाया था
सहलाया था
पर वह निकली कोंचफली
दे गई अन्तहीन खुजली
पेड़ परेशान-सा खड़ा है
आकाश में बाहें फैलाए.

२.
ऊँची डाल पर बैठा तोता
अण्ड-बण्ड बोलता है
बोल-बोल थकता है
उड़ता है फिर थाम लेता है
दूसरी फुनगी
इतराते हुए बाँचता है
रटन्त विद्या
पेड़ बेलाग है
जंगल अपने में डूबा-सा
कीड़े बेपरवाह-से और जानवर चौकन्ने.

इस ख़ौफ़नाक दौर में

अक्सर लोग फूलों का गीत गुनगुनाते
बाँट जाते हैं पैने ख़ंजर
थपथपाते हैं मेज़ें
पीटते हैं थालियाँ
खीसें निपोरते
लगाते हैं कहीं सेंध भी.
ब्रीफ़केसों में बन्द
अस्मत, किस्मत, ताक़त
दलालों के रगड़े में
पूरा समाज.
बातें हैं समझौते की
फ़स्लें उगाते लाशों की
मिसाइल की नोक पर
बाँध इन्सानियत को
उगलवाते हैं अमन-चैन,सुकून
इस दुरभिसन्धियों के ख़ौफ़नाक दौर में
कहाँ है मुकम्मल सुख?
तुम्हीं बताओ
किन भरोसेमन्द हाथों में
सौंप दूँ अपनी नन्हीं बुलबुल.

पंख

माई री…
मेरी डोली में पंख मत रखना
उसे मेरी नज़रों से ओझल
किसी नदी में मौर-सा सिरा देना
या
किसी दुतल्ले पर रखे नाने वाले
सन्दूकचे में क़ैद कर देना

कभी बहुत मचला जिया
तो लूँगी उधार उनसे पंख
महसूसूँगी रंगीले पंखों की उड़ान
कुछ पल.
फिर तो भारी करधनी
ज़मीन छोड़ने नहीं देगी
ओढ़नी उलझेगी कई खूँटों से
धीरे-धीरे उड़ना भूल जाऊँगी
पंख भूल जाऊँगी.

आसमान तलाशना छोड़ परिन्दे

परिन्दे!
क्यों आसमान तलाशता है
बित्ते भर पिंजड़े के आकाश को
छू कर सब्र, सब्र कर.

आदमी तो पिंजड़े जैसा ढूँढता फिरता है
छत मिलने से पहले
बढ़ते हैं तेज़ी से उसके पंख
बढ़ते हैं नाखून
लम्बी होती है जीभ
लेता है सपने सूरज निगलने के.
पिंजड़ा मिला नहीं
कि पंख किवाड़ के बाहर
मातमी धुन में दफ़नाए जाते हैं

शानदार आदमी
पिंजड़ों में जीते- मरते हैं.
आसमान तलाशना छोड़
परिन्दे .
चन्द मिर्ची कुतर
ठण्डा पानी पी
बोल राम! राम! राम!

सिलसिला 

मेरे और तुम्हारे मिलन का सिलसिला
यहीं तो खत्म नहीं होगा
हर प्रलय के बाद हम
उगेंगे मनु और श्रद्धा की तरह
फिर सिरजेंगे संस्कृतिओं के अंडे
जिनसे निकलेंगे सभ्यताओं के चूज़े
जो गाएँगे विरह मिलन के गीत
जो चहकेंगे,महकेंगे फिर बहकेंगे
फिर ईड़ा का तर्कजाल घेरेगा बाहों में
फिर टुच्चापन झलकेगा
मछलियों में आदम की
फिर देखेगी श्रद्धा छले जाते विश्वास
होगी कुछ क्षण बदहवास
फिर जगेगा बल,आत्मविश्वास
फिर गाएगा कोई ‘प्रसाद’
“नारी तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास रजत नग पग तल में
पीयूष स्रोत-सी बहा करो
जीवन के सुन्दर समतल में।”

सन्नाटा 

हमनें भाँपा है
सन्नाटा खींच लेता है रगों से ख़ून
कुन्द हो जाती है सोच की धार
लटक जाती है भुजाएँ बेहोश होकर
अनायास निकलने लगते हैं अस्फुट शब्द।
सन्नाटा एक रोज़ का हो तो इसे
शुगल का नाम दिया जा सकता है
या फिर
नींद के नाम किया जा सकता है
जब घुल जाता है पोर-पोर में
पारे की मानिन्द सन्नाटा।
तो चुस जाता है व्यक्तित्व
और लाले पड़ जाते हैं अस्तित्व के।

नींद में ख़लल 

पथराई गली पर बूटों की
खिट खिट निरंतर
टिक टिक टप टप हुम्म
बोझा ढोते खच्चर
कुछ आवाज़ें टिटकराने की
कुछ फुसफुसाहतें
कुछ दबी-घुटी हंसी
ओसारे में सोई चिढ़िया की
नींद में ख़लल डालती है।

पहाड़ो ! प्रतिरोध करो

पहाड़ो! प्रतिरोध करो
भारी पड़ेगी चुप्पी तुम्हारी।
कुछ तो बोलो।
कुछ तुँदियाद गावद-तकियों पर पसरे
तुम्हारी छाती में सुराख़ कर
अपनी सोने की ईँटें चिन रहे हैं।
सारी ताकत समेट अन्दर की
धकिया दो, जलवतन कर दो
बारूद को।
बरना तुम टुकड़े-टुकड़े टूट जाओगे
नुच जाएगी हरियाली
धुआँ बन जाएँगे बादल
बेमुरौव्वत हो जाएँगे पँछी
और कौन जाने दरिन्दगी पर
उतर आए आदमी भी।

काँचघर 

इस वैश्या ने
हर बार नागफनी उगाई है
और इंतज़ार की है
सोनजूही की फूलने की।
मनवंतरों को फलाँगता यह काल
इन पलों से चिपक सा गया है।
दर्द भरी हवा नीचे से ऊपर तक
डोल रही है।
नाज़ियों के यातना गृह-सा
यह काँचघर
जिसे के हर काँच में बिम्बित
हिटलरी एषनाओं की कवायद
हिरोशिमा के गर्भ की ऐंठन
जिन पर कई जोड़ी आँखें टँगी हैं।
सब कुछ ढाँप लेने को आतुर,
निरीहता से जूझती,
काँचघर पर पत्थर दे मारती हूँ।
धीमे-धीमे
मेरे और लोगों के बीच
एक अनंत मरुथल उग आता है।
तब से अब तक
खिलते फूलों के नुच जाने का
जलते सवालों के बुझ जाने का
किस्सों के टुकड़े जुड जाने का
सिलसिला जारी है।
यह काँचघर
जिसकी हर दीवार पर्दों से लैस है
जिसका हर कोना धूप से महफूज़ है
इसके मध्य बिछा सा
मेरा वैश्या मन
सोनजूही की कल्पना में कैद
नागफनी के काँटे भोग रहा है।

बेतरतीब लतर 

कोई दोर चला गया बहुत दूर !
जिसकी बाहों के समन्दरों में
मछली सी उतर तैरती थी
जिसकी आँखें मेरे जिस्म की किताब
पर अनवरत झुकी रहती थी
जिसे देख बताशे सी घुलने लगती थी
भीड़ में भी सिसकी खनखनाती हँसी
दिल की परखनली में
एकदम शुद्ध उतरती थीं
आज सारहीन सन्नाता फैल गया है
चारों ओर
रात गहराते ही और गहरा हो जाता है
यह अहसास–
कोई दूर चला गया है,मुझसे दूर, बहुत दूर।
आड़ी तिरछी रेखाएँ
दो बिल्लौरी काँच
धुएँ की हल्की सी लकीर
राशि-राशि पीलापन
उभर आता है।
फूलदान में मुस्कुराते कागज़ी
गुलदाऊदी एकदम झरने लगते हैं
कहीं से ढेर सारी हवा
घुस आती है कमरे में
पर्दों की तरह काँपती हुई
बोल उठती हूँ
कोई दूर चला गया है,दूर चला गया है।
दीवार से चिपका हाथ
अकस्मात
दस्ताने मढ़ी बुच्ची हथेली को छू लेता है
कमरे के सभी बुत
अट्टहास कर उठते हैं
लाखों जोड़ी आँखे मुझे घूरती हैं
मैं सर्द कमरे में भी पिघलने लगती हूँ।
बड़ी बोझिल लगती है
तुम्हारे द्वारा ओढ़ाई संज्ञा
अँगूर की बेतरतीब लतर सी
फैलाती हुई बुदबुदाती हूँ__
अच्छा ही हुआ ! कोई दूर चला गया है
बह्त दूर चला गया है !

कैसे बुहारूँ

बुहार दिया घर आँगन
पिछवाड़ा,गलियारा
कैसे बुहारूँ?
पीठ का कूबड़,
गाल का मस्सा,
हँसी ठठ्ठा,
अफ़वाहें
जो चिपक गई कई कानों से
कई होंठों तक।

गुणनफल आँक दो हर आँख पर

तुम्हारी स्वार्थपरता ने
जब जब मुझे छीला है
तब तब मेरे मंगलसूत्र का
एक मोती चटका है
चटकते-चटकते,घटते घटते
अब डोर मात्र रह गया है
और
मेरे और तुम्हारे बीच का रिश्ता
महज़ ख़तों में सिमट गया है।
मेरे शब्द
जो सिर्फ तुम्हारे लिए थे
हज़ारों गलियों में टुकड़े-टुकड़े भटक रहे हैं।
जब कभी तेरी याद का फल
कोई सुग्गा कुतरता है
मेरे लफ्ज़ ज़ख़्मी हो जाते हैं
आशंकाओं की सुईयाँ चुभने लगतीं हैं
यकी की ख़ुश्बू उड़ जाती है
आश्वासन पिघल पिघल जाते हैं।
हथेलियों पर आँसुओं के ताज
बनते ढहते हैं।
ओ सूरज !
मेरे हर दर्द को
खुशियों से जरब कर दो
और
गुणनफल को आँक दो
हर आँख पर।

बीसवें साल में

.साँझ होते ही अँगड़ाई ले उठ बैठा है
दिन भर का ऊँघता बाज़ार।
रोशनी के उमड़ते सैलाब में बहते हुए
अकस्मात मुझे बहुत अँधेरा लगता है
मेरी कोख में युगों से रोता हुआ
अजन्मा सत्य चीखने लगता है।
भीड़ के गुच्छे की चुंधियाई आँखे
उस तक नहीं पहुँच पाती
जब-जब आम्र मंजरियों से
हवा गन्धायी है
तब तब मैं अपने बीसवें साल में लौटी हूँ।
झूमती गेहूँ की बालियाँ मेरी रग-रग में
मस्ती भर जाती है
कचनार की फूली डालियाँ आँखों में
शरबती रंग भर जाती है
पर मुझे यह चुहल रास नहीं आती।
तुम्हारे दिए हरसिंगार चुभने लगते हैं
मेरी हथेलियाँ पसीने से नहीं जाती हैं।
एक कुलबुलाहट सारे व्यक्तित्व को
आतंकित कर जाती है
और मैं…….
अपने मातृत्व को घायल कर देती हूँ।
रक्त सनी सत्य की लोथ
पथराई आँखों से देखती (मेरी ओर)
किसी कब्र में खो जाती है
मेरे दूधिया पैरों में कोई कील गाड़ जाता है
विषुवत रेखा पर ठहरी सोचती हूँ…….
‘सृजन पीड़ा माँगता है’
मैंने वेदना से डर कर किसी सत्य की
भ्रूण हत्या की है
अब कोई सत्य मेरी कोख़ से
कभी जन्म नहीं लेगा।

विषकन्या 

.ज़िन्दगी के पाँवों में
शब्द चिपकने को मचलते हैं
शब्दों का क्या करूँ
अर्थ ही नहीं मिलते।
कुछ हो जाने का अहसास
किसी सर्प दंश से कम नहीं होता
मैं विष कन्या बनती जा रही हूँ ।
यह पीली-नीली धारियों का वेश
मुझे पसन्द नहीं
मुझे ज़िन्दा रहना है
इसलिए मेरी पसन्दीदगी का सवाल
ही नहीं।
इस फागुन को सूँघ
मेरी केंचुल तो उतरती है
पर विष नहीं उतरता।
कल क्या था? कल क्या होगा?
प्रश्न-चिन्हों से घिरी सोच के मुँह में
आज के नाम पर कड़ुवाहट
घुल जाती है।
काश! मेरा आज
गुलमोहर का गुच्छा बन जाए।

सुख

चिन्दी-चिन्दी फट जाने में
टुकड़े-टुकड़े बँट जाने में
कैसे पा जाते हैं सुख?
चिथड़े की मानि‍द
अंतिम दम तक नुच जाना
हर रेशे का चुस जाना
ही होता होगा शायद सुख।
भुरभुरे घास के तिनके-सा
गिर जाना उड़ जाना,बिछ जाना
ही है शायद सुख।
ज़र्रा-ज़र्रा बिखर जाने मेम
सोंधी माटी में मिल जाने में
किंचित पा जाते हैं सुख।
दुख के पाँव लम्बे लगे
सुख की चादर छोटी
पैर सिकोड़ कर सोना ही
है मुझ जैसों का सुख।

बहुत शर्मिन्दा हैं

रूढ़ियों के जंगल में कैद
मेरा व्यक्तित्व
आज बिन मौत मरने को बैचैन हुआ
क्योंकि
आज हम अपने आज से बहुत शर्मिन्दा हैं।
रूह तो मर गई पर लाश अभी ज़िन्दा है।
हिप्पियों के तमाशों में दर्द की
परछाईयाँ ढूँढने वाले हम
खुद कितने बेदर्द हैं?
रोशनी का ढोल पीटने वाले आज हम
बैगैरती बिल्कुल अँधे हैं।
सवालों की कीचड़ में रेंगता
लिजलिजे केंचुए सा मन
आस्थाओं से जूझता
उड़ते वर्कों वाली
किताब सा तन
दुश्चिंताओं की जोकों सा त्रस्त
हर दिन
गिन गिन कर काट रहे हैं
सच ! हम अपने आज से बहुत शर्मिंदा हैं
भाषण के मैदानों में
राशन की दुकानों में
ऊढ़ी होती जवानियों को
विरासत में दे रहे हैं।
नारे
हड़तालें,
जलूस
हनन नैतिक मूल्यों का
और घिसटते हुए जीना।
समझा दिया है अर्थ अधिकारों का।
अपने वोट को
दस से कम में मत बेचो
और भविष्य को गिरवीं रख दो
भ्रष्टाचार के हाथों।
दिन दिन गलते हुए कुष्ट रोगी
मेरे वर्तमान !
तेरे लिए आज हम बहुत शर्मिंदा हैं\

लाल रुमाल

चाँदनी को देखने की लालसा
अब मरी हुई मछली सी बदबूदार लगती है
इसे सहना अब वश की बात नहीं रही।
वे दिन पीछे छूट गए हैं।
आज तो कचनार की पत्तियों से झाँकती चाँदनी
अतीत की गलियों में ला पटकती है
रुई के फाहों सी गदबदी चांदनी
अब पिघलती मोम की गुड़िया के सिवाय
कुछ नहीं लगती।
क्यों याद कराते हो तुम उन दिनों और सपनों को
जो मर तो गए हैं पर लाश दफनाने को है।
कई गड्ढे खोद चुकी हूँ इस अंतस में
पता नहीं क्यों ? कैसे? वे लाशें दूने वेग
से उग आती हैं
पूछती हैं— हताश कौन?
अचानक सत्य के प्रेत हावी हो जाते हैं
डराते हैं,धमकाते हैं
मैं अपने हाथ का लाल रुमाल
छुपाने का प्रयत्न करती हूँ।

भोर मेरे गाँव की

पूरब से फुदकती किरण
धवल धार पर भटक रही
कन्दरा में कुछ ठूँठ खोज
देव-दारू पर अटक रही।

बाजों पर धर-धर पैर
ढलुआनों पर लटक रही
अंधियारे को निगल पचा
सीलन भी सटक रही।

नाले पर फिसकी इतराई
ठिठुरी मेंढों को सहलाए
घाटी में पसरी भुटियाई
तुरई लतर पर बलि जाए

चौखट पर बैठ निगोड़ी
कंकरियाँ फेंक रही है
अँगना में लेटी दई-मारी
नाती से खेल रही है।

धन्नो वर्कों से-रह रह
तख़्ती प्र चेंप रही है
मिमियाते अज शावक को
रह रह कर सेंक रही है।

के चरखे को कात रही है
चाय सुड़कते बुढ्ढे की
टाँग़ों को दाब रही है

दाड़िम पर चहकीं चिड़िया
सुग्गों ने पर फ़टकारे
टूँ टूँ टीं टीं वो मैं तू
फैला रव अगाड़े पिछवाड़े

डाकिए-सी… साँझ

घिरी आती है साँझ
इसे रोको! रोको! इसे रोक भी दो।
यह दे भी जाएगी एक चिट्ठी
गुमनाम सी
जो खा जाएगी मेरी नींद
आज के सपने
जो कर जाएगी कड़वी मेरी बात
मेरे घर न आए यह साँझ
कह दो ! इससे, कह दो।
यादों की भट्ठी में,पिघलते राँगे सी देह
होठों की चिमनी से
धूआँ उगलेगी।
जिससे मेरे अस्तित्व का आकाश
काला हो जाएगा
तब मेरी प्यासी आत्मा को
दो शब्दों का पानी न मिलेगा।
रोको ! इसे रोको ।
यह अवाँछित डाकिये सी…..साँझ

अल्हड़ चीड़

.सर्द खामोशी में
दीवाना हुआ जाता रे
अल्हड़ चीड़ ।
छुअन ज़रा सी हवा की
लगा झूम-झूम मचलने
सज बन तुहिन चकतों से
लगा कँपने सिहरने
झिरी से कसमसाने लगा रे
अल्हड़ चीड़।
बड़ा सहज है
झेल नहीं पाता उफान
आतंकित नहीं कर पाई
कोई भी ऊँचाई
छल नहीं पाया
किसी का बौनापन।
कितना खुलापन रे
अल्हड़ चीड़ !
छनी छनी सी धूप
फिसली गिरती सी छाया
गुंजित पल पल अनहदनाद
अर्हनिश जंगल भरमाया
कब यह जोग धराया ने ?
अल्हड़ चीड़ ।
बदली तेरा माथा चूमें
हिममुक्ता केश संवारे
चिलगोज़ों के कलश उठाए
मिलनातुर तू बाँह पसारे ।
भव्य बने तेरे नखरे रे
अल्हड़ चीड़ ।

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