सलमान अख़्तर की रचनाएँ

दोस्ती कुछ नहीं उल्फ़त का सिला कुछ भी नहीं 

दोस्ती कुछ नहीं उल्फ़त का सिला कुछ भी नहीं
आज दुनिया में बजुज़ ज़ेहन-रसा कुछ भी नहीं

पत्ते सब गिर गए पेड़ों से मगर क्या कहिए
ऐसा लगता है हमें जैसे हुआ कुछ भी नहीं

कल की यादों की जलाने का जलाएँ मषअल
एक तारीक उदासी के सिवा कुछ भी नहीं

ढूँढना छोड़ दो परछाईं का मसकन यारो
चाहे जिस तरह जियो इस में नया कुछ भी नहीं

इक बुरोटस से षिकायत हो तो दिल दुखता है
हो जो हर एक से षिकवा तो गिला कुछ भी नहीं

जागते में भी ख़्वाब देखे हैं

जागते में भी ख़्वाब देखे हैं
दिल ने क्या क्या अज़ाब देखे हैं

आज का दिन भी वो नहीं जिस के
हर घड़ी हम ने ख़्वाब देखे हैं

दूसरे की किताब को न पढ़ें
ऐसे अहल-ए-किताब देखे हैं

क्या बताएँ तुम्हें के दुनिया में
लोग कितने ख़राब देखे हैं

झाँकते रात के गिरेबाँ से
हम ने सौ आफ़ताब देखे हैं

हम संदर पे दौड़ सकते हैं
हम ने इतने सराब देखे हैं

जीना अज़ाब क्यूँ है ये क्या हो गया मुझे 

जीना अज़ाब क्यूँ है ये क्या हो गया मुझे
किस शख़्स की लगी है भला बद-दुआ मुझे

मैं अपने आप से तो लड़ा हूँ तमाम उम्र
ऐ आसमान तू भी कभी आज़मा मुझे

निकले थे दोनों भेस बदल के तो क्या अज़ब
मैं ढूँडता ख़ुदा को फिरा और ख़ुदा मुझे

पूछेंगे मुझ को गाँव के सब लोग एक दिन
मैं इक पुराना पेड़ हूँ तू मत गिरा मुझे

उस घर के कोने कोने में यादों के भूत हैं
अलमारियाँ न खोल बहुत मत डरा मुझे

कहो तो आज बता दें तुम्हें हक़ीकत भी

कहो तो आज बता दें तुम्हें हक़ीकत भी
के ज़िंदगी से रही है हमें मोहब्बत भी

तुम्हारा हुस्न तो है जान अपने रिश्‍ते की
बरत रहे हैं मगर हम ज़रा मुरव्वत भी

हज़ार चाहें मगर छूट ही नहीं सकती
बड़ी अजीब है ये मय-कशी की आदत भी

ये ज़िंदगी कोई महशर सही मगर यारो
सुकून-बख़्श है हम को यही क़यामत भी

उधार ले के ख़ुशी सारी उम्र जीते रहे
मगर ये इल्म था आएगी हम पे आफ़त भी

ख़्वाबों के आसरे पे बहुत दिन जिए हो तुम

ख़्वाबों के आसरे पे बहुत दिन जिए हो तुम
शायद यही सबब के के तनहा रहे हो तुम

अपने से कोई बात छुपाई नहीं कभी
ये भी फ़रेब ख़ुद को बहुत दे चुके हो तुम

पूछा है अपने आप से मैं ने हज़ार बार
मुझ को बताओ तो सही क्या चाहते हो तुम

ख़ाली बरामदों ने मुझे देख कर कहा
क्या बात है उदास से कुछ लग रहे हो तुम

घर के लबों पे आज तक आया न ये सवाल
हो कर कहाँ से आए हो क्या थक गए हो तुम

तेग़ खींचे हुए खड़ा क्या है

तेग़ खींचे हुए खड़ा क्या है
पूछ मुझ से मेरी सज़ा क्या है

ज़िंदगी इस क़दर कठिन क्यूँ है
आदमी की भला ख़ता क्या है

जिस्म तू भी है जिस्म मैं भी हूँ
रूह इक वहम के सिवा क्या है

आज भी कल का मुंतज़िर हूँ मैं
आज के रोज़ में नया क्या है

आइए बैठ कर शराब पिएँ
गो के इस का भी फायदा क्या है

ये तमन्ना है के अब और तमन्ना न करें

ये तमन्ना है के अब और तमन्ना न करें
शेर कहते रहें चुप चाप तक़ाज़ा न करें

इन बदलते हुए हालात में बेहतर है यही
आईना देखें तो ख़ुद अपने को ढूँडा न करें

तू गुरेजाँ रही ऐ ज़िंदगी हम से लेकिन
कैसे मुमकिन है के हम भी तुझे चाहा न करें

इस नए दौर के लोगों से ये कह दे कोई
दिल के दुखड़ों का सर-ए-आम तमाशा न करें

अंदर का शोर अच्छा है थोड़ा दबा रहे

अंदर का शोर अच्छा है थोड़ा दबा रहे
बेहतर यही है आदमी कुछ बोलता रहे

मिलता रहे हंसी ख़ुशी औरों से किस तरह
वो आदमी जो खुद से भी रूठा हुआ रहे

बिछुडो किसी से उम्र भर ऐसे कि उम्र भर
तुम उसको ढूंढो और वो तुम्हें ढूंढता रहे

कौन समझा कि ज़िन्दगी क्या है

कौन समझा कि ज़िन्दगी क्या है
रंज होता है क्यों, ख़ुशी क्या है

जिन के सीनों पे ज़ख्म रोशन हों
उनके रातों की तीरगी क्या है

लोग, किस्मत, खुदा, समाज, फ़लक
आगे इन सबके आदमी क्या है

हम बहुत दिन जियें हैं दुनिया में
हम से पूछो कि ख़ुदकुशी क्या है

कब लौट के आओगे बता क्यों नहीं देते 

कब लौट के आओगे बता क्यों नहीं देते
दीवार बहानों की गिरा क्यों नहीं देते

तुम पास हो मेरे तो पता क्यों नहीं चलता
तुम दूर हो मुझसे तो सदा क्यों नहीं देते

बाहर की हवाओं का अगर खौफ है इतना
जो रौशनी अंदर है, बुझा क्यों नहीं देते

तीर पहुंचे नहीं निशानों पर

तीर पहुंचे नहीं निशानों पर
ये भी इल्ज़ाम है कमानों पर

जिस ने लब सी लिए सदा के लिए
उसका चर्चा है सब ज़बानों पर

सर झुकाये खड़े हैं सारे पेड़
और फल सज गए दुकानों पर

सच की दौलत न हाथ आई कभी
उम्र कटती रही बहानों पर

थोड़े बड़े हुए तो हकीकत भी खुल गयी

थोड़े बड़े हुए तो हकीकत भी खुलगयी
स्कूल में सुना था कि भारत महान है

देखूं मिरे सवाल का देता है क्या जवाब
सुनता हूँ आदमी बड़ा जादू बयान है

गो देखने में मुझसे बहुत मुख्तलिफ है वो
अंदर से उसका हाल भी मेरे समान है

फर्क इतना है कि आँखों से परे है वर्ना

फर्क इतना है कि आँखों से परे है वर्ना
रात के वक्त भी सूरज कहीं जलता होगा

खिड़कियां देर से खोलीं, ये बड़ी भूल हुई
मैं ये समझा था कि बाहर भी अँधेरा होगा

कौन दीवानों का देता है यहाँ साथ भला
कोई होगा मिरे जैसा तो अकेला होगा

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