सहबा अख़्तर की रचनाएँ

असनाम-ए-माल-ओ-ज़र की परस्तिश सिखा गई

असनाम-ए-माल-ओ-ज़र की परस्तिश सिखा गई
दुनिया मुझे भी आबिद-ए-दुनिया बना गई

वो संग-ए-दिल मज़ार-ए-वफ़ा पर ब-नाम-ए-इश्क़
आई तो मेरे नाम का पत्थर लगा ई

मेरे लिए हज़ार तबस्सुम थी वो बहार
जो आँसुओं की राह पे मुझ को लगा गई

गौहर-फ़रोश शबनमी पलकों की छाँव में
क्या आग थी जो रूह के अंदर समा गई

मेरे सुख़न की दाद भी उस को ही दीजिए
वो जिस की आरज़ू मुझे शाएर बना गई

‘सहबा’ वो रौशनी जो बहुत मेहरबान थी
क्यूँ मेरे रास्ते में अंधेरे बिछा गई

कुल जहाँ इक आईना है हुस्न की तहरीर का

कुल जहाँ इक आईना है हुस्न की तहरीर का
हाल किस पत्थर पे लिक्खा है मिरी तक़दीर का

चाँद उस का आसमाँ उस का सर-ए-शाम-ए-विसाल
जिस पे साया हो तिरी ज़ुल्फ़-ए-सितारा-गीर का

की न चश्म-ए-शौक़ ने जुम्बिश-ए-हुजूम-ए-रंग में
मुझ पे तारी हो गया आलम तिरी तस्वीर का

मैं उसे समझूँ न समझूँ दिल को होता है ज़रूर
लाला ओ गुल पर गुमाँ इक अजनबी तहरीर का

चैन से दोनों नहीं इस आलम-ए-एहसास में
मैं तिरी चुप का हूँ ज़ख़्मी तू मिरी तक़रीर का

ख़ुद को शरर शुमार किया और जल बुझे

ख़ुद को शरर शुमार किया और जल बुझे
इक शोला-रूख़ से प्यार किया और जल बुझे

इक रात में सिमट गई कुल उम्र-ए-आरज़ू
इक उम्र इंतिज़ार किया और जल बुझे

पिछले जनम की राख से ले कर नया जनम
फिर राख को शरार किया और जल बुझे

हम भी नसीब से जो सितारा-नसीब थे
सूरज का इंतिज़ार किया और जल बुझे

हम रौशनी-ए-ताबा से शोला-फ़रोज़ थे
हर तीरगी पे वार किया और जल बुझे

गूँज मिरे गम्भीर ख़यालों की मुझ से टकराती है

गूँज मिरे गम्भीर ख़यालों की मुझ से टकराती है
आँखें बंद करूँ या खोलूँ बिजली कौंदे जाती है

तन्हाई के दश्त से गुज़रो तो मुमकिन है तुम भी सुनो
सन्नाटे की चीख़ जो मेरे काँटों को पथराती है

कल इक नीम शगुफ़्ता जिस्म के क़ुर्ब से मुझ पर टूट पड़ी
आधी रात को अध-खिली कलियों से जो ख़ुश-बू आती है

सून घरों में रहने वाले कुंदनी चेहरे कहते हैं
सारी सारी रात अकेले-पन की आग जलाती है

‘सहबा’ साहब दरिया हो तो दरिया जैसी बात करो
तेज़ हवा से लहर तो इक जौहड़ में भी आ जाती है

जिसे लिख लिख के ख़ुद भी रो पड़ा हूँ 

जिसे लिख लिख के ख़ुद भी रो पड़ा हूँ
मैं अपनी रूह का वो मर्सिया हूँ

मिरी तन्हाइयों को कौन समझे
मैं साया हूँ मगर ख़ुद से जुदा हूँ

समझता हूँ नवा की शोलगी को
सुकूत-ए-हर्फ़ से लम्स-ए-आश्ना हूँ

कोई सूरज है फ़न का तो मुझे क्या
मैं अपनी रौषनी में सोचता हूँ

मिरा सहरा है मेरी ख़ुद-शनासी
मैं अपनी ख़ामुशी में गूँजता हूँ

किसी से क्या मिलूँ अपना समझ कर
मैं अपने वास्ते भी ना-रसा हूँ

तुम ने कहा था चुप रहना सो चुप ने भी क्या काम किया

तुम ने कहा था चुप रहना सो चुप ने भी क्या काम किया
चुप रहने की आदत ने कुछ और हमें बदनाम किया

फ़र्ज़ानों की तंग-दिली फ़र्ज़ानों तक महदूद रही
दीवानों ने फ़र्ज़ानों तक रस्म-ए-जुनूँ को आम किया

कुंज-ए-चमन में आस लगाए चुप बैठे हैं जिस दिन से
हम ने सबा के हाथ रवाना उन को इक पैग़ाम किया

हम ने बताओ किस तपते सूरज की धूप से मानी हार
हम ने किस दीवार-ए-चमन के साए में आराम किया

‘सहबा’ कौन शिकारी थे तुम वहशत-केश ग़ज़ालों के
मतवाली आँखों को तुम ने आख़िर कैसा राम किया

दोहराऊँ क्या फ़साना-ए-ख़्वाब-ओ-ख़याल को 

दोहराऊँ क्या फ़साना-ए-ख़्वाब-ओ-ख़याल को
गुज़रे कई फ़िराक़ किसी के विसाल को

रिश्ता ब-जुज़-गुमान न था ज़िंदगी से कुछ
मैं ने फ़क़त क़यास किया माह ओ साल को

शायद वो संग-दिल हो कभी माइल-ए-करम
सूरत ने दे यक़ीन की इस एहतिमाल को

तर्ग़ीब का वुसअत-ए-इम्काँ पे इन्हिसार
रम-ख़ुर्दगी सिखाता है सहरा ग़ज़ाल को

‘सहबा’ सदा बहार है ये गुलिस्तान-ए-फ़न
मुमकिन नहीं ज़वाल सुख़न के कमाल को

सवाल-ए-सुब्ह-ए-चमन ज़ुल्मत-ए-ख़िज़ाँ से उठा

सवाल-ए-सुब्ह-ए-चमन ज़ुल्मत-ए-ख़िज़ाँ से उठा
ये नफ़ा कम तो नहीं है जो इस ज़ियाँ से उठा

सफ़ीना-रानी-ए-महताब देखता कोई
कि इक तलातुम-ए-ज़ौ जू-ए-कहकशाँ से उठा

ग़ुबार-ए-माह कि मक़्सूम था ख़लाओं का
बिखर गया तो तिरे संग-ए-आस्ताँ से उठा

ग़म-ए-ज़माना तिरे नाज़ क्या उठाऊँगा
कि नाज़-ए-दोस्त भी कम मुझ से सरगिराँ से उठा

मिरे हबीब बहुत कम-सबात है दुनिया
मिरे हबीब बस अब हाथ इम्तिहाँ से उठा

बयान-ए-लग्ज़िश-ए-आदम न कर कि वो फ़ित्ना
मिरी ज़मीं से नहीं तेरे आसमाँ से उठा

कहाँ चले हो लिए नक़्द-ए-जान-ओ-दिल ‘सहबा’
कि कारोबार-ए-वफ़ा शहर-ए-दिल-बराँ से उठा

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