सहर अंसारी की रचनाएँ

मन के मंदिर में है उदासी क्यूँ

मन के मंदिर में है उदासी क्यूँ
नहीं आई वो देवदासी क्यूँ

अब्र बरसा बरस के खुल भी गया
रह गई फिर ज़मीन प्यासी क्यूँ

इक ख़ुशी का ख़याल आते ही
छा गई ज़ेहन पर उदासी क्यूँ

ज़िंदगी बेवफ़ा अज़ल से है
फिर भी लगती है बा-वफ़ा सी क्यूँ

ऐसी फ़ितरत-शिकार-दुनिया में
इतनी इंसान-ना-शनासी क्यूँ

क्यूँ नहीं एक ज़ाहिर-ओ-बातिन
आदमी हो गए सियासी क्यूँ

ग़म-गुसारी ख़ुलूस मेहर-ओ-वफ़ा
हो गए हैं ये फूल बासी क्यूँ

इक हक़ीक़त है जब वतन की तलब
फिर मोहब्बत करें क़यासी क्यूँ

ये मुलाक़ात ये सुकूत ये शाम
इब्तिदा में ये इंतिहा सी क्यूँ

मिलने वाले बिछड़ भी सकते हैं
तेरी आँखों में ये उदासी क्यूँ

विसाल-ओ-हिज्र से वाबस्ता तोहमतें भी गईं

विसाल-ओ-हिज्र से वाबस्ता तोहमतें भी गईं
वो फ़ासले भी गए अब वो क़ुर्बतें भी गईं

दिलों का हाल तो ये है कि रब्त है न गुरेज़
मोहब्बतें तो गईं थी अदावतें भी गईं

लुभा लिया है बहुत दिल को रस्म-ए-दुनिया ने
सितमगरों से सितम की शिकायतें भी गईं

ग़ुरूर-ए-कज-कुलही जिन के दम से क़ाएम था
वो जुरअतें भी गईं वो जसारतें भी गईं

न अब वो शिद्दत-ए-आवारगी न वहशत-ए-दिल
हमारे नाम की कुछ और शोहरतें भी गईं

दिल-ए-तबाह था बे-नाम हसरतों का दयार
सो अब तो दिल से वो बे-नाम हसरतें भी गईं

हुए हैं जब से बरहना ज़रूरतों के बदन
ख़याल-ओ-ख़्वाब की पिन्हाँ नज़ाकतें भी गईं

हुजूम-ए-सर्व-ओ-समन है न सैल-ए-निकहत-ओ-रंग
वो क़ामते भी गईं वो क़यामतें भी गईं

भुला दिए ग़म-ए-दुनिया ने इश्क़ के आदाब
किसी के नाज़ उठाने की फ़ुर्सतें भी गईं

करेगा कौन मता-ए-ख़ुलूस यूँ अर्ज़ां
हमारे साथ हमारी सख़ावतें भी गईं

न चाँद में है वो चेहरा न सर्व में है वो जिस्म
गया वो शख़्स तो उस की शबाहतें भी गईं

गया वो दौर-ए-ग़म-ए-इन्तिज़ार-ए-यार ‘सहर’
और अपनी ज़ात पे दानिस्ता ज़हमतें भी गईं

हवस ओ वफ़ा की सियासतों में भी कामयाब नहीं रहा

हवस ओ वफ़ा की सियासतों में भी कामयाब नहीं रहा
कोई चेहरा ऐसा भी चाहिए जो पस-ए-नक़ाब नहीं रहा

तिरी आरज़ू से भी क्यूँ नहीं ग़म-ए-ज़िंदगी में कोई कमी
ये सवाल वो है कि जिस का अब कोई इक जवाब नहीं रहा

थीं समाअतें सर हवा-हू छिड़ी क़िस्सा-ख़ानों की गुफ़्तुगू
वही जिस ने बज़्म सजाई थी वही बारयाब नहीं रहा

कम ओ बेश एक से पैरहन कम ओ बेश एक सा है चलन
सर-ए-रहगुज़र किसी वस्फ़ का कोई इन्तिख़ाब नहीं रहा

वो किताब-ए-दिल जिसे रब्त था तिरे कैफ़-ए-हिज्र-ओ-विसाल से
वो किताब-ए-दिल तो लिखी गई मगर इंतिसाब नहीं रहा

मैं हर एक शब यही बंद आँखों से पूछता हूँ सहर तलक
कि ये नींद किस लिए उड़ गई अगर एक ख़्वाब नहीं रहा

यहाँ रास्ते भी हैं बे-शजर है मुनाफ़िक़त भी यहाँ हुनर
मुझे अपने आप पे फ़ख़्र है कि मैं कामयाब नहीं रहा

फ़क़त एक लम्हे में मुन्कशिफ़ हुई शम-ए-मौसम-ए-आरज़ू
‘सहर’ उस के चेहरे की सम्त जब गुल-ए-आफ़्ताब नहीं रहा

Share