साइल देहलवी की रचनाएँ

अमानत मोहतसिब के घर शराब-ए-अर्ग़वाँ रख दी

अमानत मोहतसिब के घर शराब-ए-अर्ग़वाँ रख दी
तो ये समझो कि बुनियाद-ए-ख़राबात-ए-मुग़ाँ रख दी

कहूँ क्या पेश-ए-ज़ाहिद क्यूँ शराब-ए-अर्ग़वाँ रख दी
मिरी तौफ़ीक़ जो कुछ थी बराए मेहमाँ रख दी

यहाँ तक तो निभाया मैं ने तर्क-ए-मय-परस्ती को
कि पीने को उठा ली और लीं अंगड़ाइयाँ रख दी

जनाब-ए-शैख़ मय-ख़ाना में बैठे हैं बरहना-सर
अब उन से कौन-पूछे आप ने पगड़ी कहाँ रख दी

तुम्हें परवा न हो मुझ को तो जिंस-ए-दिल की परवा है
कहाँ ढूँढूँ कहाँ फेंकी कहाँ देखूँ कहाँ रख दी

लगा लेंगे उसे अहल-ए-वफ़ा बे-शुबह आँखों से
अगर पा-ए-अदू पर उस ने ख़ाक-ए-आस्ताँ रख दी

इधर पर नोच कर डाला क़फ़स में उफ़ रे बेदर्दी
उधर इक जलती चिंगारी मियान-ए-आशियाँ रख दी

ज़मीर उस का डुबो देगा उसे आब-ए-ख़जालत में
वफ़ादारी की तोहमत ग़ैर पर क्यूँ बद-गुमाँ रख दी

हवस मस्ती की ‘साइल’ को नहीं काफ़ी है थोड़ी सी
प्याले में अगर पस-ख़ुर्दा-ए-पीर-ए-मुग़ाँ रख दी

बसा-औक़ात आ जाते हैं दामन से गरेबाँ में 

.बसा-औक़ात आ जाते हैं दामन से गरेबाँ में
बहुत देखे हैं ऐसे जोश-ए-अश्क चश्म-ए-गिर्यां में

नहीं है ताब ज़ब्त-ए-ग़म किसी आशिक़ के इम्काँ में
दिल-ए-ख़ूँ-गश्ता या दामन में होगा या गरेबाँ में

मुबारक बादिया-गर्दो बहार आई बयाबाँ में
नुमूद-ए-रंग-ए-गुल है हर सर-ए-ख़ार-ए-मुग़ीलाँ में

ज़ियादा ख़ौफ़-ए-रूस्वाई नहीं है सोज़-ए-पिन्हाँ में
धुआँ होता है लेकिन कम चराग़-ए-ज़ेर-ए-दामाँ में

हमेशा पी के मय जाम ओ सुराही तोड़ देता हूँ
न मेरा दिल तरसता है न फ़र्क़ आता है ईमाँ में

मज़ा क्यूँ काविश-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर का आज कम कम है
नमक की कोई चुटकी रह गई होगी नमक-दाँ में

जनाब-ए-क़ैस ने दिल से भुलाया दोनों आलम को
जुनूँ के चार हर्फ़ों का सबक़ लेकर दबिस्ताँ में

बहार आई मिला ये हुक्म मुझ को और बुलबुल को
कि वो काटे क़फ़स में ख़ाक छानूँ मैं बयाबाँ में

तरन्नुम-रेज़ियाँ बज़्म-ए-सुख़न में सुन के ‘साइल’ की
गुमाँ होता है बुलबुल के चहकने का गुलिस्ताँ में

हमें कहती है दुनिया ज़ख़्म-ए-दिल ज़ख्म-ए-जिगर वाले

हमें कहती है दुनिया ज़ख़्म-ए-दिल ज़ख्म-ए-जिगर वाले
ज़रा तुम भी तो देखो हम को तुम भी हो नज़र वाले

नज़र आएँगे नक़्श-ए-पा जहाँ उस फ़ित्नागर वाले
चलेंगे सर के बल रस्ता वहाँ के रहगुज़र वाले

सितम-ईजादियों की शान में बट्टा न आ जाए
न करना भूल कर तुम जौर चर्ख़-ए-कीना-वर वाले

जफ़ा-ओ-जौर-ए-गुल-चीं से चमन मातम-कदा सा है
फड़कते हैं क़फ़स की तरह आज़ादी में पर वाले

अलिफ़ से ता-ब-या लिल्लाह अफ़्साना सुना दीजे
जनाब-ए-मूसा-ए-इमराँ वही हैरत-नगर वाले

हमें मालूम है हम मानते हैं हम ने सीखा है
दिल आज़ुर्दा हुआ करते हैं अज़ हद चश्म-ए-तर वाले

कटाने को ग़ला आठों पहर मौजूद रहते हैं
वो दिल वाले जिगर वाले सही हम भी हैं सर वाले

तमाशा देख कर दुनिया का ‘साइल’ को हुई हैरत
कि तकते रह गए बद-गौहरों का मुँह गुहर वाले

हक़ ओ नाहक़ जलाना हो किसी को तो जला देना 

हक़ ओ नाहक़ जलाना हो किसी को तो जला देना
कोई रोए तुम्हारे सामने तुम मुस्कुरा देना

तरद्दुद बर्क़-रेज़ों में तुम्हें करने की क्या हाजत
तुम्हें काफ़ी है हँसता देख लेना मुस्कुरा देना

दिलों पर बिजलियाँ गिरने की सूरतगर कोई पूछे
तो मैं कह दूँ तुम्हारा देख लेना मुस्कुरा देना

हुई बिजली से किस दिन नक़्ल अंदाज़-ए-सितमगारी
तुम्हारी तरह सीखा लाख उस ने मुस्कुरा देना

सितमगारी की तालीमें उन्हें दी हैं ये कह कह कर
कि रोता जिस किसी को देख लेना मुस्कुरा देना

तकल्लुफ़-बरतरफ़ क्यूँ फूल लेकर आओ तुर्बत पर
मगर जब फ़ातिहा को हाथ उठाना मुस्कुरा देना

न क्यूँ हम इंक़िलाब-ए-दहर को मानें अगर देखें
गुलों का नाला करना बुलबुलों का मुस्कुरा देना

न जाना ना-तवानी पर कि अब भी सई-ए-नाख़ुँ से
दिखा सकते हैं हम ज़ख़्म-ए-कुहन का मुस्कुरा देना

तुम्हारे नाम में क्या ज़ाफ़राँ की शाख़ है ‘साइल’
कि जो सुनता है इस को उस को सुन कर मुस्कुरा देना

होते ही जवाँ हो गए पाबंद-ए-हिजाब और 

होते ही जवाँ हो गए पाबंद-ए-हिजाब और
घूँघट का इज़ाफ़ा हुआ बाला-ए-नक़ाब और

जब मैं ने कहा कम करो आईन-ए-हिजाब और
फ़रमाया बढ़ा दूँगा अभी एक नक़ाब और

पीने की शराब और जवानी की शराब और
हुश्यार के ख़्वाब और हैं मदहोश के ख़्वाब और

गर्दन भी झुकी रहती है करते भी नहीं बात
दस्तूर-ए-हिजाब और हैं अंदाज़-ए-हिजाब और

पानी में शक्कर घोल के पीता तो हैं ऐ शैख़
ख़ातिर से मिला दे मिरी दो घूँट शराब और

साक़ी के क़दम ले के कहे जाता है ये शैख़
थोड़ी सी शराब और दे थोड़ी सी शराब और

‘साइल’ ने सवालर उस से किया जब भी ये देखा
मिलता नहीं गाली के सिवा कोई जवाब और

हज़ारों इश्क़-ए-जुनूँ-ख़ेज़ के बने क़िस्से 

हज़ारों इश्क़-ए-जुनूँ-ख़ेज़ के बने क़िस्से
वरक़ हुए जो परेशाँ मिरे फ़साने के

हैं ए‘तिबार से कितने गिरे हुए देखा
इसी ज़माने में क़िस्से इसी ज़माने के

क़रार-ए-जल्वा-नुमाई हुआ है फर्दा पर
ये तूल देखिए इक मुख़्तसर ज़माने के

न फूल मुर्ग़-ए-चमन अपनी ख़ुश-नवाई पर
जवाब हैं मिरे नाल तिरे तराने के

उसी की ख़ाक है माथे की ज़ेब बंदा-नवाज़
जबीं पे नक़्श पड़े हैं जिस आस्ताने के

ख़िज़ाँ का जो गुलशन से पड़ जाए पाला 

ख़िज़ाँ का जो गुलशन से पड़ जाए पाला
तो सेहन-ए-चमन में न गुल हो न लाला

लिया तेरे आशिक़ ने बरसों सँभाला
बहुत कर गया मरने वाला कसाला

पय-ए-फ़ातेहा हाथ उठावेगा कोई
सर-ए-तुर्बत-ए-बेकसाँ आने वाला

इसी गिर्या के तार से मेरी आँखें
बना देंगी नद्दी बहा देंगी नाला

बिठा कर तुम्हें शम्अ के पास देखा
तुम आँखों की पुतली वो घर का उजाला

ख़त-ए-शौक़ को पढ़ के क़ासिद से बोले
ये है कौन दीवाना ख़त लिखने वाला

दिया हुक्म साक़ी को पीर-ए-मुगाँ ने
पय-ए-मुहतसिब जाम-ओ-मीना उठा ला

ये सुनते ही मय-ख़्वार बोले ख़ुशी से
हमीं सा है ये नेक अल्लाह वाला

हक़ीक़त में ‘साइल’ ने ज़ौक़-ए-अदब से
जहाँ तक उछाला गया नाम उछाला

मिरे ग़ैरों से मुझ को रंज-ओ-ग़म यूँ भी है और यूँ भी

मिरे ग़ैरों से मुझ को रंज-ओ-ग़म यूँ भी है और यूँ भी
वफ़ा-दुश्मन जफ़ा-जू का सितम यूँ भी है और यूँ भी

कहीं वामिक़ कहीं मजनूँ रक़म यूँ भी है और यूँ भी
हमारे नाम पर चलता क़लम यूँ भी है और यूँ भी

शब-ए-वादा वो आ जाएँ न आएँ मुझ को बुलवा लें
इनायत यूँ भी है और यूँ भी करम यूँ भी है और यूँ भी

अदू लिक्खे मुझे नामा तुम्हारी मोहर उस का ख़त
जफ़ा यूँ भी है और यूँ भी सितम यूँ भी है और यूँ भी

न ख़ुद आएँ न बुलवाएँ शिकायत क्यूँ न लिख भेजूँ
इनायत की नज़र मुझ पर करम यूँ भी है और यूँ भी

ये मस्जिद है ये मय-ख़ाना तअज्जुब इस पर आता है
जनाब-ए-शैख़ का नक़्श-ए-क़दम यूँ भी है और यूँ भी

तुझे नव्वाब भी कहते हैं शाइर भी समझते हैं
ज़माने में तिरा ‘साइल’ भरम यूँ भी है और यूँ भी

मोहब्बत में जीना नई बात है 

मोहब्बत में जीना नई बात है
न मरना भी मर कर करामात है

मैं रूस्वा-ए-उल्फ़त वो मारूफ़.-ए-हुस्न
बहम शोहरतों में मसावात है

न शाहिद न मय है न बज़्म-ए-तरब
ये ख़मियाज़ा-ए-तर्क-ए-आदात है

शब ओ रोज़ फ़ुर्क़त हमारा हर एक
अजल का है दिन मौत की रात है

उड़ी है मय-ए-मुफ़्त ‘साएल’ मुदाम
किस साक़ी से गहरी मुलाक़ात है

सुना भी कभी माजरा दर्द-ओ-ग़म का किसी दिलजले की ज़बानी कहो तो 

सुना भी कभी माजरा दर्द-ओ-ग़म का किसी दिलजले की ज़बानी कहो तो
निकल आएँ आँसू कलेेजा पकड़ लो करूँ अर्ज़ अपनी कहानी कहो तो

तुम्हें रंग-ए-मय मर्ग़ूब क्या है गुलाबी हो या ज़ाफ़रानी कहो तो
बुलाए कोई साक़ी-ए-हूर-पैकर मुसफ़्फ़ा कशीदा पुरानी कहो तो

तमन्ना-ए-दीदार है हसरत-ए-दिल कि तुम जल्वा-फ़रमा हो मैं आँखें सेकूँ
न कह देना मूसा से जैसे कहा था मिरी अर्ज़ पर लन-तरानी कहो तो

वफ़ा-पेशा आशिक़ नहीं देखा तुम ने मुझे देख लो जाँच लो आज़मा लो
तुम्हारे इशारे पे क़ुर्बानी कर दूँ अभी माया-ए-ज़िंदगानी कहो तो

कहाँ मैं कहाँ दास्ताँ का तक़ाज़ा मिरे ज़ब्त-ए-दर्द-ए-निहाँ का है कसना
फिर इस पर ये ताकीद भी है बराबर न कहना पराई कहानी कहो तो

मिरे नामा-ए-शौक़ की सत्र में है जगह इक जो सादा वो मोहमल नहीं है
मैं हो जाऊँ ख़िदमत में हाज़िर अभी ख़ुद बताने को उन के मआनी कहो तो

उड़ा सकता नहीं कोई मिरे अंदाज़-ए-शेवन को

उड़ा सकता नहीं कोई मिरे अंदाज़-ए-शेवन को
ब-मुश्किल कुछ सिखाया है नवा-संजान-ए-गुलशन को

गरेबाँ चाक करने का सबब वहशी ने फ़रमाया
कि उस के तार ले कर मैं सियूंगा चाक-ए-दामन को

बहार आते ही बटती हैं ये चीज़ें कै़द-खानों में
सलासिल हाथ को पाँव को बेड़ी तौक़ गर्दन को

झड़ी ऐसी लगा दी है मिरे अश्कों की बारिश ने
दबा रक्खा है भादों को भुला रक्खा है सावन को

दिल-ए-मरहूम की मय्यत इजाज़त दो तो रख दें हम
तिरे तलवे-बराबर ही ज़मीं काफ़ी है मदफ़न को

इजाज़त दो तो सारी अंजुमन के दिल हिला दूँ मैं
समझ रक्खा है तुम ने हेच तासीरात-ए-शेवन को

सुलूक-ए-पीर-ए-मय-ख़ाना की ऐ साक़ी तलाफ़ी क्या
ब-जुज़ इस के दुआएँ दो उसे फैला के दामन को

वफ़ा का बंदा हूँ उल्फ़त का पासदार हूँ मैं

वफ़ा का बंदा हूँ उल्फ़त का पासदार हूँ मैं
हरीफ़-ए-क़ुमरी-ओ-परवाना-ए-हज़ार हूँ मैं

जुदा जुदा नज़र आती है जल्वा-गाह की तासीर
क़रार हो गया मूसा को बे-क़रार हूँ मैं

ख़ुमार जिस से न वाक़िफ़ हो वो सुरूर हैं आप
सुरूर जिस से न आगाह हो वो ख़ुमार हूँ मैं

समा गया है ये सौदा अजीब सर में मिरे
करम का अहल-ए-सितम से उम्मीद-वार हूँ

एवज़ दवा के दुआ दे गया तबीब मुझे
कहा जो मैं ने ग़म-ए-हिज्र से दो चार हूँ मैं

शबाब कर दिया मेरा तबाह उल्फ़त ने
ख़िज़ाँ के हाथ की बोई हुई बहार हूँ मैं

क़रार दाद-ए-गरेबाँ हुई ये दामन से
कि पुर्ज़े पुर्ज़े अगर हो तो तार तार हूँ मैं

मिरे मज़ार को समझा न जाए एक मज़ार
हज़ार हसरत ओ अरमाँ का ख़ुद मज़ार हूँ मैं

‘जहीर’ ओ ‘अरशद’ ओ ‘ग़ालिब’ का हूँ जिगर-गोशा
जनाब-ए-‘दाग़’ का तिल्मीज़ ओ यादगार हूँ मैं

अमीर करते हैं इज़्ज़त मिरी हूँ वो ‘साइल’
गुलों के पहलू में रहता हूँ ऐसा ख़ार हूँ मैं

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ज़ोम न कीजो शम्अ-रू बज़्म के सोज़-ओ-सज़ा पर

ज़ोम न कीजो शम्अ-रू बज़्म के सोज़-ओ-सज़ा पर
रखियो नज़र बाज-ए-नाज़-ख़ातिर-ए-पीर-ए-नाज़ पर

ज़ेब नहीं है शैख़ ये मय-कश-ए-पाक-बाज़ पर
तोहमतें सौ लगाएगा दाग़-ए-ज़बीं नियाज़ पर

कहता हूँ हर हसीं से मैं नियत-ए-इश्क़ है मिरी
आएगा मेरा दिल मगर शाहिद-ए-दिल-नवाज़ पऱ

फ़र्क़ हयात-ओ-मर्ग का मुर्ग़-ए-चमन के दिल से पूछ
देता है फ़ौक़ दाम को चंगुल-ए-शाह-बाज़ पर

ख़्वाब-ए-लहद है पुर-सुकूँ अहद-ए-हयात पुर-अलम
मौत न क्यूँ हो ताना-ज़न ज़िंदगी-ए-दराज़ पर

संग-ए-दर-ए-हबीब पर होता हूँ सज्दा-रेज़ मैं
ख़ल्क-ए-ख़ुदा है मो‘तरिज़ मुझ पे मिरी नमाज़ पर

मुनइम-ए-बे-बसर यूँही देखिए ता-कुजा रहे
महव-ए-नशात ओ ख़ुश-दिल नग़्मा-ए-तार-ए-साज़ पर

फ़ख्र-ए-अमल न चाहिए सई-ए-अमल ज़रूर है
आँख रहे लगी हुई रहमत-ए-कारसाज़ पर

दर पें बुतों के दी सदा ‘साएल’-ए-बे-नवा ने ये
फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा रहे मुदाम हाल-ए-गदा-नवाज़ पर

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