सादिक़ रिज़वी की रचनाएँ

दुनिया से कुफ्रे – आम मिटाया हुज़ूर ने

दुनिया से कुफ्रे – आम मिटाया हुज़ूर ने
इन्सानियत का दर्स सिखाया हुज़ूर ने

इन्सानी ज़िन्दगी पे था ज़ुल्मत का इक हिसार
रौशन ज़मीर कर के दिखाया हुज़ूर ने

हैवानियत का दौर था रिश्ते अहम न थे
बेटी की क़द्र करना सिखाया हुज़ूर ने

बिठला के दिल में जहल के इक खौफे-आक़ेबत
किरदारे-बद को रब से डराया हुज़ूर ने

दस्ते-नबी पे पढ़ने लगे कल्मा कंकरी
मोअजिज़ – नुमा भी बन के बताया हुज़ूर ने

पढना है पंजगाना नमाज़ें तमाम उम्र
फरमाने-हक़ हर इक को सुनाया हुज़ूर ने

क़िस्मत में गर लिखा है तो हम देंगे हाज़री
‘सादिक़’ अगर मदीना बुलाया हुज़ूर ने

इज्ज़त बचाए रखता है असरार की तरह

इज्ज़त बचाए रखता है असरार की तरह
फैलाता हाथ जो नहीं नादार की तरह

सब रिश्ते नाते ताक़ पर रखकर वो बज़्म में
अपनों से पेश आते हैं अगयार की तरह

कब टूट जाए ये तो नज़ाकत से है भरी
होती है सांस की कड़ी इक तार की तरह

दौरे खिज़ां में ज़ेरे-शजर सजर पत्ते ज़र्द रू
बिखरे पड़े है चारसू बीमार की तरह

अहले खिरद को आता है पढ़ना किताबे रुख
करना न ज़िंदगी बुरे किरदार की तरह

जिनकी पहुँच से दूर हक़ीक़त के ख्वाब हैं
जीवन में रंग भरते हैं फनकार की तरह

क्यों कर न चूम लेने को ‘सादिक़’ का दिल करे
गुलशन के गुल का रंग है रुखसार की तरह

बसाए दिल में हज़ारों हूँ आरज़ू मैं भी

बसाए दिल में हज़ारों हूँ आरज़ू मैं भी
तलाशे मुआश में फिरता हूँ कु-ब-कू मैं भी

तमाम शोला सिफत गुस्सा सर्द हो जाए
ज़रा सी कर लूँ अगर उनसे गुफ्तगू मैं भी

भलाई के लिए देता हूँ मशविरा उनको
बताएं आप ही क्या उनका हूँ अदू मैं भी

क्यों इल्तिफात का मरकज़ न उनकी बन पाया
विसाल के लिए बैठा था रू-ब-रू मैं भी

तुम्हीं अकेले नहीं हो सुकून के तालिब
तुम्हारे साथ रहा महवे जुस्तजू मैं भी

भटक न जाऊं कहीं तीरह -शब् से घबराकर
जलाए रखता हूँ एक शाम-ए-आरज़ू मैं भी

ज़माना कहता है ‘सादिक़’ को बेसुरा लेकिन
यक़ीन मानिए तुम सा हूँ खुश-गुलू मैं भी

ख़ुदकुशी कर के अमानतदार नादानी न कर

ख़ुदकुशी कर के अमानतदार नादानी न कर
एक़तेज़ाए ज़िंदगी से फेल-ए-शैतानी न कर

है क़दम-बोसी को तेरे सामने मंजिल खड़ी
मुख़्तसर राहे-सफ़र को इतना तूलानी न कर

फ़ूंक कर क़दमों को रक्खा करते हैं अहले ख़िरद
ज़िंदगी के आख़िरी लम्हों में मनमानी न कर

जिसको सुन के जज़्बा-ए नफ़रत का तूफां हो खड़ा
अपनी तक़रीरों में पैदा ऐसी तुगयानी न कर

फक्रो-फाक़े में निहां है ज़िंदगी की हर खुशी
बात कहता हूँ पते की इस पे हैरानी न कर

जिस्म की रह से गुज़र कर नफ्स मत कर मुतमइन
ख्वाहिशों के जाल में फंसने की नादानी न कर

खैरमक़दम मेहमाँ का झुक के कर ‘सादिक़’ मगर
मासवा खालिक के इतनी खंदह पेशानी न कर

क्योंकर किनाराकश है सफाई न दे मुझे

क्योंकर किनाराकश है सफाई न दे मुझे
पीरी में बेटा शाक-ए-जुदाई न दे मुझे

कुछ ऐसा फंस गया हूँ मोहब्बत के जाल में
राहे फरारे इश्क़ सुझाई न दे मुझे

मुंसिफ तो क्या मैं शह्र का क़ाज़ी तलक नहीं
मज़लूम दर पे आ के दुहाई न दे मुझे

मालिक अभी तो कारे मोहब्बत है नातमाम
क़ैद-ए-हयात से तू रिहाई न दे मुझे

कर दूं हवाले मौत को इज्ज़त से ज़िंदगी
पाकीज़ा ज़ह्न-ओ-दिल में बुराई न दे मुझे

पूछो न मेरे आलमे वहशत हाल-ए-ज़ार
अपने ही दिल की बात सुनाई न दे मुझे

तुमको पसंद गर नहीं ‘सादिक़’ की शायरी
दाद-ए-सुखन कभी मेरे भाई न दे मुझे

जो जवानी कमाल लगती है

जो जवानी कमाल लगती है
ढल के जाँ का वबाल लगती है

मौत दूं या जिला दूं मैं इसको
ज़िंदगी एक सवाल लगती है

बन गयी है ख़याल का पैकर
आशिक़ी बेमिसाल लगती है

वक़्त पर काम आ गयी यारी
दोस्ती बाकमाल लगती है

एक मुफलिस ज़दा को ख़ामोशी
फक्रो-फाक़े की ढाल लगती है

हुस्ने जाँना की हर रविश अब तो
फंसने का एक जाल लगती है

बेहयाई निगाहे आक़िल में
दौर-ए-नौ का ज़वाल लगती है

दिल में बुगज़ो-हसद हो रुख पे खुशी
फितरते बद्खिसाल लगती है

दीन-ए-‘सादिक़’ में फितना फ़ैलाना
मुल्क दुश्मन की चाल लगती है

एक बीज इश्क़ ज़ात का जब बो गई ग़ज़ल

एक बीज इश्क़ ज़ात का जब बो गई ग़ज़ल
दिल ने कहा उठा ले क़लम हो गई ग़ज़ल

पाया सुरूर इश्क़ ने फिर वस्ले-यार में
दाग़े-जिगर के ज़ख्म को जब धो गई ग़ज़ल

बेचैन ज़ेहन-ओ-दिल को करूँ कैसे मुतमइन
वैसे हर इक के दिल में उतर तो गई ग़ज़ल

कमजोर इस क़दर तो न थी मेरी शायरी
क्यों मेरे हाले-ज़ार पे फिर रो गई ग़ज़ल

तनहा नहीं हूँ ख़ुशबुए जाने बहार है
मदफन में आ के साथ मेरे सो गई ग़ज़ल

मिलते ही नज़रें ज़ेहन पे वहशत हुई सवार
इस बेख़ुदी में जाने कहाँ खो गई ग़ज़ल

मजमें में लूट मच गई ‘सादिक़’ कलाम से
उस्ताद हँस के बोले मियाँ लो गई ग़ज़ल

सदियों से हुई रहज़नी तारीकिये शब् में

सदियों से हुई रहज़नी तारीकिये शब् में
कुछ फर्क़ नहीं लगता हमें तब में और अब में

हक़गो को खुदादाद मिला करती है क़ुव्वत
ईसार का जज़्बा नहीं होता कभी सब में

पत्थर के सनम देखा नहीं तुझको पिघलते
मोम आसा सिफत पाई है मख्लूक़ ने रब में

उल्फत की नहीं पा सके मंज़िल वो कभी भी
इज़हारे-मोहब्बत जो अदा करते हैं लब में

क्यों कर वो गुनाहों के अँधेरे में घिरा है
मिलती तो नहीं खोट कहीं उसके नसब में

होते जो तबीब अच्छे तो बन जाते मसीहा
यूं मक्खियाँ मारा नहीं करते वो मतब में

माँ-बाप मेरा नाम न क्यों कर रखें ‘सादिक़’
बाईस को पैदा जो हुआ माहे-रजब में

दिले-बेक़रार कि बात कर

दिले-बेक़रार कि बात कर
शबे-इन्तेज़ार कि बात कर

किसी छोटी बात पे मत उलझ
ज़रा इफ्तिख़ार कि बात कर

तुझे नर्म लहजे का इल्म है
कभी संग-ओ-ख़ार कि बात कर

नहीं फूल जिसके नसीब में
मेरे उस मज़ार कि बात कर

जो गिराती दिल पे हैं बिजलियाँ
उसी बर्क़-ओ-बार कि बात कर

नहीं बज़्म में कोई बेवफा
तू वफ़ा शेआर कि बात कर

अरे ‘सादिक़’ आएँगे वो ज़रूर
न अब इन्तेशार कि बात कर

कुछ ग़म भी छुपा रक्खे हैं इफराते-खुशी ने

कुछ ग़म भी छुपा रक्खे हैं इफराते-खुशी ने
एहसास दिलाया हमें पलकों की नमी ने

ललचाई तबीयत को संभाला नहीं जी ने
उस शोख़ से नज़रें जो मिलीं हम लगे पीने

अल्लाह के एहसान को मैं भूल गया था
एहसास दिलाया मुझे दौलत की कमी ने

पीते हैं ज़मींदार किसानो का लहू यूं
दहकां की कमर तोड़ी है खाते ने बही ने

तौबा के लिए रिंद तो तैयार थे लेकिन
देखा कि यहाँ शैख़ भी आने लगे पीने

मय पीनी थी जन्नत की मगर पी ली जहाँ में
ज़ाहिद को जो पैमाना दिया रामकली ने

आईना दिखाते रहे दिलसोज़ नज़ारे
‘सादिक़’ मेरे जज़्बात को समझा न किसी ने

सितम-ओ-जौर की रूदाद सुनाते चलिए

सितम-ओ-जौर की रूदाद सुनाते चलिए
अपने कान्धों पे सलीब अपनी उठाते चलिए

दूसरों के लिए आसाँ हो गुज़र गाहे-हयात
राह पर नक़शे-क़दम ऐसे बनाते चलिए

उलझने सारे ज़माने की जो हल करना हों
साया-ए-ज़ुल्फ़ से दामन को बचाते चलिए

ताकि दीवाना बनाए न यह दुनिया की नज़र
दिल के अरमानों को दिल ही में सुलाते चलिए

चांदनी रात है बहती हुई चलती है हवा
दिल के सोये हुए जज़्बात जगाते चलिए

ज़िंदगी में जो बिछाते रहे कांटे सरे राह
उनकी भी क़ब्र को फ़ूलों से सजाते चलिए

बज़्म-ए-जानाँ कभी बरहम न थी इतनी ‘सादिक़’
आज के रंग पे दो अश्क बहाते चलिए

ऐ फरोगे हुस्न तेरी दिलकशी ज़िन्दा रहे

ऐ फरोगे हुस्न तेरी दिलकशी ज़िन्दा रहे
ये अक़ीदत की फिजा ये बन्दगी ज़िन्दा रहे

जब उजालों की चमक में तीरगी ढलने लगी
चाँद चमका ताकि उस की चांदनी ज़िन्दा रहे

बेवफा वह क्या हुए चाहत न जीने की रही
फिर भी जीता इसलिए हूँ ज़िंदगी ज़िन्दा रहे

उम्र-ए-रफ्ता की हैं ज़ंजीरें निगाहों में पड़ी
कश्मकश में दिल है क्योंकर रौशनी ज़िन्दा रहे

साज़ के हैं तार टूटे राग गाऊँ किस तरह
गा रहा हूँ इस लिए कि रागनी ज़िन्दा रहे

दे के धोका दोस्तों ने कर दिया है दर-बदर
शिकवा कर सकता नहीं कि दोस्ती ज़िन्दा रहे

यूं तो दुनिया भूल जाएगी तुझे मरने के बाद
शाए कर दीवान जिससे शायरी ज़िन्दा रहे

सच्चे आशिक दिल्लगी माशूक़ से करते नहीं
दुश्मने दिल ही कहेंगे दिल्लगी ज़िन्दा रहे

बाहया के रुख़ पे नज़रे-बद कभी टिकती नहीं
है दुआ ‘सादिक़’ की ख़ालिक़ सादगी ज़िन्दा रहे

परवरदिगार जिसको भी हुस्नो-जमाल दे

परवरदिगार जिसको भी हुस्नो-जमाल दे
नज़रों में उस के शर्मो-हया का कमाल दे

ज़ालिम के दिल में रह्म की आदत को ढाल दे
यारब जहाँ में ज़ुल्म-ओ-सितम को ज़वाल दे

इक-बदज़बानी फितने की जड़ है जहान में
शीरीं ज़बान आती मुसीबत को टाल दे

मैनोश शैख़ जी हुए दौरे जदीद में
मालिक उसे तमीज़े हरामो-हलाल दे

औलाद राहे रास्त पे आएगी ख़ुद बख़ुद
शादी की उसके पैर में ज़ंजीर डाल दे

खाई है मात तूने ही उल्फत के खेल में
‘सादिक़’ ये बात जह्न से अपनी निकाल दे

माज़ी का थे चराग जलाए तमाम रात

माज़ी का थे चराग जलाए तमाम रात
यादों ने दिन के ख़्वाब दिखाए तमाम रात

तसकीने-दिल के वास्ते अक्सर अंधेरों में
ढूँढा किया हूँ अपने ही साए तमाम रात

दो-चार लम्हे भी न रहे लज्ज़ते-गुनाह
पादाश का ख़याल रुलाये तमाम रात

बस सोचते ही सोचते नींद अपनी उड़ गई
अपना वजूद ढूंढ न पाए तमाम रात

हो बेहिजाब चाँद सितारों के दरमियाँ
सूरज हया से मुहँ को छुपाये तमाम रात

सो जाएँ थोड़ी देर जो आराम के लिए
रफ्तारे-वक़्त हमको चलाए तमाम रात

छूकर किसी के शोला बदन को ख़याल में
ख्वाबों में अपने हाथ जलाए तमाम रात

ता सुब्ह कश्ती कैसे संभाली है क्या कहें
गिरदाब में थे मौत के साए तमाम रात

‘सादिक़’ जिगर में होती रही मीठी सी कसक
रह रह के हमको याद वह आये तमाम रात

इश्क़ नहीं मेरा धन तक

इश्क़ नहीं मेरा धन तक
उन पे वारी तन मन तक

जो दहलीज़ न लांघ सके
आएगा क्या आँगन तक

खैर मनाएं इज़्ज़त की
हाथ है पहुंचा कंगन तक

ब्याह दी बेटी दे के दहेज़
क़र्ज़ में डूबी गर्दन तक

आती है जब उनकी याद
रुक जाती है धड़कन तक

हम पे करे वह हद जारी
पाक है जिसका दामन तक

जान दी लेकिन आन न दी
रुसवा हो गया रहजन तक

देख के हैबत चेहरे पर
हंसने लगा है दरपन तक

‘सादिक़’ तन्हाई का ज़ह्र
फ़ैल गया है तन मन तक

चाँद मेरा सोया था ओढ़े ऐसे चादर मलमल की

चाँद मेरा सोया था ओढ़े ऐसे चादर मलमल की
रुख़ पर बिखरी ज़ुल्फें जैसे छाई घटा हो बादल की

मारो काटो आग लगा दो शोर था बरपा गलियों में
अब तक कोई जान न पाया शह्र में वजहें हलचल की

ऐशो इशरत की धारा में क्योंकर आज न बह जाएँ
किसने देखा कल है यारो किसको ख़बर है इक पल की

पाकर दौलत भूल गया भगवान् को उसके भक्तों को
क्योंकर आखिर वक़्त में समझा अहमीयत गंगाजल की

जो मदहोश नशे के आलम में रहता है शामो-सहर
क़ुलक़ुल की आवाज़ भली लगती है उसको बोतल की

सड़कें नदियाँ लगने लगी थीं वो थी क़यामत की बारिश
शह्र , मोहल्ले और घरों की हालत हो गयी जल थल की

इक साए का साथ न हो तो दम घुट जाए वहशत से
जान की दरपै सांय सांय आवाज़ें हैं जंगल की

बचपन की यादों को क्योंकर मैं भूलूंगा पीरी में
अब भी ऐसा लगता है कि बातें हों जैसे कल की

वह ज़हनी मफ़्लूज हैं ‘सादिक़’ बेबहरा इदराक से हैं
जो शायर की फ़िक्र को देते आये सनद हैं पागल की

किसने पाकीज़ा क़दम रखा है मैखाने में

किसने पाकीज़ा क़दम रखा है मैखाने में
क़ुद्स का रंग झलकने लगा पैमाने में

गुनगुना कर ये कहा शमआ से परवाने ने
प्यार की प्यास बुझा करती है जल जाने में

जब ग़लत चलता है काग़ज़ पे मुसन्निफ़ का क़लम
हँसता किरदार भी रो देता है अफ़साने में

मौत भी लगने लगे शहद से ज़्यादा शीरीं
नेक आमाल हैं काफी ये मज़ा पाने में

जिस्म की ख़ुशबू तेरी , साथ मेरे दफ़्न हुई
राहे-बरज़ख में मदद देगी ये बहलाने में

अपनी पलकों में हर इक ख़्वाब छुपा कर रखना
होगा तूफ़ान खड़ा राज़ के खुल जाने में

बे-कमां तीरे नज़र करते हैं घायल दिल को
उस में लज्ज़त है अजब यार को तड़पाने में

है शहंशाही जुनूं इश्क़ का ये ताजमहल
हैसियत इतनी कहाँ आज के दीवाने में

मजमए बज़्मे-सुख़न क्यों न हो नालां ‘सादिक़’
जल्द आ जाते हो तुम लोगों के बहकाने में

अब तेरी हर्फे शिकायत से परेशाँ हूँ मैं

अब तेरी हर्फे शिकायत से परेशाँ हूँ मैं
ज़िन्दगी चैन से कटने दे कि इन्सां हूँ मैं

पैकरे ख़ाक से कब तारे नफ़स कट जाए
चन्द साइत ही तो दुनिया तेरा मेहमाँ हूँ मैं

बेईमानी का कहीं शाएबा ढूंढें न मिला
नाज़ है ख़ुद पे कि इक साहिबे ईमां हूँ मैं

आसमाँ हो के भी हूँ दर पे तेरे सर-ब-सुजूद
बेनियाज़ी पे तेरी आज भी हैराँ हूँ मैं

वक़्त दरकार नहीं सोच सकूं मुस्तक़बिल
हाल में माज़ी की यादों से परेशाँ हूँ मैं

नाम नेकी है मेरा थाम लो बाहें मेरी
दूर क्यों भागते हो क्या कोई शैताँ हूँ मैं

सारे मक़तूल के माथे पे लिखा होता है
एक मज़लूम हूँ, मासूम हूँ, नादाँ हूँ मैं

दिल में तूफाने गमे इश्क़ दबा रक्खा है
चेहरा झूटा है अयाँ करता है खन्दां हूँ मैं

बाल ‘सादिक़’ के पकें धूप में या छाओं में
शेरगोई के लिए सुब्हे-बहाराँ हूँ मैं

जाने वफ़ा के सोग में खूँ से भरी थी शाम एक

जाने वफ़ा के सोग में खूँ से भरी थी शाम एक
जिसको शफक का दे दिया है अहले वफ़ा ने नाम एक

इश्क़ भी नातमाम है हुस्न भी नातमाम है
शौके जुनूं की पुख्तगी ठहरी खयाले खाम एक

पासे वफ़ा तुझे भी है मैं भी वफ़ा शेआर हूँ
दोनों की फिक्र एक है दोनों का है कलाम एक

रूह का ज़ख्म दिन ढले ऐसा न हो कि खिल उठे
कैसे कहूं कि फूल की ज़िद में है आई शाम एक

बंदए खास-ओ-आम को हरगिज़ न हम शरफ कहें
करता है इक जलील तो करता है एहतराम एक

फर्क़ ज़रूर कीजिये बंदए खास-ओ-आम में
उस को न पाक जानिये पी ले जो झूटा जाम एक

हक़ की नज़र में ख़ास है दोनों जहाँ में वो बशर
जिसने दिया है दार से सच्चा हमें पयाम एक

ख़त्म पे आ गयीं हैं अब तीरह शबी की वहशतें
सब्र तो कर तू ऐ सहर आने को है पयाम एक

रिज़्क के वास्ते दुआ ‘सादिक़’ ने की बहुत मगर
होती भी पूरी किस तरह करता नहीं वह काम एक

उसने लगाई ऐसे मेरे दिल पे गहरी चोट

उस ने लगाई ऐसे मेरे दिल पे गहरी चोट
ता उम्र अच्छी हो न सकी बेवफा के चोट

वादों के लफ्ज़ दिल की टहोकों की ज़द में थे
रह रह के जहने दिल को जो पहुंचा रही थी चोट

होकर असीर इश्क़ में ली लज्ज़ते शबाब
आज़ाद कर के उस ने दिया बेकली की चोट

दुश्मन को भी ख़ुदा न दिखाए कभी वह दौर
जिस तरह राहे इश्क़ में आशिक़ ने खाई चोट

अहदे वफ़ा की तुमने वह क़समें भी तोड़ दीं
इक़रार पर जो रहते तो दिल पर न पड़ती चोट

आँसू भी ख़ुश्क हो गए वीरान आँख के
उस बेवफा की याद को दफना के भर दी चोट

‘सादिक़’ था कामयाब मोहब्बत की राह में
दिल पर लगी तो अहले जहाँ ने न देखी चोट

यही है आफियते रोज़गार की सूरत

यही है आफियते रोज़गार की सूरत
कि पैदा हो न कोइ खल्फेशार की सूरत

ज़माने वालों ने लूटा है हाथो हाथ मुझे
खिजाँ से पहले मिटा दी बहार की सूरत

नक़ाब उस ने उठाया न आँखें चार हुईं
मगर बसी है निगाहों में यार की सूरत

वह हुस्न कितना है पाकीज़ा जो गुनाह लगे
ज़रा भी सोचें जो बोसो कनार की सूरत

लहू तो दिल का बहुत हो के बह गया पानी
मगर न अश्क गिरे आबशार की सूरत

वह इश्क़ इश्क़ नहीं है हवस का परदा है
अगर न उसमें हो कोइ वेक़ार की सूरत

हर एक चेहरे पे ‘सादिक़’ है दूसरा चेहरा
ग़ुरूर को है पसंद इन्केसार की सूरत

पाई है दिल ने खुशी बज़्मे-वफा में आज शाम

पाई है दिल ने खुशी बज़्मे-वफा में आज शाम
क्यों न फिर छलकाएं हम मदहोश होकर आज जाम

लग चुकी है चोट दिल पर खाके धोका प्यार में
भूली बिसरी बात का इस बज़्म में क्या आज काम

कोई है ग़मगीं जहां में और कोई मसरूर है
जिसकी क़िस्मत में खुशी है शाम उसके आज नाम

आज के रावण से सीता को बचाना है कठिन
हो गया है किस क़दर बेबस हमारा आज राम

शह्र में दो गज़ ज़मीं की जा नहीं है इसलिए
उठ रहे हैं सूए-सहरा जल्दी जल्दी आज गाम

शह्र की मानिंद सहरा की ज़मीं भी भर न जाए
कब्र की जा के लिए चल के भर आयें आज दाम

रंग चेहरे का तेरे ‘सादिक़’ उड़ा है किसलिए
क्या चुरा ली आस्मां की ज़र्द रंगत आज शाम

नर्स और मैं

तड़प तड़प के गुजारीं शबें न नींद आई
अजीब कर्ब के आलम में गुज़री तन्हाई

शिकम के दर्द ने साँसों की डोर तक तोड़ी
यहाँ तलक के सहर ने भी ले ली अंगड़ाई

परेशां ‘जेनिफर’, दिल से खयाल रखती है
ये नर्स सारे मरीजों की थी भी शैदाई

मरीज़ दर्द की शिद्दत चीखता है जब
तो एक माँ की तरह इनके दिल पे चोट आई

है पेशा नर्स का सच्ची हलाल की रोज़ी
मगर ज़माने ने बख्शी बस इनको रुसवाई

जो इनको मिलती है उजरत उसी में यह खुश हैं
न इनके दिल में कभी हिर्स ने जगह पाई

हैं सारी नर्सों की एक हेड नर्स वर्षा जी
शेफा भी इनकी ही शफ़क़त ने जल्द दिलवाई

नज़र की झील में एक फ़िक्र हो बसी जैसे
बहुत खमोश तबीयत ‘मिनी’ ने है पाई

‘सुनी’ को देता हूँ आवाज़ अनसुनी कहकर
हुई है हंस के मुखातिब हमेशा मुस्काई

‘जिशा’ ने मुझसे बताया की आप लक्की हैं
लहू जो थूके नहीं बचता वोह मेरे भाई

‘सुनी’ हो ‘जूली’ हो ‘जेसी’ हो या ‘विजी’ सिस्टर
इन्हीं के प्यार से ‘सादिक़’ ने ज़िन्दगी पाई
(मार्च २००२ में मुंबई के नानावती हस्पताल के हार्ट इंस्टिट्यूट में इलाज के दौरान कही गयी नज़्म)

 

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