साहिल अहमद की रचनाएँ

आँख से आँसू टपका होगा

आँख से आँसू टपका होगा
सुब्ह का तारा टूटा होगा

फैल गई है नूर की चादर
रूख़ से आँचल सरका होगा

फैल गए हैं रात के साए
आँख से काजल ढलका होगा

बिखरी पत्ती देख के गुल की
कलियों ने क्या क्या सोचा होगा

हम को भी तुम याद करोगे
कोई तो आख़िर मौक़ा होगा

देख मुसाफ़िर भूत नहीं है
राह का पत्ता खड़का होगा

आरिज़-ए-गुल पे देख के शबनम
कलियों ने मुँह धोया होगा

चुप चुप रहना ठीक नहीं है
बात बढ़ेगी चर्चा होगा

घूम रहे हैं शहरों शहरों
कोई तो आख़िर तुम सा होगा

आज कुआँ भी चीख़ उठा है
किसी ने पत्थर मारा होगा

फैल गई है प्यार की ख़ुशबू
कोई पतिंगा जलता होगा

मुझ से नाता तोड़ के साहिल
वो भी अब पछताता होगा

उस की आँखों में थी गहराई बहुत

उस की आँखों में थी गहराई बहुत
क्यूँ सताती है ये तन्हाई बहुत

हिज्र की सौग़ात क्या लाई बहुत
बे-तहाशा याद भी आई बहुत

पेच-ओ-ख़म जुल्फों का सारा खुल गया
रात भर आँखों में लहराई बहुत

क्यूँ चमक उठती है बिजली बार बार
ऐ सितमगर ले ने अंगड़ाई बहुत

घर से ‘साहिल’ आ के लौटी धूप क्या
हो गई मेरी तो रूस्वाई बहुत

धूप थी साया उठा कर रख दिया

धूप थी साया उठा कर रख दिया
ये सजा तारों का महज़र रख दिया

कल तलक सहरा बसा था आँख में
अब मगर किस ने समुंदर रख दिया

सुर्ख़-रू होती है कैसी ज़िंदगी
दोस्तों ने ला के पत्थर रख दिया

मुंदमिल ज़ख़्मों के टाँके खुल गए
बे-सबब तुम ने रूला के रख दिया

साबित-ओ-सालिम था दामन कल तलक
तुम ने आख़िर क्यूँ जला कर रख दिया

मिट गई तिश्ना-लबी आख़िर मिरी
जब गले पर उस ने ख़ंजर रख दिया

रो पड़ी आँखें बहुत ‘साहिल’ मिरी
जब किसी ने हाथ सर पर रख दिया

मैं लबादा ओढ़ कर जाने लगा

मैं लबादा ओढ़ कर जाने लगा
पत्थरों की चोट फिर खाने लगा

मैं चला था पेड़ ने रोका मुझे
जब बरसती धूप में जाने लगा

दश्त सारा सो रहा था उठ गया
उड़ के ताइर जब कहीं जाने लगा

पेड़ की शाखें वहीं रोने लगीं
अब्र का साया जहाँ छाने लगा

पत्थरों ने गीत गाया जिन दिनों
उन दिनों से आसमाँ रोने लगा

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