सुधा उपाध्याय की रचनाएँ

मैं हूं, मैं हूं, मैं हूं

चौराहों से एक तरफ निकलती
संकरी गली में
स्थापित कर दी तुमने मेरी प्रतिमा
लोग भारी भारी होकर आते हैं मेरे पास
मुझे छू-छूकर दिलाते हैं विश्वास
कि मैं हूं
मैं हूं
मैं हूं
बस कभी हल्की नहीं होने पाती मैं
ताकती रहती हूं
चौराहे पर पसरी भीड़ को
उपेक्षित गली को
और सबसे ज्यादा
अपने ईर्द गिर्द लगी
लोहे की जालियों को
जहां अब भी ढेर सारा चढ़ावा रखा है

औरत

औरत
तूने कभी सोचा है
जिस परिधि ने तुझको घेर रखा है
उसकी केंद्र बिंदु तो तू ही है
तू कहे अनकहे का हिसाब मत रख
किए न किए कि शिकायत भी मत कर
तू धरा है धारण कर
दरक मत
तू परिधि से नहीं
परिधि तुझसे है

क्यों करती हो वाद-विवाद

क्यों करती हो वाद-विवाद
बैठती हो स्त्री विमर्श लेकर
जबकि लुभाते हैं तुम्हें
पुरुषतंत्र के सारे सौंदर्य उपमान
सौंदर्य प्रसाधन, सौंदर्य सूचक संबोधन
जबकि वे क्षीण करते हैं
तुम्हारे स्त्रीत्व को
हत्यारे हैं भीतरी सुंदरता के
घातक हैं प्रतिशोध के लिए।
फिर क्यों करती हो वाद-विवाद।

बोनजई

तुमने आँगन से खोदकर
मुझे लगा दिया सुंदर गमले में
फिर सजा लिया घर के ड्राइंग रूम में
हर आने जाने वाला बड़ी हसरत से देखता है
और धीरे-धीरे मैं बोनज़ई में तब्दील हो गई
मौसम ने करवट ली
मुझमें लगे फल फूल ने तुम्हें फिर डराया
अबकी तुमने उखाड़ फेंका घूरे पर
आओ देखकर जाओ
यहां मेरी जड़ें और फैल गईं हैं।

विशिष्टों का दु:ख

खुश्क हंसी लीपे पोते
अपनी-अपनी विशिष्टताओं में जीते
लोगों के कहकहे भी होते हैं विशिष्ट
कृत्रिमता की खोल में
जबड़ों और माथे पर कसमसाता तनाव
उन्हें करता है अन्य से दूर
कभी नहीं पता चल पाता
मिल जुलकर अचार मुरब्बों के खाने का स्वाद
कोई नहीं करता उन्हें नम आंखों से विदा
या कलेजे से सटाकर गरम आत्मीयता
विशेष को कभी नहीं मिलता
शेष होने का सुख

भरोसा… उधार

उसने मांगा मुझसे उधार….भरोसा
लगा, लौटाएगा या नहीं
अपने सम्बन्धियों से मैंने मांगा…विश्वास
बदले में मिलता रहा बहाना
अब कुछ-कुछ समझने लगी हूं
किससे कितना और
क्या-क्या है छुपाना।

खानाबदोश औरतें

सावधान…
इक्कीसवीं सदी की खानाबदोश औरतें
तलाश रहीं हैं घर
सुना है वो अब किसी की नहीं सुनतीं
चीख चीख कर दर्ज करा रही हैं सारे प्रतिरोध
जिनका पहला प्रेम ही बना आखिरी दुःख
उन्नींदी अलमस्ती और
बहुत सारी नींद की गोलियों के बीच
तलाश विहीन वे साथी जो दोस्त बन सकें
आज नहीं करतीं वे घर के स्वामी का इंतज़ार
सहना चुपचाप रहना कल की बात होगी
जाग गयी हैं खानाबदोश औरतें
अब वे किस्मत को दोष नहीं देतीं
बेटियां जनमते जनमते कठुवा गयी हैं

चिल्लर

 समेट रही हूं
लंबे अरसे से
उन बड़ी-बड़ी बातों को
जिन्हें मेरे आत्मीयजनों
ठुकरा दिया छोटा कहकर।
डाल रही हूं गुल्लक में
इसी उम्मीद से
क्या पता एक दिन
यही छोटी-छोटी बातें
बड़ा साथ दे जाए
गाहे बगाहे चोरी चुपके
उन्हें खनखनाकर तसल्ली कर लेती हूं कि
जब कोई नहीं होगा आसपास
तब यही चिल्लर काम आएंगे।

आभार

उन सबका आभार
जिनके नागपाश में बंधते ही
यातना ने मुझे रचनात्मक बनाया।
आभार उनका भी
जिनकी कुटिल चालें
चक्रव्यूह ने मुझे जमाने का चलन सीखाया।
उनका भी ह्दय से आभार
जिनके घात प्रतिघात
छल छद्म के संसार में
मैं घंटे की तरह बजती रही।
मेरे आत्मीय शत्रु
तुमने तो वह सबकुछ दिया
जो मेरे अपने भी न दे सके।
तुम्हारे असहयोग ने
धीमे-धीमे ही सही
मेरे भीतर के कायर को मार दिया।.

बेटियां-1

बेटियां पतंग सी कई रूप रंग धर लेती हैं…
बेटियां कई रिश्तों को एक साथ जी लेती हैं
कहीं बंधती हैं तो कहीं से छूटने लगती हैं
कट कट कर गिरती हैं दूसरों के आँगन में
लोग दौड़ते हैं हसरत से लूटने पतंग
जितनी डोर खींचे उतनी पींग भर लेती हैं बेटियां

बेटियां-2

बेटियां
होती हैं आँख की रौशनी
दाल में हल्दी
सब्जी में नमक
माँ के प्रसव की पनियल दमक
पिता की आँख का मोती
चुन्धियाने लगती हैं
अडोस पड़ोस की आँखें
घर छोड़ कर जातीं हैं जब
पिता को दे जाती हैं मोतियाबिंद
माँ को रतौंधी

 

Share