हनीफ़ राही की रचनाएँ

बेवफ़ा ऐसे तो हरगिज़ न थे पहले हम लोग

बेवफ़ा ऐसे तो हरगिज़ न थे पहले हम लोग
एक ही शह्र में रहकर नहीं मिलते हम लोग

जिस तरह जीना था ऐसे ही जो जीते हम लोग
जिस तरह मरते हैं ऐसे नहीं मरते हम लोग

ख़िदमते ख़ल्क़ में जिस शख्स की गुज़री है हयात
ऐसे इंसा की अयादत को न पहुँचे हम लोग

अम्न का काफला करता रहा मिन्नत फिर भी
चंद लम्हों को भी ख़मोश न बैठे हम लोग

इतना एहसान जताते हैं कि मर जाता है
काम आजायें जो दुनिया में किसी के हम लोग

तोड़ देती है ज़रा भर में चरागों का ग़ुरूर
ए हवा देख चुके हैं तेरे जलवे हम लोग

यही तज़ाद तो हैरान करने वाला है 

यही तज़ाद तो हैरान करने वाला है
कहाँ चराग़ रखा है कहाँ उजाला है

मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ इस वास्ते नशे में हूँ
मुझे बताओ हरम है कि ये शिवाला है

रईसे शह्र का ये आलिशान बंगला भी
किसी ग़रीब से छीना हुआ निवाला है

अमीर लोगों से महफूज़ रख मेरे मालिक
फिर एक ग़रीब की बेटी ने क़द निकाला है

उन्हीं के सर पे न गिर जाऊँ आसमाँ बनकर
सितमगरों ने मेरा नाम तो उछाला है

हैं इन्तज़ार में तारे भी चाँद भी वो भी
सुना है रात में सूरज निकलने वाला है

हवा की राह में जलता चराग़ है “राही”
वो क्या बुझेगा जिसे रौशनी ने पाला है

तेरी तलाश तेरी जुस्तजू उतरती है

तेरी तलाश तेरी जुस्तजू उतरती है
मेरे शऊर के कागज़ पे तू उतरती है

संवारने के बजाए संवरने लगता है
जब आईने के मुक़ाबिल में तू उतरती है

तू मेरे नाम से मंसूब है ज़माने में
तू कुछ करे तो मेरी आबरू उतरती है

मैं दिल के पाकीज़ाख़ाने में इसको रखता हूँ
तुम्हारी याद बहुत बा-वज़ू उतरती है

मैं ऐसा रिन्दे-बलानोश मैक़दे का तेरे
मेरे लिए मय-जामो सुबू उतरती है

इसीलिए मैं मयाना- रवि का काइल हूँ
ज़वाल से भी बुलंदी की लू उतरती है

तेरी सिफ़ात में तेहलील हो गया हूँ मैं
हर इक अदा में मिरी तेरी ख़ू उतरती है

मैं तंग दस्त कहाँ तक लिबास पहनाऊँ
बरहना जिस्म कई आरज़ू उतरती है

ये नींद जिसको ज़माना सुकूँ समझता है
हमारे जिस्म पे मिस्ले-अदू उतरती है

ये शायरी के अनासिर भी कुदरती हैं जनाब
के फ़िक्रो फ़न की तरंगों से बू उतरती है

वो जज़्बो में गहरा सात समंदर से

वो जज़्बो में गहरा सात समंदर से
मैंने उसको देख लिया है अंदर से

आज हमें जो ज़ख़्म लगे हैं पत्थर से
मुमकिन है कल भर जायेंगे ख़ंजर से

कब दौड़ेगा ख़ून रगो में बदले का
कब निकलेगी राख़ हमारे अंदर से

और भी है रंगीन मनाज़िर सड़कों पर
बाहर आके देखो ख़ाब की चादर से

कुछ न कुछ तो बात है तुझमें ए जाना
चाँद ज़मी पे देख रहा है अम्बर से

जागे की कोई सोऐ हम फ़र्ज़ निभा आये 

जागे की कोई सोऐ हम फ़र्ज़ निभा आये
हम रात की गलियों मे आवाज़ लगा आये

मालूम नहीं हमको फूलों में छुपा क्या है
बातों से तो ज़ालिम की ख़ुश्बू ए वफ़ा आये

ज़ख़्मो पे कोई मरहम रख्खे या नमक छिड़के
हम दर्द का अफ़साना दुनिया को सुना आये

उठती चली जाती है दीवार गुनाहों की
कह दो ये समंदर से साहिल पे चला आये

अंदाज़े नज़र उसका पागल न कहीं कर दे
जब उसकी तरफ़ देखूँ आँखों में नशा आये

यादों के दरीचों से बचपन की गली झाँके
“राही” मेरे आँगन में ममता की हवा आये

जीने का बन गया है इमकान ज़िन्दगी में

जीने का बन गया है इमकान ज़िन्दगी में
तुम आ गये हमारी वीरान ज़िन्दगी में

हर रास्ता है अब तो आसान ज़िन्दगी में
शामिल हुआ है जब से क़ुरआन ज़िन्दगी में

मरने के बाद इसकी मौहलत नहीं मिलेगी
कर आख़ेरत का प्यारे सामान ज़िन्दगी में

फिर मिल सकी न उसको जाए-पनाह कोई,
जिसने भी खो दिये हैं ओसान ज़िन्दगी में

ये कह के अपने दिल को देते हैं हम तसल्ली
पूरे हुए हैं किसके अरमान ज़िन्दगी में

कुछ ऐसे लोग भी हैं दुनिया में तेरी या रब
लेते नहीं किसी का एहसान ज़िन्दगी में

आदत सी बन गई है अब तो हनीफ़ “राही”
झेले हैं जाने कितने तूफ़ान ज़िन्दगी में

खुली रखूंगा मैं कमरे की खिड़कियाँ कब तक

खुली रखूंगा मैं कमरे की खिड़कियाँ कब तक
इधर से गुज़रेगा ख़ुश्बू का कारवाँ कब तक

मुसाफ़िरो पे ये रस्ता हो मेहरबाँ कब तक
ज़मीन थक गई पहुँचेगा कारवाँ कब तक

लिबासो-जिस्म पे गर्दे सफ़र तो ठहरेगी
रखूँ सम्भाल के मुट्ठी में कहकशाँ कब तक

ज़मीन रोज़ ये मुझसे सवाल करती है
तुम्हारे सर पे रहेगा ये आसमाँ कब तक

सिखा दो अपने चराग़ों को आँधियों की ज़ुबाँ
रहोगे ऐसे हवाओं से बदगुमाँ कब तक

मैं बंद कमरे में तन्हाई से जला हूँ मियां
सड़क पे आयेगा इस जिस्म का धुआँ कब तक

वो नींद लगने से पहले मुझे जगाता है
करूँ मैं अपनी थकन को भी रायगाँ कब तक

ये बात सच है फ़रिश्ता सिफत नहीं हूँ मैं
बढ़ा चढ़ा के लिखें मेरी दास्ताँ कब तक

नज़र को क़ुर्बे शनासाई बाँटने वाले

नज़र को क़ुर्बे शनासाई बाँटने वाले
कभी तो हाथ आ परछाई बाँटने वाले

अकेलापन दरो दीवार से टपकता है
कहाँ गये मिरी तन्हाई बाँटने वाले

ये मुंह से सूखे निवाले भी छीन लेते हैं,
बहुत ग़रीब हैं महंगाई बाँटने वाले

हमारे शह्र को तेरी बड़ी ज़रूरत है,
इधर भी आ कभी अच्छाई बाँटने वाले

कभी ये सोच के तेरे भी अपने बच्चे हैं
हमारी नस्ल को नंगाई बाँटने वाले

ज़माना क्या हुआ अब जो नज़र नहीं आते
वफ़ा की प्यार की बीनाई बाँटने वाले

न मस्जिदें न शिवाले तलाश करते हैं

न मस्जिदें न शिवाले तलाश करते हैं
ये भूखे पेट निवाले तलाश करते हैं

हमारी सादा दिली देखो इस ज़माने में
दुखों को बांटने वाले तलाश करते हैं

मुझे तो इसपे तअज्जुब है अक़्ल के अंधे
दिये बुझा के उजाले तलाश करते हैं

किसी के काम न आये कभी ज़माने में
और अपने चाहने वाले तलाश करते हैं

रहे वफ़ा में अभी दो क़दम चले भी नहीं
अभी से पाँव के छाले तलाश करते हैं

निगाह रखते हैं साक़ी वो तेरी आँखों पर
सुकूने दिल के जो प्याले तलाश करते हैं

रहबरों का आज देखिये मुल्क में अजीब हाल है

रहबरों का आज देखिये मुल्क में अजीब हाल है
आईनों की फ़िक्र ही नहीं पत्थरों की देख भाल है

सिर्फ इस जहाँ में दोस्तों इसलिए वो मालामाल है
उसको आज तक पता नहीं क्या हराम क्या हलाल है

बद्दुआएं आपकी सभी मेरे हक़ में बन गयी ख़ुशी
मुझ पे जलने वाले दोस्तों और आगे क्या ख़्याल है

हर क़दम-पे बेपनाह ग़म हर नफ़स नये-नये सितम
जी रहा हूँ ऐसे दौर में ये भी कोई कम कमाल है

पहले जैसा क़त्लो ख़ून है अब भी तख़्तो-ताज के लिए
नफ़रतें हैं आज का सबक़ और फ़साद इनकी चाल है

हम्द क्या है नात क्या ग़ज़ल क्या मेरा शऊर क्या अमल
है अताए रहमते तमाम फ़ज़ले-रब्बे ज़ुल-जलाल है

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