‘हफ़ीज़’ बनारसी की रचनाएँ

दिल की आवाज़ में आवाज़ मिलाते रहिए 

दिल की आवाज़ में आवाज़ मिलाते रहिए
जागते रहिए ज़माने को जगाते रहिए

दौलत-ए-इश्‍क़ नहीं बाँध के रखने के लिए
इस ख़जाने को जहाँ तक हो लुटाते रहिए

ज़िंदगी भी किसी मेहबूब से कुछ कम तो नहीं
प्यार है उस से तो फिर नाज़ उठाते रहिए

ज़िंदगी दर्द की तस्वीर न बनने पाए
बोलते रहिए ज़रा हँसते हँसाते रहिए

रूठना भी है हसीनों की अदा में शामिल
आप का काम मनाना है मनाते रहिए

फूल बिखराता हुआ मैं तो चला जाऊँगा
आप काँटे मिरी राहों में बिछाते रहिए

बे-वफ़ाई का ज़माना है मगर आप ‘हफीज़’
नग़मा-ए-मेहर-ए-वफा सब को सुनाते रहिए

जब तसव्वुर में कोई माह-जबीं होता है

जब तसव्वुर में कोई माह-जबीं होता है
रात होती है मगर दिन का यकीं होता है

उफ वो बेदाद इनायत भी तसद्दुक जिस पर
हाए वो ग़म जो मसर्रत से हसीं होता है

हिज्र की रात फ़ुसूँ-कारी-ए-ज़ुल्मत मत पूछ
शमअ् जलती है मगर नूर नहीं होता है

दूर तक हम ने जो देखा तो ये मालूम हुआ
कि वो इसाँ की रग-ए-जाँ से क़रीं होता है

इश्‍क़ में मारका-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र क्या कहिए
चोट लगती है कहीं दर्द कहीं होता हे

हम ने देखे हैं वो आलम भी मोहब्बत में ‘हफीज़’
आस्ताँ ख़ुद जहाँ मुश्‍ताक-ए-जबीं होता है

जो पर्दो में ख़ुद को छुपाए हुए हैं 

जो पर्दो में ख़ुद को छुपाए हुए हैं
क़यामत वही तो उठाए हुए हैं

तिरी अंजुमन में जो आए हुए हैं
ग़म-ए-दो-जहाँ को भुलाए हुए हैं

कोई शाम के वक़्त आएगा लेकिन
सहर से हम आँखें बिछाए हुए हैं

जहाँ बिजलियाँ ख़ुद अमाँ ढूँडती हैं
वहाँ हम नशेमन बनाए हुए हैं

ग़ज़ल आबरू है तो उर्दू जबाँ की
तिरी आबरू हम बचाए हुए हैं

ये अशआर यूँ ही नहीं दर्द-आगीं
‘हफीज़’ आप भी चोट खाए हुए हैं

लब-ए-फ़ुरात वही तिश्‍नगी का मंज़र है

लब-ए-फ़ुरात वही तिश्‍नगी का मंज़र है
वही हुसैन वही क़ातिलों का लश्‍कर है

ये किस मक़ाम पे लाई है ज़िंदगी हम को
हँसी लबों पे है सीने में ग़म का दफ्तर है

यक़ीन किस पे करें किस को दोस्त ठहराएँ
हर आस्तीन में पोशीदा कोई ख़ंजर है

गिला नहीं मिरे होंटों पे तंग-दस्ती का
ख़ुदा का शुक्र मिरा दिल अभी तवंगर है

कोई तो है जो धड़कता है ज़िंदगी बन कर
कोई तो है जो हमारे दिलों के अंदर है

उसे करीब से देखा तो ये हुआ मालूम
वो बू-ए-गुल नहीं शमशीर-ए-बाद-सरसर है

समझ के आग लगाना हमारे घर में तुम
हमारे घर के बराबर तुम्हारा भी घर है

मिरी जबीं को हक़ारत से देखने वाले
मिरी जबीं से तिरा आस्ताँ मुनव्वर है

तुम्हारे कुर्ब की लज़्ज़त नसीब है जिस को
वो एक लम्हा हयात-ए-अबद से बेहतर है

हमारा जुर्म यही है के हक़-परस्त हैं हम
हमारे ख़ून का प्यासा हर एक ख़ंजर है

वो मेरे सामने आए तो किस तरह आए
कोई लिबास है उस का न कोई पैकर है

हर इक बला से बचाए हुए है जो हम को
हमारे सर पे ये माँ की दुआ की चादर है

भटक रहा हूँ मैं सदियों से दश्‍त-ए-ग़ुर्बत में
कोई तो मुझ को बताए कहाँ मिरा घर है

अभी ‘हफीज़’ गुलाबों की बात मत कीजे
लहु-लुहान अभी गुलसिताँ का मंज़र है

ये हादसा भी षहर-ए-निगाराँ में हो गया

ये हादसा भी शहर-ए-निगाराँ में हो गया
बे-चेहरगी की भीड़ में हर चेहरा खो गया

जिस को सज़ा मिली थी कि जागे तमात उम्र
सुनता हूँ आज मौत की बाँहों में सो गया

हरकत किसी में है न हरारत किसी में है
क्या शहर था जो बर्फ़ की चट्टान हो गया

मैं उस को नफरतों के सिवा कुछ न दे सका
वो चाहतों का बीज मिरे दिल में बो गया

मरहम तो रख सका न कोई मेरे ज़ख्म पर
जो आया एक नश्‍तर-ए-ताज़ा चुभो गया

या कीजिए कुबूल कि चेहरा ज़र्द है
या कहिए हर निगाह को यरकान हो गया

मैं ने तो अपने ग़म की कहानी सुनाई थी
क्यूँ अपने अपने गम में हर इक शख़्स खो गया

उस दुश्‍मन-ए-वफा को दुआ दे रहा हूँ मैं
मेरा न हो सका वो किसी का तो हो गया

इक माह-वश ने चूम ली पेशानी-ए-‘हफीज़’
दिलचस्प हादसा था जो कल रात हो गया

ये कैसी हवा-ए-ग़म-ओ-आज़ार चली है

ये कैसी हवा-ए-ग़म-ओ-आज़ार चली है
ख़ुद बाद-ए-बहारी भी शरर-बार चली है

देखी ही न थी जिस ने शिकस्त आज तक अपनी
वो चश्‍म-ए-फसूँ-खेज़ भी दिल हार चली है

अब कोई हदीस-ए-क़द-ओ-गेसू नहीं सुनता
दुनिया में वो रस्म-ए-रसन-ओ-दार चली है

तकता ही नहीं कोई मय ओ जाम की जानिब
क्या चाल ये तू ने निगह-ए-यार चली है

वो लगो कहाँ जाएँ जो काफ़िर हैं न दीं-दार
फिर कशमकश-ए-काफ़िर-ओ-दीन-दार चली है

बात और भी कुछ मय की मज़म्मत के अलावा
ये बात तो ऐ शैख कई बार चली है

दीवानगी-ए-शौक़ में जो कर गए हम लोग
मेयार-ए-खिरद बन के वो गुफ़्तार चली है

साज़िश न हो कुछ दैर ओ हरम वालों की इस में
सुनता हूँ कि मय-ख़ाने में तलवार चली है

कब याद किया हम को ‘हफीज़’ अहल-ए-चमन ने
जब ज़ीस्त सू-ए-वादी-ए-पुर-ख़ार चली है

खिलाओ फूल, बिखेरो हंसी जिधर जाओ 

खिलाओ फूल, बिखेरो हंसी जिधर जाओ
चमन से मिस्ले-नसीमे-सहर गुज़र जाओ

न मिल सकेगा जहाँ में मेरी नज़र का बदल
संवर सको तो इस आईने में संवर जाओ

तुम्हारी चारागरी का जहाँ में शुहरा है
कभी हमारे दिलों के भी ज़ख्म भर जाओ

हर इक मक़ाम है मौजे-बला के नर्गे में
कहाँ पनाह लो, जाओ तो किस के घर जाओ

अजीब हाल है हर सुबह लो जनम फिर से
जब आये शाम तो कमरे में अपने मर जाओ

तुम्हारे नाम से मंसूब मंजिलें होंगीं
ग़ुबार बन के रहे-शौक़ में बिखर जाओ

बहुत क़लील है ये फ़ुर्सत-ए हयात ‘हफ़ीज़’
जो कर सको तो कोई नेक काम कर जाओ

हो जाइएगा आप भी पत्थर न देखिये

हो जाइएगा आप भी पत्थर न देखिये
जादूगरों का शहर है मुड़ कर न देखिये

लग जाती है खुद अपनी नज़र भी कभी-कभी
हर लम्हा अपने हुस्न का पैकर न देखिये

पत्थर बरस रहे हैं फ़िज़ा फिर ख़राब है
दरवाज़े बंद कीजिये, बाहर न देखिये

रोशन ज़मीन पर भी हैं लाखों मह-ओ-नजूम
हैं आप दीदावर तो फ़लक पर न देखिये

कांटें भी हैं निगाह-ए तवज्जुह के मुस्तहक़
गुलशन में रह के सिर्फ़ गुले-तर न देखिये

ये देखिये निगाह से कैसी है नौ उरुस
क्या अपने साथ लाई है ज़ेवर न देखिये

पैदा नज़र भी कीजिये गर शौके-दीद है
औरों की आँख से कोई मंज़र न देखिये

सब एतबार ख़ाक में मिल जायेगा हफ़ीज़
किस किस की आस्तीं में है खंज़र न देखिये

जुल्फ़े-दौरां में न बल हो ये कहाँ मुमकिन है

जुल्फ़े-दौरां में न बल हो ये कहाँ मुमकिन है
मसअला वक़्त का हल हो ये कहाँ मुमकिन है

हर हसीं जिस्म कँवल हो ये कहाँ मुमकिन है
हर महल ताजमहल हो ये कहाँ मुमकिन है

चोट तो रोज़ कलेजे पर लगा करती है
रोज़ इक ताज़ा ग़ज़ल हो ये कहाँ मुमकिन है

साकिया साग़रे-मय भी है बहुत खूब मगर
तेरी आँखों का बदल हो ये कहाँ मुमकिन है

वो जो हर रोज़ बदलते हैं अदाएँ अपनी
उनका वादा और अटल हो ये कहाँ मुमकिन है

जिस की फितरत में ही तल्खी हो वह क्या देगा मिठास
नीम में आम का फल हो ये कहाँ मुमकिन है

यूँ तो कह लेते हैं कहने को ग़ज़ल हम भी हफ़ीज़
मीर-सी कोई ग़ज़ल हो ये कहाँ मुमकिन है

हजारों आफतें हैं मेरा सर है

हजारों आफतें हैं मेरा सर है
मैं जिंदा हूँ ये मेरा ही जिगर है

बहुत आसान राहे-पुर खतर है
तुम्हारी याद जब से हमसफ़र है

कहाँ थे मेरे नग्मे इतने शीरीं
तेरे दर्द-ए-मुहब्बत का असर है

जो पिघला दे दिले-कोहसार को भी
मुहब्बत वह नवा-ए-कारगर है

ज़माने भर के ग़म में रोने वाले
तुझे कुछ अपने घर की भी खबर है

न पूछो आज सजदों की लताफ़त
मेरा सर है और उनका संगे-दर है

मिले फुर्सत तो सुन लेना किसी दिन
मेरा किस्सा निहायत मुख़्तसर है

आप की याद आपका ग़म है

आप की याद आपका ग़म है
ज़िन्दगी के लिए ये क्या कम है

ऐ मता-ए-सुकूं के दीवानों!
ज़िन्दगी इज्ताराबे-पैहम है

एक लग्ज़िश में सज गई दुनिया
क्या मुक़द्दस गुनाहे-आदम है

इन दिनों कुछ अजीब आलम है
हर नफस एक महशरे-ग़म है

आज खुल कर न रो सकी शबनम
आज फूलों में ताज़गी कम है

आज तक उसकी उलझनें न गयीं
ज़िन्दगी किसकी ज़ुल्फ़े-पुरखम है

इन दिनों कुछ अजीब आलम है
हर नफ़स एक महसरे-ग़म है

ज़िन्दगी तो नहीं ‘हफ़ीज़’ कहीं
अब फ़क़त ज़िन्दगी का मातम है

दूर अँधेरा हुआ रौशनी आ गयी 

दूर अँधेरा हुआ रौशनी आ गयी
आप आये नई ज़िन्दगी आ गयी

कोई इक दूसरे का शनाशा नहीं
हाय किस मोड़ पर ज़िन्दगी आ गयी

क्या निजामे-चमन है ज़रा देखिये
कोई रोया, किसी को हंसी आ गयी

इस क़दर बढ़ गईं उनकी ख़ुदबीनियाँ
इश्क़ वालों में भी ख़ुदसरी आ गयी

या नज़ारों में वह जाज़बीयत नहीं
या हमारी नज़र में कमी आ गयी

ग़ैर का ज़िक्र था ग़ैर की बात थी
आप की आँख में क्यूँ नमी आ गयी

चाँद तारे भी हैं महवे-हैरत ‘हफ़ीज़’
बढ़ते-बढ़ते कहाँ बंदगी आ गयी

किस के चेहरे पर ग़म की धूल नहीं 

किस के चेहरे पर ग़म की धूल नहीं
कौन इस दौर में मलूल नहीं

जिस ने गुलशन को ज़िन्दगी बख्शी
उसके दामन में कोई फूल नहीं

जिस में शामिल न हो तुम्हारा ग़म
वो मसर्रत हमें क़बूल नहीं

कोई सैराब हो कोई तरसे
मयक़दे का तो ये असूल नहीं

संगरेज़ा हो या गुहर हो ‘हफ़ीज़’
कोई शय दहर में फ़िज़ूल नहीं

पैग़ाम दिया है कभी पैग़ाम लिया है

पैग़ाम दिया है कभी पैग़ाम लिया है
आँखों से मुहब्बत में बड़ा काम लिया है

गुज़रा है जो बे खौफ़ गुज़रगाहे-तलब से
मंज़िल का तलब उसने बहर गाम लिया है

जब ज़िक्र छिड़ा है मेरी बर्बादी-ए-दिल का
दुनिया ने मेरे साथ तेरा नाम लिया है

ये बात अलग है कि ख़ता किस से हुई थी
दीवानों ने सब अपने सर इलज़ाम लिया है

मज़बूरी-ए-हालात ने वह दिन भी दिखाए
ज़हराब से लुत्फ़े-मये-गुलफ़ाम लिया है

याद आये जो गुज़रे हुए लम्हाते-मुहब्बत
वह चोट पड़ी है कि जिगर थाम लिया है

हर सुबह किया तर्के–तअल्लुक़ का इरादा
हर शाम मगर हमने तेरा नाम लिया है

हूँ तिश्ना ‘हफ़ीज़’ आज तक इस जुर्म के बायस
साक़ी की नज़र से कभी इक जाम लिया है

दर्द को गीत में ढालो कि बहार आई है

दर्द को गीत में ढालो कि बहार आई है
मयकशो जाम उछालो कि बहार आई है

मैं सुनाता हूँ नए गीत नए लहन के साथ
तुम उठो साज़ संभालो कि बहार आई है

मह्वशो दीदा-ए-देरीना को पूरा कर दो
बात अब कल पर न टालो कि बहार आई है

उनकी मस्ती भरी आँखें भी यही कहती हैं
आतिशे-शौक़ बुझा लो कि बहार आई है

क्या हो कल सुबह किसे इसकी खबर है यारो
रतजगा आज मना लो कि बहार आई है

उनको रूठे हुए इक उम्र हुई आओ ‘हफ़ीज़’
चल के अब उन को मना लो कि बहार आई है

इधर भी तबाही उधर भी तबाही 

इधर भी तबाही उधर भी तबाही
कहाँ जाएँ आख़िर मुहब्बत के राही

मेरा इश्क़ क्या है तेरी दिलनवाज़ी
तेरा हुस्न क्या है मेरी ख़ुशनिगाही

वही हुस्नवाले, वही नाज़ो-गमज़ा
वही अहले-दिल हैं वही कज्कुलाही

न कोई तर्दुद, न कोई तफ़क्कुर
फ़क़ीरी में हम कर गए बादशाही

तेरी जुस्तजू में कहाँ आ गए हम
न ज़ादा, न मंज़िल, न रहबर, न राही

अभी नामुकम्मल है जश्ने-चिराग़ा
कहीं रौशनी है कहीं है सियाही

हफ़ीज़’ उनके लब पर है कुछ और लेकिन
नज़र और कुछ दे रही है गवाही

आस्तीनों में न ख़ंजर रखिये

आस्तीनों में न ख़ंजर रखिये
दिल में जो है वही लब पर रखिये

होंट जलते हैं तो जलने दीजे
अपनी आँखों में समंदर रखिये

अपनी परछाईं भी डस लेती है
हर क़दम सोच समझ कर रखिये

किस को मालूम है कल क्या होगा
आज की बात न कल पर रखिये

जेब ख़ाली है तो ग़म मत कीजे
दिल बहरहाल तवंगर रखिये

जो महो-साल का पाबंद न हो
कोई ऐसा भी कलेंडर रखिये

हर नज़र संग बदामाँ है यहाँ
आबगीनों को छुपा कर रखिये

अपनी पलकों पर किसी शाम सजा लो मुझको

अपनी पलकों पर किसी शाम सजा लो मुझको
मैं अगर रूठ गया हूँ तो मना लो मुझको

सोच के गहरे समंदर से निकालो मुझको
दम घुटा जाए है अब कोई बचा लो मुझको

मैं अगर फूल नहीं हूँ तो शरारा भी नहीं
अपने दामन में बिला खौफ छुपा लो मुझको

अब तो ले दे के तुम्हीं एक सहारा हो मेरा
छोड़ के जाओ न यादों के उजालो मुझको

लब पर आया जो कोई हर्फ़े-गिला तो कहना
शमा की तरह सरे-बज़्म जला लो मुझको

कल यही वक़्त कहीं मेरा तलबगार न हो
अहदे-हाज़िर की अमानत हूँ संभालो मुझको

आऊँ नीचे तो सलामत न रहे मेरा वजूद
इतना ऊँचा न मेरे यारो उछालो मुझको

शिकवा-ए–दर्द ही करते रहे हम लोग ‘हफ़ीज़’
दर्द कहता रहा संगीत में ढालो मुझको

गेसुओं की बरहमी अच्छी लगे

गेसुओं की बरहमी अच्छी लगे
ये हसीं आवारगी अच्छी लगे

उसके होंटों की हंसी अच्छी लगे
अध खिली-सी वह कली अच्छी लगे

प्यास के तपते हुए सहराओं में
ओस की इक बूँद भी अच्छी लगे

हमनशीं है जब से वह जान-ए-ग़ज़ल
दिन भी अच्छा रात भी अच्छी लगे

खूब है हरचंद राहे-रास्ती
गाहे गाहे कजरवी अच्छी लगे

लोग तो रंगीनियों पर हैं फ़िदा
मुझको तेरी सादगी अच्छी लगे

धूप जाड़े की मज़ा दे जाए है
चाँदनी बरसात की अच्छी लगे

उड़ गए सब रंग उस तस्वीर के
फिर भी आँखों को वही अच्छी लगे

ग़ैर के महलों में जी लगता नहीं
अपनी टूटी झोंपड़ी अच्छी लगे

मुद्दतों गंभीर रह लेने के बाद
कुछ हंसी कुछ दिल लगी अच्छी लगे

उसका प्यार, उसकी वफ़ा, उसके सितम
हर अदा उस शोख़ की अच्छी लगे

सू-ए-काबा किस लिए जाये ‘हफ़ीज़’
जिस को काशी की गली अच्छी लगे

दिल परेशां नज़र है आवारा 

दिल परेशां नज़र है आवारा
किसलिए हर बशर है आवारा

फूँक कर अपना घर मुहब्बत मे
ज़िन्दगी दरबदर है आवारा

किस की ज़ुल्फों को छू के आई है
क्यों नसीम-ए-सहर है आवारा

कुछ तुम्हारा शबाब है चंचल
कुछ हमारी नज़र है आवारा

चल रही है वह तुन्दो तेज़ हवा
जुल्फ़े-फ़िकरो-नज़र है आवारा

चांदनी है ज़मीन पर रक्सां
आसमां पर क़मर है आवारा

ज़हनो-दिल, आरजू ख़यालो-ख़्वाब
इन दिनों घर का घर है आवारा

क्या उसे रास्ते पर लाये कोई
फितरतन हर बशर है आवारा

कल चहकते थे अंदलीब जहाँ
अब वहाँ मुश्ते-पर है आवारा

कारवां से बिछड़ के इक राही
मिस्ले-गर्दे-सफ़र है आवारा

है तेरे इंतज़ार में मंज़िल
तू सरे-रहगुज़र है आवारा

क्या दिखायेगा राह-ए-रास्त हफ़ीज़
खुद अगर राहबर है आवारा

लहू की मय बनाई, दिल का पैमाना बना डाला

लहू की मय बनाई, दिल का पैमाना बना डाला
जिगर दारों ने मक़तल को भी मयख़ाना बना डाला

हमारे जज़्ब-ए-तामीर की कुछ दाद दो यारो
कि हमने बिजलियों को शम्म-ए काशाना बना डाला

सितम ढ़ाते हो लेकिन लुत्फ़ का एहसास होता है
इसी अंदाज़ ने दुनिया को दीवाना बना डाला

भरी महफ़िल में हम ने बात कर ली थी उन आँखों से
बस इतनी बात का यारों ने अफसाना बना डाला

मेरे ज़ौक़े-परस्तिश की करिश्मा साज़ियाँ देखो
कभी काबा, कभी काबा को बुतखाना बना डाला

शिकायत बिजलियों से है न शिकवा बादे–सरसर से
चमन को खुद चमन वालों ने वीराना बना डाला

चलो अच्छा हुआ दुनिया ‘हफ़ीज़’ अब दूर है हम से
मुहब्बत ने हमें दुनिया से बेगाना बना डाला

कुछ सोच के परवाना महफ़िल में जला होगा

कुछ सोच के परवाना महफ़िल में जला होगा
शायद इसी मरने में जीने का मज़ा होगा

गुमराहे-मुहब्बत हूँ पूछो न मेरी मंज़िल
हर नक्शे-क़दम मेरा मंज़िल का पता होगा

कतरा के तो जाते हो दीवाने के रस्ते से
दीवाना लिपट जाए क़दमों से तो क्या होगा

मयखाने से मस्जिद तक मिलते हैं नक़ुशे-पा
या शेख गए होंगे या रिंद गया होगा

फ़रज़ानों का क्या कहना हर बात पर लड़ते हैं
दीवाने से दीवाना शायद ही लड़ा होगा

रिन्दों को ‘हफ़ीज़’ इतना समझा दे कोई जा कर
आपस में लड़ोगे तुम वायज़ का भला होगा

गुमराह कह के पहले जो मुझ से खफ़ा हुए

गुमराह कह के पहले जो मुझ से खफ़ा हुए
आखिर वह मेरे नक़शे-क़दम पर फ़िदा हुए

अब तक तो ज़िन्दगी से तआरुफ़ न था कोई
तुम से मिले तो ज़ीस्त से भी आशना हुए

मेरी नज़र ने तुमको जमाल आशना किया
मुझ को दुआएँ दो कि तुम इक आइना हुए

सुनता हूँ इक मुक़ामे-ज़ियारत है आजकल
वह ज़िन्दगी का मोड़ जहाँ हम जुदा हुए

क्या होगा इस से बढ़ के कोई रब्ते-बाह्मी
मंज़िल हमारी वह तो ह्म उनका पता हुए

कब ज़िन्दगी ने हमको नवाज़ा नहीं ‘हफ़ीज़’
कब हम पर बाबे-लुत्फ़-ओ-इनायत न वा हुए

रात का नाम सवेरा ही सही

रात का नाम सवेरा ही सही
आप कहते हैं तो ऐसा ही सही

क्या बुराई है अगर देख लें हम
ज़िन्दगी एक तमाशा ही सही

क़त्ल कर देगी उसे भी दुनिया
अपने युग का वह मसीहा ही सही

तुम तो मौसम की तरह मत बदलो
अब ज़माने का ये शेवा ही सही

मेरा क़द आप से ऊँचा है बहुत
मैं ‘हफ़ीज़’ आप का साया ही सही.

क्या जुर्म हमारा है बता क्यों नहीं देते 

क्या जुर्म हमारा है बता क्यों नहीं देते
मुजरिम हैं अगर हम तो सजा क्यों नहीं देते

तुम को तो बड़ा नाज़-ए-मसीहाई था यारो
बीमार है हर शख्स दवा क्यों नहीं देते

किस दश्त में गुम हो गए अहबाब हमारे
हम कान लगाये हैं सदा क्यों नहीं देते

कम ज़र्फ़ हैं जो पी के बहकते हैं सरे-बज़्म
मह्फ़िल से उन्हें आप उठा क्यों नहीं देते

क्यों हाथ में लरज़ा है तुम्हें खौफ़ है किस का
हम हर्फ़े-ग़लत हैं तो मिटा क्यों नहीं देते

कुछ लोग अभी इश्क़ में गुस्ताख़ बहुत हैं
आदाब-ए-वफ़ा उनको सिखा क्यों नहीं देते

नग़मा वही नग़मा है उतर जाए जो दिल में
दुनिया को ‘हफ़ीज़’ आप बता क्यों नहीं देते

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