हम्माद नियाज़ी की रचनाएँ

बे-सबब हो के बे-क़रार आया 

बे-सबब हो के बे-क़रार आया
मेरे पीछे मिरा ग़ुबार आया

चंद यादों का शोर था मुझ में
मैं उसे क़ब्र में उतार आया

उस को देखा और उस के बाद मुझे
अपनी हैरत पे ए‘तिबार आया

भूल बैठा है रंग-ए-गुल मिरा दिल
परतव-ए-गुल पे इतना प्यार आया

एक दुनिया को चाहता था वो
एक दुनिया में उस पे वार आया

साँस लेती थी कोई हैरानी
मैं जिसे लफ़्ज़ में उतार आया

कुछ न आया हमारे कासे में
और आया तो इंतिज़ार आया

कब मुझे उस ने इख़्तियार दिया
कब मुझे ख़ुद पे इख़्तियार आया

भुला दिया भी अगर जाए सरसरी किया जाए

भुला दिया भी अगर जाए सरसरी किया जाए
मुतालया मिरी वहशत का लाज़मी किया जाए

हम ऐसे लोग जो आइंदा ओ गुज़िश्ता हैं
हमारे अदह को मौजूद से तही किया जाए

ख़बर मिली है उस ख़ुश-ख़बर की आमद है
सो एहतिमाम-ए-सुख़न आज मुल्तवी किया जाए

हमें अब अपने नए रास्ते बनाने हैं
जो काम कल हमें करना है वो अभी किया जाए

नहीं बईद ये अहकाम-ए-ताज़ा जारी हों
कि गुम्बदों से परिंदों को अजनबी किया जाए

बस एक लम्हा तिरे वस्ल का मयस्सर हो
और उस विसाल कि लम्हे को दाइमी किया जाए

दिल के सून सेहन में गूँजी आहट किस के पाँव की 

दिल के सून सेहन में गूँजी आहट किस के पाँव की
धूप-भरे सन्नाटे में आवाज़ सुनी है छाँव की

इक मंज़र में सारे मंज़र पस-मंज़र हो जाने हैं
इक दरिया में मिल जानी हैं लहरें सब दरियाओं की

दश्त-नवर्दी और हिजरत से अपना गहरा रिश्ता है
अपनी मिट्टी में शामिल है मिट्टी कुछ सहराओं की

बारिश की बूँदों से बन मे ंतन में एक बहार आई
घर घर गाए गीत गगन ने गूँजी गलियाँ गाँव की

सुब्ह सवेरे नंगे पाँव घास पे चलना ऐसा है
जैसे बाप का पहला बोसा क़ुर्बत जैसे माओं की

इक जैसा एहसास लहू में जीता जागता रहता है
एक उदासी दे जाती है दस्तक रोज़ हवाओं की

सीनों और ज़मीनों का अब मंज़र-नामा बदलेगा
हर सू कसरत हो जानी है फूलों ओर दुआओं की

दिल की याद-दिहानी से 

दिल की याद-दिहानी से
आँख खुली हैरानी से

रंग हैं सारे मिट्टी के
बे-रंग इस पानी से

हर्फ़-निगारी सीखी है
कमरे की वीरानी से

पेड़ उजड़ते जाते हैं
शाख़ों की नादानी से

दाग़-ए-गिर्या आँखों का
कब धुलता है पानी से

हार दिया है उजलत में
ख़ुद को किस आसानी से

ख़ौफ़ आता है आँखों को
भेद भरी उर्यानी से

रोज़ पसीना बहता है
आँखों की पेशानी से

गली का मंज़र बदल रहा था 

गली का मंज़र बदल रहा था
क़दीम सूरज निकल रहा था

सितारे हैरान हो रहे थे
चराग़ मिट्टी में जल रहा था

दिखाई देने लगी थी ख़ुश्बू
मैं फूल आँखों पे मल रहा था

घड़े में तस्बीह करता पानी
वज़ू की ख़ातिर उछल रहा था

शफ़ीक़ पोरों का लम्स पा कर
बदल सहीफ़े में ढल रहा था

दुआएँ खिड़की से झाँकती थीं
मैं अपने घर से निकल रहा था

ज़ईफ़ उँगली को थाम कर मैं
बड़ी सहूलत से चल रहा था

अजीब हसरत से देखता हूँ
मैं जिन मकानों में कल रहा था

हमारे बस में क्या है और हमारे बस में क्या नहीं

हमारे बस में क्या है और हमारे बस में क्या नहीं
जहान-ए-हस्त-ओ-बूद में किसी पे कुछ खुला नहीं

हुज़ूर-ए-ख़्वाब देर तक खड़ा रहा सवेर तक
नशेब-ए-क़ल्ब-ओ-चश्म से गुज़र तिरा हुआ नहीं

नज़र में इक चराग़ था बदन में एक बाग़ ािा
चराग़ ओ बाग़ हो चुके कोई रिहा रहा नहीं

उजड़ गईं हवेलियाँ चली गईं सहेलियाँ
दिला तिरी क़बील से कोई भी अब बचा नहीं

हवस की रज़्म-गाह में बदन की कार-गाह में
वो शोर था कि दूर तक किसी ने कुछ सुना नहीं

न जाने कितने युग ढले न जाने कितने दुख पले
घरों में हाँडियों तले किसी को कुछ पता नहीं

वो पेड़ जिस की छाँव में कटी थी उम्र गाँव में
मैं चूम चूम थक गया मगर ये दिल भरा नहीं

हुज्रा-ए-ख़्वाब से बाहर निकला

हुज्रा-ए-ख़्वाब से बाहर निकला
कौन ये मेरे बराबर निकला

फड़-फड़ाया मिरे बाहर कोई
और परिंदा मिरे अंदर निकला

आँख से अश्क निकल आए हैं
रेत से जैसे समुंदर निकला

हिज्र को ख़्वाब में देखा इक दिन
और फिर ख़्वाब-ए-मुक़द्दर निकला

मेरे पीछे मिरी वहशत भागी
मैं जो दीवार गिरा कर निकला

आँख बीनाई गँवा बैठी तो
तेरी तस्वीर से मंज़र निकला

रात सीने की हवेली गूँजी
और दिल शोर मचा कर निकला

शाम फैली तो खुला अज़-सर-ए-नौ
मेरा साया मिरा पैकर निकला

जब मुंडेरों पे परिंदों की कुमक जारी थी

जब मुंडेरों पे परिंदों की कुमक जारी थी
लफ़्ज़ थे लफ़्ज़ों में एहसास की सरदारी थी

अब जौ लौटा हूँ तो पहचान नहीं होती है
कहाँ दीवार थी दीवार में अलमारी थी

वो हवेली भी सहेली थी पहेली जैसी
जिस की ईंटों में मिरे ख़्वाब थे ख़ुद्दारी थी

आख़िरी बार मैं कब उस से मिला याद नहीं
बस यही याद है इक शाम बहुत भारी थी

पूछता फिरता हूँ गलियों में कोई है कोई है
ये वो गलियाँ हैं जहाँ लोग थे सरशारी थी

पेड़ के चंद मकानों में ज़मानों जैसे
जिन की छाँव में मिरी रूह की लू जारी थी

क्या भले दिन थे हमें खेल था हँसना रोना
साँस लेना भी हमें जैसे अदाकारी थी

बस कोई ख़्वाब था और ख़्वाब के पस-मंज़र में
बाग़ था फूल थे ख़ुशबू की नुमूदारी थी

हम ने देखा था उसे उजले दिनों में ‘हम्माद’
जिन दिनों नींद थी और नींद में बेदारी थी

जिस की सौंधी सौंधी ख़ुशबू आँगन आँगन पलती थी

जिस की सौंधी सौंधी ख़ुशबू आँगन आँगन पलती थी
उस मिट्टी का बोझ उठाते जिस्म की मिट्टी गलती थी

जिस को ताप गर्म लिहाफ़ों में बच्चे सो जाते थे
दिल के चूल्हे में हर दम वो आग बराबर जलती थी

गर्म दो-पहरों में जलते सेहनों में झाड़ू देते थे
जिन बूढ़े हाथों से पक कर रोटी फूल में ढलती थी

किसी कहानी में वीरानी में जब दिल घबराता था
किसी अज़ीज़ दुआ की ख़ुशबू साथ हमारे चलती थी

गर्द उड़ाते ज़र्द बगूले दर पर दस्तक देते थे
और ख़स्ता-दीवारों की पल भर में शक्ल बदलती थी

ख़ुश्क खजूर के पŸाों से जब नींद का बिस्तर सजता था
ख़्वाब-नगर की शहज़ादी गलियों में आन निकलती थी

दिन आता था और सीने मे शाम का ख़ाका बनता था
शाम आती थी और जिस्मों में शाम भी आख़िर ढलती थी

सब्ज़-खेतों से उमड़ती रौशनी तस्वीर की

सब्ज़-खेतों से उमड़ती रौशनी तस्वीर की
मैं ने अपनी आँख से इक हर्फ़-गह तामीर की

सुन क़तार अंदर क़तार अश्जार की सरगोशियाँ
और कहानी पढ़ ख़िजाँ ने रात जो तहरीर की

कच्ची क़ब्रों पर सजी ख़ुशबू की बिखरी लाश पर
ख़ामुशी ने इक नए अंदाज़ में तक़रीर की

बचपने की दर्स-गाहोें में पुराने टाट पर
दिल ने हैरानी की पहली बारगह तस्ख़ीर की

रौशनी में रक़्स करते ख़ाक के ज़र्रात ने
इंतिहा-ए-आब-ओ-गिल की अव्वलीं तफ़्सीर की

कोहसारों के सरों पर बादलों की पगड़ियाँ
एक तमसील-ए-नुमायाँ आया-ए-ततहीर की

धुँद के लश्कर का चारों ओर पहरा था मगर
इक दिये ने रौशनी की रात भर तशहीर की

आज फिर आब-ए-मुक़द्दस आँख से हिजरत किया
घर पहुँचने में किसी ने आज फिर ताख़ीर की

सेहन-ए-आइंदा को इम्कान से धोए जाएँ

सेहन-ए-आइंदा को इम्कान से धोए जाएँ
बाँझ हैं क़र्या-ए-जाँ आइए रोए जाएँ

उस सेहर-ज़ादी की पेशानी को चूमें झूमें
ख़ुद में ख़ुर्शीद बनें शब में पिरोए जाएँ

घड़ियाँ काँधों पे रखे ये मिरे पेड़ से लोग
सुब्ह से शाम तलक धूप को ढोए जाएँ

ख़्वाब-ए-देरीना का मंज़र भी अजब मंज़र है

हम तिरी गोद में जागें भी तो सोए जाएँ

दश्त-ए-दिल मे कोई पगडंडी बनाएँ उस पर
ढूँडने जाएँ उसे दश्त में खोए जाएँ

उम्र की अव्वली अज़ानों में 

उम्र की अव्वली अज़ानों में
चैन था दिल के कार-ख़ानों में

लहलहाते थे खेत सीन के
बाँसुरी बज रही थी कानों में

बाँसुरी जिस की तान मिलती थी
ख़्वाब के बे-नुमू जहानों में

ख़्वाब जिन के निशान मिलना थे
आने वाले कई ज़मानों में

मुस्कुराहट चराग़ ऐसी थी
रौशनी खिल उठी मकानों में

रौशनी जिस का दिल धड़कता था
दूर सहरा के सारबानों में

वो किसी बाग़ जैसी हैरानी
अब अगर है तो दास्तानों में

वो निगह जब मुझे पुकारती थी

वो निगह जब मुझे पुकारती थी
दिल की हैरानियाँ उभारती थी

अपनी नादीदा उँगलियों के साथ
मेरे बालों को वो सँवारती थी

रोज़ मैं उस को जीत जाता था
और वो रोज़ ख़ुद को हारती थी

पत्तियाँ मुस्कुराने लगती थीं
शाख़ से फूल जब उतारती थी

जिन दिनों मैं उसे पुकारता था
एक दुनिया मुझे पुकारती थी

सेहन में छाँव थी दरख़्तों की
जो मिरी शाइरी निखारती थी

बारगाहों में ग़ुस्ल-ए-गिर्या से
रूह अपनी थकन उतारती थी

इक लगन थी चुभन थी जो भी थी
रोज़ सीने में दिन गुज़ारती थी

यक़ीन की सल्तनत थी और सुल्तानी हमारी

यक़ीन की सल्तनत थी और सुल्तानी हमारी
दमकती थी दुआ की लौ से पेशानी हमारी

महकता था घने पेड़ों से वीराना हमारा
जहान-ए-आब-ओ-गिल पर थी निगहबानी हमारी

हमारे जिस्म के टुकड़े हुए रौदें गए हम
मगर ज़िंदा रही आँखों में हैरानी हमारी

हम इस ख़ातिर तिरी तस्वीर का हिस्सा नहीं थे
तिरे मंज़र में आ जाए न वीरानी हमारी

बहुत लम्बे सफ़र की गर्द चेहरों पर पड़ी थी
किसी ने दश्त में सूरत न पहचानी हमारी

किसी ने कब भला जाना हमारा कर्ब-ए-वहशत
किसी ने कब भला जानी परेशानी हमारी

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