हरबिन्दर सिंह गिल की रचनाएँ

Paragraph


धुँआ (1)

ये कैसे बादल हैं
जो बिन मौसम के हैं,
ये आसमान में नहीं रहते
रहते हैं, गली कूचों में ।

इन बादलों से
सूरज की रोशनी कम नहीं होती
न रोकते हैं, चाँदनी चांद की ।

क्योंकि, ये गरजते नहीं हैं
गिराते हैं आग
इन्सान के दिलों पर ।

क्योंकि, ये पानी नहीं बरसाते
बरसाते हैं
खून मनुष्यों का, पानी की तरह ।

क्योंकि, ये बादल
किन्हीं हवाओं से नही बने
बने हैं, नफरत की आँधी से ।

क्योंकि, ये बादल
किसी चक्रवात से नही बने
बने हैं, ग्लानि के ज्वार-भाटो से ।

क्योंकि, ये बादल
किन्हीं फसलों के लिए नही बने
न बने हैं, पेड़-पौधों के लिए
न बने हैं, पशु-पक्षियों के लिए ।

ये तो बने हैं, सिर्फ एक निम्न ध्येय के लिए
कैसे छिना जाए
अन्न का निवाला, बच्चों के मुख से ।

धुँआ (2)

कैसे हो जाए,
चारों तरफ जमघट विधवाओं का ।
कैसे बन जाए,
हंसते-खेलते शहर, ढेर एक राख का ।
हो यह कैसे भी, पर होगा जरूर ।

क्योंकि, ये बादल बनें हैं
एक धुऐं के
जो उठते हैं, मनुष्य के दिलों से
और जिसकी चिंगारी होती हैं
मनुष्य के मस्तिष्क में ।
ताकि जला सके, हर उस आत्मा को
जो चाहे, जोड़ना अपने को मानवता से ।

मानवता कहीं सुख की श्वास न ले
इसलिए मनुष्य ने जन्म दिया है
इस धुएं को
और बनाए, ये घनघोर बादल
टकराव के ।

मानवता कहीं सुन्दर भविष्य की कल्पना न करे
इसलिए मनुष्य ने उत्पत्ति की
इस धुएं की
और बनाएं ये घनघोर बादल
अन्धविश्वास के ।

मानवता कहीं धर्म में सफल न हो जाए
इसलिए मनुष्य ने रचना की
इस धुएं की
और बनाए ये घनघोर बादल
फूट के ।

धुँआ (3)

इन बादलों की गरज बहुत भयानक है,
बिजली की कड़क इनके सामने बहुत मद्धम है ।
ये सिर्फ दहलाते नहीं हैं, दिलों को
रोक देते हैं, धड़कन हर उस परिवार की
हर उस गली-कूचे की, कस्बे की
हर उस शहर की, जिस पर गिरती है
यह भयानक बिजली संकीर्णता की ।

इन बादलों की बरसात बहुत भयानक है
नदियों की बाढ़ इनके सामने बहुत मद्म है ।
ये सिर्फ अस्त-व्यस्त नही करते हैं, जीवन को
खत्म कर देते हैं, भविष्य हर उस परिवार का
हर उस बच्चे का, हर उस माँ-बाप का
हर उस भाई-बहन का, जिस पर बरसते हैं
ये भयानक बादल प्रतिशोध के ।

इन बादलों का तूफान बहुत भयानक है
धरती का भूचाल इनके सामने बहुत मद्धम है ।
ये सिर्फ तोड़-फोड़ नही करते जीवन में
चूर-चूर कर देते हैं, खुशियाँ हर उस परिवार की
हर उस समाज की, हर उस जाति की
हर उस धर्म की, जिस पर गिरता है
ये भयानक तूफान विघटन का ।

इतना ही भयानक स्वरूप है
यदि इन आतंकवाद के बादलों का
बादल जो बनते नहीं, बनाएं जाते हैं
क्यों नहीं खत्म कर देते, हर उद्गम को
जहां से उठता है, यह धुँआ विनाशकारी ।

परन्तु यह इतना आसान नहीं है
क्योंकि वह ओढ़े हुए, एक श्वेत चादर
जिस पर लिखा है, धर्म संकट में है ।
अब मैं संकट मे पड़ गया हूँ ।
कैसे कहूँ, यह चादर तो आडम्बर है
धुएं के कालिख से मैली हुई पड़ी है ।

कैसे कहूँ , यह चादर तो सफेद नहीं है
खून के रंग में रंगी हुई है ।

कैसे कहूँ , यह चादर तो मानवता की ओढ़नी नहीं है
यह तो समेटे हुए है, गुनाह अपने आँचल में ।

यदि कहता हूँ, यह सब जो कुछ कहा है
इस श्वेत धार्मिक चादर के विपरीत
मै एक धर्म विरोधी कहलाता हूँ
समाज में लज्जित किया जाता हूँ

फिर क्यों करूं विरोध इस चादर का
क्यों न कहूँ, यह चादर
चाँद की चाँदनी और दूध सी साफ है
और मान लूँ, यह भयानक बादल नहीं हैं
यह तो अगरबत्ती से निकला एक धुआं है ।

धुँआ (4)

यह धुएं बहुत बिषैला है
उगलता है, जहर पर जहर ।
फिर भी लोग समझ इसे अमृत,
पिये जा रहे हैं, पिये जाते रहेंगे
क्योंकि रखा है, इसे धर्म के लोटे में
और लोग तरसते हैं, इसकी एक-एक बूंद ।

जिसे पीकर शायद वो
ऐसा धर्म प्रहरी कहते हैं
होगे प्रस्थान स्वर्ग को
जहां उन्हें सत्कार से मंजूर किया जाएगा ।

परन्तु मनुष्य, क्यों भूल गया
जहर जिसे समझ अमृत पिया
दिखाने लगा है करतब अपने
और लगा है बदलने रंग आत्मा का
जिसे यमदूत ले जा रहे हैं
ले जाते-जाते वह काली पड़ने लगी है
जो हमेशा कभी दूध सी साफ रहती थी ।

धुँआ (5)

यह धुआँ बहुत कोलाहल मचाता है ।
शायद धर्म-प्रहरी समझते हैं
जब तक धर्म पुस्तकों के सन्देश
सड़को पर न लाया जाए
इन्हे जुलूस का रूप न दिया जाए
इन्हे दीवारों पर अंकित न किया जाए
ये अधूरे हैं, शायद भगवान को सुनते नहीं हैं ।

फिर क्यों न इन संदेशों को लेकर
भगदड़ मचायी जाए गली-गली में
शहर-शहर में, प्रांत-प्रांत में
अगर हो सके तो पूरे देश में
फिर भी तसल्ली न हो
इसे विश्व मंच पर सुनाया जाए ।

हाथों में नहीं होने चाहिए,
ये बेसुरे बाजे या ढोलक
होने चाहिए ये हाथ सजे
तलवारों और ढालों से
या हाथ में हो, लट्ठ और छड़
या फिर जुलूस की ख़ुशी का
धमाका होता हो बंदूकों से
तभी कहीं ये सन्देश धर्म-पुस्तकों के
सुने जाएंगे, भगवान के घर में ।
क्योंकि वह बहरा है
उसे बोलने से नहीं सुनता
जब तक न मचाया जाए कोलाहल ।

धुँआ (6) 

ये बादल धुएँ के बहुत कहर ढालते हैं
पूछ कर देखो जिन पर ये गिरते हैं
पता तो तब चलेगा, जब अपने पर गिरेंगे ।

फिर खड़े क्यों देख रहे हो तमाशा
जाकर सुनो कराह उस परिवार की
जिस पर गिरे हैं, ये बादल
और सुनो विलाप, अगर कोई बचा है, तो ।

पता चलेगा, कैसा क्रूर था वो क्षण
जिसने समय को बांधकर रख दिया
हमेशा के लिए, समाज की ठोकरें खाने के लिए ।

कैसा कलयुग आया है
मनुष्य ने बांध लिया है, समय को अपने में
और क्षण-प्रतीक्षण करता है प्रतीक्षा
कब इनका वार करूँ , धर्म की आड़ लेकर
अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए
और खुद लुप्त हो जाता है, इन्हीं बादलों में
और आनंद ले सके, उस नाश लीला की
बैठकर एकांत में, धुएँ की आड़ में ।

क्या यह धुआँ धर्म की श्वास है
क्या धर्म इसके बिना जिंदा नहीं रहेगा
या रूक जाएगी धड़कन धर्म की ।

धुँआ (7) 

इस धुएँ का प्रहार
बहुत प्रचंडित है ।

जरा ताडंव देखो इस नृत्य का
सरे आम कर नग्न स्त्री को
बलात्कार कर दिया जाता है
और फिर उस असहाय अबला को
वैसे ही मुद्रा में छोड़ दिया जाता है ।

यह सब इस लिए हुआ
क्योंकि उस स्त्री ने
पर धर्म के मानव को दिया था जन्म ।

धुँआ (8)

धुएँ का सबसे बड़ा दुश्मन
तर्क संगत होना है
क्योंकि, उसे तथ्य नाम की चीज से
बहुत डर लगता है ।

इसीलिए, रूढ़िवाद का ले सहारा
कर नफरत की खेती
कांटे ही कांटे बो देता है
समाज की हर गली कूचे में
ताकि सच्चाई की परछाई
उसे कहीं नग्न न कर दे ।

यह सब इसलिए होता है
उसे जमीर नाम की चीज से
बहुत डर लगता है
क्योंकि वह हमेशा तर्क-संगत होती है ।

धुँआ (9)

जब पड़ता है, कोहरा इस धुएँ का
कोई रास्ता नहीं दिखाई देता
सब खो कर रह जाता है
जीवन की राह में, पथभ्रष्ट होकर ।

आत्मा की रोशनी भी
रह जाती है, मंद पड़कर
और छोड़ देती है, साथ मनुष्य का
क्योंकि, उसने कर दी थी अनसुनी
आवाज अपनी ही आत्मा की
जब था उजाला राहों पर ।

समय बहुत था, संभलने का
समझाने का और मनाने का
अपने ही मंसूबों में
कैसे लगा सकूँ , दाव पर मानवता
धर्म के नाम पर ।

इससे अच्छा समय क्या होगा
ऐसे दावों को अजमाने का
जब फैला हुआ हो चारों तरफ
कोहरा ही कोहरा, इस धुएँ का ।

धुँआ (10)

यह धुआं बहुत जालिम है
पहले डालता है, दरार दिलों में
फिर फैलाता है, हाथ अपने
करने को देश के टुकड़े-टुकड़े ।

आपको क्या परवाह इल्जाम की
न फिक्र है, तबाही की
बहता है तो बहे खून
बन नाले और नदियां ।

यह खून काम आयेगा
लिखने पंक्तियां इतिहास की ।

यह खून काम आयेगा
सिंचने क्यारियां गुलशन की ।

यह खून काम आयेगा
अपने ही बुराईयों को धोने के लिए ।

मगर वह भूल गया
अगर खून से ही गुनाह धुलते
इन्सान पानी क्यों पीता
वह शुरू कर देता पीना खून ।

अगर ऐसा ही होता
न होती जरूरत भगवान को जन्म लेने की
और न होती उत्पत्ति धर्म की
इसलिए समझ लो, ए मानव
गहराई इस जालिम धुएँ की ।

धुँआ (11)

यह धुआं बहुत जानलेवा है
उसने त्रस्त किया है
सदियों से, मेरी मां मानवता को
एक बहुत ही, दुःखदायी रोग से
और कहते हैं, हम उसे कुष्ट रोग ।

सोचो विडंबना, उस बेसहाय मां की
जो लगाना चाहती है गले
चूमना चाहती है, उसका मस्तिष्क होठों से ।

क्या बेमिसाल ममता है, मां की
निर्दोष होकर भी, समझती है दोषी अपने को
और मानव है बेखबर
अपने ही अपराधों से ।

अपराध, वह स्वयं ही है, जन्म दाता
इस कुष्ट रोग का, जो जानलेवा है ।
धर्म के नाम पर
फैला रहा है, धुआं ।

धुँआ (12)

यह धुआं बहुत पीड़ा देय है
पूछ कर देखो उस अबला को
जिसका सुहाग यह निगल गया
और छोड़ गया उसे जिंदगी भर
तड़पने के लिए, कराहने के लिए
घुट-घुट कर दम तोड़ने के लिए ।

क्या वो जिन्होंने यह धुआं फैलाया है
कभी आयेंगे और देंगे उसे सहारा
और कहेंगे, उठो बहना, धीरज रखो
हम तुम्हें जिंदगी के अंधेरे से निकाल लेंगे ।

नही, वे कभी नहीं आयेंगे
क्योंकि जिस चिता में
इसका सुहाग जला है
वह चिता उनके लिए
एक लकड़ी से ज्यादा कुछ नहीं है ।

ऐसी लकड़ियों सें ही तो निकलता है
यह धुआं आतंकवाद का ।

पूछ कर देखो उस अबला से
कितना पीड़ा देय है
जब भारी होकर पड़ता है, यह धुआं ।

धुँआ (13)

यह धुआं बहुत निर्दयी है
पूछो न इसके वार को ।

जिस फूल के लिए
हवा का एक तेज झोंका ही
काफी है, उसे डाली से
अलग कर फेंकने के लिए
यह आता है पूरी आंधी से
और कर देता है, पंखुड़ी अलग अलग
पैरों तले रौंदने के लिए ।

उस निर्दयी धुएं ने यह न सोचा
निकल जांऊ जरा हटकर
इसमें पल रहा है, कोई बच्चा
जिसने अपनी आंखें भी नहीं खोली हैं
वह कैसे चलेगा उठकर जिंदगी की राह पर ।

तूने तो मार दिया माली को
वह कैसे करेगा आबाद
यह उजड़ा गुलिस्तांब ।

धुँआ (14)

यह धुआं बहुत घनघोर है
कर देता है भरे दिन में
अंधेरा एक अमावस्या की रात का ।

वह रात भी होगी कम भयानक
जब चंद्रमा का होगा पूर्ण अंधेरा
परंतु इस धुएं के बादल ने
दिन में भी कर दी है, राहें सुनसान
गलियों में कुत्ते भी नहीं भौंकते हैं, डर के ।

रात के सन्नाटे में कम से कम
हवाओ के चलने की आवाज तो सुनाई देती है
यहां तो दिन में भी
देख इस घनघोर धुऐं को
स्वयं को अपनी श्वास की आवाज नही सुनती ।

क्या खबर लेगा वो दूसरों की
पूरा का पूरा शहर सो कर रह गया है
भय और संताप की निद्रा में ।

सामने पड़ी लाश है
और डर के मारे
सिसकियों की आवाज भी
रह गई है, गुम होकर
कहीं सुन न ले, विलाप वो शैतान
जो रहते है, छिपे इन घनघोर बादलो में ।

धुँआ (15) 

यह धुआं बहुत दगाबाज है
कर देता है, पैदा हवाएं शक की
और आ जाता है, पतझड़ परस्पर विश्वास पर ।

सूखने लगती है, डालियां एक-एक कर
और घोंसले पक्षियों के
लगते है बिखरने, तिनका तिनका कर
क्योंकि, दरार पड़कर रह गई है, जमीन में
तना भी सह नही पा रहा है, भार अपना
पूरा-पूरा का पेड़ ही टूट कर गिर गया है ।

क्या जड़ से उखड़ा पेड़
लग पायेगा, जमीन में दुबारा कभी ।
हाँ वे जड़ें जिसमें नही लगी है दीमक
शायद जब कभी दुबारा आए बहार
फिर जाकर अंकुरित होगा, ये पेड़ टूटा हुआ ।

परंतु उस समय तक, समय बहुत बीत चुका होगा
जब तक वह बड़ा होगा और आयेगी नई डालियां
तब तक क्या वो पक्षी, जिनका वास था इन पर, रह पाएंगे
जो हुए थे कभी शिकार इस दगाबाज धुएं के ।

धुँआ (16)

यह धुआं एक जहरीली गैस है
जो कर देती है, अंधा मनुष्य को
उन नेत्रों को नहीं
जिससे वह देखता है, यह झूठा संसार ।
ले लेता हैं, रोशनी उन आंखों की
जो करती हैं, उजाला उसकी आत्मा में ।

इसलिए आंखों के होते हुए भी
वह अंधों की तरह दुनिया में चल रहा है
भागा जा रहा है, अंधाधुंध
भीड़ के पीछे स्वर्ग की चाह में
जो कह रहे हैं और भाग रहे हैं
इन्ही धुऐं के बादलों के पीछे
आ गया है दरवाजा जन्नत का ।

जब जाकर खटखटाता है
आती है आवाज उसे
ओ पागल तू क्यों भागा इतनी दूर
स्वर्ग का दरवाजा इन बादलों के पीछे नहीं है
यहां तो नगर है, शैतान का ।

मैं तो तेरे अंदर हूँ
खोल कर देख उन आंखो से
जिस पर जहर चढ़ा है, धुऐं का ।

कितनी विषैली गैस है, यह धुआं
पूछ कर देखो, उसे अपनी अंधी आत्मा से ।

धुँआ (16) 

यह धुआं एक जहरीली गैस है
जो कर देती है, अंधा मनुष्य को
उन नेत्रों को नहीं
जिससे वह देखता है, यह झूठा संसार ।
ले लेता हैं, रोशनी उन आंखों की
जो करती हैं, उजाला उसकी आत्मा में ।

इसलिए आंखों के होते हुए भी
वह अंधों की तरह दुनिया में चल रहा है
भागा जा रहा है, अंधाधुंध
भीड़ के पीछे स्वर्ग की चाह में
जो कह रहे हैं और भाग रहे हैं
इन्ही धुऐं के बादलों के पीछे
आ गया है दरवाजा जन्नत का ।

जब जाकर खटखटाता है
आती है आवाज उसे
ओ पागल तू क्यों भागा इतनी दूर
स्वर्ग का दरवाजा इन बादलों के पीछे नहीं है
यहां तो नगर है, शैतान का ।

मैं तो तेरे अंदर हूँ
खोल कर देख उन आंखो से
जिस पर जहर चढ़ा है, धुऐं का ।

कितनी विषैली गैस है, यह धुआं
पूछ कर देखो, उसे अपनी अंधी आत्मा से ।

धुँआ (17)

यह धुआं बहुत चपल है
इसकी चाल पहचाननी बहुत कठिन है
देखकर रूख तट का
बदलता है, यह बहाव अपना ।

कहीं तो विनाश करता है, भरमार
गांव के गांव, शहर के शहर
आ जाते हैं, चपेट में इसकी
और कहीं टकरा के तटों से
रह जाता है, मार कर उछाल ।
परंतु फिर भी छोड़ जाता है, पीछे
निशान अपनी धार के बहाव के ।

धार जो वार करती है जब
छोड़ जाती है घाव कटाव के
घाव गहरे भी हो सकते हैं
और हो सकते हैं, खरोंच भर भी ।

घाव अपंग भी बना सकते हैं
और उतारकर तलवार हृदय में
फेंक सकते हैं, बनाकर लावारिस लाश भी ।

इसलिए समझने की कोशिश करें
इस धुऐं की चपलता को
और धार इस धुऐं के वार की ।

धुँआ (18)

यह धुआं बहुत बहरूपिया है
इसकी आवाज में है, वाणी संतो की
गहराई है, जीवन के दार्शनिकता की
मिठास है, सभ्यता और मानवता की
परंतु जब कोशिश करेंगे
इसे सुनकर समझने की
पाओगे एक विशेष अंतर ।

यह समय की आवाज नहीं है
इसमें तो सुनाई देता है
एक सुर दुहाई का
कि धर्म संकट में है
शायद अपने हितों को
संकट से उभारना चाहते हैं
इसलिए उन्होंने पहना दिया है
इस धुएं को एक चोला धर्म का ।

चोला धर्म का, जिस पर लिख दिया है
कि धर्म संकट में है
उसे उबारना है, चाहे धार्मिकता को दांव पर लगाना पड़े ।
दांव पर लगी थी द्रौपदी भी कभी
शिकार हुई थी, इसी बहरूपिये धुएं की ।

धुँआ (19)

यह धुआं कलंक है
हाँ, इतना आसान नहीं है
इतना बड़ा आरोप लगा देना ।

इसके शिष्य मान इसे धर्म युद्ध या जिहाद
इस काले धुएं को
रंग देना चाहते हैं
खून के रंग से
और चल पड़े है, गीत गाते वीरता के
एक अन्जान रण-भूमि की ओर ।

यह रण भूमि कोई मैदान नहीं
वो तो गली-कूचों में बने पूजास्थल हैं
जिन्हें कर नष्ट हाथों से,
वही हाथ जिसमें पकड़ते है धर्म-ग्रंथ
मनाते हैं, खुशियाँ जीत की
फहराते हैं, पताका अपने धर्म चिन्ह की ।

परंतु पताकों पर नहीं दिखाई देते
धब्बे उन बेकसूर मनुष्यों के खून के
जो निसंदेह हैं, कलंक के ।

धुँआ (20)

हम कोशिश करेंगे, समझ सकें
अर्थ इस धुऐं का
परंतु यह सिर्फ एक शब्द ही नहीं है
ढूंढ सकें , इसे किसी शब्दकोष में ।

यह तो एक विवाद है
इसे हम सामाजिक कहें
या रूप दें धार्मिकता का ।

विवाद को सुलझाने में
एक प्रश्न उठता है
समाज बड़ा या बड़ा धर्म ।

पाऐंगे न समाज, धर्म के बिना कुछ है
और न ही धर्म, समाज के बिना ।

इसलिए दोनों एक दूसरें को
एक दूसरे से बड़ा समझना छोड़ दें
देखोगे मानव धर्म को समझने लगेगा
वह धर्म को मानवता के समीप ले जाएगा ।

मानवता और धर्म के इस मिलन से
समाज बटने से बच जाएगा
इस प्रकार हम सब समझ पाएंगे
अर्थ इस आतंकवाद के धुऐं का

धुँआ (21)

मैं भी कितना पागल हूँ
धर्म ग्रंथों के होते हुऐ भी
इस धुऐं का चला हूँ , अर्थ बताने
धर्म ग्रंथ तो स्वयं एक ज्योति है ।

‘‘ज्योति जो सिर्फ आत्मा में जलती है
वरना धर्मग्रंथ एक कागज से
ज्यादा और कुछ नहीं’’ ।

इसलिए जब पढ़ते हैं, ये धर्म ग्रंथ
सिर्फ अपने मस्तिष्क से ही काम न लें
मस्तिष्क तो दुनियादारी का साधन है ।

ना ही अपने दिल से
प्रभावित हों
दिल में एक स्वाभाविक झुकाव होता है ।

यदि आत्मा का आंशिक योगदान है
निश्चय ही, जीवन में प्रकाश होगा
उसमें लौ ही होगी, चाहे थोड़ी ही हो
परंतु विश्वास रखो धुआं नही होगा ।

धुँआ (22)

इस धुऐं के स्थान पर
आंधी क्यों नहीं आ जाती
जो झकझोर दे, मनुष्य के मस्तिष्क को
मस्तिष्क जिसमें चली जा रही है
चालें शतरंज की
और लगी है दाव पर मानवता ।

इस धुऐं के स्थान पर
तूफान क्यों नही आ जाता
जो टुकड़े-टुकड़े कर दे
मनुष्य के हृदय को ।

हृदय जिसमें बह रही है, मानवता
सिर्फ स्वयं के लिए
ओर है पत्थर वही दिल
अपनी मां-मानवता के लिए ।

धुँआ (23)

इस धुऐं के स्थान पर
भूचाल क्यों नहीं आ जाता
जो रौंद डाले
मनुष्य की आत्मा को ।

आत्मा जिसकी आवाज दब चुकी है
इस दुनिया के शोर में
और न सुन सके कराह, अपनी माँ की ।

ओ मानव ले आओ, आंधी क्रांति की
और तूफान निश्चय का
भूचाल अपने सार्थक विचारों का
तकि रौंद सके, हर उस व्यक्ति को
जो जन्म देते हैं, इस धुऐं को ।

इस धुऐं के बादलों में
एक अनूठा वातावरण है
सन्नाटे और चीख के बीच
अपनी ही आंख मिचौली है ।

मगर क्या पता इस वातावरण को
यह आंख मिचौली
बच्चों का खेल बनकर रह गया है
बड़े बनने के लिए
मानवता की आंख पर पट्टी है
और मानव उससे खेल रहा है ।

हाँ, अगर मानव की जगह
बच्चे होते, तो मंजूर था
सोचकर यह कि माँ
बच्चों का दिल बहला रही है
खेल-खेल में
जीवन की राह दिखा रही है ।

परंतु इस धुऐं की
आंख मिचौली में
तो बच्चे पिस रहे हैं
बे-मौत मर रहे हैं
जीकर भी अधमरे हैं
क्योंकि सन्नाटे और चीख की
इस आंख मिचौली में
पट्टी बंधी हुई है
इन्सानियत की आंखों पर ।

जब कोई मानव भौंकता है कटार उसमें
चीख ही चीख सुनाई देती है
जैसे बिजली आसमान फाड़ रही है
और फिर हो जाता है
सन्नाटा चारों तरफ ।

इस धुऐं के बादलों में
एक अनूठा वातावरण है
सन्नाटे और चीख के बीच ।

धुँआ (24)

क्या ये धुऐं के बादल भी पेशेवर हैं
वैसे ही जैसे होते हैं, पेशेवर खूनी
या होते हैं जैसे पेशेवर तस्कर
या जिनका व्यवसाय होता है, पेशेवर दलाल
या फिर समाज के पेशेवर चोर और डाकू ।

हाँ इन धुऐं के बादलों को
यदि कहे पेशेवर खूनी
कोई भी नहीं करेगा इंकार ।
सड़को पर पड़े खामोश शव
बहुत हैं कहने को
हम नहीं मरते बेमौत
अगर ये पेशेवर बादल न होते ।

हाँ, ये झूठे गवाह भी है
जो समाज में, भरे चौराहों पर
डंका बजाकर घोषणा करते हैं
धर्म संकट में है ।
जबकि संकट में थे, हित उस अपराधी के
जिसने उन्हें भेजा या चौराहों पर ।

यदि हम कहते हैं, ये बादल
पेशेवर तस्कर हैं, इसका भी सबूत है
जंगलो में रहने वाले फकीर
वातानुकूलित घरों में अपना डेरा न डालते ।

अब प्रश्न उठता है क्या ये बादल
पेशेवर दलाल भी हैं
बिना झिझक हम हाँ कहेगें
नहीं तो मानवता के खूनी
हमेशा कैसे खून कर जाते ।

बादलो को हम कहें, चोर या डाकू
कोई अंतर नही पड़ता
क्योंकि मानवता की पूंजी
जो इन धर्म ग्रंथों में संचित है
लुटती जा रही है, दिन-प्रतिदिन ।

यदि ये धुऐं के बादल इतने पेशेवर गुनाहगार हैं
हमें इनके पेशे पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना होगा
इससे पहले के ये बादल पेशेवर वैश्या का रूप ले लें
इन्हें पूर्ण सामाजिक बनाना होगा ।

धुँआ (25) 

यह धुआं सिर्फ कल्पना नहीं है
न ही कविता की पंक्तियां
न ही व्यक्तिगत उपदेश
और न ही कोई राय
ये तो एक वास्तविकता है ।

क्या मैं इस वास्तविकता से
अपने आपको मारकर इससे समझौता कर लूँ ।

नही, मै क्यो करूँ
हिंदू होकर नफरत एक मुसलमान से
क्या जाने अगले जन्म में
काशी के स्थल पर हो दीदार-ए-मदिना ।

नही, मैं क्यो करूँ
सिक्ख होकर दुआ एक ईसाई से
क्या जाने अगले जन्म में
कृपाण की जगह ले ले ये क्रास ।

नहीं, मैं क्यों करूँ
ईसाई होकर नफरत एक मुसलमान से
क्या जाने अगले जन्म में
क्रास की जगह चांद ले ले ।

नही, मै क्यो करूँ
मुसलमान होकर नफरत एक हिन्दू से
क्या जाने अगले जन्म में
मेरी मौत के बाद, दफनाने की जगह जलाया जाए मुझे ।

नही, मै क्यो करूँ
मानव होकर नफरत एक मानव से
क्या जाने आने वाले समय में
मानवता-मानव को जन्म देने से न कर दे इन्कार।

धुँआ (26) 

क्या धुआं सबकी समस्या नहीं है
यदि नही तो, इसे क्या नाम दें
उसे कहें जिंदगी की मूलभूत जरूरत
या है हर धर्म की मूलभूत आवश्यकता
या मान लें, इसे समाज का एक अभिन्न अंग ।

यदि इसे हम जिंदगी की जरूरत मान लें
फिर क्यों इसकी कटु आलोचना
आलोचना तो विवाद की होती है
अगर ये विवाद नहीं है
इसे जीवन का सत्य क्यों न मान लें
और यदि इस धुऐं का अस्तित्व सत्य है
यह बेझिझक क्यों न मान लें
सत्य आत्मा नहीं, सत्य शरीर है ।

यदि हम इसे धर्म की मूलभूत आवश्यकता मान लें
फिर क्यों इसकी दार्शनिकता पर प्रश्न चिन्ह
प्रश्न चिन्ह तो सवाल पर लगता है
अगर यह सवाल नहीं है
इसे धर्म ग्रंथ का उपदेश क्यों न मान लें
और यदि यह धुआं , धर्म ग्रंथ का उपदेश है
यह वे झिझक क्यों न मान लें
सत्य दार्शनिकता नहीं, सत्य रूढ़ीवाद है ।

यदि इसे हम समाज का अभिन्न अंग मान लें
फिर क्यों इसकी बर्बरता पर रोष
रोष तो दुश्मन पर होता है
यदि यह दुश्मन नहीं है तो
इसे समाज का हितैषी क्यों न मान लें
और यदि यह धुआं समाज का हितैषी है
तो यह बेझिझक क्यों न मान लें
कि सत्य मानवता नहीं, सत्य ‘‘मैं’’ है ।

धुँआ (27)

शहर में कहीं दूर, बहुत दूर से
धुऐं के बादल उठने लगे
और सोचने लगा
कौन-कौन बने होंगे
शिकार इस जाल के ।

इसलिए काट दो इस जाल को
न रहे निशानी किसी गांठ की
इर गांठ कहती है, कहानी एक स्वार्थ की
और मनुष्य इन्हें बुनता ही जा रहा है
बिना सोचे कौन शिकार हैं, इस जाल का
उसे क्या पता है, वह बेखबर है
अपनी ही कूटनीति की दुनिया में मगन है
और बुनता जा रहा है एक जाल
जो दे रहा है जन्म इस धुऐं को नित्य-प्रतिदिन ।

धुँआ (28)

क्या हमने कभी कोशिश की है
सीखने की, इस धुऐं के बहाव से
जो सदियों से बह रहा है
मानवता के जीवन में ।

यदि नही तो समय आ गया है
सीख लो कुछ सीख
इस लंबे मानव इतिहास में
जिसमें मानवता का अंश बहुत आंशिक है ।

कहीं यह हवा
जो प्रकृति की देन है
गुम होकर न रह जाए
इस धुऐं के बादलों में पूर्णतः
जिसमें सिर्फ दम घुटता है ।

धुँआ (29)

यदि कोई यह कहे कि यह धुआं
धर्म को निखारता है
मैं इसे मानने को तैयार नहीं
क्योंकि यह कोई जलप्रपात से उठता
मनमोहक प्राकृतिक धुआं नहीं है
यह तो धर्म पर लगा दाग है ।

यदि कोई यह कहे कि यह धुआं
धर्म ग्रंथ की ओढ़नी है
मैं इसे मानने को तैयार नहीं
क्योकि यह नीले अंबर में
तारों से सजी प्राकृतिक चादर नहीं
यह तो धर्म पर लगे
मानवता के खून के धब्बे है ।

यदि कोई यह कहें कि यह धुआं
धर्म गुरूओं की देन है
मै इसे मानने का तैयार नहीं
क्योंकि यह कोई गंगा से बहता
पवित्रता से भरा प्राकृतिक जल नहीं है
यह तो धर्म के नाम पर बहती गंदगी है ।

धुँआ (30)

क्या धुएँ के साए में
कभी कोई फूल खिला है
यदि नहीं, तो आतंकवाद रूपी धुएँ
के साये में कोई धर्म पल सकता है
यह एक प्रश्न है, जो विचारणीय है ।

यदि नहीं तो मानव समझ ले
क्या आवश्यकता थी
भगवान को मानव बनाने की
वह मानव को जानवरों की तरह
दिल और आत्मा देकर रह जाता ।

हां, यदि मानव को भगवान ने
दिमाग रूपी हीरे से सजाया है
तो क्यों न इसका मूल्यांकन करें
और इस आतंकवादी धुएँ से
मानवता रूपी कोहिनूर को
काला पड़ने से बचा लें ।

धुँआ (31)

मैं उन गोलीयों से
जिससे मुझे लगा
यहां धुँआ उठने वाला है
चुपचाप गुजर रहा था ।

लगा ऐसे कि
यहां तो उत्सव की तैयारियां
हो रही हैं
वीरता और बहादुरी की
कहानियां और गीत
गाए और सुनाए जा रहे हैं
धर्म गुरूओं का नाम लेकर
दुहाई ही दुहाई है ।
धार्मिक नारों का बोल बाला है

सोचकर, शायद
किसी देवता पर
बलि की भेंट चढ़ने वाली है
मैं चुपचाप गुजर गया ।

धुँआ (32)

क्या इस धुएँ की क्रूरता पर
कोई कानूनी प्रतिबंध लगाकर
इसे खत्म कर सकते हैं ।

अथवा इसकी विनाशलीला पर
कड़ी सजा का भय देकर
इसे कम कर सकते हैं ।

नहीं, यह धुँआ
न किसी कानूनी प्रतिबंध से
न किसी सजा के भय से
और न ही
समाज निष्कासन के आरोप से
कम हो सकता है ।

यह धुँआ तो हमेशा के लिए
अपने आप ही
मिटकर रह जाएगा
यदि मानव अपने धर्म की अहं मिटा ले ।

धुँआ (33)

मैं एक चित्रकार के पास गया
जो अपने रंगो से
इस धुएँ का चित्र बनाकर
समाज के सामने
प्रदर्शनी में रख सके
ताकि वह मानव को
अपने ही कुकर्मों का रूप दिखा सके
उसे अपनी ही आत्मा का
काला रंग दिखाई दे सके ।

उस चित्रकार ने पूछा
बताओ मुझे उन दीवारों को
जहां धुएँ का चित्र प्रदर्शन करना है
देखकर उन दीवारों को
चित्रकार ने कहा
कल यह कमरा प्रदर्शनी के लिए
तैयार हो जाएगा
समाज इसका अवलोकन कर सकेगा

परंतु घंटे बीत गए, पहर बीत गये
दिन पर दिन बीत गये, सालों बीत गये
मगर किसी की हिम्मत नहीं हुई देख सकूं
अपने ही आत्मा के घिनौने स्वरूप को
जिसे उस चित्रकार ने अपने ही खून के रंग से
दिया था स्वरूप उन दीवारों पर धुएँ के चित्र को ।

धुँआ (34)

क्या इस कविता की पंक्तियों से
धुएँ का भाव साफ होकर
समाज के सामने आ सकेगा ।

भाव समझ भी लिया यदि मानव ने
क्या उसे अर्थ दे सकेगा
या फिर उसे मंचो पर सुनाकर
मानवता की दुहाई देकर
चुपचाप उन्हीं गलियों में वापिस जाकर
इसी धुएँ में रहने का
आदि तो नहीं हो जाएगा ।

यदि होगा, क्योंोकि यह भाव नया नहीं है
न ही धर्म ग्रन्थों के उपदेशों से ज्यादा मूल्यवान है
यदि समझ सकते हो गहराई
धार्मिक उपदेशों के दार्शनिकता की
न उठता प्रश्न सपने में भी
इस धुएँ के उद्गम का ।

धुँआ (35) 

इस धुएँ का सबसे बड़ा कारण
यह है कि मानवता का हृदय
समाज में छिन्न-भिन्न हुआ पड़ा है
और सब लिए फिरते हे इन टुकड़ों को
और उससे भी विचित्र
कोई पहचान नहीं रह गई इन टुकड़ों की ।

किसी को महसूस नहीं हुआ
कि ये रो रहे हैं
‘‘हम टुकड़े नहीं वस्तु के
हम टुकडे़ हैं दिल के
दिल जो किसी मां का है
मां जिसने सभी धर्मों को जन्म दिया ।

जोड़ो इनको, जो जोड़ सको
इससे पहले कि धड़कते टुकड़े
कहीं धड़कना न बंद कर दें ।

इन्हीं धड़कनों में
धड़कते हैं, दिल असंख्य ।

महसूस करो धड़कन इन टुकड़ों की
आवाज सुनो उनके रोने की ।

वो रो नहीं रहे, रहे हैं भर सिसकियां
सिसकियां जो दबकर रह गई है
धर्म के झुठे नारों में ।

नारे जो हल्ला कर रहे हैं
जिसमें नहीं कोई राग, विराग का ।

हो जाओ पूरे वैरागी पाओगे ये टुकड़े
किसी वस्तु के नहीं, बल्कि मानवता के हैं ।

यह उतना ही कट्टर सच है
जितना कोई कट्टर धार्मिक
इसलिए सच्चा कट्टर धार्मिक वही होगा
जो इस धुएँ का दुश्मन होगा ।

धुँआ (36)

यह धुँआ बड़ा विचित्र है
जिसमें कई रंग भरे हैं
इन्हे नाम दूँ, इन्द्र धनुष का
या कहूँ, है रंग गिरगिट का ।

इस धुएँ के जन्म का कारण
मानव की धर्म के पीछे अंधी दौड़ है
परंतु भगवान ने धर्म
इसलिए, नहीं बनाया कि मनुष्य बनाऊँ
और उसे जगह दूँ स्वर्ग या नरक में ।

यदि ऐसा होता वो खुद ही
दो दुनिया बना देता, परंतु नहीं किया ।
उसने धर्म बनाया, मानवता के लिए
पूजास्थल बनाये, उसने पूजन के लिए
और मानव बनाया, ब्रह्मांड को सुगंधित करने के लिए
न कि दूषित करने के लिए धुएँ से ।

धुँआ (37)

मैं इस धुएँ के होते हुए
और ज्यादा नहीं लिख सकता
मानव के लिए, एक शब्द भी ।

मानव जो पलता रहा
आज तक मानवता के आंचल में
और खेलता रहा
आज तक मानवता की गोद में
और मानव जो जीता रहा
आज तक मानवता की धड़कन से ।

‘‘ धड़कन जो मानवता के हृदय में है
हृदय जो अंबर से भी विशाल है
और मानव उस विशाल हृदय की एक सांस है
एक धड़कन से ज्यादा और कुछ नहीं ’’
और वही मानव धड़कन आज चली है
मानवता की हृदय गति रोकने i

इसलिए में कुछ नहीं लिख सकता
सिवाय मानवता के, मानव के लिए ।

धुँआ (38)

इन धुएँ के बादलों से ऊपर उठकर
जीना ही, जीवन मूल्य होगा ।

हम व्यर्थ ही चाह कर लेते हैं
इस नाशवान शरीर को मूल्यवान बनाने की
जीवन मूल्यों को, धुएँ के व्यापारियों के हाथ
परंतु अंत में, हाथ कुछ आता नहीं
रह जाता है, यह मानव शरीर एक मुट्ठी राख ।

ठीक पूछा क्या मूल्यवान व्यक्ति
एक मुट्ठी राख नहीं बनता ।
हां वह भी एक मुट्ठी राख से
ज्यादा और कुछ नहीं, कुछ भी नहीं ।

यदि मानव, इस मुट्ठी भर राख की कीमत जान ले
इस धुएँ का उठना, अपने आप ही बंद हो जाएगा ।

धुँआ (39)

यह कवि स्वयं भी
अपने जन्म से पहले ही
शिकार हुआ था
धुएँ के बादल का ।

जब देश आजाद हो रहा था
इन धुएँ के बादलों से
और मेरे होने वाले माता पिता का
घर जलकर राख हो रहा था ।

यहां तक इस धुएँ की लपटों ने
छत के साये तक को भी जला दिया था
और रह गई सड़कें आशियां बनकर ।

मेरा भाग्य जो लिखा जा रहा था
विधाता के घर में
इस धुएँ से धूमिल हो रहा था
परंतु क्या मानते हम हार
इस धुएँ की बर्बरता से ।

यह धुँआ तो हमें
और मजबूत बना रहा था ।
बता दें इस धुएँ के बादलों को
ये भाग्य की लकीरें
किसी मिट्टी के ढेर पर नहीं बनी
ये मेहनत के पत्थर पर उभरी हैं
जो निश्चल रहता है, धुँआ कैसा भी हो ।

धुँआ (40)

मैं कैसे भूल सकता हूँ
इस धुएँ के घाव को
जिसने मेरे मात-पिता
मेरे भाई-बहिन
और ऐसे ही लाखों परिवारों को
चाहे वो सीमा के इस पार हों
या आज रहते हों उस पार
रख दिया था बनाकर घर से बेघर ।

घर बहुत है मुश्किल बनाना
इसलिए देश बनाने की चाह में
बसे घरों को मत उजाड़ो ।

धुँआ तो घरों को
उजाड़ने के लिए ही बना है
इसे अपने स्वार्थो को बसाने के लिए
कभी मत देना कोई-बुलावा
वरना ब्रम्हांड में मानव नहीं, मानवता नहीं
सिर्फ धुँआ ही धुँआ रहेगा, भूत के बसेरों का ।

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