हरे प्रकाश उपाध्याय की रचनाएँ

हाशिया 

1

लिखने से पहले
निकाल देता हूँ हाशिए की ज़गह
हाशिए से बाहर
लिखता चला जाता हूँ

पूरे पृष्ठ में कोरा
अलग से दिखता है हाशिया
मगर हाशिए को कोई नहीं देखता
कोई नहीं पढ़ता हाशिए का मौन

हाशिए के बाहर
फैले तमाम महान विचार
लोगों को खींच लेते हैं
खींच नहीं पाती हाशिए की रिक्ति
किसी को…

2

एक कवि जब हाशिए के बाहर
व्यक्त कर लेता है अपना विचार
हाशिए के बारे में भी
लिख लेता है अपनी कविता

और नहीं मिलती उसे कोई जगह
तो आकर
हाशिए में लिखता है अपना नाम
एक बार फिर…

विमर्श

लोग सरकारी दफ़्तरों में भकुआए हुए घूमते हैं
इस मेज़ से उस मेज़ पर दुरदुराए जाते हुए
लोग कोर्ट-कचहरियों में लूट लिए जाते हैं
धक्के खाते हैं
लोग भूखे रह जाते हैं
भविष्य के लिए थोड़ा सा अन्न बचाते हैं
लोग साधारण सुविधाओं के लिए तरस कर रह जाते हैं

एक तिहाई से भी अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हैं
बेरोजगारों की फौज़ रेलों में लटककर
देश भर में काम खोज़ती घूम रही है
लोग चन्द हज़ार के कर्ज़े चुकाने में अपनी धरती से हाथ धो बैठते हैं
लोग खेत से लौटते हैं और फाँसी लगा लेते हैं
ज़हर खा लेते हैं
लोग राजनीति पर थूकते हैं

तो विश्वविद्यालय में मलाई मार रहा एक अध्यापक कहता है
जनता अराजनीतिक हो गई है
यह जनता के भविष्य के ख़िलाफ़ है
एक वामपंथी सरकारी अधिकारी कहता है
जनता में लुम्पेनगीरी बढ़ रही है
तरह-तरह के रंगों वाली सरकारों से अनुदान पाकर नाटक करने वाला
एक नटकिया कहता है कि खतरनाक है जनता की राजनीति से चिढ़

वह राजनीतिक पक्षधरता के विलुप्त हो जाने का राग अलापता है
अपनी बीवी को सड़क पर घसीटकर बाहर कर देने वाले एक क्रांतिकारी
अध्यापक को याद आती है रघुवीर सहाय की संदर्भ से भटकायी गई पंक्तियाँ
‘‘एक मेरी मुश्किल है जनता
जिससे मुझे ऩफ़रत है
गहरी और निस्संग…’’
एक भगवाधारी कहता है- सब प्रभु की माया है
समाजवादी कहता है कि बगैर सोशल इंजीनियरिंग के नहीं टिक सकती राजनीति…

नागरिक

उसके घर जब आकर रहने लगे
दु:ख अभाव और उनकी सगी कलह
तो वह भागकर कमाने मुम्बई चला गया
वहाँ से भगाया गया
धरती पुत्रों ने भगाया उसे
उसके बाद वह सूरत गया, बंगाल गया
नेपाल गया
कई-कई शहरों में कई-कई बार गया
कहीं दोस्तों ने ही ठग लिया
कहीं उसके मालिकों ने मार लिया मेहनताना
और भगा दिया
कहीं बीमारी और मौत से लड़ते-लड़ते वह भागा
मारा-मारा फिरता रहा
एक अदद काम की तलाश में
पूरी जवानी की यही रही कहानी

एक दिन कबूतरबाज़ों के हत्थे चढ़ा
तो अपने हिस्से में मिली एक कोठरी भर की ज़मीन बेचकर
चला गया दूर अरब के देश में

वहाँ भी उसका मालिक
उठाता है उसकी मज़बूरी का फ़ायदा
जब न तब बिना बात के काट लेता है पैसे
बोनस में अपमान का करता है भुगतान

अब वह जाए तो कहाँ जाए
अब वह लौटे तो किसके पास लौटे
किस ठिकाने पर लौटे
निगोड़ा घर भी बिक गया
जो होता तो लौटने का एक बहाना तो होता
अब वह उस देश में कैसे लौटे
जहाँ बिक गई उसकी धरती
बिक गया आसमान…

कहने को मगर
वह अब भी एक देश का नागरिक है…

भारत माता के बेटे 

यह भाई जो दिन-दिन भर
रोज़ रिक्शा चलाता है
दो-चार रुपये के लिए झिक-झिक झेलता है
बेवजह अपमान झेलता है मार खाता है
जिसके पेट में भूख हरदम अंतड़ियाँ चबाती रहती हैं
भारत इस भाई का भी तो है

यह भाई जो दिन भर ठेले खींचता है
और जिसके बच्चे मिठाई के लिए तरसते हैं
जिसके बच्चों के लिए नयी कमीज़ें दिवास्वप्न की तरह हैं
भारत इस भाई का भी तो है

यह भाई जो खेतों में
अपनी हड्डियाँ गलाता है
पसीने से सींचता है अन्न के दानों को
जिसके बच्चे दूध के लिए तरस कर रह जाते हैं
जिसकी बिन ब्याही बेटी पिता की दु:ख की पोटली लिए कुएँ में कूद जाती है
भारत इस भाई का भी तो है

यह भाई जो फूटपाथ पर
जूते सिलता है
और जिसके पाँव बिवाइयों से पटे हैं
भारत इस भाई का भी तो है

यह भाई जिसका भाई
इलाज़ के अभाव में मर गया
और जो चन्द रुपयों की दवाई ख़रीद न सका
जो अस्पतालों स्कूलों और कचहरियों में घुसते हुए डरता है
भारत इस भाई का भी तो है

यह भाई जिसके पिता
साहूकार से लिए चन्द हज़ार रुपये की कर्ज़ न चुका पाए
और अपमान व ज़िन्दगी की दिक्कतों से भागकर
गरदन में गमछा बाँधकर पेड़ से लटक गए
भारत इस भाई का भी तो है

यह भाई जिसके बेटे को
पुलिस ले गई
आतंकवादी कहकर
जो दरअसल बेरोज़गारी-अभाव के आतंक से बौखलाया
मारा-मारा घूम रहा था
जिसके चेहरे पर हल्की दाढ़ी थी
भारत इस भाई का भी तो है

क्या आप इन भाइयों को बता सकते हैं
संविधान में दर्ज़ समता बंधुत्व न्याय स्वतंत्रता के अर्थ
क्या आप बता सकते हैं इन्हें विकास का अर्थ
क्या आप बता सकते हैं इन्हें नयी शताब्दी का अर्थ
क्या आप बता सकते हैं डिज़िटल इण्डिया के मायने

ये किससे करें ‘मन की बात’
क्या आप बता सकते हैं…?

इन्तज़ार

क्या वह दिन कभी आएगा
जब हरचरना भी पेट भर पाएगा
सबकी आवाज़ में आवाज़ मिला अमन का गाना गाएगा

वह दिन कब आएगा
जब हरचरना का बेटा भी साहेब के स्कूल में पढ़ने जाएगा
जब वह भी साहेब बन संसद पर अपनी पतंग उड़ाएगा
मनचाहे कोई नौकरी से उसे निकाल नहीं पाएगा
कोई मालिक कोई गुलाम नहीं रह जाएगा

आखिर वह दिन कब आएगा
जब हरचरना भी साहेब के संग कुर्सी पर बैठ बतियाएगा
कोई बड़ा कोई छोटा नहीं रह जाएगा
हर हाथ कमाएगा
हर मुँह पेट भर खाएगा

दिन वह कब आएगा
जब नहीं बुधिया का बेटा उपास रह जाएगा
वह भी कटोरी भर दूध पाएगा
कोई भूखा नहीं रह जाएगा
कोई नंगा नहीं छूट जाएगा
लूटेरा जब कोठियों में नहीं, जेल में रह पाएगा
क्या वह दिन सचमुच में आएगा

आखिर वह दिन कब आएगा ?

जिन चीज़ों का मतलब नहीं होगा

मैं भारत में नहीं रहता हूँ
मैं अपने घर में रहता हूँ
मेरे घर का कोई नाम नहीं है
मेरे घर की बगल में कई घर हैं
सबके अपने-अपने घर हैं
सबके घर में अपना-अपना प्यार
बहुत हुआ तो मिल-जुल आए किसी तीज-त्योहार

मैं अपने घर में रहता हूँ और कई बार
मुझे लगता है मैं बेघर रहता हूँ
घर की छप्पर पर रूक नहीं पाती बारिश धूप सर्दी
मैं मौसम की मार हरमेश अपने सिर पर सहता हूँ

मन्दिर बहुत हैं
घर बहुत कम हैं
घर में भी मन्दिर है
मन्दिर में मूर्तियाँ रहती हैं
मैं मूर्तियों-सा नहीं रहना चाहता हूँ

मैं किसी बात पर अड़ता हूँ
किसी बात से डरता हूँ
किसी से घृणा, किसी से मुहब्बत करता हूँ
मैं फ़ैसले करता हूँ
मैं मौक़े आने पर घर बदलता हूँ
आपसे मैं कह सकता हूँ
रहने दीजिए अपने चढ़ावे पान फूल इत्र सुगन्ध

मैं घर से निकलकर कुछ देर में घर लौटता हूँ
घरों के बीच
मैं बहुत सारे घरों के बारे में सोचता हूँ
घरों के बारे में सोचते हुए मैं
दरअसल घरों में रहनेवाले लोगों के बारे में सोचता हूँ
मुझे उन लोगों के बारे में भी सोचना होगा जिनके घर नहीं हैं

जिनके घर नहीं हैं
दरअसल वे बेघर नहीं हैं
उनके भी घर हैं
उनके घर में भी उनके अपने-अपने डर हैं
उनका पता अभी दर्ज होना है मतदाता-सूची में
उनके पास खोने को कुछ नहीं
पर उन्हें भी दाता होना है
उन्हें ही दरअसल भारत का भाग्य-विधाता होना है

घर गिने जाएँगे
जब चुनाव आएँगे
दरअसल जब घिरे गिने जाएँगे तो लोग गिने जाएँगे
उनमें रहनेवाली परेशानियों को नहीं गिना जाएगा
परेशानियाँ अपने नहीं गिने जाने पर घर में कलह मचाएँगी
बरतन बजेंगे
ज़ोर-ज़ोर से लोगों के बोलने की आवाज़ें आएँगी
उन आवाज़ों का कोई मतलब नहीं निकाला जाएगा इस जनतन्त्र में…

जिन चीज़ों का कोई मतलब नहीं निकाला जाएगा
वे चीज़ें भी रहती आई हैं घर में साधिकार
और रहती रहेंगी लगातार

घर से निकलेंगे लोग
और मैदान में खड़े होंगे तो गाएँगे
राष्ट्रगान
भारत माता की जय बोलेंगे
हाथ लहरा के मुट्ठी बाँध के बोलेंगे
भारत माता की जय
हिन्दू होंगे जो
मुसलमानों को देखकर मुस्काएँगे
मुसलमान होंगे जो नज़रें फेर गुस्साएँगे

भारत माता को कोई मतलब नहीं कौन क्या चिल्लाया
नेता क्या बोला
अफ़सर क्या बोला
मास्टर क्या बोला
भारत माता को कोई मतलब नहीं कौन क्या चिल्लाया

भारत माता को अपने घर नहीं लाए~मगे लोग
भारत माता को अस्पताल नहीं ले जाएँगे लोग
भारत माता को पार्क में नहीं टहलाएँगे लोग
लोग छुट्टियां मनाएँगे
सिनेमा देखने जाएँगे
सिनेमा में एक नकली हीरो, हीरो हो जाएगा
असली भारत में एक नकली सिनेमा की तर्ज पर कई नकली फ़िल्में बनेंगी
फ़िल्मों में गाना होगा नाच होगा लड़ाई होगी
बहुत हुआ तो अँग्रेज़ होंगे देशभक्त होंगे
भारत माता तो नहीं होगी फ़िल्मों में
जैसे देशभक्त नहीं होंगे दर्शकों में
क्या, आपको क्या लगता है…?

छुट्टियों के बाद अपने-अपने काम पर चले जाएँगे लोग
काम से लौटकर घर आएँगे
बहुत हुआ तो
अपनी-अपनी माता के पैर दबाएँगे लोग
भारत माता फिर किसकी माता है
छब्बीस जनवरी के दिन राजमिस्त्री धड़ाधड़ घर की ईंटे जोड़ते हुए
मज़ाक में पूछता है
भारत माता किसकी माता है…
इस सवाल का कोई मतलब नहीं होगा जनतन्त्र में
पर जिन चीज़ों का मतलब नहीं होगा…
वे भी होंगी

बॉस और बीवी

वह जो मेरा बॉस है
आख़िर रोज़ क्या लेकर लौटता होगा अपने घर
अपनी प्रिय बीवी के लिए
क्या वह अपनी बीवी से
उमगकर करता होगा प्रेम
घर लौटकर चूमता होगा बेतहाशा उसका चेहरा
उतार लेता होगा उन वक़्तों में
अपने चेहरे से बनावटी वह सख़्त नक़ाब
क्या उसकी दिल की घड़ी बदल लेती होगी
अपनी चाल
क्या वह दफ़्तरी समय की
चिक-चिक, झिक-झिक से अलग
किसी मधुर संगीत में बजने लगती होगी

मैं लौटता हूँ लिए
अपनी बीवी के लिए
अपने चेहरे पर गुस्सा, चिन्ता, धूल-पसीना
जिसे देखते ही वह
अपनी जीभ और होठों से
पोंछ देना चाहती है

मैं डपटता हूँ उसे
निकालता हूँ उसके हर काम में
बेवजह ग़लतियाँ
अपने बॉस की तरह बनाकर सख़्त चेहरा
उसकी ख़बर लेता हूँ

मेरी प्रिय पत्नी मुझसे डरने लगती है
उसका डरना भाँपकर
मुझे ख़ुद से ही डर लगने लगता है
मैं अपना चेहरा छुपाता हूँ
इधर-उधर हो जाता हूँ
परेशान हो जाता हूँ
मैं पाग़ल हो जाता हूँ …

मायावी यह संसार

अधिकांश चीज़ें मायावी हैं
मार तमाम संकटों के बीच ही
हँसी की बारिश
मार गुर्राहटों के बीच
कोयल की विह्वल पुकार
ऐ कोयल ! तुम पाग़ल हो और एक दिन तुम पाग़ल बना दोगी समूची दुनिया को
ऐ नदी ! तुम ज़रा इधर नहीं आ सकती शहर में
ऐ हवा, तुम अपना मोबाइल नं० दोगी मुझे
सुनो, सुनो, सुनो….

अधिकांश चीज़ें मायावी हैं…
जिनकी आवाज़ों के शोर के बजे नगाड़े
उनसे भागे जिया
जिनकी आवाज़ न आए
उसी आवाज़ पर पाग़ल पिया..
जहाँ रहने का ठौर, मन वहां न लागे मितवा
चल, यहाँ नहीं, यहाँ नहीं, यहाँ नहीं…
पता नहीं कहाँ
चल कहीं चल मितवा…
अधिकांश चीज़ें मायावी हैं…

जिन चीज़ों से प्रेम वे अत्यन्त अधूरी
इन अधूरी चीज़ों की भी महिमा गजब

यह जीवन सुखी-दु:खी एक पहेली…

जी नहीं रहे हम
बस अपनी उम्र के घण्टे-पल-छिन गिन रहे बस
और इसी गुणा-भाग में एक लम्बी उम्र गुज़ार कर
जो गए
उनके लिए मर्सिया पढ़ रहे हैं हम…

चन्द उलाहने 

1

तटस्थता के पुल पर खड़ी होकर
उसने मुझे
एक दिन
जाने किस नदी में ढकेल दिया
कोई किनारा नहीं
कोई नाव नहीं
कोई तिनका नहीं
बहता हाँफता जा रहा हूँ
लहरों के साथ
इन्तज़ार में कि कभी तो कहीं बढ़ाएगी हाथ ।

2

बहुत सारे चुम्बनों और भटकनों के बाद
उसने यकायक पूछा
दोस्ती करोगे मुझसे
क्या जवाब देता आख़िर मैं
बस चलता रहा उसके साथ
जाने किन मोड़ों पार्कों पुलों और नदियों से होते हुए
जाने कहाँ लेकर चली गई मुझे
और आगे और आगे
और कहा
यकायक
लोग यहाँ से लौट जाते हैं अक्सर
सूरज आया माथे पर
चाहो तो लौटो तुम भी
घर पर तुम्हारा इन्तज़ार हो रहा होगा बहुत
और वह अदृश्य हो गई यकायक
क्या आपको पता है उसका पता
मैं ऐसे रास्ते पर चलता जाता हूँ
जिसमें मोड़ बहुत
पर न किसी से रास्ता पूछता हूँ
न किसी रास्ते पर भरोसा करता हूँ
सपने में सोया रहता हूँ
उसकी याद में रोया करता हूँ ।

3

उसने कहा एक दिन
अब हम प्यार नहीं करते
उसके कुछ दिन पहले कहा
तुम मुझे प्यार नहीं करते
उसके पहले कहा था
काश तुम मुझे प्यार करते
वह पता नहीं क्या-क्या कहती गई
और भटकती गई
भटकता गया मैं भी
अब देखिए न
न जाने वह किस छोर गई
न जाने किस मोड़ से मुड़कर
मैं आया हूँ इधर ।

4

पहले उसने पता नहीं
कौन सा जादू किया
मैं पतंग बन गया
उसने जी भर उड़ाया मुझे
प्रेम की डोर में बाँधकर अपनी इच्छाओं के
सातवें आसमान में
फिर मुझे सुग्गा बनाया
अपने हथेलियों पर नचाती रही
और एक दिन पिंजरे से उड़ा दिया
जाओ जरा उड़ कर आओ
अब न मैं पतंग हूँ न सुग्गा
पतंगों की डोर में लगे मंझे से लहूलुहान
एक ऐसी चिड़िया
जिसे उड़ना ही नहीं आता घोसला कोई बनाना ही नहीं आता.

5

एक दिन उसने कहा
अपनी कहानी कहो
कहो कहो कहो ज़िद्द में वह कहती रही
नींद में सपने में
पार्क पर पुल पर बाग में
मैंने एक कहानी बनाई
हमारी कहानी सुनते-सुनते सो गई वह
मैं उसे सुनाता रहा सुनाता रहा
पता नहीं वह सुनते सुनते किस सपने में चली गई
फिर ढूँढ़े ना मिली मुझे ।

क्या जानते हो?

नदी में तैरते हुए सोचता हूँ
पानी नदी के बारे में क्या जानता है
नदी से पूछता हूँ
तुम पानी की हो या मेरी
नदी कोई जवाब नहीं देती
वह हवा की और इशारा करती है

धूप से आँख-मिचौली खेलती हवा के बारे
हम क्या जानते हैं ?

कोई किसी के बारे में क्या जानता है
एक स्त्री जो रोज़ चूल्हा जलाती है
आग के बारे में क्या जानती है

आग ही आग के बारे में क्या जानती है
मैं उदास हूँ तो मित्र
तुम भी उदास हो जाते हो
मेरी उदासी में
किसकी हँसी शामिल है
तुम क्या जानते हो ?

मुकदमा

मेरे कवि मित्रो

क्या तुम्हें वारण्ट नहीं मिला है अभी तक

समय ने मुकदमा दायर कर दिया है हम सब पर

हम सब समय की अवमानना के दोषी हैं

हम सब दोषी हैं

कि रात जब अपना सबसे अंधेरतम समय बजा रही थी

और बोलना सख्त मना किया गया था

हम गा रहे थे प्रेमगीत

हम लिख रहे थे दोस्तों को चिट्ठियां

हम पोस्टर पर कसी मुट्ठी वाला हाथ बना रहे थे

सूरज जैसा रंग उठाये कूचियों में

जब सोने का समय था

हम जाग रहे थे और लिख रहे थे कविताएं

जबकि समय ने अंधेरा फैलाया था

सोने के लिए।

बस सोने के लिए या थोड़ा बहुत रोने के लिए

हम सब पर अभियोग है

कि हम शामिल नहीं हुए प्रार्थनासभाओं में

रात के अवसान पर

जब दो मिनट के मौन में खड़ा होना था

हम चिड़ियों के सुर में चहचहा दिये

बारिश की , धूप की परवाह नहीं की हमने

चाहे जैसा भी रहा मौसम

हम अपनी जिद पर कायम रहे

मौसम तो इसलिए बदला जा रहा था

कि हम ठिठकें ठहरें थोड़ा डरें

खड़ा होकर सिर झुकायें

कभी कभी जी हुजूर जी हुजूर किया करें

और हम कठिन से कठिन दौर में

ठठा कर हंसते रहे।

हमारे ऊपर इल्जाम है

कि सुबह या शाम

हमने कभी तो नहीं किया ईश्वर को सलाम

हमें चेतावनी दी गयी है

कि हम समय की अवमानना के संगीन जुर्म के अपराधी हैं

हम क्षमा मांग लें

समय की अदालत में

नहीं तो हम पर पहाड़ तोड़ कर गिराया जाएगा

या बिजली गिरायी जाएगी

मेरे कवि मित्रो

क्या तुम्हें वारण्ट नहीं मिला है

हमें सब कुछ खबर है

और हम दोस्त की तरह रीझे हैं पहाड़ पर

बिजली के सामने रखने जा रहे हैं प्रेम का प्रस्ताव

बिजली गुस्सा करती है तो और चमकदार लगती है हमें

पहाड़ तो हमारा घोड़ा है

उसी पर बैठ कर जाएंगे हम चांद को ब्याहने

ओ समय

तुम नदी का पानी हो

जिसमें हमारी चांदनी नहाती है

हम भला क्या डरें तुमसे

कहां है तुम्हारी अदालत

हमें नहीं मालूम!

दफ़्तर

मेरे घर से दफ़्तर की दूरी
अलग अलग जगह रहने वाले मेरे सहकर्मियों के लगभग बराबर
एक तरफ़ से मापो तो सोलह घंटे हैं
दूसरी तरफ़ से आठ घंटे हैं
रोज़ रोज़ जंज़ीर गिराओ तो कुछ समय, जो कि दूरी का भी एक पैमाना है
इधर से उधर सरक जाता है
इस तरफ़ से मापो तो भागा-भागी है, कांव-कीच है
एसाइनमेण्ट, कान्ट्रैक्ट, सैलरी, एबसेण्ट आदि की सहूलियतें हैं
उस तरफ से मापो तो थोड़ी-सी नींद, थोड़ी-सी प्यास है
थोड़ी-सी छुट्टियों, रविवार, बाज़ार, इंडिया गेट, लोटस टेम्पल, बिड़ला मंदिर आदि के पड़ाव हैं
इन सारी चीज़ों का अर्थ राजधानी के दफ़्तर के निमित्त ज़िन्दगी में
लगभग एक ही है
हर चीज़ में थोड़ी सी रेत है, चप-चप पसीना है, बजता हुआ हार्न है
इस दूरी को जो रेल मापती है उसमें खूब रेलमपेल है
इन सब चीज़ों को जो घड़ी नचाती है
उसमें चांद, आकाश, प्रेम, नफ़रत, उमंग, हसरत, सपना सेकंड के पड़ाव भर हैं
यह साजिशों, चालाक समझौतों, कनखियों और सामाजिक होने के आवरण में
अकेला पड़ जाने की हाहा…हीही…हूहू…में व्यक्त समय है
इस घड़ी की परिधि घिसे हुए रूटीन की दूरी भर है
समाज की सारी घटनाएँ प्रायोजित हैं जल्दी विस्मृत होती हैं अच्छा है… अच्छा है…

दफ़्तर और घर के बीच
आ-जा रही ज़िन्दगी में कोई दोस्त न दुश्मन है
सब सिर्फ़ मौक़े का खेल है
यों ही नहीं बदल जाता है रोज़ राष्ट्रीय राजनीति में साम्प्रदायिकता का मुहावरा
ये सारे लोग लगभग एक जैसे जो चारों ओर फैल गये
इनकी ज़िन्दगी में
थोड़ा-सा कर्ज, थोड़ा सा बैंक बैलेन्स
थोड़ा-सा मंजन घिसा हुआ ब्रश है
बगैर साबुन की साफ़ शफ़्फ़ाक कमीज़ है पैण्ट है टाई है
आटो मेट्रो लोकल ट्रेन और उनका एक घिसा हुआ पास है
सुबह का दस है, शाम का दस है
बाक़ी सब धूल है
जो पैर से उड़ कर सिर पर
सिर से उड़ कर पैर पर बैठती रहती है
और पूरा शरीर उस उड़ान की बीट से पटा रहता है
महंगी कार में चलने वाले अपनी जानें यह कविता
दूरी के बारे में सोचने वालों की कविता है

जैसे मेरी सुबह दफ़्तर जाने के लिए होती है
और शाम दफ़्तर से घर लौट आने के लिए
दोपहर दफ़्तर के लंच आवर के लिए
रात में मैं दफ़्तर जाने के लिए आराम करता हूँ सोता हूँ
उसके पहले टी०वी० देखता हूँ
बीवी को गले लगाता हूँ
उसके हाथों से बनाया खाना खाकर
उसकी बाहों में जल्दी सो लेता हूँ
कि सुबह जब हो
मेरे दफ़्तर जाने में तनिक देर नहीं हो
तीन दिन की थोड़ी-थोड़ी देर पूरे एक दिन का
भरपूर काम करने के बावजूद आकस्मिक अवकाश होती है

नींद में मैं दफ़्तर के सपने देखता हूँ
सपने में दफ़्तर के सहकर्मियों के षड्यंत्र सूंघता हूँ
जिससे बहुत तेज़ बदबू आती है
इस बदबू में मुझे धीरे-धीरे बहुत मज़ा आता है
मैं नींद में बड़बड़ाता हूँ
बॉस को चूतिया कह कर चिल्लाता हूँ
नींद में हाथ पैर भांज-भांज कर
बॉस की, कलीग की, सीनियर की, जूनियर की
दफ़्तर के कोने में काजल लगाये बैठी उस लड़की की ऐसी-तैसी कर देता हूँ
इस तरह चरम-सुख पाता हूँ मैं
मेरे इस करतब को देख कर
नहीं जानता बगल में जग गई पत्नी पर क्या गुज़रती है
जैसा कि उसे मैं जितना जानता हूँ हतप्रभ होती होगी
कहती होगी बड़े वैसे हैं ये

सुबह उठ कर पत्नी चाय बनाती है मेरी नींद के बारे में पूछती है
मैं अनसुना करता हूँ
और लगा रहता हूं युद्ध की तैयारी में एक औसत आदमी जैसा लड़ता है युद्ध
ब्रश, शेविंग, बूट पालिश, स्नान-ध्यान, पूजा-पाठ सब जल्दी में
इस बीच कभी भूल जाता हूँ फूल को पानी देना
किसी बच्चे को दो झापड़ मारता हूँ
पिता कहते हैं जैसे मुझे समझदार होना चाहिए मैं चिड़चिड़ा होता जा रहा हूँ

दफ़्तर जाकर काम निपटाता हूँ
इसको डाँटता हूँ उससे डाँट खाता हूँ
दफ़्तर में ढेर सारे गड्ढे
इसमें गिरता हूँ, उसे फांदता हूँ
यहाँ डूबता हूँ वहाँ निकलता हूँ
कुर्सी तोड़ता हूँ कान खोदता हूँ
तीर मारता हूँ अपनी पीठ ठोकता हूँ

अख़बार पढ़ता हूँ देश में तरह तरह के फैसले हो रहे हैं
प्रधानमंत्री, फलां मंत्री इस देश जा रहे हैं उस देश जा रहे हैं
देश में यहाँ-वहाँ बम फूट रहे हैं
इसमें मुसलमानों के नाम आते हैं
और एक दिन कहीं किसी साध्वी के हाथ होने के सबूत भी मिलते हैं
तो तमाम राष्ट्रवादी उसकी संतई और विद्वता के किस्से बताने लगते हैं
उसे चुनाव लड़ाने लगते हैं
किसी प्रांत में कुछ लोग ईसाइयों की सफ़ाई में लग जाते हैं
हमारे दफ़्तर में इससे उत्तेजना फैलती है
इस आधार पर फाइलों को लेकर भी साजिशें होने लगती हैं
फिर कहा जाता है देश के कर्णधार ही सब पगले और भ्रष्ट हैं
तो हम जो कुछ कर रहे हैं कौन ग़लत कर रहे हैं
अलग-अलग गुट बन जाते हैं
और अपने गुट के कर्णधार को कुछ कहे जाने पर जैसे सबकी फटने लगती है
गुस्सा करने लगते हैं लोग ग़ाली-गलौज
प्रमोशन करने-कराने रोकने का यह एक आधार बन जाता है… बनने लगता है

हमने अपने-अपने घरों में मनोरंजन के लिए टी०वी० लगा रखा है
यह कम ज़िम्मेदार नहीं है हमारे द्रोहपूर्ण ज्ञान के विकास में
यहीं से हम नई-नई ग़ालियाँ, डिस्को, गुस्सा, प्यार करना और अवैध सम्बन्ध बनाना
सीख आते हैं और दफ़्तर में उसकी आजमाइश करना चाहते हैं
वहाँ एक से एक अच्छी चीज़ें हैं
नचबलिए है, लाफ़्टर शो हैं, टैलेंट हंट हैं, क्रिकेट मैच, बिग बॉस और
एकता कपूर के धारावाहिक
पर मैं सोचता हूं इससे अपन का क्या
दफ़्तर न हो तो पैसा न मिले
पैसा न मिले तो केबल कट जाए
फिर ये साले रहें न रहें
भाड़ में जाए सब कुछ
गिरे शेयर बाजार लुढ़के रुपया
सुनते हैं गिरता है रुपया तो अपन की ग़रीबी बढ़ती है बढ़ती होगी
अपन का क्या अपन कर ही क्या सकते हैं

बस सलामत रहे नौकरी
बॉस थोड़ा बदतमीज़ है
कलीग साले धूर्त हैं
कोई नहीं,
कहाँ जाइयेगा सब जगह यही है
अपन ही कौन कम हैं

राजधानी में इधर बहुत बम विस्फ़ोट हो रहे हैं
क्या पता किसी दिन अपन भी किसी ट्रेन के इंतज़ार में ही निपट जाएँ
माँ रोज़ सचेत करती है
बेटा, ज़माना बहुत बुरा हो गया है
ख़ाक बुरा हो गया है
हो गया है तो हो गया है
अपन को कोई डर नहीं
मुझे तो दफ़्तर जाते न डर लगता है न कोई उमंग
न चिन्ता न ख़ुशी
यही है कि आने-जाने वाली ट्रेन लेट हो
तो थोड़ी बेसब्री जगती है
सरकार पर थोड़ा गुस्सा आता है
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर प्यार उमड़ आता है
वैसे वे कौनसी दूध की धुली हैं
आदमी तो सब जगह एक

क्या आप एक ऐसी स्त्री को जानते हैं

हम प्रेम नहीं करते
यानी हमारी भावनाएँ आत्मघाती नहीं हैं
उम्र में मुझसे वह थोड़ी सी ज़्यादा ही बड़ी है
और मैं बच्चों-सी विनम्रता से पेश आता हूँ
बच्चों-सी मेरी ज़िद पर वह माँ-सी मोहब्बत करती है

मेरा यक़ीन है
उससे दोस्तों जैसा बोलूँ तो ख़ुश ही होगी वह
वह थोड़ा और खुलेगी शायद
बुरा तो नहीं ही मानेगी
आख़िर उसके एकान्त का साथी हूँ मैं
लेकिन पता नहीं क्यों बड़ों की तरह ही देता हूँ आदर
पाँव उसके बड़े सुंदर हैं उसके चेहरे से ज़्यादा
कितना अच्छा होता पाँवों के भी आईने होते
तो मैं आईना होता
और उतारता उसके पाँवों के अक्स अपनी आत्मा में

कभी-कभी सोचता हूँ तो लगता है
उसके प्रति मेरी यह जो विनम्रता है
कहीं उसे चिढ़ाती तो नहीं होगी
पर अपनी इस आदत का क्या करूँ
क्या करूँ आख़िर इसका मैं
मैं कभी-कभी उसे छूना चाहता हूँ
फूलों की तरह नहीं, तकिये की तरह
कैसे दबाकर रख लेते हैं गोद में वैसे
उसकी त्वचा पर अपनी त्वचा फेरना चाहता हूँ
मिले रोम-रोम पसीना जैसे पानी में पानी मिलता है
उसके होठों को अपने होठों से
अपने हो…ठों से हल्के छू लेना चाहता हूँ
पर वह क्या चाहती है
क्या वह भी चाहती है?

कैसा भी मौसम हो कैसी भी हवा
उसके भीतर अपने गीत हैं अपना चाँद अपना सूरज
हमारी सारी मुलाक़ातें
एकान्त की वे रातें सब उसके सूरज-चाँद की मोहताज रही हैं
देह के माधुर्य की वे सारी चर्चाएँ उसके मौसम की उपज हैं

मुझे चिढ़ है और ख़ूब आश्चर्य
कि वह इतनी अपनी धूप, अपनी नमी और हवाएँ
कैसे बना लेती है
उसे इस प्रकृति के समानान्तर अपनी प्रकृति की ज़रूरत ही क्यों है
वह क्या चाहती है
आख़िर उसकी और मेरी रुचियों और ज़रूरतों की तमाम भिन्नताओं के बावजूद
वह क्या है कि हमारा केन्द्र एक हो रहा है
आख़िर वह क्या है जो मुझे बेईमान बनाता है
अपनी कक्षा में छोड़कर उन तमाम हमउम्र और चुलबुली लड़कियों को
मैं इस मैदान में जो बीहड़ जैसा है क्यों आया हूँ
वह कैसी स्त्री है
जिसकी चुनरी पर छपी परछाइयों को चाँद की तरह विभोर निहार रहा हूँ

वह मुझे क्यों खेंचे है
क्या उधार है उसका मेरे पास
क्या पाना है मुझे उसके पास
उसे उसके घोड़े जैसे पति का प्यार नहीं मिला
कभी वह यों ही कह देती है
और उदास-सी हो जाती है
उसकी उदासी में इतना चटख़ रंग क्यों है खू़न जैसा
वह अपने पति से मिलने की तमाम रातों के बाद
मुझे फ़ोन करती है
और जो मैं उससे चिढ़ा-चिढ़ा बैठा रहता हूँ
क्यों काँप जाते हैं मेरे पैर घनघोर शराबी की तरह

ओल्डमांक का अद्धा चढ़ाकर सोचता हूँ
शशि जिन्हें कहते हैं विषकन्याएँ
क्या वे भी ऐसी ही होती हैं
ऐसी औरत से आप प्रेम नहीं कर सकते तो क्या
क्या घृणा कर सकते हैं?
यदि प्रेम और घृणा दोनों नहीं कर सकते
तो क्या कर सकते हैं
क्या वही जो मैं कर रहा हूँ इन दिनों

क्या आप एक ऐसी स्त्री को जानते हैं?

बुराई के पक्ष में 

कृपया बुरा न मानें
इसे बुरे समय का प्रभाव तो क़तई नहीं
दरअसल यह शाश्वत हक़ीक़त है
कि काम नहीं आई
बुरे वक्त में अच्छाइयाँ
धरे रह गये नीति-वचन उपदेश
सारी अच्छी चीज़ें पड़ गयीं ओछी
ईमानदारी की बात यह कि बुरी चीज़ें
बुरे लोग, बुरी बातें और बुरे दोस्तों ने बचाईं जान अक़सर
उँगली थामकर उठाया साहस दिया
अच्छी चीज़ों और अच्छे लोगों और अच्छे रास्तों ने बुरे समय में
अक़सर साथ छोड़ दिया

बचपन से ही
काम आती रही बुराइयाँ
बुरी माँओं ने पिलाया हमें अपना दूध
थोड़ा-बहुत अपने बच्चों से चुराकर
बुरे मर्दों ने खरीदी हमारे लिए अच्छी कमीज़ें
मेले-हाटों के लिए दिया जेब-ख़र्च

गली के हरामज़ादे कहे गए वे छोकरे
जिन्होंने बात-बात पर गाली-गलौज़
और मारपीट से ही किया हमारा स्वागत
उन्होंने भगाया हमारे भीतर का लिज़लिज़ापन
और किया बाहर से दृढ़
हमें नपुंसक होने से बचाया
बददिमाग़ और बुरे माने गये साथियों ने
सिखाया लड़ना और अड़ना
बुरे लोगों ने पढ़ाया
ज़िन्दगी का व्यावहारिक पाठ
जो हर चक्रव्यूह में आया काम हमारे
हमारी परेशानियों ने
किया संगठित हमें

सच ने नहीं, झूठ ने दिया संबल
जब थक गए पाँव
झूठ बोलकर हमने माँगी मदद जो मिली
झूठे कहलाए बाद में
झूठ ने किया पहले काम आसान

आत्महत्या से बचाया हमें उन छोरियों के प्रेम ने
जो बुरी मानी गईं अक़सर
हमारे समाज ने बदचलन कहा जिन्हें

बुरी स्त्रियों और सबसे सतही मुंबईया फ़िल्मों ने
सिखाया करना प्रेम
बुरे गुरुओं ने सिखाया
लिखना सच्चे प्रेम-पत्र
दो कौड़ी के लेमनचूस के लालच में पड़ जाने वाले लौंडों ने
पहुँचाया उन प्रेम-पत्रों को
सही मुक़ाम तक

जब परेशानी, अभाव, भागमभाग
और बदबूदार पसीने ने घेरा हमें
छोड़ दिया गोरी चमड़ी वाली उन ख़ुशबूदार प्रेमिकाओं ने साथ
बुरी औरतों ने थामा ऐसे वक़्त में हाथ
हमें अराजक और कुंठित होने से बचाया
हमारी कामनाओं को किया तृप्त
बुरी शराब ने साथ दिया बुरे दिनों में
उबारा हमें घोर अवसाद से
स्वाभिमान और हिम्मत की शमा जलायी
हमारे भीतर के अँधेरों में
दो कौड़ी की बीड़ियों को फूँकते हुए
चढ़े हम पहाड़ जैसे जीवन की ऊँचाई
गंदे नालों और नदियों का पानी का आया वक़्त पर
बोतलों में बंद महँगे मिनरल वाटर नहीं

भूख से तड़पते लोगों के काम आए
बुरे भोजन
कूड़े पर सड़ते फल और सब्जियाँ
सबसे सस्ते गाजर और टमाटर

हमारे एकाकीपन को दूर किया
बैठे-ठाले लोगों ने
गपोड़ियों ने बचाया संवाद और हास्य
निरंतर आत्मकेंद्रित और नीरस होती दुनिया में

और जल्दी ही भुला देने के इस दौर में
मुझे मेरी बुराइयों को लेकर ही
शिद्दत से याद करते हैं उस क़स्बे के लोग
जहां से भागकर आया हूँ दिल्ली!

पूछो तो 

कब तक मौन रहोगे
विवादी समय में यह पूछना बहुत ज़रूरी है
पूछो तो अब
यह पूछो कि पानी में
अब कितना पानी है
आग में कितनी आग
आकाश अब भी कितना आकाश है

पूछो तो यह पूछो
कि कितना बह गया है भागीरथी में पानी
कितना बचा है हिमालय में
पूछो कि नदियों का सारा मीठा पानी
आखिर क्यों जा डूबता है
सागर के खारे पानी में
पूछो

मित्रो, मैं पूछता हूँ
आदमी का पानी
कब उड़ जाता है
मेरी-तुम्हारी आँखों में
बचा है अब कितना पानी
खोजो कहीं चुल्लू भर ही पानी
डूब मरने के लिए
पानी के इस अकाल समय में
नाविकों और मछलियों से कहो

वे अपने भीतर बचाए रखें पानी
उन्हें दुनिया को पार लगाना है
जंगलों से कहो वे आग बचाएँ
ठंडी पड़ती जा रही है यह दुनिया
ख़त्म हो रही है आत्मा की ऊष्मा

देर मत करो पूछो
आग दिल की बुझ रही है
धुआँ-धुआँ हो जाए छाती इससे पहले
मित्रो, ठंड से जमते इस बर्फ़ीले समय में
आग पर सवाल पूछो
माचिस तीली की टकराहट की भाषा में

तय कर लो
आग कहाँ और कितनी ज़रूरी है
क्या जलना चाहिए आग में
क्या बचना चाहिए आग से

पूछो आकाश से तो
क्यों भागता जाता है ऊपर
हमसे क्यों छिनी जा रही है क़द की ऊँचाई
हाथ बढ़ाओ और
आकाश से सवाल पूछो
कि हमसे भागकर कहाँ जाओगे
तुम हमारे क़द पर कब तक ओले गिराओगे

मित्रो, उससे इतना ज़रूर पूछो कि
हमारे हिस्से की धूप
हमारे हिस्से की बिजली
हमारे हिस्से का पानी
हमारे हिस्से की चाँदनी का
जो मार लेते हो रोज़ थोड़ा-थोड़ा हिस्सा
उसे कब वापस करोगे

मित्रो, यह ज़िन्दगी है
आग पानी आकाशा
बार-बार पूछो इससे

हमेशा बचाकर रखो एक सवाल
पूछने की हिम्मत और विश्वास

फूल 

तेतरी ने फूल गढ़ा है
अपने घर के बाहर
अपनी मिट्टी की दीवार पर

फूल बहुत सुंदर है
बहुत सच्चा लगता है
गली से आते-जाते लोगों को
वह बहुत अच्छा लगता है

पर कैसी भी हवा चले
तेतरी के बिन दरवाजे घर में
फूल की सुगन्ध कोई, कभी नहीं आती
घर के भीतर तो
कालिख भरा धुआँ फैला रहता है
जो तेतरी की आँखों में पानी
भरता रहता है

यह कैसा मज़ाक़ है
कि तेतरी के हाथ से
बने फूल
हँसते हैं
और तेतरी के हाथ
हँसी को तरसते हैं !

दिन होगा 

दिन होगा तो
औरतें चौखट लाँघ
चली जाएँगी नदी तक
और अँचरा में बाँध कर लाएँगी
पानी की धार
रात चाहे जितनी हो गहरी
औरतें बड़ी बेकली से कर रही हैं
दिन का इंतज़ार

दिन होगा
तो करेंगी वे दुनिया की
नये तरीक़े से झाड़-बुहार
रात की धूल और ओस
झटक आएँगी बस्ती के बाहर

औरतें ठीक-ठीक नहीं जानतीं
दिन कैसे होगा
कैसे बीतेगी यह रात
वे महज़ इतना जानती हैं
कि पूरब में जब खिलेगा लाल फूल
और सन्नाटा टूटेगा
मुर्गा बोलेगा तो बिहान होगा

कहते हैं वैज्ञानिक
जब यह धरती
घूम जाएगी थोड़ी-सी अक्ष पर
तो दिन होगा
कुछ होगा तो दिन होगा
रात से ऊबे हुए बच्चे
पाँव चला रहे हैं
और इसे लगकर धरती हिल रही है
लगता है
अब दिन होगा!

घड़ी

दुनिया की सभी घड़ियाँ
एक-सा समय नहीं देतीं
हमारे देश में अभी कुछ बजता है
तो इंग्लैंड में कुछ
फ्रांस में कुछ
अमेरिका में कुछ….

यहाँ तक कि
एक देश के भीतर भी सभी
घड़ियों में एक-सा समय नहीं बजता
समलन हुक्मरान की कलाई पर कुछ बजता है
मज़दूर की कलाई पर कुछ
अफ़सरान की कलाई पर कुछ

मन्दिर की घड़ी में जो बजता है
ठीक-ठीक वही चर्च की घड़ी में नहीं बजता है
मस्जिद की घड़ी को मौलवी
अपने हिसाब से चलाता है
और सबसे अलग समय देती है
संसद की घड़ी

कुछ लोग अपनी घड़ी
अपनी जेब में रखते हैं
और अपना समय
अपने हिसाब से देखते हैं
पूछने पर अपनी मर्ज़ी से
कभी ग़लत
कभी सही बताते हैं।

मोहनदास करमचन्द गाँधी
अपनी घड़ी अपनी कमर में कसकर
उनके लिए लड़ते थे
जिनके पास घड़ी नहीं थी
और जब मारे गये वे
उनकी घड़ी बिगाड़ दी
उनके चेलों-चपाटों ने
कहना कठिन है अब उनकी घड़ी कहाँ है
और कौन-कौन पुर्ज़े ठीक हैं उसके

हमारी घड़ी
अकसर बिगड़ी रहती है
हमारा समय गड़बड़ चलता है
हमारे धनवान पड़ोसी के घर में
जो घड़ी है
उसे हमारी-आपकी क्या पड़ी है!

इस बरस फिर 

इस बरस फिर बारिश होगी
मगर पानी
सब बह जाएगा समुद्र में
बता रहे हैं मौसम विज्ञानी
इस बरस पौधों की जड़ सूख जाएगी
मछली के कंठ में पड़ेगा अकाल
ऐन बारिश के मौसम में

इस बरस फिर ठंड होगी
और ठिठुरेंगे फुटपाथी
महलों में वसन्त उतरेगा इस बरस फिर
जाड़े के मौसम में
बिने जाएँगे कम्बल
मगर उसे व्यापारी हाक़िम-हुक़्मरान
धनवान ओढ़ेंगे
सरकार बजट में लिख रही है यह बात

इस बरस फिर आयेगा
वसन्त
मगर तुम कोपल नहीं फोड़ पाओगे बुचानी मुहर

इस बरस फिर
लगन आयेगा बता रहे हैं पंडी जी
मगर तुम्हारी बिटिया के बिआह का संजोग नहीं है करीमन मोची
इस बरस फिर तुम जाड़े में ठिठुरोगे
गरमी में जलोगे
बरसात में बिना पानी मरोगे सराप रहे हैं मालिक
अपने आदमियों को।

बढ़ई इस बरस चीरेगा लकड़ी
लोहार लोहा पीटेगा
चमार जूता सिएगा
और पंडीजी कमाएँगे जजमनिका
बेदमन्त्र बाँचेंगे
पोथी को हिफ़ाज़त से रखेंगे
और सबकुछ हो पिछले बरस की तरह
आशीर्वाद देंगे ब्रह्मा, विष्णु, महेश….!

लुहार

लोहे का स्वाद भले न जानते हों
पर लोहे के बारे में
सबसे ज़्यादा जानते हैं लुहार
मसलन लुहार ही जानते हैं
कि लोहे को कब
और कैसे लाल करना चाहिए
और उन पर कितनी चोट करनी चाहिए

वे जनाते हैं
कि किस लोहे में कितना लोहा है
और कौन-सा लोहा
अच्छा रहेगा कुदाल के लिए
और कौन-सा बन्दूक की नाल के लिए
वे जानते हैं कि कितना लगता है लोहा
लगाम के लिए

वे महज़
लोहे के बारे में जानते ही नहीं
लोहे को गढ़ते-सँवारते
ख़ुद लोहे में समा जाते हैं
और इन्तज़ार करते हैं
कि कोई लोहा लोहे को काटकर
उन्हें बाहर निकालेगा
हालाँकि लोहा काटने का गुर वे ही जानते हैं
लोहे को
जब बेचता है लोहे का सौदागर
तो बिक जाते हैं लुहार
और इस भट्टी से उस भट्टी
भटकते रहते हैं!

हम पत्थर हो रहे हैं 

कितने लाख लोग दुनिया के भीख माँग रहे हैं
कितने अपाहिज हो गये हैं मेरी तरह
कितने प्रेमियों के साथ दग़ा हो गया है
बस यही बचा है सुनने-बताने को

मेरी तरह कितने ही लोग
इन ख़बरों में हाय-हाय कर रहे हैं
हाय-हाय की दहला देने वाली चीखें
घुटी-घुटी हैं
न जाने कौन इनका गला घोंट रहा है

मैं सोचता हूँ
निकलूँ और दौड़ू सड़कों पर
अपने तमाम ख़तरों के बावज़ूद
चिल्लाऊँ शोर मचाऊँ
कि पड़े सोए लोगों की नींद में खलल
पृथ्वी की छाती में
कील ठोका जा रहा है
और अज़ीब-सी बात है कि मेरे साथी सब सो रहे हैं
बस चिल्लाने का काम ही मेरे वश में है
जो मैं नहीं कर रहा हूँ
नहीं तो करने को बचा ही क्या है
भरोसाहीन इस दौर में

निराशा की यह घनी शाम
दुख की बूंदा-बांदी
तुम्हारी यादें
गलीज़ ज़िन्दगी की ऊब
और एक सख़्तजान बुढ़िया की क़ैद
जो उल्लास के हल्के पत्तों के संगीत से भी
चौंक जाती है और चीख़ने लगती है
इन सबसे बिंधा
कितना असहाय हो रहा हूँ मैं
कहीं कोई भरोसा नहीं
पता नहीं किस भय से काँप रहा हूँ मैं

सारी चिट्ठियाँ अनुत्तरित चली जाती हैं
कहीं से कोई लौटकर नहीं आता
दोस्त मतलबी हो गए हैं
देखो मैं ही अपनी कुंठाओं में
कितना उलझ गया हूँ

संवेदना के सब दरवाज़ों को
उपेक्षा की घुन खाये जा रही हैं
बेकार के हाथ इतने नाराज़ हैं
कि पीठ की उदासी हाँक नहीं सकते

हम लगातार अपरिचित होते जा रहे हैं
हमारे पाँव उन गलियों का रास्ता भूल रहे हैं
जिनमें चलकर वे बढ़े हैं
देखो तुम ही इस गली से गई
तो कहाँ लौटी फिर!

घास के उन घोंसलों की उदासी तुम भूल गयी
जिन्हें हम अपने उदास दिनों में देखने जाते थे
और लौटते हुए तय करते थे
परिन्दों की गरमाहट लौटाएँगे
किसी-न-किसी दिन इन घोंसलों को
देखो हम किस क़दर भूले सब कुछ
कि ख़ुद को ही भूल गए

हमें प्यास लगी है
और हमें कुएँ की याद नहीं
हम एक पत्थर की ओर बढ़ रहे हैं
पूरी बेचैनी के साथ…।

पिता

पिता जब बहुत बड़े हो गये
और बूढ़े
तो चीज़ें उन्हें छोटी दिखने लगीं
बहुत-बहुत छोटी

आख़िरकार पिता को
लेना पड़ा चश्मा

चश्मे से चीज़ें
उन्हें बड़ी दिखाई देनी लगीं
पर चीज़ें
जितनी थीं और
जिस रूप में
ठीक वैसा
उतना देखना चाहते थे पिता

वे बुढ़ापे में
देखना चाहते थे
हमें अपने बेटे के रूप में
बच्चों को ‘बच्चे’ के रूप में
जबकि हम
उनके चश्मे से ‘बाप’ दिखने लगे थे
और बच्चे ‘सयाने’

कुछ दृश्य

1.

बच्चियों के ‘दूध’
पी गए बच्चे सारे
वे ‘पानी पीकर’ सो रही हैं…
उठेंगी अभी
सारे अभावों को देंगी बुहार
आँखों से पानी
और छाती से दूध उतार
पानी और दूध की क़िल्लत दूर करेंगी
बच्चियाँ

2.

बच्चियाँ
टी०वी० देख रही हैं
टी०वी० में
सीता राम का ब्याह हो रहा है

अभी बजेगी दरवाज़े की घंटी
कोई आएगा थुलथुल
एक चीकट मेहमान
सोफ़े पर पसर जायेगा
बच्चियाँ किचन में घुस
चाय बनाएँगी
पकौड़े छानेंगी

स्वयंवर का धनुष टूटते-टूटते
हो ही जाता है कोई अड़भंग
कोई पूरा ब्याह
कहाँ देख पाती हैं बच्चियाँ!

व्यथा वृत्त 

कथित उत्तर-आधुनिक सदी में
वह आदमी
आदमी होने की निराशा भोग रहा था

कहता जा-जाकर हित मित्रों से
कि उसे दुख है, दिक़्क़त है
जो चाहिए उसकी क़िल्लत है-
कोई उसकी नहीं सुनता
कि भूखा रह जाता है वह
और उसे कोई नहीं पूछता

कि वह काम करते-करते
थक जाता है
और आराम के लिए
कोई नहीं कहता
कहता कि वह रोता रहता है
तो दुनिया हँसने लगती है
इस बात का उसे दुख है
उसे दुख है कि लोग हँसी को
हँसी की तरह नहीं हँसते
उसे दुख था तो वह निराश था
अपने मन की व्यथा-कथा
उसने सबसे कही

उन सबसे जिन पर उसे
भरोसा था कि
वे उसे प्यार करते हैं
उसने कहा
हाल यही रहा तो
वो नहीं रहेगा
उसने रो-रोकर कहा
कि वह कुछ कर लेगा
कि कोई उसकी नहीं सुनता

वैसे उसकी सुनते तो सब
बल्कि कई तो सुनते हुए
उसके साथ-साथ रोने लगते
मगर जब सचमुच ही
उसकी आत्मा दरकने लगती
तब इगी-दुगी तक हँसने लगते
कि वह नौटंकी कर रहा है
आख़िर उसे क्या दुख हो सकता है
सब कुछ तो भरा है उसके यहाँ

यह ठीक था
सब कुछ भरा था उसके यहाँ
लेकिन वह जहाँ भी हाथ डालता
ख़ालीपन ही पाता
लोग उसकी इसी बात का
भरोसा नहीं करते
हालाँकि अपने-अपने जीवन में
सबका यही अनुभव था
लेकिन इसे सार्वजनिक करने को
कोई तैयार न था

सब चाहते तो थे
कि एक-दूसरे के कन्धे पर
अपना माथा रखकर
मिल-जुलकर रोएँ
पर सब अपने-अपने कन्धे बचाना चाहते
और आँसू तो कतई नहीं दिखाना चाहते
सब दुखी थे और ख़ुश थे
वही दुख को दुख की तरह
कहने और नहीं सहने का
साहस कर रहा था
इसलिए हास्यास्पद हो रहा था
यह बात वह समझ रहा था अच्छी तरह
इसलिए वह जिस-तिस से लड़ पड़ता
ग़ैरो से वह शिक़ायत करता
मगर अपनों के प्रति
उसका ग़ुस्सा ख़ास था
और ख़तरनाक था
और चूँकि वह औरों से हटकर था
इसलिए सब उससे हटकर रहना चाहते
इस बात से वह और दुखी था

जब उससे अपना दुख
देखा नहीं गया
और दूसरों का दुख कीचड़ की तरह
उसके सामने फैला ही रहा

घूम-घूमकर अपने सभी हित मित्रों को
वह प्रणाम कर आया
जिनके जो छोटे-मोटे कर्ज़ थे
चुका आया
जो नहीं चुका सकता था उसके लिए
माफ़ी माँग आया
और गाँव से बाहर नहर के कछार पर
ज़हर खाकर
छटपटाकर मर गया
वह मर गया तो भोज हुआ
उस भोज में
अपने-पराये
कौए, बिलार, भालू, राक्षस सबने
डकार कर जलेबी-पूरी खायी

एक ब्राह्मण ले गया उसकी बछिया खोलकर!

खिलाड़ी दोस्त

खिलाड़ी दोस्तों के बारे में
बताने से पहले ही सावधान कर दूँ कि
मेरा इशारा ऐसे दोस्तों की तरफ़ नहीं है
जो ज़िन्दगी को ही एक खेल समझते हैं
बल्कि यह उन दोस्तों की बात है जो
खेल को ही ज़िन्दगी समझते हैं
जो कहीं भी खेलना शुरू कर देते हैं
जो अक़सर पारम्परिक मैदानों के बाहर
ग़ैर पारम्परिक खेल खेलते रहते हैं

वे दोस्त
खेल के बाहर भी खेलते रहते हैं खेल
जब भी जहाँ
मौक़ा मिलता है पदाने लगते हैं
पत्ते फेंकने लगते हैं
बुझौव्वल बुझाने लगते हैं
गोटी बिछाने लगते हैं
आँखों पर कसकर बाँध देते हैं रूमाल
और दुखती रग को दुखाने लगते हैं

वे दोस्त अच्छी तरह जानते हैं
दोस्ती में खेलना
सही तरह पैर फँसाना वे जानते हैं
जानते हैं वे कब
कहाँ से मारने पर रोक नहीं पाएगा गोल
जानते हैं कितनी देर दौड़ाएँगे
तो थककर गिर जाएगा दोस्त
वे हाथ मिलाते हुए अक़सर
हमारी भावनाएँ नहीं
हमारी ताक़त आँकते रहते हैं
अक़सर थके हुए दौर में
भूला हुआ गेम शुरू करते हैं दोस्त
वे आँसू नहीं मानते
तटस्थ वसूलते हैं क़ीमत
हमारे हारने की

सुख और ख़ुशी में भले भूल जाते हों
दुख में अकेला नहीं छोड़ते
आ जाते हैं डंडा सँभाले
उदासी और थकान में
शुरू करते हैं खेल
और नचा-नचा देते हैं

दोस्त अवसर देखते रहते हैं
काम आने का
और मुश्किल समय में अक़सर
ऐसे काम आते हैं कि भूल नहीं सकते हम

हमारे गहरे अभाव
टूटन और बर्बादी के दिनों में
जब दुश्मन उपेक्षा करते हैं हमारी
दोस्त आते हैं ख़ैरियत पूछने
और हास्य के शिल्प में पूछते हैं हाल
हमारे चेहरे की उड़ती हवाइयाँ देखकर
हताश नहीं होते
वे मूँछों में लिथड़ाती मुस्कान बिखेरते हैं

दोस्त हमें हारकर
बैठ नहीं जाने देते
वे हमें ललकारते हैं
चाहे जितने पस्त हों हम

उठाकर हमें मैदान में खड़ा कर देते हैं वे
और देखते रहते हैं हमारा दौड़ना
गिरना और हमारे घुटने का छिलना
ताली बजाते रहते हैं वे
मूँगफली खाते रहते हैं
और कहते हैं
धीरे-धीरे सीख जाओगे खेल

जो दोस्त खेल में पारंगत होते हैं
खेल से भागने पर कान उमेठ देते हैं
कहते हैं, कहाँ-कहाँ भागोगे
‘भागकर जहाँ जाओगे
हमें वहीं पाओगे’

खेल में पारंगत दोस्त
खेल में अनाड़ी दोस्त से ही
अक़सर खेलते हैं खेल!

ऐसा नहीं होता तो 

अच्छा है कि हैं देश में निर्दोष
कि कानून उन्हें सजा दे रहा है
और रक्षा कर पा रहा है अपनी मर्यादा की
अच्छा है कि हैं अबले
कि सधाते हैं सबले अपनी जोम
अच्छा है कि बचे हैं गरीब
कि अमीर ऐंठते हैं अपनी अमीरी
अच्छा है कि सीधे लोग हैं अड़ोस-पड़ोस
कि गुंडों की चलती है गुंडई
अच्छा है कि जनता है निरीह
कि चल पा रही है सरकार निरंकुश
अच्छा है कि रहे हैं लोग मूर्ख के मूर्ख
कि चालाक कर रहे हैं चालाकियाँ
अच्छा है कि पूजने वाले हैं
तो बची है प्रभु की प्रभुता
नहीं तो क्या होता
ऐसा नहीं होता तो
कैसा होता मेरे दोस्त!
यह दुनिया कैसी दिखती तब?

नाराज 

ना-राज में राज का निषेध है
फिर भी
आप तो ऐसे नाराज होते हो
जैसे राज की कोई बात हो
क्या आप किसी पर नाराज होते हुए
कभी सोचते हैं
कि आप उस पर राज नहीं कर रहे?

नाराज के आगे कोई ना कर दे
तो नानाराज हो जाता है
क्या आपने कभी इस तरह सोचा है
आपने इस तरह नहीं सोचा है तो…

फिर नाराज के बारे में आपने क्या सोचा है?
मेरा बच्चा नाराज के पहले
हमेशा ‘का’ जोड़ देता है और हँसता रहता है
देर तक…।

फेसबुक

दोस्त चार हजार नौ सौ सतासी थे
पर अकेलापन भी कम न था
वहीं खड़ा था साथ में
दोस्त दूर थे
शायद बहुत दूर थे
ऐसा कि रोने-हँसने पर
अकेलापन ही पूछता था क्या हुआ
दोस्त दूर से हलो, हाय करते थे
बस स्माइली भेजते थे…

भूलनेवाले 

भूलनेवाले तो ऐसे भूले हैं
जैसे कि कुछ भूले ही न हों
वे अतीत भूले हैं समूचा
इस तरह जैसे किसी का कोई अतीत होता ही न हो
वे वर्तमान के उस मोड़ पर खड़े हैं
जहाँ से उन्हें उनका भविष्यपथ राजपथ जैसा दीखता है

वे सिर्फ राजपथ देखते हैं
और कुछ नहीं देखते हैं
राजपथ पर वे लार टपकाते हुए स्मृति में
अपना ही प्रतिबिंब देखते हैं
वे मासूम हैं वे हिंसक हैं
उनके हाथों में चमकती हुई कटार है
आपकी गर्दन झुकी हुई है
साँसें आपकी रुकी हुई हैं

वे अवसर को समझते हैं
वे इतिहास को समझते हैं
वे आपकी कीमत समझते हैं
वे अपनी औकात समझते हैं
इसलिए वे ऐसे भूलते हैं
जैसे कि वे भूले ही न हों

वे सिद्धहस्त भुलक्कड़ हैं
इसलिए वे सब याद रखते हैं
और बदला लेते हैं
जैसे कि आपके उपकारों का बदला
वे आपको मिटाकर लेते हैं
वे वर्तमान को ऐसे क्षण से शुरू करना चाहते हैं
जहाँ से उनकी कमजोरियाँ उनकी ताकत बनती हैं
गर इतिहास लौटा फिर अपनी ताकत से
तो वे निस्संदेह वर्तमान भूल जाएँगे
भूलनेवाले अपनी दुम सलामत रखते हैं
हर कुर्सी के आगे हर ताकत के आगे
हर चमकती हुई चीजे के आगे
वे डुलाते रहते हैं इसे वे कभी नहीं भूलते हैं…
वे अपनी क्षमताओं से अधिक अपनी दुम पर भरोसा रखते हैं।

प्यार 

प्यार धीरे-धीरे होता है या एकाएक
सुबह होता है या शाम
प्यार कब होता है
कहां होता है प्यार
बाजार में होता है कि जंगल में
कि घर में ही हो जाता है प्यार

चिट्ठियों में मोबाइल की बातों में
या फेसबुक पर गाढ़ा होता है प्यार?
प्यार होने पर कैसा लगता है
अच्छा लगता है या बुरा
हँसी आती है कि रोना?
प्यार में क्या मिलता है
और क्या पड़ता है खोना

यह क्या है मर्ज है मरहम है
नशा है शौक है रिश्ता है
या है कोई जादू-टोना
कहाँ जाऊँ-किससे पूछूँ
जबसे उससे मिला हूँ नींद अपनी खोई है
वह मिलकर जाते हुए क्यों ऐसे रोई है
प्यार के बारे में लिए तमाम सवाल
छान रहा हूँ कोना-कोना

प्यार होता है एक बार
कि जीवन में करना पड़ता है बारंबार
क्या प्यार एक भारी पत्थर है
जिसे जीवन भर ढोना पड़ता है लगातार

क्या प्यार करने से
इन्सान का हो जाता है बेड़ा पार
प्यार नहीं करने से जीवन कैसे कटता है
क्या प्यार में दिल
एक ही बात बार-बार रटता है
जो प्यार नहीं करता उसका
जीवन कैसे कटता है
क्या पक्षी-पतंगे-जानवर सब करते हैं प्यार
भद्र लोग कैसे करते हैं
क्या गंवार भी वैसे करते हैं

आप चुप क्यों हैं
क्या आपको भी हो गया है
किसी से प्यार

सच्चा प्यार गूंगा होता है
या झट से कर देता है इजहार
जाइए जनाब ऐसे ही बड़बड़ा रहा हूँ
दरअसल मैं कर रहा हूं किसी का इंतजार…

वर्तनी

मैं जब लिखता हूँ
थोड़ी वर्तनी गलत हो जाती है
थोड़ी भाषा बिगड़ जाती है
थोड़ी बात कहता हूँ
थोड़ी रह जाती है

थोड़ा कागज काला होता है
थोड़ा सफेद रह जाता है
थोड़ी रोशनी के खयाल से लिखता हूँ
थोड़ा अंधेरा अच्छा लगता है

समूची पकड़ में नहीं आती चीजें
जितना सोचता हूँ उसका
थोड़ा ही पाता हूँ
थोड़ा कह पाता हूँ
थोड़ा कहने से रह जाता हूँ

जो हो गई गल्ती-सल्ती
जो रह गया है अधूरापन
उसके लिए
कृपया महान लोगों से संपर्क करें
वे कम नहीं हैं दुनिया में
वे भरे-पूरे शुद्ध-समूचे का दावा कर रहे हैं

उनका ही संसार सब चीजों से भरता जा रहा है
मेरे जैसे नाचीजों पर चढ़ी जा रही है उनकी अमरबेल…।

रंग

कई बार चीजों को हम
उनके रंगों से याद रखते हैं
रंगों को कई बार हम
रंग की तरह नहीं फूल, चिड़िया या स्त्री की तरह देखते हैं

रंगों की दुनिया इतनी विविध
इतनी विशाल, इतनी रोचक
कि कई बार हमें लगा है
कि हम आदमी से नहीं रंगों से करते हैं प्यार
रंगों से ही नफरत
कुछ रंग इतने प्यारे
कि हम हम उन्हें पोशाक की तरह पहनना चाहते हैं
कुछ लोगों की कुछ रंगों से नफरत भी ऐसी ही

हम हर रंग को फूल की तरह देखें
अपने पसंदीदा फूल की तरह
तो कम हो कुछ रंग भेद- मुझे ऐसा लगता है
कि रंग को हम सिर्फ फूल की तरह देखें
तो हर रंग से हो जाए धीरे-धीरे प्यार
ढेर सारे रंगों से कर-करके प्यार
बनाया जाए एक विविधवर्णी संसार…

पहला मिलन 

बोलना-बताना तो खैर मुश्किल है
गर उन अनुभवों के बारे में लिखा जाएगा
तो शायद बहुत कम लिखा जाएगा
शब्द बहुत धोखा देंगे
शरमाएंगे मुंह छिपाएंगे मुस्काएंगे
उन अनुभवों में आंधी ही ऐसी कि निर्लज्ज शब्द उड़ि-उड़ि जाएंगे
किसी नदी किनारे वे बैठेंगे
बस याद करेंगे उन बातों को
उनके पाँवों में जल होगा

बहुत पवित्र होकर नहीं लिखे जाएंगे
वे ब्यौरे
वे पैदल चलकर आएँगे उनके पाँवों में धूल होगी
उनकी आत्मा में साँसों की गर्मी होगी
हाथों का पसीना होगा
बहुत देहगंध भरी होगी उधम मचाती सी
उनके भीतर उलाहनों की थकान होगी
तमाम संशय होंगे उसमें आगे-पीछे के

तुम कहती हो- कहो
कुछ तो कहो
कहने में मौन भरा है
मौन इतना वाचाल हुआ है
तुम कहती हो कहो
मैं कहता हूँ तुम सुनती हो
मैं नहीं कहता हूँ तुम सुनती हो
मैं तुम्हारी शरारतों की कविता खूब समझता हूँ

पहली मुलाकात थी हमारी वह
तुम क्या-क्या सुनना चाहती हो समझता हूँ मैं
पर कैसे कहूँ प्रिय उन बातों को
उन बातों में इतनी आग
शब्द भला जल न जाएँगे…

जो जिया उसे शब्दों में तो जिया नहीं
साँसों में स्पर्श में मौन में
तुम्हारे भय के पर्दे में मेरे संकोच में
कितना अद्भुत था वह समय
जो बीतता था तो बुरा लगता था
मगर उस समय में बैठे कैसा लगता था
उसे किसी शब्द में कहूं तो कैसे कहूं

बेजुबानी बहुत उन यादों की
उन्हें देख रहा हूं दोनों पलकों से नजरें अपनी ढांपे
सुन रहा हूँ अपने रक्त में उन्हें टहलते हुए
कहना जुबान से उसे असत्य हो जाएगा
पाप लगेगा जाने कितना

तमतमाया था तुम्हारा चेहरा
पता नहीं वह क्या कहता था
तुम्हारी आँखों में इतना रस था
मैं पीता जाता था
तुम देती जाती थी
उसमें नशा बहुत था
तेरी हथेली मेरी हथेली पर बैठी
मैना सी बोले जाती थी
भाषा नहीं थी उसके पास
हकलाती थी वह भावों में
त्वचा भी सुनती है आँखें भी सुनती हैं
पहली बार तब जाना मैंने
उन हाथों में उन अंगों की यादें हैं

जो बातें हैं
वे सांसों की बातें हैं
उन यादों में तेरे होठों की हलचल है

साँसें जब बोलती हैं तो और कोई नहीं बोलता
यह अनुशासन है गजब
दिमाग सोचने का काम त्याग बस सुनता है
बताओ भला
इस स्मृति के ब्यौरे कैसे दिए जाएँ

हमारे आगे क्या है
हमारे पीछे क्या था
इन बातों में क्या बातें हैं
आगे की जो बातें हैं वे इतनी आगे हैं
कि इन बातों से उन बातों का
उन बातों से इन बातों का कोई मेल-मिलाप नहीं

हाँ,
सुनो जहां गए हम वहां अब न जाएंगे
उन यादों के सहारे अपने को भरमाएंगे
उसकी अपूर्वता ही हमारा जीवन धन होगा
उससे जीवन का व्यापार चलाएँगे…
क्या कहती हो
इतनी मुस्काती क्यों हो…

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