हातिम शाह की रचनाएँ

आब-ए-हयात जा के किसू ने पिसू ने पिया तो क्या 

आब-ए-हयात जा के किसू ने पिसू ने पिया तो क्या
मानिंद-ए-ख़िज्र जग में अकेला जिया तो क्या

शीरीं-लबाँ सीं संग-दिलों को असर नहीं
फ़रहाद काम कोह-कनी का किया तो क्या

जलना लगन में शम्अ-सिफ़त सख़्त काम है
परवाना जूँ शिताब अबस जी दिया तो क्या

नासूर की सिफ़त है न होगा कभू वो बंद
जर्राह ज़ख़्म-ए-इश्क़ कूँ आ कर सिया तो क्या

मोहताजगी सूँ मुझ कूँ नहीं एक दम फ़राग़
हक़ ने जहाँ में नाम कूँ ‘हातिम’ किया तो क्या

ऐ दिल न कर तू फ़िक्र पड़ेगा बला के हाथ

ऐ दिल न कर तू फ़िक्र पड़ेगा बला के हाथ
आईना हो के जा के लग अब दिलरूबा के हाथ

पैग़ाम दर्द-ए-दिल का मिरे ग़ुंचा-लब सती
पहुँचा सकेगा कौन मगर दूँ सबा के हाथ

मैं अब गिला जहाँ में बेगानों सीं क्या करूँ
जीना हुआ मुहाल मुझे आश्ना के हाथ

देना नहीं है शीशा-ए-दिल संग-दिल के तईं
दीजे अगर ये दिल तो किसू मीरज़ा के हाथ

आज़ाद हो रहा हूँ दो आलम के क़ैद सूँ
मीता लगा है जब सतीं मु बे-नवा के हाथ

ताबे रज़ा का उस की अज़ल सीं किया मुझे
चलता नहीं है ज़ोर किसूँ का क़ज़ा के हाथ

‘हातिम’ उम्मीद हक़ पे न राखे तो क्या करे
मौक़ूफ़ है मिलाप सजन का ख़ुदा के हाथ

इश्क़ में पास-ए-जाँ नहीं है दुरूस्त

इश्क़ में पास-ए-जाँ नहीं है दुरूस्त
इस सुख़न में गुमाँ नहीं है दुरूस्त

किसू मशरब में और मज़हब में
ज़ुल्म ऐ मेहरबाँ नहीं है दुरूस्त

डर न दुश्मन कूँ कड़कड़काने में
बाँग मुर्ग़ी के याँ नहीं है दुरूस्त

कई दीवान कह चुका ‘हातिम’
अब तलक पर ज़बाँ नहीं है दुरूस्त

इश्क़ नहीं कोई नहंग है यारो

इश्क़ नहीं कोई नहंग है यारो
दुश्मन-ए-नाम-ओ-नंग है यारो

सब्र बिन और कुछ नहीं हमराह
कूचा-ए-इश्क़ तंग है यारो

शम्अ-रू पर न हुए क्यूँ कर डोर
दिल हमारा पतंग है यारो

बात उस तिफ़्ल-ख़ू की रम्ज़-आमेज़
मुज दिवाने को संग है यारो

तिल है तिरयाक चश्म जाम-ए-शराब
सब्ज़ा-ए-ख़त यू बंग है यारो

ज़ुल्फ़ का दिलरूबा की आज ख़याल
दिल कूँ क़ैद-ए-फ़रंग है यारो

उस परी-रू सी और ‘हातिम’ सी
रात दिन सुल्ह ओ जंग है यारो

जी तरसता है यार की ख़ातिर 

जी तरसता है यार की ख़ातिर
उस सीं बोस-ओ-कनार की ख़ातिर

तेरे आने से यू ख़ुशी है दिल
जूँ कि बुलबुल बहार की ख़ातर

हम सीं मस्तों को बस है तेरी निगाह
तोड़ने कूँ ख़ुमार की ख़ातिर

बस है उस संग-दिल का नक़्श-ए-क़दम
मेरी लौह-ए-मज़ार की ख़ातिर

उम्र गुजरी कि हैं खुली ‘हातिम’
चश्म-ए-दिल इंतिज़ार की ख़ातिर

जिस कूँ पी का ख़याल होता है

जिस कूँ पी का ख़याल होता है
उस कूँ जीना मुहाल होता है

ख़म-ए-अबरू की याद सीं दिल पर
ज़ख़्म-ए-नाख़ुन हिलाल होता है

चल चमन तेरे फ़ैज़-ए-क़द से सर्व
हर क़दम में निहाल होता है

जब मैं रोता हूँ खोल कर दिल कूँ
शहर में बर्शगाल होता है

कौन जाने है ग़ैर-ए-हक़ तुझ बिन
जो कि ‘हातिम’ का हाल होता है

यार निकला है आफ़्ताब की तरह

यार निकला है आफ़्ताब की तरह
कौन सी अब रही है ख़्वाक तरह

चश्म-ए-मस्त-ए-सियह की याद मुदाम
शीशा-ए-दिल में है शराब की तरह

कभू ख़ामोश हूँ कभू गोया
सरनविश्त है मिरी किताब की तरह

पस्त हो चल मिसाल दरिया के
ख़ेमा बरपा न कर हबाब की तरह

पा-बोसी कूँ उस का है गर शौक़
क़द कूँ अपने बना रिकाब की तरह

साफ़ दिल है तो आ कुदूरत छोड़
मिल हर इक रंग बीच आब की तरह

पीवे पीवे है शबाब ‘हातिम’ साथ
क्यूँ न दुश्मन जले कबाब की तरह

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