हिलाल फ़रीद की रचनाएँ

आँखों में वो ख़्वाब नहीं बसते, पहला सा वो होल नही होता 

आँखों में वो ख़्वाब नहीं बसते, पहला सा वो होल नही होता
अब फ़स्ल-ए-बहार नहीं आती और रंज ओ मलाल नहीं होता

इस अक़्ल की मारी नगरी में कभी पानी आग नहीं बनता
यहाँ इश्क़ भी लोग नहीं करते, यहाँ कोई कमाल नहीं होता

हम आज बहुत ही परीशाँ हैं, इस वक़्त के फेर से हैराँ हैं
हमें ले के चलो किसी ऐसी तरफ़ जहाँ हिज्र ओ विसाल नहीं होता

जितनी है निदामत तुम को अब उतने ही पशेमाँ हम भी हैं
तुम उस का जवाब ही क्यूँ सोचो हम से जो सवाल नहीं होता

वो बस्ती भी इक बस्ती थी, ये बस्ती भी इक बस्ती है
वहाँ टूट के दिल जुड़ जाते थे, यहाँ कोई ख़याल नहीं होता

इस शहर की रीत को आम करें, झुक झुक के भी सभी को सलाम करें
हर काम तो हम कर लेते हैं यही काम ‘हिलाल’ नहीं होता

आँसू तो कोई आँख में लाया नहीं हूँ मैं

आँसू तो कोई आँख में लाया नहीं हूँ मैं
जैसा मगर लगा तुम्हें वैसा नहीं हूँ मैं

अब मुब्तला-ए-इश्क़ ज़्यादा नहीं हूँ मैं
कहते हो तुम यही तो फिर अच्छा नहीं हूँ मैं

ख़ूबी न हो कोई मगर इतना तो है ज़रूर
झूठी लगे जो बात वो कहता नहीं हूँ मैं

पानी पे बनते अक्स की मानिंद हूँ मगर
आँखों में कोई भर ले तो मिटता नहीं हूँ मैं

इस तरह ख़ुद को मुझ पे नुमायाँ न कीजिए
इंसान हूँ हुज़ूर फ़रिश्ता नहीं हूँ मैं

रस्तों के ख़म व पेच में ऐसा रहूँ हूँ ग़र्क़
अब तक किसी मक़ाम पे ठहरा नहीं हूँ मैं

सौदा है मेरे सर में तो पैरों मंे भी है दम
चलता हूँ एक बार तो रूकता नहीं हूँ मैं

मानो मेरी भी बात के सब कुछ लुटा के भी
जीता हूँ उस के इश्क़ में हारा नहीं हूँ मैं

सुन ले ‘हिलाल’ आज ही सुनना है जो ग़ज़ल
फिर मुझ से मत ये कहना सुनाता नहीं हूँ मैं

हम ख़ुद भी हुए नादिम जब हर्फ़-ए-दुआ निकला 

हम ख़ुद भी हुए नादिम जब हर्फ़-ए-दुआ निकला
समझे थे जिसे पत्थर वो शख़्स ख़ुदा निकला

इस दश्त से हो कर भी इक सैल-ए-अना निकला
कुछ बर्ग-ए-शजर टूटे कुछ ज़ोर-ए-हवा निकला

उलझन का सुलझ जाना इक ख़ाम-ख़याली थी
जब ग़ौर किया हम ने इक पेच नया निकला

ऐ फ़ितरत-ए-सद मानी ‘ग़ालिब’ की ग़ज़ल है तू
जब हुस्न तेरा परखा पहले से सवा निकला

हम पास भी जाने से जिस शख़्स के डरते थे
छू कर जो उसे देखा मिट्टी का बना निकला

फूलों में ‘हिलाल’ आओ अब रक़्स-ए-ख़िजाँ देखें
काँटों के नगर में तो हर बाग़ हरा निकला

कभी तो सहन-ए-अना से निकले, कहीं पे दश्त-ए-मलाल आया 

कभी तो सहन-ए-अना से निकले, कहीं पे दश्त-ए-मलाल आया
हमारी वहशत पे कैसा कैसा उरूज आया ज़वाल आया

अदावतें थीं, मोहब्बतें थीं, न जाने कितनी ही हसरतें थीं
मगर फिर ऐसा हो के सब कुछ मैं ख़ुद ही दिल से निकाल आया

कभी इबादत, कभी इनायत, कभी दुआएँ, कभी अताएँ
कहीं पे दस्त-ए-तलब बने हम, कहीं पे हम तक सवाल आया

गुलों के चेहरे खिले हुए हैं, हवा में ख़ुश्बू महक रही है
ये मेरी आँखों ने ख़्वाब देखा के सैल-ए-हुस्न-ओ-जमाल आया

तमाम रंज ओ मेहन को छोड़ें, तुम्हीं को देखें तुम्हीं को सोचें
बड़े जमाने के बाद दिल में ये भूला बिसरा ख़याल आया

ग़ज़ल सुनाऊँ तो दाद पाऊँ, मगर मैं तुम से भी क्या छुपाऊँ
तुम ही ने सारे हुनर सिखाए तुम ही से रंग-ए-‘हिलाल’ आया

मुमकिन ही नहीं की किनारा भी करेगा 

मुमकिन ही नहीं की किनारा भी करेगा
आशिक़ है तो फिर इश्क़ दूबारा भी करेगा

परदेस में आया हूँ तो कुछ मैं भी करूँगा
कुछ काम तेरे तख़्त का तारा भी करेगा

अंदाज़ यही है यही एतवार हैं उस के
बैठेगा बहुत दूर इशारा भी करेगा

रोएगा कभी ख़ूब कभी ख़ूब हँसेगा
क्या और तेरे तीर का मारा भी करेगा

जब वक़्त पड़ा था तो जो कुछ हम ने किया था
समझे थे वही यार हमारा भी करेगा

शेरों में ‘हिलाल’ आप को कहना है फ़क़त सच
सच बात मगर कोई गवारा भी करेगा

रास्ता देर तक सोचता रह गया

रास्ता देर तक सोचता रह गया
जाने वाले का क्यूँ नक़्श-ए-पा रह गया

आज फिर दब गईं दर्द की सिसकियाँ
आज फिर गूँजता क़हक़हा रह गया

अब हवा से शजर कर रहा है गिला
एक गुल शाख़ पर क्यूँ बचा रह गया

झूठ कहने लगा, सच से बचने लगा
हौसले मिट गए तजरबा रह गया

हँसते गाते हुए लफ़्ज़ सब मिट गए
आँसुओं से लिखा हाशिया रह गया

वक़्त की धार में बह गया सब मगर
नाम दीवार पर इक लिखा रह गया

उस के दम से कहे शेर मैं ने ‘हिलाल’
फूल इस धूप में जो खिला रह गया

रूकने के लिए दस्त-ए-सितम-गर भी नहीं था 

रूकने के लिए दस्त-ए-सितम-गर भी नहीं था
अफ़्सोस किसी हाथ में पत्थर भी नहीं था

बाहर जो नहीं था तो कोई बात नहीं थी
एहसास-ए-निदामत मगर अंदर भी नहीं था

जन्नत ने मुझे दी तो मैं दोज़ख़ भी न लूँगा
मोमिन जो नहीं था तो मैं काफ़िर भी नहीं था

लौटा जो वतन को तो वो रस्ते ही नहीं थे
जो घर था वहाँ तो मेरा घर भी नहीं था

अंजाम तो ज़ाहिर था सफ़ें टूट चुकी थीं
सालार-ए-मुअज्ज़ज़ सर-ए-लश्कर भी नहीं था

अफ़्सोस क़बीले पे खुला ग़ैर के हाथों
सरदार के पहलू में तो ख़ंजर भी नहीं था

जो बात कही थी वो बहुत साफ़ कही थी
दिल में जो नहीं था वो ज़ुबाँ पर भी नहीं था

ये सच है क़सीदा न ‘हिलाल’ एक भी लिक्खा
ये सच है कि मैं शाह का नौकर भी नहीं था

सब कुछ खो कर मौज उड़ाना इश्क़ में सीखा

सब कुछ खो कर मौज उड़ाना इश्क़ में सीखा
हम ने क्या क्या तीर चलाना इश्क़ में सीखा

रीत के आगे प्रीत निभाना इश्क़ में सीखा
साधू बन कर मस्जिद जाना इश्क़ में सीखा

इश्क से पहले तेज़ हवा का ख़ौफ़ बहुत था
तेज़ हवा में हँसना गाना इश्क़ में सीखा

हर इक सरहद फांच चुका था सर-कर दरिया
उस दरिया को मोड़ के लाना इश्क़ में सीखा

इश्क़ किया तो ज़ुल्म हुआ और ज़ुल्म हुआ तब
ज़ुल्म के आगे सर न झुकाना इश्क़ में सीखा

अपने दुख में रोना-धोना आप ही आया
ग़ैर के दुख में ख़ुद को दुखाना इश्क़ में सीखा

कुछ भी ‘हिलाल’ अब डींगें मारो लेकिन तुम ने
महफ़िल महफ़िल धूम मचाना इश्क़ में सीखा

थी अजब ही दास्ताँ जब तमाम हो गई

थी अजब ही दास्ताँ जब तमाम हो गई
इक मिसाल बन गई इक पयाम हो गई

रात जब जवाँ हुई जब दियों के सर उठे
तक हवा भी और कुछ तेज़-गाम हो गई

एक बस नज़र पड़ी उस के बाद यूँ हुआ
मैं ने जो ग़ज़ल लिखी तेरे नाम हो गई

मिट रही थी तिश्नगी बढ़ रही थी दोस्ती
फिर अना को की तेग़ क्यूँ बे-नियाम हो गई

फ़लसफ़े को छोड़िए क्या कहेंगे सोचिए
ज़िंदगी जो आप से हम-कलाम हो गई

तंज़ तो बहुत हुए पर अजीब बात है
राह जो हमारी थी राह-ए-आम हो गई

कैसी उम्दा क़ौम थी क्या ही ज़िंदा क़ौम थी
आख़िर उस को क्या हुआ क्यूँ ग़ुलाम हो गई

जाम-ए-इश्क़ पी चुके ज़िंदगी भी जी चुके
अब ‘हिलाल’ घर चलो अब तो शाम हो गई

वही हुआ कि ख़ुद भी जिस का ख़ौफ़ था मुझे 

वही हुआ कि ख़ुद भी जिस का ख़ौफ़ था मुझे
चराग़ को जला के बस धुआँ मिला मुझे

कभी मिआ सका न कोई दूसरा मुझे
शिकस्त दे गई मगर मेरी अना मुझे

जवाब इस सवाल का भी दे ज़रा मुझे
उड़ा के लाई हैं यहाँ पे क्यूँ हवा मुझे

हरी-भरी सी शाख़ पर खिला हुआ गुलाब
न जाने एक ख़ार क्यूँ चुभा गया मुझे

उस अजनबी से वास्ता ज़रूर था कोई
वो जब कभी मिला तो बस मेरा लगा मुझे

अभी न मुझ को टोकिए अभी तो ज़िंदगी
सुना रही है गीत रोज़ इक नया मुझे

ये मुद्दतों के बाद जो कही ग़ज़ल ‘हिलाल’
वो कौन है जो आज याद आ गया मुझे

वक़्त ने रंग बहुत बदले क्या कुछ सैलाब नहीं आए

वक़्त ने रंग बहुत बदले क्या कुछ सैलाब नहीं आए
मेरी आँखें कब वीरान हुईं कब तेरे ख़्वाब नहीं आए

दिल सहरा का वो तिश्ना-लब हर बार यही सोचा जिस ने
मुमकिन है के आगे दरिया हो और कोई सराब नहीं आए

हम लोग क्यूँ इतने परीशाँ हैं किस बात पर आख़िर नालाँ हैं
क्या सारी बहारें रूठ गईं क्या अब के गुलाब नहीं आए

तुम कुर्ब की राहत क्या समझो तुम हिज्र की वहशत क्या जानो
तुम ने वो रात नहीं काटी तुम पर वो अज़ाब नहीं आए

पहले भी जहाँ पर बिछड़े थे वही मंज़िल थी इस बार मगर
वो भी बे-लौस नहीं लौटा हम भी बे-ताब नहीं आए

ये बज़्म-ए-‘हिलाल’ है ख़ूब मगर जब तक न सुनाएँ आप ग़ज़ल
चेहरों के गुलाब नहीं महकें महफ़िल पे शबाब नहीं आए

ये विसाल ओ हिज्र का मसअला तो मेरी समझ में न आ सका

ये विसाल ओ हिज्र का मसअला तो मेरी समझ में न आ सका
कभी कोई मुझ को न पा सका कभी मैं किसी को न पा सका

कई बस्तियों को उलट चुका कोई ताब इस की न ला सका
मगर आँधियों का ये सिलसिला तेरा नक़्श-ए-पा न मिटा सका

मेरी दास्ताँ भी अजीब है वो क़दम क़दम मेरे साथ था
जिसे राज़-ए-दिल न बता सका जिसे दाग़-ए-दिल न दिखा सका

न ही बिजलियाँ न ही बारिशें न ही दुश्मनों की वो साज़िशें
भला क्या सबब है बता ज़रा जो तू आज भी नहीं आ सका

कभी रौशनी की तलब रही कभी हौसलों की कमी रही
मैं चराग़ को तेरे नाम के न जला सका न बुझा सका

वो जो अक्स रंग-ए-‘हिलाल’ थी वो जो आप अपनी मिसाल थी
मुझे आज तक है ख़लिश यही तुझे वो ग़ज़ल न सुना सका

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