हुमेरा ‘राहत’ की रचनाएँ

आँखों से किसी ख़्वाब को बाहर नहीं देखा 

आँखों से किसी ख़्वाब को बाहर नहीं देखा
फिर इश्क़ ने ऐसा कोई मंज़र नहीं देखा

ये शहर-ए-सदाक़त है क़दम सोच के रखना
शाने पे किसी के भी यहाँ सर नहीं देखा

हम उम्र बसर करते रहे ‘मीर’ की मानिंद
खिड़की को कभी खोल के बाहर नहीं देखा

वो इश्क़ को किस तरह समझ पाएगा जिस ने
सहरा के गले मिलते समंदर नहीं देखा

हम अपनी ग़ज़ल को ही सजाते रहे ‘राहत’
आईना कभी हम ने सँवर कर नहीं देखा

फ़साना अब कोई अंजाम पाना चाहता है

फ़साना अब कोई अंजाम पाना चाहता है
तअल्लुक़ टूटने को इक बहाना चाहता है

जहाँ इक शख़्स भी मिलता नहीं है चाहने से
वहाँ ये दिल हथेली पर ज़माना चाहता है

मुझे समझा रही है आँख की तहरीर उस की
वो आधे रास्ते से लौट जाना चाहता है

ये लाज़िम है कि आँखें दान कर दे इश्क़ को वो
जो अपने ख़्वाब की ताबीर पाना चाहता है

बहुत उकता गया है बे-सुकूनी से वो अपनी
समंदर झील के नज़दीक आना चाहता है

वो मुझ को आज़माता ही रहा है ज़िंदगी भर
मगर ये दिल अब उसे को आज़माना चाहता है

उसे भी ज़िंदगी करनी पड़ेगी ‘मीर’ जैसी
सुख़न से गर कोई रिश्ता निभाना चाहता है

हर एक ख़्वाब की ताबीर थोड़ी होती है

हर एक ख़्वाब की ताबीर थोड़ी होती है
मोहब्बतों की ये तक़दीर थोड़ी होती है

कभी कभी तो जुदा बे-सबब भी होते हैं
सदा ज़माने की तक़सीर थोड़ी होती है

पलक पे ठहरे हुए अश्क से कहा मैं ने
हर एक दर्द की तशहीर थोड़ी होती है

सफ़र से करते हैं इक दिल से दूसरे दिल तक
दुखों के पाँव में ज़ंजीर थोड़ी होती है

दुआ को हाथ उठाओ तो ध्यान में रखना
हर एक लफ़्ज़ में तासीर थोड़ी होती है

हवा के साथ ये कैसा मोआमला हुआ है

हवा के साथ ये कैसा मोआमला हुआ है
बुझा चुकी थी जिसे वो दिया जला हुआ है

हुज़ूर आप कोई फै़सला करें तो सही
हैं सर झुके हुए दरबार भी लगा हुआ हे

खड़े हैं सामने कब से मगर नहीं पढ़ते
वो एक लफ़्ज जो दीवार पर लिखा हुआ है

है किस का अक्स जो देखा है आईने से अलग
ये कैसा नक़्श है जो रूह पर बना हुआ है

ये किस का ख़्वाब है ताबीर के तआक़ुब में
ये कैसा अश्क है जो ख़ाक मे मिला हुआ है

ये किस की याद की बारिश में भीगता है बदन
ये कैसा फूल सर-ए-शाख़-ए-जाँ खिला हुआ है

सितारा टूटते देखा तो डर गई ‘राहत’
ख़बर न थी यही तक़दीर में लिखा हुआ है

कहानी को मुकम्मल जो करे वो बाब उठा लाई

कहानी को मुकम्मल जो करे वो बाब उठा लाई
मैं उस की आँख के साहिल से अपने ख़्वाब उठा लाई

ख़ुशी मेरी गवारा थी न क़िस्मत को न दुनिया को
सो मैं कुछ ग़म बरा-ए-ख़ातिर-ए-अहबाब उठा लाई

हमेशा की तरह सर को झुकाया उस की ख़्वाहिश पर
अँधेरा ख़ुद लिया उस के लिए महताब उठा लाई

समेटे उस के आँसू अपने आँचल में तो जाने क्यूँ
मुझे ऐसा लगा कुछ गौहर-ए-नायाब उठा लाई

मयस्सर था न कोई ख़्वाब इन आँखों में रखने को
सौ मैं इन के लिए अश्कों का इस सैलाब उठा लाई

किसी भी राएगानी से बड़ा है

किसी भी राएगानी से बड़ा है
ये दुख तो ज़िंदगानी से बड़ा है

न हम से इश्क़ को महफ़हूम पूछो
ये लफ़्ज़ अपने मआनी से बड़ा है

हमारी आँख का ये एक आँसू
तुम्हारी राजधानी से बड़ा है

गुज़र जाएगी सारी इस में
मिरा क़िस्सा कहानी से बड़ा है

तिरा ख़ामोश सा इज़हार ‘राहत’
किसी की लन-तरानी से बड़ा है

मैं आब-ए-इश्क़र में हल हो गई हूँ 

मैं आब-ए-इश्क़र में हल हो गई हूँ
अधूरी थी मुकम्मल हो गई हूँ

पलट कर फिर नहीं आता कभी जो
मैं वो गुज़रा हुआ कल हो गई हूँ

बहुत ताख़ीर से पाया है ख़ुद को
मैं अपने सब्र का फल हो गई हूँ

मिली है इश्क़ की सौग़ात जब से
उदासी तेरा आँचल हो गई हूँ

सुलझने से उलझती जा रही हूँ
मैं अपनी ज़ुल्फ़ का बल हो गई हूँ

बरसती है जो बे-मौसम ही अक्सर
उसी बारिश में जल थल हो गई हूँ

मिर ख़्वाहिश है सूरज छू के देखूँ
मुझे लगता है पागल हो गई हूँ

मिसाल-ए-ख़ाक कहीं पर बिखर के देखते हैं 

मिसाल-ए-ख़ाक कहीं पर बिखर के देखते हैं
क़रार मर के मिलेगा तो मर के देखते हैं

सुना है ख़्वाब मुकम्मल कभी नहीं होते
सुना है इश्क़ ख़ता है सो कर के देखते हैं

किसी की आँख में ढल जाता है हमारा अक्स
जब आईने में कभी बन सँवर के देखते हैं

हमारे इश्क़ की मीरास है बस एक ही ख़्वाब
तो आओ हम उसे ताबीर कर के देखते हैं

सिवाए ख़ाक के कुछ भी नज़र नहीं आता
ज़मीं पे जब भी सितारे उतर के देखते हैं

ये हुक्म है कि ज़मीन-ए-‘फराज़’ में लिक्खें
सो इस ज़मीन में म पाँव धर के देखते हैं

तअल्लुक़ की नई इक रस्म अब ईजाद करना है 

तअल्लुक़ की नई इक रस्म अब ईजाद करना है
न उस को भूलना है और न उस को याद करना है

ज़बानें कट गईं तो क्या सलामत उँगलियाँ तो हैं
दर ओ दीवार पे लिख दो तुम्हें फरियाद करना है

सितारा ख़ुश-गुमानी का सजाया है हथेली पर
किसी सूरत हमें तो अपने दिल को शाद करना है

बना कर एक घर दिल की ज़मीं पर उस की यादों का
कभी आबाद करना है कभी बर्बाद करना है

तक़ाज़ा वक़्त का ये है न पीछे मुड़ के देखें हम
सो हम को वक़्त के इस फै़सले पर साद करना है

तुम्हारे इश्क़ पे दिल को जो मान था न रहा

तुम्हारे इश्क़ पे दिल को जो मान था न रहा
सितारा एक सर-ए-आसमान था न रहा

वो और थे कि जो ना-ख़ुश थे दो जहाँ ले कर
हमारे पास तो बस इक जहान था न रहा

तू अपनी फ़त्ह का ऐलान कर मैं हार गई
वो हौसला कि मुझे जिस पे मान था न रहा

वही कहानी है किरदार भी वहीं हैं मगर

जो एक नाम सर-ए-दास्तान था न रहा

सदाएँ दोगे पलट कर कभी तो देखोगे
हमारे दिल में ये मुबहम गुमान था न रहा

वक़्त ऐसा कोई तुझ पर आए 

वक़्त ऐसा कोई तुझ पर आए
ख़ुश्क आँखों में समंदर आए

मेरे आँगन में नहीं थी बेरी
फिर भी हर सम्त से पत्थर आए

रास्ता देख न गोरी उस का
कब कोई शहर में जा कर आए

ज़िक्र सुनती हूँ उजाले का बहुत
उस से कहना कि मिरे घर आए

नाम ले जब भी वफ़ा का कोई
जाने क्यूँ आँख मिरी भर आए

वक़्त की आँख से कुछ ख़्वाब नए माँगता है

वक़्त की आँख से कुछ ख़्वाब नए माँगता है
दिल मिरा एक दुआ रात गए माँगता है

एक आवाज़ तह-ए-आब बुलाती है मुझे
इश्क़ मुझ से भी वही कच्चे घड़े माँगता है

दर्द कहता है किसी साअत-ए-तंहा में रहूँ
इक मकाँ गहरे समंदर से परे माँगता है

ज़ब्त चाहे उसे रूख़्सत की इजाज़त मिल जाए
अश्क आँखों से मोहब्बत के सिले माँगता है

दश्त दर दश्त लिए फिरता है मुझ को ये जुनूँ
इम्तिहाँ इश्क़ में कुछ और कड़े माँगता है

ये कहना था जो दुनिया कर रही है

ये कहना था जो दुनिया कर रही है
ये गंगा कब से उल्टी बह रही है

ख़बर है ख़्वाब टूटेगा यक़ीनन
मगर इक फ़ाख़्ता दुख सह रही है

लगी थी उस की बुनियादों में दीमक
सो अब दिल की इमारत ढह रही है

कहीं ये ख़ुश्क हो जाए न साथी
मिरे दिल में जो नदिया बह रही है

सितारा बंद मुट्ठी में मिलेगा
मिरी तक़दीर मुझ से कह रही है

मिरे दिल के अकेले घर में ‘राहत’
उदासी जाने कब से कह रही है

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