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पिता की मृत्यु पर 

पिता की मृत्यु पर
जब खुल कर नही रोया मैं
और एकांत में दहाड़ कर कहा मौत से
अभी देर से आना था तुम्हें
उस वक्त मिला
पिता की आत्मा को मोक्ष।

पिता की अलग दुनिया थी
मेरी अलग
दोनों दुनिया में न कोई साम्य था
न कोई प्रतिस्पर्धा
जब पिता नही रहे
दोनों दुनिया के बोझ तले दब गया मैं
मेरी आवाज़ कहीं नही पहुँचती थी
मुझ तक भी नही।

कोई भी गलत काम करने से पहले
ईश्वर का मुझे लगता था बहुत भय
पिता की मौत के बाद
ईश्वर का भय हुआ समाप्त
और पिता का भय बढ़ गया
इस तरह ईश्वर अनुपस्थित हुआ मेरे जीवन से
पिता के जाने के बाद।

पिता के मर जाने पर
मनुष्य के अंदर का पिता डर जाता है
वो जीना चाहता है देर तक
अपने बच्चों के लिए
भले जीते जी वो कुछ न कर पाए
मगर
मर कर नही बढ़ाना चाहता
अपने बच्चों की मुश्किलें।

पिता का सच 

एक मेरे पिता थे
जो यदा-कदा कहते थे
तुम्हारे बस का नही ये काम

एक वो है
जिनका पिता मैं हूँ
उनकी अपेक्षाओं पर जब होता हूँ खारिज़
ठीक यही बात कहतें वो
आपके बस का नही ये काम

दो पीढ़ियों के बीच
इतना मजबूर हमेशा रहा हूँ मैं
ये कोई ग्लैमराइज्ड करने की बात नही
ना अपनी काहिली छिपाने की
एक अदद कोशिश इसे समझा जाए

बात बस इतनी सी है
मैं चूकता रहा हूँ हमेशा बेहतर और श्रेष्ठतम् से
नही कर पाता
कुछ छोटे छोटे मगर बुनियादी काम
और मनुष्य होने के नातें
ये एक बड़ी असफलता है मेरी
यह भी करता हूँ स्वीकार

अपने पिता और पुत्रों के मध्य
संधिस्थल पर बैठा प्रार्थनारत हूँ न जाने कब से
घुटनों के बल बैठे बैठे मेरी कमर दुखने लगी है
मेरा कद रह गया है आधा

इसलिए नही देख पाता
अपने आसपास बिखरी
छोटी-बड़ी खुशियों को

मेरे वजूद का यही एक ज्ञात सच है
जो बता सकता हूँ मैं
अपने पूरे आत्मविश्वास के साथ।

पिता के लिए 

संयोग से उस दौर में
मेरा जन्म हुआ
जहाँ पिता पुत्र के अंतर्द्वन्द बेहद गहरे थे
समाज तब करवट ले रहा था
मेरे से पूर्ववर्ती पीढ़ी
विचार और संवेदना के स्तर पर नही थी
इस किस्म की विद्रोही

हम नालायक थे
वो रही थी अपेक्षाकृत आज्ञाकारी

मेरा विद्रोह किसी क्रांति के निमित्त न था
ये काफी हद तक भावनात्मक रहा
कुछ कुछ वैसा ही
जैसा सबको रहती है शिकायत कि
पिता उन्हें ठीक से समझ नही पाए
मगर
एक ईमानदार सवाल यह भी है
क्या हम ठीक से समझ पाए पिता को

ऐसा क्यों हुआ हमारा अस्तित्व ही
चुनौति बन गया उनके लिए
हमारे मुद्दें भिन्न थे तर्क भिन्न थे
एकदम अलग थी दुनिया
मगर अक्सर बहस क्यों रही एकतरफा

पिता के साथ क्यों नही विकसित हो पाया
हमारा लोकतांत्रिक रिश्ता
दोनों के हिस्से में आती रही हमेशा
थोड़ी जिद थोड़ी परेशानी

एक चूके हुए समय में
पिता पुत्र का साथ होना था बेहद जटिल
आदर की कल्पनाओं के साथ बनता रहा
असहमतियों का पहाड़

पिता कुछ इस तरह उपस्थित रहें हमारे जीवन में
जैसे कुँए में रस्सी
हम पिता की अपेक्षाओं से नही
खुद के असंतुलन से होते रहे सहज
नही समझ पाए
प्यार का होता है एक गैर बौद्घिक संस्करण भी

पिता के जीते जी
हमारे कन्धे जुते रहें खुद के यथार्थ को जोतने में
हमें उम्मीद थी कि हम पैदा करेंगे कुछ नया
जिसे देख विस्मय से चुप हो जाएंगे पिता

और जब एकदिन पिता चुप हो गए हमेशा के लिए

हमनें पाया सारी ज़मीन बंजर थी
जिसे जोत रहे थे हम बेतुके उत्साह के साथ

हम उस दौर के पुत्र है
जो अपने पिता के पिता बननें की फिराक में थे
मगर साबित हुए
खुद एक औसत पिता

दरअसल, पिता होना इतना आसान नही था
ये बात तब समझ में आई
जब पिता नही थे,पिता की कुछ स्मृतियाँ थी
जो रोज़ हँसती थी हमारे एकांत पर
जो रोज़ रोती थी हमारी मजबूरियों पर

पिता मजबूरी के प्रतीक नही थे
हमनें उनको बनाया ऐसा
भले ही हमारा मन्तव्य उनको छोटा करना नही था
मगर सच तो ये भी है
तमाम समझदारी के दावों के बीच
हम नही नाप पाए अपने ही पिता का कद।

सियासती 

कभी कभी खीझकर
पिताजी मुझे कहते थे
सियासती
खासकर जब मैं तटस्थ हो जाता
या फिर उनका पक्ष नही लेता था
उनके एकाधिकार को चुनौति देने वाली व्यूह रचना का
वो मुझे मानते थे सूत्रधार
उन्हें लगता मैं अपने भाईयों को संगठित कर
उनके विरोध की नीति का केंद्र हूँ
गर्मा गरम बातचीत में उन्हें लगता
मिलकर उनको घेर रहा हूँ
उनको जीवन और निर्णयों को अप्रासंगिक बताने के लिए
सबको करता हूँ दीक्षित
बावजूद ऐसे गुस्से भरे आरोपों के
एक मैं ही था
जिसकी बात मानते थे वो
क्यों, ये आजतक नही जान पाया
मैंने देखा उनको धीरे धीरे ढल जाना
बिना किसी मजबूरी के
तमाम असहमतियों के बावजूद
पिता बचे मेरे जीवन में बेहद आदर के साथ
कुछ क्षमा प्रार्थनाओं की शक्ल में
और मैं पता नही किस रूप में बचा
उनके चले जाने के बाद
तमाम सियासत के बावजूद मैं हार गया एक दिन
तमाम विरोध के बावजूद वो जीत गए उस दिन
हमेशा की तरह।

भाई के लिए… 

लगा ऐसा कई बार कि
तुम बदल गए
और रच ली तुमनें अपनी एक ऐसी दुनिया
जहाँ पग पग पर खारिज़
हो रही थी मेरी मान्यताएं

सामाजिक गौरव का संयुक्त हिस्सा बनना था हमें
मगर तुम उलझ गए अपनी ही दुनिया में
जैसे जैसे हम बड़े हुए
छोटी होती गई हमारी दुनिया
और साफ तौर पर अलग भी

पारिवारिक अवसरों पर हम मिलतें रहे
एक औपचारिक गर्मजोशी के साथ
मगर जैसे ही पैतृक घर छूटता
छूट जाती थी हमारी अपनत्व की लगाम
हमें विजयी करनी थी अपनी अपनी दुनिया
बनना था कहीं श्रेष्ठ पति तो कहीं श्रेष्ठ पिता

कई बार सोचता हूँ
जब जब गहराया जीवन में धन का संकट
तुम याद क्यों नही आए
क्या तो याद आया पिता
या फिर वो दोस्त
जिनसे मुद्दत से रिश्तें रहें है मेरे खराब
तुम भाई थे मेरे मगर मुश्किल वक्त पर
दोस्त से कम अधिकार महसूस किया मैंने
कमजोर पड़ती गई हुलस कर गले लगनें की चाह

एक रक्त हमारी शिराओं में बहता है
मगर इसके जमनें और बहनें के बिन्दू क्यों है भिन्न
ये बात मुझे पूछनी थी किसी रुधिर विज्ञानी से

ऐसा नही मेरे मन तुम्हारे प्रति कोई व्यक्तिगत आक्रोश है
शायद एक समय के बाद
भाई हो ही जातें है बेहद एकांतिक और आत्मकेंद्रित
दफ्तर और घर की जिम्मेदारियां
धीरे धीरे लील लेती है उनका भाईपना

यह भी सम्भव है
ठीक यही शिकायतें तुम्हें मुझसे हो
समझा जाता रहा हूँ मैं भी इतना ही आत्मनिष्ठ और मतलबी भाई
मगर भाई को भुजा कहने के वाले शास्त्र
अब न जाने को क्यों सच्चें नही लगतें

एक ही पीढ़ी में हम भाई के रूप में
कितनें रूपांतरित हुए
और बना ली अपनी समानांतर दुनिया
इसे कई गुना बदलेंगी हमारी सन्तानें
यह मेरा भविष्य का स्थाई डर है
चाचा-ताऊ की होने के बाद भी
उनमें पसरा रहेगा एक ख़ास किस्म का अजनबीपन
नही होगा उनके मध्य कोई पवित्र अनुराग
वें कर रहे होंगे एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा
संपत्ति और सफलता तय कर रही होगी उनकी निकटता और दूरी

ये देख कर बतौर भाई मुझे अच्छा नही लगेगा
शायद तुम्हें भी न लगें
मगर तुम कह न पाओगे
ये बात मुझे पता है

मैं कह रहा हूँ महज इसलिए
तमाम असहमतियों और शिकायतों के बावजूद
मुझे तुम्हारी जरूरत हमेशा होती है महसूस
तुम्हारे रहते लगता है
मेरे किसी भी लौकिक अपमान का बदला तुम जरूर लोगे एकदिन
मेरे बच्चों को डांट दोगे उतने ही अधिकार के साथ
यदि देखोगे उन्हें गलत चलता हुआ

मेरे भाई मेरे दोस्त मेरे दुश्मन
बस इतनी सी बात है
हम दोनों ही बदलतें बदलतें इस तरह बदल गए
कि एक दूसरे को भाई के रुप में नही रख पातें याद
हमारी साँझा स्मृतियां तेजी से हो रही समाप्त
इससे पहले हम अपने पिता की दो इकाई रह जाए
और भूल जाए हम अपना संयुक्त बचपन

भाई को भाई मिलते रहना जरूरी है
उससे उसकी दिक्कतें पूछता रहना भी जरूरी है
अतीत में अटका रहना भी उतना ही जरूरी है
यही वो तरीका है
जो बचा सकता है
भाई से भाई का रिश्ता
न्यूनतम पारस्परिक सम्मान
और मिलनें की चाह
हमारा अतीत ही जोड़े रख सकता है अब हमें
क्योंकि
वर्तमान और भविष्य दोनों में
भाई कहीं भाई के पास नही दिखता मुझे
इसी यथार्थ ने अँधा कर दिया है मुझे
और मैं गलतफ़हमियों का रास्ता पार करने के लिए
तलाश रहा हूँ भाई का हाथ।

अनावरण

देह को होना होगा एक दिन
अनावृत्त
समस्त आवरणों से
जैसे मस्तूल से बंधी नाव
को होना होता है अलग
चलनें के लिए जल की तरलता पर
आलिंगन और स्पर्शों की प्रतिलिपियां
जमा करनी होगी
अपनत्व के संग्रहालय में
जब जिस्म का नही होगा कोई मनोविज्ञान
जब मन का नही होगा कोई दर्शन
तब मिलना होगा कुछ तरह कि
न रहें कुछ भी शेष
न विमर्श को न स्पर्श को
थोड़े से अधीर थोड़े से आश्वस्त होकर
मैं तुम्हारे माथे पर और
तुम मेरी पीठ पर लिखोगी
यही एक सयुंक्त बात
मुक्ति यदि कोई अंतिम चीज़ होती तो
इसे हासिल किया जा सकता था।

साधना

पराजित देवता के आशीर्वाद से
उसनें प्रेम किया
त्याज्य ऋषियों ने उसे दीक्षित किया
मंत्र को उसनें गीत की तरह पढ़ा
उसके यज्ञ की समिधा
जंगल की सबसे उपेक्षित वनस्पतियां थी
उसकी आहूतियां बिलकुल शास्त्रीय नही थी
उसके आह्वहान में थोड़ा रोष करुणा के साथ था
उसके विसर्जन के सूत्र अप्रकाशित थे
इतनी विषमताओं के बावजूद
वो आश्वस्त था
बहुत सी बातों को लेकर
यह बात अचरज भरी थी
उन लोगो के लिए
जो प्रेम और जीवन को
आदर्श स्थिति में जीने के आदी थे।

नदी 

नदी
कहती है पहाड़ से
कभी मिलने आओ
और पहाड़ रो पड़ता है
नदी समझती है बोझ का दर्द
इसलिए फिर नही कहती कुछ
केवल समन्दर जानता है
नदी के आंसूओं का खारापन
क्योंकि
उसके लिए वो बदनाम है
नदी कृतज्ञ है
अंतिम आश्रय के लिए
पहाड़ शर्मिंदा है
प्रथम उच्चाटन के लिए
समन्दर शापित है
चुप रहनें के लिए
नदी पहाड़ समन्दर
एक दूसरे की कभी शिकायत नही करतें
बस देखतें हैं चुपचाप
मजबूरियों का पहाड़ होना
आँसूओं का नदी होना
धैर्य का समन्दर होना।

बेवजह 

जिन दिनों तुमसे
बातचीत बंद थी बेवजह
उन दिनों
आसमान का रंग हो गया था सफेद
धरती हो गई थी काली
हवा का वजन कुछ ग्राम बढ़ गया था
नदी समुन्द्र तल से नीचे बह रही थी
पहाड़ अनमना हो बैठ गया था ऊकडू
जंगल हो गए थे समझदार
खरपतवार बन गए थे सलाहकार
झरने बंट गए थे हिस्सों में
पत्थरों के पास थे नसीहत के राजपत्र
उनदिनों
बादल हो गए थे चुपचाप
बूंदे बढ़ा रही थी ताप
रास्तों ने मिलकर तय कर लिए थे भरम
जिन दिनों तुमसे बातचीत बंद थी
उन दिनों
सपनों की फ़िल्म एक्स रे की माफिक
चांदनी में देखता तो
चाँद में साफ़ नजर आता था
बाल भर अविश्वास का फ्रेक्चर
तारें देते थे सांत्वना वक्त बदलनें की
उन्ही दिनों मैंने जाना
बातचीत कितनी जरूरी चीज़ थी
मेरे जीवन की
इसी बातचीत के सहारे
मैं धकेल सकता था दुःख को सैकड़ो मील दूर
स्थगित कर सकता था अवसाद का अध्यादेश
लड़ सकता था खुद से एक बेहतर युद्ध
मुक्त हो सकता था हार और जीत से
बता सकता था खुद की कमजोरियों का द्रव्यमान
उम्मीद को पी सकता था ओक भर
ताकि बचा रहे एक बेहतर कल
दरअसल
बातचीत का बेवजह बंद हो जाना
उतना अप्रत्याशित नही था
जितना अप्रत्याशित था
इस बात का इतना लम्बा खींच जाना।

धरती और खगोल

धरती घूम रही है
अपनी एक थिर गति से
कायदे से
इसे रुक जाना चाहिए
कुछ पल के लिए
ताकि जड़ हुए मनुष्य
छिटक कर जा पड़े मीलों दूर
मनुष्यता को बचाने का
कम से कम एक प्रयास
धरती को करना चाहिए जरूर।

देखना एक दिन ऐसा होगा
धरती बंद कर लेगी अपनी आँखें
फिर फर्क करना मुश्किल हो जाएगा
दिन और रात का
उस दिन
आसमान कोई सलाह नही देगा
वो देखेगा
मनुष्य को भरम के चलते
गिरते-सम्भलतें हुए
धरती आसमान के बीच उस दिन
सबसे अकेला होगा मनुष्य।

धरती की शिकायत
बस इतनी सी है
मनुष्य उसे अपनी सम्पत्ति समझता है
जबकि
वो खुद ब्रह्माण्ड के निर्वासन पर है
जिस दिन पूरा होगा उसका अज्ञातवास
मनुष्य सबसे अप्रासंगिक चीज़ होगा
धरती के लिए।

धरती गोल है
यह एकमात्र वैज्ञानिक सत्य नही है
धरती के गोल होनें के मिले है
ठोस मनोवैज्ञानिक प्रमाण भी
तभी तो
मनुष्य जहाँ से चलता है
एक दिन लौट आता है उसी जगह
कभी हारकर कभी जीतकर
धरती जरुर गोल है
मगर मनुष्य का कोई एक आकार नही है
यह बात सिद्ध होनी बाकि है अभी
किसी वैज्ञानिक/मनोवैज्ञानिक शोध में

ब्रेक अप: कुछ फुटकर नोट्स

ब्रेक अप
एक अंग्रेजी शब्द था
मगर इसके प्रभाव थे
विशुद्ध देशी किस्म के
यह जुड़कर टूटने की
बात करता था
शब्दकोश में देखा
इसके आगे पीछे कोई शब्द नही था
ये वहाँ उतना ही नितांत अकेला था
जितना अकेला
एक एसएमएस के बाद मैं हो गया था।

ब्रेक अप के बाद
शब्दों के षड्यंत्र
आकार लेना आरम्भ करते
प्रेम को निगल जाता सन्देह
स्मृतियों को चाट जाती युक्तियां
स्पर्शों को भूल जाती देह
अह्म होता शिखर पर
दिल अकेला हँसता
दिमाग की चालाकियों पर
यही हँसी दिख जाती कभी कभी
आंसूओं की शक्ल में।

ब्रेक अप के बाद
मैंने छोड़ दिया पृथ्वी ग्रह
मैं निकल आया प्लूटो की तरफ
मगर वहाँ के चरम एकांत में भी
ब्रेक अप की ध्वनि
मेरा दिशा भरम करती रही
दरअसल वो ध्वनि नही
एक किस्म का शोर था
शोर ब्रह्माण्ड के हर कोने तक
करता रहा मेरा पीछा
जबतक मैं बहरा न हो गया।

ब्रेक अप
सवाल की शक्ल में आया
जवाब की शक्ल में चला गया
सवाल-जवाब के मध्य
रूपांतरित होता हुआ रिश्ता
समुंद्र तल की ऊंचाई से कुछ मीटर
ऊपर का था
जब एक दिन पानी पर
तुम्हारा नाम लिखना चाहा
तब पता चला
कुछ सेंटीमीटर
तुम्हारा तल बदल चुका है
ब्रेक अप एक तरल चीज थी ठोस नही।

ब्रेक अप
आसान नही होता
कहना भी करना भी और जीना भी
ब्रेकअप उतना मुश्किल भी नही होता
जितना मैं सोचता था
इधर ब्रेक अप हुआ
उधर मेरी जगह ले ली
किशोर कुमार लता मंगेशकर ने।

संदेह

उत्तरोत्तर होता जाऊँगा मैं
बेहद सतही और सस्ता
नही नाप सकेंगी
तुम्हारे मन की आँखें भी
मेरी चालाकियां
प्रेम और छल को मिला
झूठ बोलूँगा मैं
पूरे आत्मविश्वास के साथ
किन्तु परंतु के बीच रच दूंगा
एक महाकाव्य
जहाँ ये तय करना मुश्किल होगा
ये स्तुति है या आलोचना
खुद को खारिज करता हुआ
निकल जाऊँगा उस दिशा में
जिस तरफ तुम्हारी पीठ है
कवि होने का अर्थ हमेशा
सम्वेदनशील होना नही होता है
कवि को समझनें के लिए बचा कर रखों
थोड़ा सा सन्देह
थोड़ा सा प्रेम
और कुछ सवाल हमेशा
कवि और कविता का अंतर
एक अनिवार्य सच है
भावुकता से इतर
शब्द और अस्तित्व के बीच
फांस सा फंसा हुआ सच।

अपदस्थ 

प्रेम में अपदस्थ प्रेमी
से जब पूछा मैंने
अपना अनुभव कहो
उसने कहा
मेरा कोई अनुभव अपना नही
प्रेम के बाद कुछ अपना बचता है भला?

मैं इस बात पर हँस पड़ा
उसने कहा तुम प्रेम के अध्येता हो
प्रेमी नही
मैंने कहा आपको कैसे पता
प्रेम में कोई दूसरे की बात पर हँसता है भला?

अब मै थोड़ा उदास हो चुप बैठ गया
अब तुम पात्रता अर्जित कर रहे हो
मुझे सुनने की
मगर मै जो कहूँगा वो मेरा होगा
यह संदिग्ध है
मेरे बारे में पूछना तो उससे पूछना
जिसे मै याद हूँ भूलकर भी

मैंने कहा आप क्या बता सकेंगे फिर?
मैं बता सकूँगा सिर्फ इतना
मैंने जीना चाहा तमाम अभाव और त्रासदी के बीच
मैंने पाना चाहा तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद
मैंने बाँट दिया खुद को कतरा कतरा
मैंने खो दिया उसको लम्हा लम्हा
इस बात पर मुझे पुख़्ता यकीं है
वो साथ है भी और है भी नही।

देव 

हो सके तो सम्बोधनों के
षडयंत्रो से बचना
पति को देव कहने से बचना

देव आदर्श भरी कल्पना है
मिथको से घिरी एक अपवंचना है
मनुष्य जब देवता बताया जाता है
फिर वो कर देता है इनकार
मनुष्य को मनुष्य मानने से
समझने लगता है खुद को चमत्कारी

प्रेम की चासनी में लिपटे
बहुत से चमत्कार तुम समझ न पाओगी
आत्म गौरव को देवत्व के समक्ष बंधक पाओगी
साथी के तौर पर कोशिश करना
तुम्हारा साथी मनुष्य रहे
और तुम्हारा साथ उसे बनाए
और एक बेहतर मनुष्य

यदि तुमनें एक बार उसे बना दिया देव
फिर वो भूल जाएगा कमजोरियों पर माफी माँगना
सीख लेगा वो अधिपत्य घोषित करना
एकदिन तुम्हें बता देगा तुम्हारी ही नजरों में
सबसे निष्प्रयोज्य
घोषित कर देगा अपनी कृपा का घोषणापत्र

मत मानना पुराणों के शब्द विलास
गढ़ना अपने सह अस्तित्व का शब्दकोश
समझना और बरतना बराबरी के सुख दुःख
मत कर देना खुद को प्रस्तुत
देवता के स्वघोषित साम्राज्य में दास की तरह

प्रेम में एक बार देव कहोगी
दुःख में भूल जाओगी असल के देवता को भी
दरअसल
देवता कोई नही होता है
असल के देवताओं के भी अनन्त किस्से है छल के

पति को देव बनाना
उस छल को निमंत्रित करना है
जिसकी शिकायत किसी से नही कर सकोगी
और यदि करोगी भी
सारी सलाह और समायोजन तुम्हारे हिस्से आएगी
दब जाओगी जिसके बोझ तले असमय

पति का एक नाम है
उसी नाम से पुकारना
देव कहने से बैचेन होगा असल का पति
खुश होगा देव बनने को बैचेन पति

बस यह सूत्र रखना याद
और तय करना प्रिय पति का संबोधन
बतौर माँ यही
आख़िरी सलाह है मेरी।

अज्ञानता

मैंने कहा मेरी अंग्रेजी कमजोर है
ये बात मैंने कमजोरी से ज्यादा
ताकत के तौर पर इस्तेमाल की अक्सर
अंग्रेजी पढ़ते वक्त हिंदी में सोचता
तो गड़बड़ा जाते सारे टेन्स
इज एम आर वाज़ वर लगते मुझे दोस्त
उनके साथ आई एन जी जोड़
छुड़ा लेता था अक्सर अपना पिंड
यह मेरी अधिकतम अनुवाद क्षमता थी

एक्टिव वॉयस और पेसिव वॉयस का भेद
मुझे आजतक नही समझ पाया
मै क्रिया कर्ता कर्म तीनों को समझता रहा
मुद्दत तक एक ही कुनबे का

भाषा को लेकर हमेशा रहे मेरे देहाती संकोच
मैंने साइन बोर्ड पढ़कर याद रखे रास्ते
इस लिहाज से अंग्रेजी काम आई मेरी
कुलीन जगह पर अंग्रेजी बोलने के दबाव के बावजूद
मैंने हिंदी को चुना
चुना क्या दरअसल मैंने चुप रहने का नाटक किया
क्या तो प्राइस टैग पलटता रहा
या मेन्यू देखता रहा बिना किसी रूचि के
ऐसे मौकों पर दोस्तों ने बचाई जान
उनके सहारे मेरा सीना तना रहा
ये अलग बात है कभी वेटर तो कभी सेल्स पर्सन
भांप गया ऑड और एवन में मुझे बड़ी आसानी से

ये बातें मैं अतीत का हिस्सा बताकर नही परोस सकता
ना ही अपने किसी जूनून का विज्ञापन कर सकता
मै जीता रहा भाषाई अपमान के मध्य
अपनी स्वघोषित अनिच्छा का एक बड़ा साम्राज्य
मैंने लूटे अक्सर भदेस होने के लुत्फ़

यहाँ जितनी बातें की उनकी ध्वनि ऐसी रखी
जानबूझकर कि लगे सीख गया हूँ
ठीक ठाक अंग्रेजी अब
मगर सच तो ये है
आज भी मुझसे कोई पूछे
जूतों के फीते की स्पेलिंग
मै टाल जाऊँगा उसकी बात हँसते हुए

कुछ और भले ही न सीखा हो मैंने
मगर मैंने सीख लिया है
अज्ञानता को अरुचि के तौर पर विज्ञापित करना
अंग्रेजी की तो छोड़िए
इस बात के लिए मुझे हिंदी ने
माफ़ नही किया आज तक

मेरी वर्तनी में तमाम अशुद्धियां
हिंदी की उसी नाराज़गी का प्रमाण है
जिनसे बचता हुआ आजकल
मैं खिसियाते हुए ढूंढ रहा हूँ
एक बढ़िया प्रूफ रीडर
जो कम से कम मेरा दोस्त न हो।

तुम बिन 

तुम मेरे जीवन में
पूर्ण विराम थे
आधे अधूरे वाक्य
और प्रश्नचिन्ह के बाद
अनिवार्य थी तुम्हारी उपस्थिति
तुम्हारा बिना अर्थ छूटे सब अधूरे
बिगड़ा जीवन का व्याकरण
अब कोई यह तय नही कर पाता
मुझे पढ़ते हुए
उसे कहाँ रुकना है।

तुम मेरे जीवन में
अवसाद की तरह व्याप्त थे
तुम्हारे बिना लगता था खालीपन
तुम रह सकते थे
सुख और दुःख में एक साथ
तुम्हारे बिना
सुख और दुःख में मध्य अटक गया मै
इसलिए
नजर आता हूँ
हँसता-रोता हुआ एक साथ।

दो दिन से मुझे बुखार है
माथे पर रखा हाथ याद आता है मुझे
ताप जांचता हूँ गालों को छूकर
आँखों बंद करता हूँ तो
नजर आती हो तुम नसीहतों के साथ
बीमार हूँ मगर खुश हूँ
ये खुशी
तुम्हारी बात न मानने की है।

उन दिनों और इन दिनों में
ये एक बुनियादी फर्क है
अब बुरा लग जाता है
बेहद मामूली बातों का
तुम्हारे बिना खुद को बचाना पड़ता है
दुनिया और उसकी धारणाओं से
तुम्हारे साथ लड़ना अनावश्यक लगता था
उन दिनों अनायास लापरवाह था
इन दिनों सायास सावधान हूँ मैं।

सर्दी की बातें

बहुत दिन बाद उसने पूछा
कैसे हो?
मेरे पास इस सवाल का
एक अस्त व्यस्त जवाब था
इसलिए मैंने कहा
बिलकुल ठीक
उसके बाद
बहुत दिनों तक हालचाल नही पूछा उसने
सम्भवतः वो समझ गई थी
बिलकुल ठीक के बाद
मुद्दत लगती है सब कुछ ठीक होने में।

परसों उसका फोन आया
जब तक फोन जेब से निकाला
फोन कट गया
इसका एक अर्थ यह लगाया मैंने
वो उसी क्षण चाहती थी मेरी आवाज़ सुनना
लेशमात्र का विलम्ब शंका पैदा कर गया होगा
जैसे ही कॉल बेक के लिए फोन किया टच
दूसरा फोन आ गया अचानक से
इस तरह टल गया मेरा भी वो क्षण
जब कुछ कहना था मुझे
प्रेम में टलना एक बड़ी दुर्घटना थी
ये बात केवल जानता था हमारा फोन।

उस दिन मैंने मजाक में कहा
प्लास्टिक मनी नही मेरे पास
वरना कॉफी पिलाता तुम्हें
उसने हँसते हुए कहा
अच्छा है नही है तुम्हारे पास
वरना कॉफी नही
शराब पिलाने के लिए कहती तुमसे
मैंने कहा यूं तो कैशलैस एक अच्छा अवसर हुआ
उसने उदास होते जवाब दिया
जब तुम होपलैस हो
फिर कोई अवसर अच्छा कैसे हो सकता है?

लास्ट दिसम्बर की बात है
एक धुंध भरी सुबह
उसने कहा
मौसम को चिढ़ा सकते हो तुम
मैंने कहा वो कैसे?
उसके बाद उसने मुझे गले लगा लिया
और हँसने लगी
उस हँसी के बाद
दिसम्बर उड़ गया धूप बनकर
पहली बार हँसी के बदले
मुझे सूझ रहा था
केवल मुस्कुराना।

प्रिय कवि

कभी तुम्हारा प्रिय कवि था मै
इतना प्रिय कि
खुद चमत्कृत हो सकता था
तुम्हारी व्याख्या पर
देख सकता था
पानी पर तैरता पतझड़ का एक पत्ता
और तुम्हारी हँसी एक साथ

कभी मैं बहुत कुछ था तुम्हारा
कवि होना उसमें कोई अतिरिक्त योग्यता न थी
तुम तलाश लेती थी
उदासी में कविता
मौन में अनुभूति
और दूरी में आश्वस्ति

मुद्दत से तुमसे कोई संपर्क न होने के बावजूद
इतना दावा आज भी कर सकता हूँ
याद होगी तुम्हें
मेरी लिखावट
मेरी खुशबू
और मेरी मुस्कान
लगभग अपनी पहली शक्ल में

कभी तुम्हारा प्रिय कवि था मै
मेरी कविताओं की शक्ल में मौजूद है
ढ़ेर सी अधूरी कहानियां
और बेहद निजी बातचीत
उन दिनों
मैं कर जाता था पद्य में गद्य का अतिक्रमण
जिसके लिए कभी माफ नही किया
मुझे कविता के जानकारों ने

कभी तुम्हारा प्रिय कवि था मै
इसका यह अर्थ यह नही कि
आज तुम्हें अप्रिय हूँ मै
इसका अर्थ निकालना एक किस्म की ज्यादती है
खुद के साथ
और तुम्हारे साथ

कवि एकदिन पड़ ही जाता है बेहद अकेला
इतना अकेला कि
उसे याददाश्त पर जोर देकर याद करने पड़ते है
अपने चाहनेवाले

कविता तब बचाती है उसका एकांत
स्मृतियों की मदद से

वो हँस पड़ता है अकेला
वो रो पड़ता है भीड़ में
महज इतनी बात याद करके

कभी किसी का प्रिय कवि था वह।

थायरॉयड 

बेशक ये बदलाव
हार्मोनल था
मगर इस बदलाव में कोई क्रान्ति न थी
ये एक छिपा हुआ प्रतिशोध था

ये देह को मजबूरी के चरम तक देखने का
देह का एक बड़ा सस्ता मगर क्रूर प्रहसन था

थायरॉइड से लड़ती एक स्त्री की देखी फीकी हँसी
थायरॉयड से लड़ते एक पुरुष का देखा बोझिल गुस्सा
दोनों में एक बात का साम्य था
दोनों जानते थे अपनी थकन का ठीक ठीक अनुमान
व्याधि स्त्री पुरुष को कैसे मिला देती है एक बिंदु पर
साम्यता की यह सबसे गैर गणितीय समीकरण थी

मैंने पूछा जब एक स्त्री से थायरॉयड के बारें में
वो ले गई मेरा हाथ पकड़ कर दीमक की बांबी तक
उसने दिखाया चीटियों को कतार से चलते हुए
उसने दिखाई सीमेंट से पलस्तर हुई दीवार

यही सवाल जब एक पुरुष से किया मैंने
वो बैठ गया ऊकडू
धरती पर बनाया उसने एक त्रिभुज
उसने गिनवाईं अपनी धड़कनें
और लगभग हाँफते हुए बताया
उसे नही है अस्थमा

थायरॉइड उत्तर आधुनिक बीमारी है
ऐसा देह विज्ञानी कहते है
मनोविज्ञान इसे अपनी वाली बीमारी मानता ही नही
जबकि ये सबसे ज्यादा घुन की तरह चाटती है मन को

थायरॉयड से लड़ते स्त्री पुरुष को देख
ईश्वर के होने पर होने लगता है यकीन
वही मनुष्य को इस तरह लड़खड़ाता देख
हो सकता है खुश
और बचा सकता है प्रार्थना के बल पर अपनी सत्ता

थायरॉयड से लड़ते लोगो के परिजन
दवा के अलावा बहुत सी बातों से रहते है अनजान
उन्हें नही पता होता है
जब हँस रहा होता है एक थायरॉयड का मरीज़
ठीक उसी वक्त वो तलाश रहा था होता पैरो तले ज़मीन
गुरुत्वाकर्षण उससे खेलता रहता है आँख मिचोली
मोटापा बन चुका होता है
उसकी जॉली नेचर का एक स्थायी प्रतीक

थायरॉयड दरअसल उस गलती की सजा देता है
जो गलती आपने की ही नही होती कभी
थककर मनुष्य लौटता है पूर्व जन्म में
याददाश्त पर जोर देकर सोचता है
पूर्व जन्म के पाप
या विज्ञान के चश्में से पढ़ता है आनुवांशिकी
जब नही मिलता कोई ठीक ठीक जवाब
फिर डरते डरते पीता है पानी घूँट-घूँट

प्यास में पानी से
भूख में खाने से
डरना सिखा देता है थायरॉइड
और डरा हुआ मनुष्य जिस आत्म विश्वास से
लड़ता है लड़ाई इस बीमारी से
उसे देख थायरॉयड से पीड़ित व्यक्ति के
पैर छू लेना चाहता हूँ मै
मेरे पैर छू लेने से थायरॉइड नही छोड़ेगा
किसी स्त्री या पुरुष को
ये जानता हूँ मै
मगर और कर भी क्या सकता हूँ मैं
सिवाय इसके कि
थायरॉइड के बारें में थोड़ा बहुत जानता हूँ मै
जितना जानता हूँ वह पर्याप्त है
मुझे डराने के लिए।

मामूलीपन 

बेहद मामूली दुनिया थी मेरी
इतनी मामूली कि
दुखी हो सकता था मै
सब्जी वाले के दो रुपए कम न करने पर

खुश हो सकता था मैं
फटी जुराब होने के बावजूद
किसी को नजर न आने पर

मैं खुद इतना मामूली था
नही जानता था घर की पिछली गली में
कोई मेरा नाम
कई कई साल टेलर नही लेता था मेरी नाप
फिर भी सही रहता उसका अनुमान

मेरी बातें इतनी मामूली थी कि
सबसे गहरा दोस्त भी जम्हाई लेने लगता
और विषय बदल कर पूछता सवाल
और बताओ क्या चल रहा है

दरअसल,
मैंने खुद को जानबूझकर मामूली नही बनाया
मैं बनता चला गया
मामूली सी जिंदगी में
एक मामूली सा इंसान
मैं जब कहता कि मै खुश हूँ
मेरा परिवेश सोचता शराब पी है आज मैंने
मैंने जब कहता कि मैं दुखी हूँ
लोगबाग इसे मेरी आदत समझ लेते

वैसे मामूली होने से
मुझे कोई ख़ास दिक्कत नही थी
बल्कि ऐसा होना मेरे काम आया अक्सर
मुझसे नही थी किसी को सिफारिश की उम्मीद
मेरी अनुपस्थिति नही थी किसी भी महफ़िल में
जिज्ञासा और कौतुहल का विषय

जब मामूली सी बातों को मै दिल से लगा बैठता
यही मामूली होना मेरी सबसे ज्यादा मदद करता
मै हँस पड़ता रोते हुए
मैं रो पड़ता हँसते हुए

इस दौर में मामूली होना आसान नही था
हर कोई वहन नही कर सकता था मामूलीपन
इसकी अपनी एक कीमत थी
जिसको चुकाने की कोई मियाद नही थी
जो इतना बोझ उठा पाता
उसी के हिस्से में आती ये मामूली जिंदगी

मेरे हिस्से से जब किस्से में आई
ये मामूली ज़िंदगी
तब ये उनके समझ में आई
जो मुझे ख़ास समझकर
काट करे थे उम्मीद से भरी जिंदगी

उनकी निराशा पर
मुझे हुई मामूली सी हताशा
यही मामूलीपन बचा ले गया मुझे
गहरे अवसाद के पलों में आत्महत्या से

मामूली होने ने जीना थोड़ा आसान किया
और मरना थोड़ा मुश्किल
मामूलीपन की यही वो खास बात है
जिसे मेरा कोई ख़ास नही जान पाया
आजतक।

पिता के श्राद्ध पर 

पिता के लिए…
तुम पिता थे मेरे
मेरे जीवन में लगभग अनिमंत्रित
बहुत से व्यक्तिगत आक्रोश थे मेरे
कुछ हास्यास्पद शिकायतें भी थी
जो कभी सुनाई नही तुम्हें
बचपन से तुम्हारी एक छवि थी
डर हमेशा आगे रहता
तुम हमेशा पीछे
एक वक्त तुम्हें देख शब्द अटक जाते थे मेरे
भूल जाता था मै चप्पल पहनना भी
शर्ट पहन लेता था पायजामे पर
थोड़ा बड़ा हुआ तो
मैंने तर्को से कई बार किया तुम्हें खारिज़
और विजयी मुद्रा में घूमता रहा आंगन में
असल में वही मेरी असल पराजय थी
जो पराजय का श्राप बन चिपक गई
मेरे अस्तित्व से
एक वक्त वो भी देखा
जब थे तुम बेहद मजबूर
दिला रहे थे मुझे आश्वस्ति
परेहज करने के भर रहे थे शपथ पत्र
तुम्हें लगा मैं डॉक्टर को ठीक ठीक बता सकता हूँ
तुम्हारी दशा
और बचा लूँगा तुम्हें उस वक्त मौत के मुंह से
मैं तुम्हारा बेटा था
मगर उस वक्त तुम
मुझे अपने पिता की तरह देख रहे थे
तुम गलत थे उस वक्त
मैं हमेशा से मजबूर था तुम्हारे सामने
बात जीवन की हो या मौत की
रहा हमेशा उतनी ही मात्रा में मजबूर
तुम्हें बचाने के मामले में
मैं मतलबी हो गया था
नही मानी तुम्हारी अंतिम इच्छा
जब तुमने कहा मुझे मेरी माँ के पास ले चले
वास्तव में मुझे नही पता था
ये आख़िरी शब्द होंगे तुम्हारे
हो सके तो मेरी अवज्ञा के लिए
मुझे माफ़ करना पिता
मैंने विज्ञान को मान लिया था ईश्वर
और इस झूठे आत्मविश्वास में था कि
अस्पताल से ले जाऊंगा तुम्हें ठीक कराकर
नही पता था
कलयुग में नही होता कोई ईश्वर
बस एक सच्चाई होती है मौत
जो नही छोड़ती किसी पिता या पुत्र को
तुम्हारी मौत से पहले
मुझे मांगनी थी कुछ अश्रुपूरित क्षमाएं
मुझे पता था
तुम माफ़ कर दोगे तुरन्त
मगर तुम चालाकी से निकल गए चुपचाप
अब ये क्षमाएं मेरे कंधे पर सवार रहती है हमेशा
आंसू भी नही देते है इनका साथ
सच ये है तुम बिन बड़ा अकेला पड़ गया हूँ मै
इतना अकेला कि जितने अकेले हो
तुम अपनी दुनिया में
और
दो अकेले पिता पुत्र
कभी नही मिला करते
न इस लोक में
न उस लोक में।
(पिताजी के श्राद्ध पर)

सवाल जवाब

उसने पूछा
शर्ट इन क्यों नही करते
क्यों दिखतें हो हमेशा अस्त व्यस्त
मैंने कहा
जेन्टिलमैन नही हूँ ना
फॉर्मल भी नही हूँ
हसंते हुए उसने कहा
जो हो उसके बारे में बताओ
जो नही हो तुम
उसे तुमसे बेहतर जानती हूँ मैं।

हमेशा देखती हूँ तुम्हें
स्लीपर या सैंडिल में
जूते क्यों नही पहनते हो तुम
उसने विस्मय से उलाहना देते हुए कहा
मैंने कहा
बंधन नही पंसद मुझे
चप्पल याद दिलाती है मुझे आवारगी
फिर तो नँगे पैर रहा करो तुम
एम एफ हुसैन की परंपरा बचाने वाला भी
आखिर कोई फनकार तो होना चाहिए
ताना मारते हुए उसे कहा
मैंने कहा ठीक है देखता हूँ
मुझे सीरियस होता देख उसने कहा
कैसे भी रहो मुझे फर्क नही पड़ता
हाँ ! तुम्हें चोट न लगे इसकी फ़िक्र जरूर है
मैंने कहा
क्या ये सम्भव है कि मुझे चोट न लगे
मेरे पैर पर अपने पैर रखते हुए उसने
आश्वस्ति और आत्मविश्वास से दिया जवाब
बिलकुल !
कम से कम मेरे साथ चलते कभी न लगेगी।

उसने पूछा एकदिन
कॉफी क्यों नही पसन्द तुम्हें
मैंने कहा जैसे तुम्हें चाय नही पसन्द
सवाल का जवाब सवाल नही होता
तुनकते हुए उसने कहा
अच्छा ये बताओ चाय क्यों है पसन्द
मैंने कहा क्यों का जवाब नही होता मेरे पास
मैं क्यों का जवाब ही नही तलाशता कभी
जैसे तुम कभी ये पूछ बैठो
तुम क्यों हो पसन्द मुझे
चाय की तरह नही बता सकता उसकी वजह
हम्म ! ये जवाब सही है
चलो चाय पीते है किसी कॉफी शॉप पर
ये सुनकर हँस पड़ा हमारे बीच खड़ा रास्ता।

अचानक एकदिन
उसने किया एक दार्शनिक सवाल
स्थिर प्यार क्या सड़ जाता है
स्थिर जल की तरह?
मैंने कहा
क्या स्थिर प्यार सम्भव है?
वो बोली हाँ! बिलकुल सम्भव है
मुझे तो नही लगता है
मैने असहमत होते कहा
प्यार रूपांतरित होता रहता है
स्थिर होना सम्भव नही उसके लिए
मैंने कहा क्या महज यह एक जिज्ञासा है
या तुम्हारी मान्यता समझूं?
हँसते हुए उसने कहा फ़िलहाल तो जिज्ञासा ही समझो
मान्यता ब्रेक अप के बाद बता सकूँगी।

षड्यंत्र 

चाय पीते वक्त एकदिन
मैने पूछ लिया यूं ही अचानक से
तुम्हारे जीवन की
सबसे बड़ी दुविधा क्या है?
कप को टेबल और लब के मध्य थामकर
एक गहरी सांस भरते हुए कहा उसने
जो मुझे पसन्द करता है
वो बिलकुल भी नही करता तुम्हे पसन्द।

मुद्दत बाद मिलने पर
उसने पूछा मुझसे
किसी को सम्पूर्णता में चाहना क्या सम्भव है?
मैंने कहा शायद नही
हम चाहतें है किसी को
कुछ कुछ हिस्सों में
कुछ कुछ किस्सों में
इस पर मुस्कुराते हुए उसने कहा
अच्छा लगा मुझे
जब शायद कहा तुमनें।

मैंने चिढ़ते हुए कहा एकदिन
यार ! तुम सवाल जवाब बहुत करती हो
प्रश्नों के शोर में
दुबक जाती है हमारे अस्तित्व की
निश्छल अनुभूतियां
बेज़ा बहस में खत्म होती जाती है ऊर्जा
हसंते हुए वो बोली
हाँ बात तो सही है तुम्हारी
मगर इस ऊर्जा को बचाकर करोगे क्या
ढाई शब्द तो ढाई साल में बोल नही पाए
ये उस वक्त तंज था
मगर सच था
जो बन गया बाद में मेरे वजूद का
एक एक शाश्वस्त सच।

एकदिन उसने
फोन किया और कहा
गति और नियति में फर्क बताओं
उस दिन भीड़ में था कहीं
ठीक से सुन नही पाया उसकी आवाज़
जवाब की भूमिका बना ही रहा था कि
हेलो हेलो कहकर कट गया फोन
उसके बाद उसका फोन नही
एसएमएस आया तुरन्त
शुक्रिया ! मिल गया जवाब
ये उसकी त्वरा नही
समय का षड्यंत्र था
जिसने स्वतः प्रेषित किए मेरे वो जवाब
जो मैंने कभी दिए ही नही।

वो 

उससे कोई आग्रह अपेक्षा नही थी
मगर उसे उदास देख
कहीं खो जाता था
एक वक्त का भोजन
एक वक्त की चाय
और बेवजह की मुस्कान

और उसकी खिलखिलाती हँसी की व्याख्या
की जा सकती थी अपने मन मुताबिक़
एक को लगता वो खुश है
एक को लगता वो खुश दिख रहा है
एक को लगता वो दुःख छिपा रहा है
एक को लगता वो हँस रहा है बेमन से
एक को लगती उसकी हँसी दुर्लभतम्

उसकी बातों में छल नही था
उसकी आँखों में कल नही था

वो जी रहा था वर्तमान बेहद मुक्त अंदाज़ में
उसके चलतें वो भूल गई थी
अपना भूत और भविष्य
वो बह रही थी वर्तमान की दिशा में
दक्खिनी हवा बनकर

उन्होंने मिलकर रच ली थी अपनी एक समानांतर दुनिया
जहाँ हवा आकाश धरती नदी जंगल सब उनके अपने थे
वो घूम रहे थे बेफिक्र हर जगह

उसकी दुनिया में कोई प्रतीक्षारत में नही था
इसलिए
वो टहल सकता था निर्द्वन्द
मगर कब तक ये कोई नही जानता था

मगर वो जब तक
तब तक था एक बहुमूल्य चीज़ की तरह
जिसे खोने का भय सबको एक साथ था
जब वो खो जाएगा
नही चलेगा पता कि किसकी प्रिय वस्तु खोई है

क्योंकि
उसके बाद नही हो सकेगी
कुछ लोगो की आपस में मुलाक़ात
वो अकेला पता था
जो मिलाता था अनजान लोगो को एक साथ
बिना किसी दोस्ती के।

असफलता

मुद्दत बाद मिलनें पर उसने कहा
बड़े अश्लील हो गए हो तुम
और थोड़े घटिया भी
उसने जवाब दिया
कोई नई बात कहो
इतने दिन बाद मिली हो
और वही कह रही हो
जो दुनिया कहती है

अच्छा ! दुनिया ऐसा कहती है तुम्हारे बारे में?
उसने चौंकते हुए कहा

हाँ !

फिर तुम ये नही हो सकते
तुम तो दुनिया को गलत साबित करने के लिए पैदा हुए थे
मैं गलत थी फिर इस हिसाब से

अच्छा क्या हो गए हो फिर तुम?

मेरे ख्याल से थोड़ा तल्खज़बाँ
थोड़ा बदतमीज़
उसने आत्म समर्पण की मुद्रा में जवाब दिया

हम्म !
आदत अच्छी नही मगर इतनी भी बुरी नही कि
तुम्हारी शक्ल देखना पसन्द न करें कोई

क्या फर्क पड़ता है इन सब बातों से! वो अब दार्शनिक मुद्रा में था

फर्क बस इतना पड़ता
अब हमें हँसी नही आती इन बातों पर
ये क्या कोई कम बड़ा फर्क है तुम्हारे हिसाब से,उसने चिढ़ते हुए कहा

हँसी हमेशा किसी बात पर ही आती है इसलिए हँसी मजबूर चीज़ है थोड़ी
उदास आदमी बेसबब भी हो सकता है

ओह हो ! तो ये बात है
शायर हो गए हो तुम उसने छेड़ते हुए कहा

शायर हुआ नही जाता है आदमी हो जाता है

मतलब इश्क विश्क टाइप उसने हँसते हुए पूछा

छोड़ो ये बातें अच्छा ये बताओं
दिलचस्पी का मरना किस तरह देखती हो तुम
उसने कहा ठीक वैसे जैसे तुम्हें देखकर खुद को देखती हूँ

ये ठीक बात कही तुमनें तमाम बातों के बीच

अब एक मेरे भी एक सवाल का जवाब दो
प्यार बदलता क्यूँ है
प्यार बदलता नही है स्थिर होकर सूख जाता है

ऊँहूँ ! बात जमी नही कुछ
इतने कमजोर तर्क कब से करने लगे?

चलो ! अपनी वही प्रेम कविता सुनाओं
जिसे पढ़कर प्यार दुनिया की सबसे पवित्र चीज़ लगता था

उसने कहा,याद नही अब तो

तुम में सच अब बेहद घटिया हो गए हो
अश्लील भी
इसलिए नही कि दुनिया कहती है
इसलिए अब तुम अपनी प्रिय कविता भूल गए हो

हम्म !

फिर कोई सवाल जवाब नही हुआ दोनों मध्य
दोनों एक दूसरे को देखते रहें थोड़ी देर
और विदा हो गए
अपनी अपनी असफलता पलकों पर लेकर।

एकदिन 

बहुत दिन बाद
मिलने पर पूछा उससे
क्या तुम्हें भी आवाज़ मोटी लगती है मेरी
याददाश्त पर जोर देकर सोचते हुए
उसनें कहा हाँ थोड़ी भारी है
मैंने कहा एक ही बात है
इस पर बिगड़ते हुए वो बोली
एक ही बात कैसे हुई भला
आवाज़ हमेशा भारी या हलकी होती है
मोटी या बारीक नही
मोटा आदमी हो सकता है
बारीक नज़र हो सकती है
तुम्हारी आवाज़ भारी है
मैंने कहा फिर तो तुम्हारे कान भी थकते होंगे
उसनें कहा नही
मेरा दिल थकता है कभी कभी
मैंने कहा कब थकता है दिल
लम्बी सांस लेकर उसने कहा
जब तुम्हारी आवाज़ भारी से मोटी हो जाती है
तब तुम्हारी नजर बेहद बारीक होती है
ये सुनकर मैं हँस पड़ा
उसने कहा तुम्हारी हँसी भारहीन है
मैंने कहा कब तौली तुमने
उसने कहा
जब तुम उदास थे।

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