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इंक़िलाब 

वो कारवान-ए-गुल-ए-ताज़ा जिस के मुज़्दे से
दिमाग़-ए-इश्क़ मोअत्तर है और फ़ज़ा मामूर
दिलों से कितना क़रीं है नज़र से कितनी दूर

इंतिज़ार की रात

तेरी वादी के सनोबर मेरे सहरा के बबूल
उन पे इक लर्ज़ा सा तारी उन के मुरझाए से फूल
तेरा जी उन से ख़फ़ा और मेरा दिल उन पर मलूल

क्या ये मुमकिन है कि उन का फ़ासला हो जाए कम
ख़ाक के सीने पे आख़िर कब तलक ये बार-ए-ग़म

नई मरियम 

कैसी तवाना कैसी चंचल कितनी शोख़ और क्या बेबाक
कैसी उमंगें कैसी तरंगें कितनी साफ़ और कैसी पाक
होश की बातें शौक़ की घातें जोश-ए-जवानी सीना-चाक
ख़ंदा ऐसा जैसे रक़्स
बातें ऐसी जैसे साज़
कैसी तवज्जोह कैसी मोहब्बत जिस में शामिल कम कम नाज

प्यास 

दूर से चल के आया था मैं नंगे पाँव नंगे सर
सर में गर्द ज़बाँ में काटने पाँव में छाले होश थे गुम
इतना प्यासा था मैं उस दिन जितना चाह का मारा हो
चाह का मारा वो भी ऐसा जिस ने चाह ने देखी हो

इतने में क्या देखा मैं ने एक कुँआ है सुथरा सा
जिस की मन है पक्की ऊँची जिस पर छाँव है पेड़ों की
चढ़ कर मन पर झाँका मैं ने जोश-ए-तलब की मस्ती में
कितना गहरा इतना गहरा जितनी हिज्र की पहली रात
कैसा अंधा ऐसा अंधा जैसी क़ब्र की पहली रात

कंकर ले के फेंका तह में
पानी की आवाज़ न आई
उस का दिल भी ख़ाली था

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