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जे० एन० यू० पर

साम्यवाद का अन्त हो गया
अन्त हुआ इतिहास का
है यथार्थ बेहद रपटीला
सपना है संत्रास का
अब तुमसे ही होगा बेड़ा पार जी !

बहुराष्ट्रीय निगम कमाने
आए बड़ा मुनाफा
वर्ल्ड-बैंक डब्ल्यू० टी० ओ० के
बल में हुआ इज़ाफ़ा
इनके निर्देशों को तुम करना स्वीकार जी !

मस्ज़िद के मलबे पर जिनकी
खड़ी हुई है सत्ता
धर्म और संस्कृति के वे ही
शातिर हुए प्रवक्ता
ऐसा धर्म मुबारक़ हो ऐसी सरकार जी !

अमरीकी जलवे के सम्मुख
तुम नत-शिर हो जाना
देश बिलखता भी हो तो तुम
हरगिज़ मत शरमाना
कला बचाना अपनी, मत करना प्रतिकार जी !
जे० एन० यू० पर तुम रखो अपने उद्गार जी !

आते हैं

जाते हुए उसने कहा
कि आते हैं
तभी मुझे दिखा
सुबह के आसमान में
हँसिये के आकार का चन्द्रमा
जैसे वह जाते हुए कह रहा हो
कि आते हैं

आम

रसाल है रामचरित
और रसाल है
अवधी में उसका विन्यास
भक्ति का रस
और काव्य का रस
जानने में
शायद इससे भी मदद मिले
कि कौन-सा आम
खाते थे तुलसीदास

सरकारी हिन्दी

डिल्लू बापू पंडित थे
बिना वैसी पढ़ाई के
जीवन में एक ही श्लोक
उन्होंने जाना
वह भी आधा
उसका भी वे
अशुद्ध उच्चारण करते थे
यानी ‘त्वमेव माता चपिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश चसखा त्वमेव’
इसके बाद वे कहते
कि आगे तो आप जानते ही हैं
गोया जो सब जानते हों
उसे जानने और जनाने में
कौन-सी अक़्लमंदी है ?
इसलिए इसी अल्प-पाठ के सहारे
उन्होंने सारे अनुष्ठान कराये
एक दिन किसी ने उनसे कहा:
बापू, संस्कृत में भूख को
क्षुधा कहते हैं
डिल्लू बापू पंडित थे
तो वैद्य भी उन्हें होना ही था
नाड़ी देखने के लिए वे
रोगी की पूरी कलाई को
अपने हाथ में कसकर थामते
आँखें बन्द कर
मुँह ऊपर को उठाये रहते
फिर थोड़ा रुककर
रोग के लक्षण जानने के सिलसिले में
जो पहला प्रश्न वे करते
वह भाषा में
संस्कृत के प्रयोग का
एक विरल उदाहरण है
यानी ‘पुत्तू ! क्षुधा की भूख
लगती है क्या ?’
बाद में यही
सरकारी हिन्दी हो गयी

जाति के लिए

ईश्वर सिंह के उपन्यास पर
राजधानी में गोष्ठी हुई
कहते हैं कि बोलनेवालों में
उपन्यास के समर्थक सब सिंह थे
और विरोधी ब्राह्मण
सुबह उठा तो
अख़बार के मुखपृष्ठ पर
विज्ञापन था:
‘अमर सिंह को बचायें’
और यह अपील करनेवाले
सांसद और विधायक क्षत्रिय थे
मैं समझ नहीं पाया
अमर सिंह एक मनुष्य हैं
तो उन्हें क्षत्रिय ही क्यों बचायेंगे ?
दोपहर में
एक पत्रिका ख़रीद लाया
उसमें कायस्थ महासभा के
भव्य सम्मेलन की ख़बर थी
देश के विकास में
कायस्थों के योगदान का ब्योरा
और आरक्षण की माँग
मुझे लगा
योगदान करनेवालों की
जाति मालूम करो
और फिर लड़ो
उनके लिए नहीं
जाति के लिए
शाम को मैं मशहूर कथाकार
गिरिराज किशोर के घर गया
मैंने पूछा: देश का क्या होगा ?
उन्होंने कहा: देश का अब
कुछ नहीं हो सकता
फिर वे बोले: अभी
वैश्य महासभा वाले आये थे
कह रहे थे – आप हमारे
सम्मेलन में चलिए

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