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रेत री पुकार (कविता)

थे कदी सुणी है-
रेत री पुकार
तिस मरती रेत री
पाणी जठै
एक सोवणो सुपनो है
हारी-थाकी आंख्यां रो ।
एक-एक बूंद तांई तरसती
फेफी जम्यां होटां पर जीभ फिरांवती
रेत रो
पाणी सूं कितणो हेत हुवै
थे स्यात कोनी जाणो ।
आभो तकती आंख्यां में
मेह सूं कितणो नेह हुवै
ऐ खेजड़ा अर फोगला जाणै
या जाणै रोहिड़ो
जिको काळी-पीली आंधी में बी
मुळकतो-मुळकतो गीत गा देवै
रेत री संवेदनशीलता रा
रेत –
कोरी रेत नईं है
बठै बी थानै
रंगीन कल्पनावां मिलसी ;
जिकै दिन आ रेत
अंगड़ाई लेसी
इतिहास बदळ ज्यावैलो
थे देखता रहज्यो
अठै बी
नुंईं-नुंईं कळियां खिलसी ।

म्हारो बसंत

थारै आवंतो हुसी बसंत
फागण में ।
अठै तो भाया असाढ में
जे आसमान फूट ज्यावै
अर जम ज्यावै बाजरी री जड़,
पसर ज्यावै
काकड़िया-मतीरियै री बेलां
तो सावण-भादुवै स्यूं
सगळी रुत हेठी है !
ओ थार है ! थार !!
अठै सगळी रुत आळगी है
दुनियां सूं ।
अठै बचपन सूं सीधो
बुढापो आवै ;
जुआनी रो पानो
बेरो नीं कुण फाड़ ज्यावै ?
जिनगाणी एक-एक सांस सूं
धक्का पेल करै
रात रै सरणाटै में
रेत बी गीत गांवती सुणी ज्यासी
कुदरत बी अठै
रोज-रोज नूंवां खेल करै ।
रेत रै ईं तपतै समन्दर में
धोरां री ढाळ पर
हठ जोगी-सा
एक टांग पर उभा खेजड़ा
गै’री साधना में व्यस्त है,
अर बळती दोपारी में बोलती कमेड़ी
कीं भगत ज्यूं
रामनामी धुन में मस्त है ।
अठै हरेक जीव सांस-सांस में
जिनगाणी सूं जंग करै
बै चित्राम थानै अठै-कठै मिलसी,
जठै फागण
फूल-फूल

रेत की पुकार

आपने कभी सुनी है-
रेत की पुकार
प्यासी रेत की
पानी जहां
एक सलोना सपना है
हारी- थकी आंखों का ।
एक -एक बूंद के लिए तरसती
पपड़ाए होंठों पर जीभ फिराती
रेत का पानी से कितना प्यार होता है
आप शायद नहीं जानते ।
आकाश को तकती आंखों में
मेह से कितना नेह होता है
यह खेजड़े और फोगले जानते हैं
या फिर जानता है रोहिड़ा
जो काली-पीली आंधी में भी
मुस्कुराता-मुस्कुराता गीत गा देता है
रेत की संवेदनशीलता के ।
रेत- सिर्फ रेत नहीं
यहां भी आप को
रंगीन कल्पनाएं मिलेगी ;
जिस दिन यह रेत
अंगड़ाई लेगी
इतिहास बदल जाएगा
आप देखते रहेंगे
यहां भी
नई-नई कलियां खिलेगी ।

अनुवाद : नीरज दइया

में नूंवां-नूंवां रंग भरै ?

मेरा बसंत

आपके आता होगा बसंत
फागुन में ।
यहां तो भाई आषाढ़ में
यदि आसमान फूट जाए
और जम जाए बाजरे की जड़,
फैल जाए
काकड़िये-मतीरों की बेलें
मूंग-मोठ धरती को ढक लें
तो सावन-भादवे से
सभी ऋतुएं नीचे है ।
यह थार है ! थार !!
यहां सारी ऋतुएं अलग है
दुनिया से ।
यहां बचपन से सीधा
बुढ़ापा आता है ;
जवानी का पन्ना
ना जाने कौन फाड़ जाता है ?
जिन्दगी एक एक सांस से
धक्का-मुक्की करती है
रात के सन्नाटे में
रेत भी गीत गाती सुनाई दे जाएगी
कुदरत भी यहां
नित-नए खेल रचती है ।
रेत के इस तपते समंदर में
धोरों की ढलान पर
हठ जोगी-सा
एक टांग पर खड़ा है खेजड़ा
गहरी साधना में व्यस्थ है,
और तपती दोपहरी में बोलती कमेड़ी
किसी भक्त-सी
रामनामी घुन में मस्त है ।

यहां प्रत्येक जीव सांस-सांस में
जिंदगी से जंग करता है
वह चित्रण आपको यहां कहां मिलेंगे,
जहां फागुन
फूल-फूल में नए-नए रंग भरता है ?

अनुवाद : नीरज दइया

 

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