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इमरती गली

कहने भर को पटना शहर में
पर सैकड़ों साल से वहीं का वहीं
जैसे कहीं पड़ा हो पहाड़, खड़ा हो बूढ़ा पेड़

बबलू इमरती वाला जब शाम को कड़ाही चढ़ाता
मुँह मीठा हो जाता है इमरती गली का

हाथ में रुमाल रखे गुज़र रहे भद्र लोग भी
एक बार कनखियों से देख लेते रंग इमरती का

तरह-तरह की सब्ज़ियां, किसिम-किसिम के सामान लिए
खोमचे वाले आते-जाते
अगल-बगल के मजनूँ-छाप लड़के मँडराते
शाम होते ही रौनक बढ़ जाती
इमरती गली की

पता नहीं क्या है इस गली में
कि जो गुज़रता यहाँ से पसीने से तरबतर
जाता अपना पसीना सुखा कुछ देर गली में बैठकर

मौसम-बेमौसम यहाँ उड़ती रहती पतंग
जैसे कि ज़माना ही हो पतंगबाज़ी का

हँसते लोट-पोट होती रहतीं लड़कियाँ
यहाँ के लड़कों की, कटी पतंगें देखकर

हर शहर में मिलती हैं ऐसी गलियाँ
जिन्हें तरक्कीपसंद लोग देते हैं गालियाँ
मगर इन गलियों की बाँहें रहती हैं फैली
किसी आगंतुक का करने स्वागत

ऐसी गलियाँ धड़कती हैं शहर के सीने में
ज़िदगी बनकर
और मीठी, जलेबी से ज़्यादा।

भय

भेंट हुई, पिछले दिनों एक आदमी से
जिसे, हवा-पानी और धरती की तरह
ज़रूरत रहती थी, एक शत्रु की

जिस दिन से, कोई शत्रु
होने लगता, निर्बल-असहाय
या हार मानकर, बनने लगता मित्र
उसी दिन से, उसकी बेमज़ा होने लगती ज़िंदगी
और दूसरे ही दिन, सुबह से
ढूँढ़ने लगता वह किसी दूसरे शत्रु को

दुनिया भर को देता वह गालियाँ
कोसता भूत, भविष्य, वर्तमान को
उसके अनुसार कुछ लोग, कुछ चीज़ें ही बची हैं
जिनका किया जा सकता है एहतराम

उसे जानने वाले
कतराते, मुँह चुराते
निकल जाते अपनी राह
और वह खिलखिला कर हँसता, उन चूहों पर
जो आदमी की तरह थे
हाथ-पैर-नाक और चार पैरों वाले

जो मिलता उससे
याद करता, किसका मुँह देख निकला था घर से?
और उस बुरे दिन को याद कर
मिसरी की तरह मीठा हो
वही सुनता जो वह कहता
वही करता जो वह चाहता

लोगों का मानना है
वह आदमी
शत्रु है, अपना ही
और जो बन जाता इस समय में अपना शत्रु
उसे नहीं, किसी से दुनिया में भय!

सारिपुत्त की स्वीकारोक्ति

तथागत ! मैंने नहीं देखा विस्तृत नभ को
देखा पृथ्वी को
और हो गया पृथ्वी ही

देखा जल की ओर
और हो गया जल ही

गुरूवर ! देखा अग्नि को प्रज्जवलित
और हो गया अग्नि ही

देखा मन्द-मन्द बहते वायु को
और हो गया वायु ही

नहीं देखा कभी अपनी ओर
द्रष्टा बन अपनी ही काया को

पृथ्वी की भाँति
मुझे ज्ञात, मात्र स्वीकार
प्रवाहमय मैं जल की भाँति
अनासक्त भाव से
ग्रहण किया संसार

शुभ-अशभ, असुन्दर-सुन्दर सभी
हो जाते मुझमें निमग्न
दुर्गन्ध हो या सुगन्ध सबको ले चलता
वायु समान

तथागत, मैं हूँ ही नहीं
और सभी में
मैं विद्यमान
जैसी आपकी देशना
जैसा आपका ज्ञान

सारिपुत्र[1] की यह स्वीकारोक्ति
एक न एक दिन हो
हमारी स्वीकारोक्ति ।

राग

अकस्मात् ही हुआ होगा
कभी दबे पैर आया होगा
ईर्ष्या-द्वेष
घृणा-बैर आदि के साथ
जीवन में राग

फिर न पूछिए !
क्या हुआ ……………….
कुछ भी नहीं बचा
बेदाग ।

पधारिए हम्मर गाँव

खुरपी और हँसुए से भी तेज़ है बोली
पता नहीं, कब, किस बात पर
चल जाए लाठी-गोली
दरिद्रता में भी हठी बेजोड़

एक कट्ठा खेत में डाली जाती
कितनी राजनीति की खाद
कभी जानना हो
तो पधारिए हम्मर गाँव।

पुल और नदी

पुल पार करते
उस नदी को देखा मैंने
एक भूली-बिसरी बरसाती नदी
दो-चार महीना, टलमल-टलमल, जल से
फिर छूँछ की छूँछ

कितनी बेरौनक लगती है नदियाँ
जब उनमें नहीं होता जल

उदास, उस पुल से पूछे कोई।

दूब, गुलाब, तितली और मैं

दूब को देखा मैंने गौर से
और हथेलियों से सहलाता रहा
दूब तो दूब ठहरी
लगी थी पृथ्वी को हरा करने में निःशब्द

सुबह का खिला गुलाब था
उसकी रंगत, कँटीली काया और सब्ज़ पत्तों को देखा
बाँट रहा था पृथ्वी को सुगन्ध निःशब्द

मैंने एक तितली का पीछा किया
वह फूलों से अलग बैठी थी घास पर
वह भी मना रही थी उत्सव रंगपर्व का निःशब्द
दूब, गुलाब, तितली सभी निःशब्द
पृथ्वी को समर्पित

मेरे पास सिर्फ़ शब्द थे और भाव
जिनसे लिखी जा सकती थीं कुछ कविताएँ
उस दिन मुझे भरोसा हुआ
दूब, गुलाब, तितली की तरह
मेरे पास भी कुछ है, देने के लिए पृथ्वी को
और उनकी तरह
मेरी भी जगह है पृथ्वी पर।

पक रही है कविता

एक-एक कर पक रहे
बाकी बचे दाढ़ी-मूँछ के बाल
धीरे-धीरे घट रही
आँखों की ज्योति

कितना कुछ छुट गया
अदेखा, अजाना, अचीन्हा
उन्हें देखने, जानने, चीन्हने के लिए
हो रहा भरसक यत्न
और टूट रही है देह

पहले मेहमान थीं बीमारियाँ
अब आती हैं तो नहीं लेती जाने का नाम

बाहर तेज़ है धूप
खेतों में पक रहा है धान
पगडण्डियों से गुज़रता मैं
माथे पर गमछा बाँध
बहुत दिन हुए एक कविता को काटते-पीटते
सोचते, विचारते
कविता भी पक रही है
जैसे पक रहा है धान।

मिट्टी में पड़ा धान

ठीक नहीं लगता, जब दादी चुनती
मिट्टी से धान का एक-एक दाना
अकसर दादी से कहता
क्या ! इतने ग़रीब हैं हम
कि तुम नाख़ूनों से उठाती हो धान
परन्तु दादी बुरा मान जाती
और हम मिट्टी से चुनने लगते धान

उन दिनों बैलों को भर दुपहरिया
गोल-गोल चलना पड़ता धान के पुआल पर
हम भी चलते गोल-गोल
जैसे पृथ्वी को नाप लेंगे आज ही

सन जाते हाथ-पैर, कपड़े, पसीने-मिट्टी से
होने लगती साँझ
तब दादी को आता हम पर दुलार
चूम लेतीं, हमारा माथा
और बताती, मिट्टी में पड़ा धान रोता है बेटा
कि मिट्टी से आए और मिट्टी में मिल गए
तब बरकत नहीं होती किसान की

नहीं रही दादी, पर
मिट्टी में पड़ा धान
आज भी दिखाई देता है रोते।

रसप्रिया 

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘रसप्रिया’ को पढ़ते हुए

असमाप्त ही रह जाती है रसपिरिया की कथा
रह-रह फूटती, मिरदंगिया की हूक
कि रसपिरिया नहीं सुनेगा मोहना !
देख न ! आ गया कैसा कठकरेज वक़्त
कि पहले रिमझिम वर्षा में लोग गाते थे बारहमासा
चिलचिलाती धूप में बिरहा, चाँचर, लगनी
अब तो भूलने लगी है कूकना कोयल भी

पंचकौड़ी मिरदंगिया को पता होगा ज़रूर
अगर परमात्मा कहीं होगा, तो होगा रस-रूप ही
तभी तो टेढ़ी उँगली लिए
बजाता रहा आजीवन मृदंग
और इस मृदंग के साथ फूटता रहा रमपतिया का करूण-क्रन्दन
कि मिरदंगिया है झूठा! बेईमान! फरेबी!
ऐसे लोगों के साथ हेलमेल ठीक नहीं बेटा

भौचक है मोहना !
ठीक मेरी तरह
इस अपरूप प्रेम की कथा में।

 

चले जाना ऐसे

जब उत्सव मना रहे थे लोग
उड़ रहा था अबीर-गुलाल
उमड़-घुमड़ रहा था आँखों में वसन्त

वह चला गया

जब छोटकी पतोहु बनी थी पहली बार माँ
लोगों के पैर नहीं पड़ रहे थे धरती पर
हुलस-हुलस कर देखने में लगे थे सभी
नवजात का टेसू-सा लाल मुख
पहली बार सास हल्दी डाल
गरम कर रही थी
बहू के लिए दूध

वह चला गया

जब माघ मास की रात्रि में पड़ रहा था पाला
घरों-दालानों में दुबके थे लोग
माएँ अपने शिशु को गोदी में ले बिछावन पर

वह चला गया

जाना तो सबको होता है
पर ऐसे चले जाना
कलेजे में हूक उठती है दोस्त !

असमय

क्या ! भूल रही है कोयल कूकना भी
पखेरू मन मार कर उड़ रहे आकाश
तितलियों की लुप्त हो रही चंचलता
और भौरों का फूलों से हो चुका मोहभंग
क्या ! नदियों का समुद्र से मिलने की घट रही चाह
बीच राह में ही कर रहीं प्राणत्याग

क्या ! हँसी का सम्बन्ध हृदय से हट कर
जुड़ गया दिमाग से
क्या ! उल्टा-पुल्टा हो गया दुनिया का गणित

इन तमाम बातों में सिर खपाता कवि
हो रहा था, दिनोंदिन अकेला और बूढ़ा, असमय।

कविता और मेरे बीच

उदासी कितनी ख़ूबसूरत होती है
कविता मुझे बरसों समझाती रही
घुमाती बियाबान सड़कों पर, ग़मगीन दुनिया,
ज़र्द चेहरों की कहानियाँ सुनाती रही

बैठाती रही दरख़्तों के नीचे
और बिखरे पत्तों को हथेली पर ले
बताती रही, पतझड़ ही निष्कर्ष है

एक दिन मैंने पूछ ही लिया
क्यों न वसन्त को ही मान लूँ निष्कर्ष
जितना सच पतझड़, उतना ही वसन्त है
जिऊँगा जितने दिन
रहूँगा, संग वसन्त के

मित्रो, यह तर्क-वितर्क चल रहा है अब तक
कविता और मेरे बीच।

मुँह चिढ़ाते दादा

दादा जब बड़े प्रेम से बतियाते
उनकी आँखों में एक शिशु कुलाँचे मारता
उनके अनुभव और उम्र को चिढ़ाता रहता मुँह

वे रस से सराबोर हो समझाते
कि सभ्यता के विकास में अनुभवी लोग
सिर्फ़ उड़ाते हैं हँसी
जमा नहीं करते कुछ भी

अनुभवी लोग अकसर बूढ़े होते हैं
दुनिया के संशयग्रस्त प्राणी
अनुभव रहता इनके सिर पर सवार
जो कुछ करने के पहले ही
उन्हें कर देता पस्त-हिम्मत
मेरा तो मानना है
ऐसे अनुभव को ले तुम ओढ़ोगे कि बिछाओगे
खाओगे कि नहाओगे

दादा की अनुभवी आँखों में
कितनी घृणा थी अनुभव से
कि जब कोई बच्चा उन्हें चिढ़ाता मुँह
वे उसे न समझाते, न गुस्साते, चिढ़ाने लगते मुँह।

ईश्वर की सर्वोत्तम रचना

कितनी अजीब बात है!
जब उचारा आपने
कि मनुष्य, ईश्वर की सर्वोत्तम रचना है
तो मुखमण्डल आपका दिपदिपाने लगा
पर जब कहा मैंने
कि ईश्वर, मनुष्य की सर्वोत्तम कल्पना है
तो मुखमण्डल आपका स्याह हो गया

सैकड़ों-हज़ारों साल हुए
आपको अब तक भरोसा नहीं मनुष्य पर
ईश्वर की सर्वोत्तम रचना होने के बाद भी।

एक कविता ही छुट गई

इतना कैसे मिलता वक़्त तुम्हें
जो लिखते कविताएँ
जबकि घर-परिवार, दुनिया की आपाधापी में
किसी को साँस लेने की फुर्सत नहीं
सब कुछ सह लेता हूं मैं एक कविता छोड़ कर

मुझे हँसी आई
उस रसूखदार आदमी के प्रश्न पर
और मैंने कहा, गनीमत है
कम से कम
एक कविता तो आप से छुट गई

दोस्तो,
इस दौर में, हमारे लिए
यह बहुत बड़ी ख़बर है
अकाल में झमाझम बरखा जैसी

कि ताक़तवर, रसूखदार लोग
सब कुछ भले अपनी हथेली में भर लें
वे रहते कविता से सात बाँस दूर
एक यही चीज़ उन्हें भीतर से
नाकाबिले बर्दाश्त है

नहीं तो ज़्यादातर चीज़ों की तरह
कविता भी बिकने लगती बाज़ार में।

कविता की दुनिया

मेरे सामने एक-दो नहीं, कई रास्ते थे
परन्तु मैंने पगडण्डी ही पकड़ी
वहाँ एक मनुष्य होने के नाते
चल फिर सकता था मनुष्य की तरह

जी सकता था उन लोगों की दुनिया मे
जो पराजित हो गए द्यूतक्रीड़ा में
झोपड़ियों, जंगलों और गाँवों में रह गए महदूद
उनके पुरखे भी कभी छाँट दिए गए होंगे नगरों से
यह तर्क दे कर कि, जंगलों को जलाकर
मैदान बनाया हमने, फिर गाँव, फिर नगर बसाया हमने
तुम्हारा है हमारे नगरों में प्रवेश निषिद्ध

मेरी देह धूल से सनी
पैरों में भरी है बिवाईयाँ
जमी है पपड़ी होंठो पर
सभ्य नागर जन देख लें मुझे तो
प्रथमदृष्टया समझेंगे असभ्य ही
और मेरी कविताएँ, ठीक मेरी तरह
न उनमें अलंकारिक भाषा, न चमत्कार
न कलात्मकता का वैभव,
न बौद्धिकों के लिए यथेष्ट खुराक
तो मैं क्या करूँ !
यहाँ, कहाँ, तितली पकड़ने जाऊँ
जहाँ पेट के लिए आदमी हलकान
ग़रीबी, लाचारी और चिन्ता से गायब मुसकान
माथे पर रख हाथ, भविष्य को विचारते हैरान

खैर छोड़िए !
आप अपनी दुनिया में ख़ुश रहें
मैं अपनी दुनिया में मगन हूँ
गोकि कविता की दुनिया इतनी बड़ी है
जिसमें समा सकती है हमारी-आपकी तरह
सैकड़ों-हज़ारों दुनिया।

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