Skip to content

 

ढूँढ़ रही हूँ चन्दन

दूर देश में
नए वेश में
पार समन्दर
इस विदेश में
ढूँढ़ रही
अपनापन साथी ।

बहुत भीड़ है
नया नीड़ है
काम बहुत है
शक्ति क्षीण है
ढूँढ़ रही
संजीवन साथी ।

कठिन घड़ी है
धूप कड़ी है
शाम अकेली
और बड़ी है
ढूँढ़ रही हूँ
चन्दन साथी ।

किस पर विश्वास करें ?

भावों में शब्द नहीं
शब्दों में अर्थ नहीं
अर्थों में तत्त्व नहीं
किस पर विश्वास करें ?

भजनों में भक्ति नहीं
मन्त्रों में शक्ति नहीं
शक्लों में व्यक्ति नहीं
किस पर विश्वास करें ?

सुर में संगीत नहीं
सावन में गीत नहीं
अपने अब मीत नहीं
किस पर विश्वास करें ?

गीतों में छंद नहीं
फूलों में गंध नहीं
सच्चे सम्बन्ध नहीं
किस पर विश्वास करे ?

Leave a Reply

Your email address will not be published.