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इसी पृथ्वी पर

इसी पृथ्वी पर

इतने सारे जीव

आदमी पशु-पक्षी कीट-पतंग

जीवन के ढेर सारे रंग

पृथ्वी पर ही

पहाड़ पानी आग

उसकी मिट्टी और आकाश

इसी पर

बारिश में जैसे छाता ताने हुए

ग्रह नक्षत्र

बिखरी आकाशगंगा

घेरता अनन्त

यहीं पुण्य और पाप

जन्म इसी पर

यहीं अवसान

इसी धरणी को

सिर आँखों पर बिठाये शेषनाग

अगोरे दिकपाल

गिरे नहीं फिर भी

झुके नहीं इसका माथ

थामे हुए इसको

गर्भ से ही अनवरत

मेरे दो हाथ।

बीस सौ पचास

भर रहा हूँ

देह और धरती के

हर चुल्लू में पानी

नहीं तो आधे

पड़ जाएँगे प्यास के माथे

रख रहा हूँ आग

बचा-बचाकर

हर जली हुई तीली के साथ

क्योंकि प्रकाश की कई पीढ़ियाँ

लेने जा रही है संन्यास

साँसों से चुरा-चुराकर

हवा को रोके रखा है फेफड़ों में

प्राण और वायु का रिश्ता

छूट जाने वाले दिनों के लिए

कंकरीट हो रही सतह को

कुरेद-कुरेदकर

जमा की है मिट्टी

सारे के सारे नाख़ूनों में

कि रेत होने जा रहा है

इस जीवन का सबकुछ

आकाश के कुछ रूमाल

रखने हैं कई-कई साल

जब तलवों को आएगी नींद

चलते-चलते कहीं टिककर

सपने देखने होंगे इन्हीं पर

अरबों पैरों से लग-लगकर

फट रही पृथ्वी की बिवाइयों में

भर रहा हूँ मोम-सा विश्वास

कि देख सके यह दुनिया

सन् बीस सौ पचास !

बरताव 

बरसों पुराने पड़े पन्ने

दाग़ रह गये हैं

उँगलियों और नमी के

कुछ स्याहियों के छींटे

रद्दी के भाव बेचा नहीं इन्हें

रखा है तह पर तह कर

लिबास जो होते गये छोटे

जगह-जगह मसकने

और दरकने के बावजूद

नयी चीज़ों से बदले नहीं

देखा इन्हीं से

अपने जीवन का अक्स

छूटते समय के बरअक्स

ईंट कंकरीट से बने घर में

बचाये रखी मिट्टी की परत

सुरक्षित है जहाँ

कई पीढ़ियों की छुअन

पहले भोर से जल रहे

सूरज और चूल्हे की आँच पर

पक और पग रहा मन

पहली ही साँझ से लगाये रखा

आँखों में अंजन

कद काटते बड़प्पन में

जुगाया स्मृतियों का बालपन

पथराये शरीर की खोह में

आत्मा का यौवन

दिलो-दिमाग़ के दराज़ों में हैं

लाल-काली तारीख़ों वाली डायरियाँ

सही-ग़लत के धूल-भरे निशान

धुँधली लिखावटों वाली अनमेल चिट्ठियाँ

पुरानी यात्राओं के सामान

मुझसे अब तक जुड़े

अपनों के अक्षय कोष

देखती कहती है मानुषी

जाने कितनों से रहा तुम्हारा प्रेम

किस-किससे जुड़ी जान !

जुगत

भरता हूँ प्याली

कोर को बचाकर

और थोड़ी बची रहने पर

कह देता बस

पाता हमेशा

पेट से कम

आख़िर में फिर भी

उठाता जूठन

देह की नाप से तंग

रहता कपड़ा

और दर्ज़ी बड़ी मिन्नत के बाद

होता सिलने को तैयार

उजाले के लिए देर तक

मैं ही होता प्रतीक्षारत

फिर परदे से बुलाकर थोड़ा अन्धकार

करता दिन का विचार

भरकर सारे शब्दों की आवाज़

साधता उसमें कुछ मौन

हर सफ़र मुलाक़ात में

दो क़दम पहले ठहर

झुककर आगे मिलाता हाथ

ज़रूरी और अपने हिस्से का

रहता पहले से ही थोड़ा

और इस्तेमाल के वक़्त

बचा लेता उसका एक टुकड़ा

इस तरह सेंतकर

सत का पानी

मन का सूत

रखा है अन्तस के कोषों में

इस विशाल मरुथल में जब

पृथ्वी लगाकर ऊंट के पाँव

लथपथ दौड़ेगी रेत-रेत

मैं बन जाऊँगा उसका पेट !

सहेजना 

बेतरतीब बढ़े जीवन में कुछ

तो छाँट डालेंगे उसे पौधे की तरह

और ध्यान रखेंगे यह भी

कि वह अलग तो नहीं हो रहा जड़ से

फ़ालतू चीज़ों का अम्बार लगे घर में

तो कर देंगे कूड़ेदान या कबाड़ी के हवाले

पर मनाएँगे उनमें से भी

सहेज लें कुछ चुनने वाले

कपड़े फटेंगे देह के

तो भी चलेगी नये सिरे से कैंची

बनेगा झोला पोंछना गेंदड़ा

दम तोड़ते रेशों के साथ

आएगा कुछ नया

जीमेंगे मन भर

पहले रखकर आगत के लिए गुड़ पानी

चिड़ियों को दाने

और मिट्टी को बीज

फलेगा फूलेगा घर

मगर यह भी सोचेंगे हर पल

सिर ढँकने के लिए हो छत

और खुले रहें दरवाज़े

तलवों को छील रही कंकरीट के आसपास

बची रहे कुछ नर्म मुलायम घास

जोतेंगे धरती उँगलियों के हल से

कि आहत नहीं हो जीवित कोशिकाएँ

बहाएँगे मगर रखेंगे आँखों में पानी

साँसों में हवा हथेलियों में ऊष्मा

बचाएँगे जागे हुए सपनों के सच

हमारा होना और करना

इस बात से है कि हम

ख़र्च करते वक़्त सहेज लेते हैं क्या-क्या

जर्जर से भी जोड़ लेते हैं कितना

कुछ फेंकते हैं तो इस भरोसे

कि उसकी धूल लौटकर आएगी घर

और बहुत झाड़ने पोंछने के बावजूद

छिपी रहेगी अतीत के अँतरों में

इस सृष्टि का लघुतम कण है मेरा हिस्सा

इसे ही मुझे सहेजना बरतना और बचा लेना

कज1 होती जहाँ-जहाँ धरती

चींटी की तरह इस शक्कर को दूसरी ओर रखना

और उसके भार भर मीठी याद छोड़ जाना।

आवभगत 

कहीं गया तो उतार कर

घर में ही अपनी देह का खोल

सफ़र भर लाल कलेजा खोले

घूमता रहा लपलपाती जीभों के बीच

सीढ़ियाँ चढ़कर जान-बूझ कर कूदा ऊंची छतों से

लड़ने के सामान हमेशा चुने अपने से तगड़े

घृणा के लिए पास रखे जीने के सबसे ज़रूरी पात्र

प्रेम किया उन होठों से जिनमें थी

सबसे अधिक बारूद और आग

अपने ही शरीर की खिल्ली उड़ाते हुए

सच की तरह मैं चिल्लाया कई बार

सारे युद्धों में मुझे ही होना था पराजित

विध्वंसों में मेरा ही संहार

इतने पर भी पता नहीं क्यों

सभी जगह हो रही है मेरी खोज

हर रात घुसते अपने ही घर में चोर

मेरी हर साँस हर चाप पर होते चौकन्ने

और चतुर हाथों से उलटते-पुलटते

खूँटी पर टँगा मेरा पुराना कोट

अब तो और भी बदल गया है युग और समाज

लूटने काटने निगलने वालों को शायद

लग गया है एक अनोखी चीज़ का स्वाद

मगर उन सीनाज़ोरों को क्या सुनाई पड़ रही होगी

मेरे कोट की जेब से धीरे-धीरे बज रही

अपनी आत्मा की आवाज़ !

सबक़

रूसी भरे बालों की तरह झरते-गिरते

कमज़ोर और कठिन समय के हिसाब के लिए

अपने बच्चे की पुरानी स्लेट है मेरे पास

जिस पर अंक की तरह लिखा है एक अक्षर

उसी के छापे पड़े हैं मेरे पूरे बदन पर

कोहरे में लिपटी पथरीली ज़मीन पर उगाना कोंपल

नाज़ुक नसों से उकेरना शिलालेख

सहज दिखने वाली दुनिया का सबसे दूभर है काम

मगर मैं लगा रहना चाहता हूँ इसी में अटूट

वह आख़िर एक ही तो है आखर

जिससे बना शब्द सबसे ज़रूरी और सुन्दर

उसी पर लेखनी की तरह फिराता रहता हूँ अपनी उँगली

पहले लिखता जिसे बच्चा सोच-समझकर

इस जीवन और जगत की नश्वरता के विरुद्ध

सच की यही एक उँगली है मेरे पास

जानता हूँ जो गलेगी नहीं कभी

घूमती रहेगी अक्षर के अक्ष पर

जैसे चलती रहती है पृथ्वी निरन्तर।

पहले पहल

लिया जन्म

तो पहले पहल

पहने कपड़े

बड़ों के छोड़े हुए

चढ़ीं सीढियाँ

जो थीं दबी हुई

पुरखों के पैरों से

पहला पाठ जो आया ज़ुबान पर

वह था हृदय के पार

गहरे सोतों से नि:सृत धार

मिली जो स्लेट

उस पर थे लिखने और पोंछने के

पिछले निशान

किताबों के पन्नों पर

काले अक्षरों से इतर

बिखरा था ज्ञान

तय कीं जितनी राहें

उनकी तहों से

आती रहीं हरदम

पहले तय की गयी यात्राओं की आहटें

गुनगुनाता रहा वही

कई साँसों की लय में बँधी हवा

पिया बार-बार मिट्टी की छलनी में

रेत के रेशों से छना आब

रहा हमेशा आदिम ख़ुशबुओं के साथ

मन को उड़ाया बहुत दूर

कटी थी जहाँ कल बच्चों की पतंग

जलायी दिल के बहुत भीतर

जंगलों की वही पुरानी आग

सोचता हरदम

अतल अन्नत में डूबकर

चुनता सृष्टि का पुरातन स्पन्दित कण

सुनता उसकी धड़कन

जीता पहला जीवन क्षण।

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