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ऐ कवि !

जब देश में दंगा हो रहा था
ऐ कवि, तू तब कहाँ था ?
— मेरे गुसल का नल टूटा था
पानी बहता बचा रहा था

जब लोग सारे रो रहे थे
ऐ कवि, तू तब कहाँ था ?
— बच्ची मेरी भूखी बड़ी थी
खाना-वाना जुटा रहा था

जब ख़ून गीला बह रहा था
ऐ कवि, तू तब कहाँ था ?
— आसमां में तारे कम थे
मैं धुन्ध-धुआँ हटा रहा था

जब सब बेचारे मर चुके थे
ऐ कवि, तू तब कहाँ था ?
— नंगी क़ब्रें खुली पड़ी थीं
इक-इक की चादर बना रहा था

हैप्पी न्यू इयर

अनुभव का भार
झुर्रियों में बिठाए
एक बिखरा आदमी
नए साल की पार्टी
मनाते बच्चों को
देर तक देखता रहा…

आह भरी,
उसी भीड़ में हो गया
ओझल ।
बीते साल की तरह ।

मेरा ख़ून तुमने किया

तुम, जो सुख बटोरे बैठे हो
अपने हिस्से से
किलो भर अधिक ।
तुम, जो पेट भरने के बाद
अपनी थाली में
भर लेते हो मेरा खाना ।

मेरा ख़ून तुमने किया —
उस पहिये ने नहीं जिसे रौंद दिया
तुमने,
जिसने उस पटरी पर मुझे होने दिया
बली ।

थी हिम्मत तो मर जाते मेरे साथ
लेकिन तुम ज़िन्दा हो …

इसीलिए
मेरा ख़ून तुमने किया
तुमने ।

चाय

तुम मुझे बहुत पसन्द हो
क्या मेरी दादी से मिलोगे ?

मेरी दादी, जो बहुत बूढी थी
मुझे राजा-रानी की कहानी सुनाती थी
आँगन पर रंगोली बनाती थी

क्या उस आँगन पर बैठ
हम-तुम चाय पिएँगे ?

गहन 

अँधेरे को चीरती हुई
एक तीखी आवाज़
पहुँचती है मुझ तक

वो इस क्षण है
अगले, नहीं।

ये जान मन में एक
अजीब कुलबुलाहट होती है
मानो अलौकिक किसी संसार से
कोई गहन कुछ बोल रहा है

जो इस पल है
और अब … नहीं।

परसों

आज, मैं सपना देखूँगी
हक़ीक़त से मिलता जुलता ।
कल, मैं हक़ीक़त को
सपने में बदल दूँगी ।
परसों, मैं थक जाऊँगी
हक़ीक़त से
सपने से
दोनों के एक जैसे होने से ।

परसों मिलूँगी मैं
मुझ से
थकी थकी।

रोज़ाना वाली खिचड़ी 

एक कटोरी — चिन्ता
और एक कटोरी — काम
को मिला दीजिए ।
तक़लीफ़ में भिगोकर
छोड़ दीजिए ।

आँच पर जीवन रखिए
दो बड़े चम्मच याद डालिए ।
अच्छे से गरम होने पर
ज़रा सी उम्मीद का छौंक
और ख़ौफ़ का तड़का लगाइए ।

अब इसमें काम और चिन्ता के गीले मिश्रण को
डेढ़ गिलास तमन्ना संग मिला दीजिए ।
अरे हाँ ! ढक्कन बन्द करने से पहले
स्वादानुसार अनिश्चितता का प्रयोग कीजिए ।

फिर क्या ?
जितनी सीटियाँ चाहें बजा दीजिए ।
खिचड़ी तैयार !

जनाब, खा सकें तो खा लीजिए ।

ब्रा

इसको कस के पहनो
फिसलने मत दो
सटा के पहनो
हिलने मत दो ।

इसका नाम मत लो
इसको बाक़ी कपड़ों से ढक दो
जब बालकॉनी में सुखाओ ।

इसकी सफ़ेद पट्टी को कन्धे पर से दिखने मत दो,
ग़लती से भी ।
फिर चाहे तुमने झुककर गोबर उठाया हो
या पुस्तकें ।

किसी को पता नहीं चलना चाहिए
कि तुमने इस ‘कवच’ को पहना है
वरना आतंक फैल जाएगा
सरकार गिर जाएगी
तेल का भाव उठ जाएगा !

ये भगवान की तरह है
इसके होते हुए, इसके न दिखने के
अभिनय का रियाज़ रोज़ करो
तो तुम्हारे सौ ख़ून माफ़ ।

क्योंकि तुम वो उत्तम कलाकारा हो
जो ‘ब्रा’ — केवल दुकानदार को बोलती है
और ऊँघते पति के सामने खोलती है !

ज़ुनून 

जुनून — आँखों में छिपी वो हंसी
जिसे पता है कि जीत गुलाबी होगी ।

जो चुपचाप शोर मचा रही है
आजुओं-बाजुओं को सता रही है
जिसके नशे में धुत्त हो
आँखें एक अडिग ज़िद्द लिए
— बिना झपके
घूरती रहती हैं इक-टुक

और जिनकी लाली में घुल
जीवन गुलाबी सा हो रहा हो …

वो दौड़ा

क्यूँकि उसे देर हो रही थी
वो दौड़ा
क्यूँकि उसकी ट्रेन छूट रही थी
वो दौड़ा
क्यूँकि वो कहीं होना चाहता था
वो दौड़ा
क्यूँकि वो डाँट से डरता था
वो दौड़ा
क्यूँकि वो मुस्कुराना चाहता था
वो दौड़ा
क्यूँकि वो उम्र भर दौड़ा है
वो दौड़ा

दर्द 

“एक मोटे से रस्से को
जैसे हवा में फैंकने का मन करे —
वो ऊँचा !
फिर घुमाकर किसी के गले में डालकर उसे खींच लो,
और वो शतरंज के पैदल जैसा— धम्म से गिर जाए ।

कभी सामने किसी को थमा के,
खिंचम-खिंचाई खेली जाए ।
रस्से को गोल-गोल, गोल-गोल, घुमाया जाए,
साँप जैसा ज़मीन पर डुलाया जाए ।

२६ वीं मंजिल से खड़े होकर
नीचे चलते किसी के सिर पे खुजली करें ।
यादों की बाल्टी कुएँ से भरें,
और अपनी तरफ ऊपर खींच लें ।

फिर, रस्से को खींचने पर,
हथेली से जैसे ख़ून निकलता है —
वैसा …
दर्द।”

सिक्योरिटी चेक

पासपोर्ट दिखाइए ।
लैपटॉप खोलिए ।

सीधे खड़े रहिए ।

लैपटॉप रख दीजिए ।
झुकिए मत —

सीधे, सीधे खड़े रहिए, प्लीज …

जूते खोलिए ।

सीधे प्लीज …

हाथ दिखाइए ।
घूम जाइए ।
सामने देखिए ।
आँख मत झपकाइए ।

देखिए देखिए, प्लीज …

हाथ यहाँ रखिए ।
सीधा रखिए, प्लीज …

अपना पासपोर्ट और सामान ले लीजिए ।

शुक्रिया !
अमेरिका में आपका स्वागत है ।

— आप विस्फोटक नहीं हैं ।

बड़ा आदमी

मैं और मेरा आत्म-विश्वास
आख़िरी सांसें भर रहे हैं
मैं अस्सी का हो चला
और उसे तो उम्र का आभास ही नहीं ।

वो हंस रहा है
मैं दर्द में हूँ
वो सीधा खड़ा है
मैं बिस्तर में हूँ ।

आँखें मुझ-सी ही पाई हैं…
वो, जो सीने को चीर देती हैं
वो, जो सपनों की उड़ानों में विलीन हैं
वो, जो सच की मूर्खता में मग्न हैं ।

एक पल के लिए मैं मोहित हो चला
फिर सम्भला ।
स्मृतियों के जाल को परे कर
मेरी भौंहें सवाल कर रही हैं
— उसके चमकते माथे पर शिकन तक नहीं
मैं क्रोध के कोहरे में खो रहा हूँ
— उसे परवाह ही नहीं ।

एक हंसी हंस रहा है वो — टेढ़ी
गुलाबी गालों पर, गुलाबी हंसी — टेढ़ी।
मेरे प्रश्न से न भय उठा
न लज्जा
न भाव
न देह
निष्ठुर !

एकाएक मुझे याद आया
वो भी तो जा रहा है आज
जीत की ख़ुशी में मैं मुस्काया
— भीतर ही भीतर —
मैं संवेदनशील हूँ
उस तक का ख़याल हूँ रखता
वो निर्लज्ज, मुझी पर है हंसता !

सारा जीवन बिता दिया
इसकी सेवा-पानी में
घरवालों की गाली सही
भरपूर जवानी में
किसलिए ?
ताकि ये जीए
जीए जैसे मन हो इसका ।
ऐसे तो मेरे बाबा ने भी नहीं जीने दिया मुझे
इसके बहकावे में आ
घर तक मैंने छोड़ दिया
निकल चला, कठोर कर्म करने
सृष्टि-विजय
सृष्टि-परिवर्तन
सृष्टि-नवनिर्माण
अन्तहीन ख़्वाहिशें…!

वो बोला — न करना कभी सवाल
दोस्ती का हाथ समझे
मैं थामे रहा मशाल
कई बार गिरा
कई बार लुढ़का
चोट लगी, खून बहा
पेड़ों ने भी ताने कसे
फल जब-जब नहीं मिला ।

आज अब हम हैं यहाँ
अस्पताल में — यूँ आमने-सामने
उलाहनों से मेरा मन भर आया
आँख फेरने को बोली काया
मैं और मेरा आत्म-विश्वास
थे एक-दूजे के दुश्मन ख़ास।

वो घड़ी अब आ चली
मैंने अन्तिम वाली श्वास भरी
आँख में उसके आँसू तो आया
पर हंसी रही फिर भी वहीं

हार गया !
अलविदा का मैंने हाथ उठाया
उसने लपक कर थाम लिया
कुछ झुका, फिर कहा —

“जब तुमने मुझे था जीवन दिया
तो कहा था ऐसा एक दिन आएगा
कहा था देह दण्ड तब पाएगा
कहा था तुमने —
‘वादा करो — रहोगे उस दिन भी अटल, कहो !
मुस्काते, निर्भीत, निश्छल, निडर ।
तभी रह पाऊँगा मैं जीवित
तभी बनूँगा मैं अमर ।’

आज पूरा किया वो वादा मैंने
मुस्का रहा हूँ मैं देखो
हो जाओ अमर तुम अब, चलो !”

मेरी साँस छूट गई
उड़ता चला गया मैं कहीं
आसमानों की विवादित वन्दना में
वो देखता रहा मुझे,
डबडबाई निश्छल आँखों से
अपने विश्वासघाती साथी को
जो छोड़ गया जग में उसको
मुस्काता हुआ ।

लोग कहते हैं — कोई बड़ा आदमी मरा है
लोग कहते हैं — वाह ! क्या जीवन जीया है
लोग कहते हैं — ये हमेशा हमारे साथ रहेगा
लोग कहते हैं — मैं और मेरा आत्म-विश्वास अमर है ।

सच 

काग़ज़ पे लिखे लम्हों
में छिपा सच
सिर्फ़ दो लोग पहचानते हैं
काग़ज़ और मैं ।

एक दिन काग़ज़ खो जाएगा
और मैं मर जाऊँगा
रह जाएगा सिर्फ़ सच —
विलुप्त ।

स्वतंत्रता दिवस

अपने सिद्धान्त लिए खड़ा वो
बीचों बीच सड़क के …
स्वतंत्रता दिवस !
— छुट्टी का दिन
एक रोज़ स्वतंत्रता दिवस
आज़ादी का दिन
था ।

ओस की बूँद

ओस की इक बूँद जैसे
पकड़े बेल के पत्ते को
तय है उसका नीचे गिरना
तड़पे संग में रहने को
पल भर को
बस पल भर को तो जीवन हो…।

सड़क पार

और उसने सड़क पार कर ली ।
हवा का एक तेज़ झोंका
गाड़ी से निकला
ब्रेक जो लगा था ।

गाड़ी के मालिक ने देखा जो नहीं था,
उसने पी जो रखी थी,
गर्लफ्रेंड से झगड़ा जो हो गया था,
वो किसी और से इश्क़ जो फ़रमा रही थी ।
स्कूटर वाला एस्टेट एजेण्ट ख़ुश जो था,
उसने ब्रोकरेज में लाखों जो कमा लिए थे ।
पिज्जा डिलीवरी बॉय का आधा घण्टा जो ख़त्म हो रहा था
कॉल सेण्टर के अफ़सरों का ब्रेक जो था ।
भई ! रिक्शेवाला सलमान खान के गानों में जो डूबा था ।

तभी हवा का एक तेज़ झोंका
गाड़ी से निकला
— ब्रेक जो लगा था !

कुत्ते का पिल्ला
— उबासी लेता
— दुम हिलाता
— ठुमक — ठुमकता
बेख़बर मासूम रफ़्तार से चला

और उसने सड़क पार कर ली ।

गुरु

मेरे अन्दर एक मुस्कुराहट छिपी है
किसी और की
मेरे अन्दर एक ज़िद्द छिपी है
किसी और की…

एक दिन वो बिना बताए घर आ गया
बोरी-बिस्तर समेत
मैंने घर के कमरों में से
उस ‘किसी और’ को — रसोई दे दी
ये सोचकर के कि जितनी कम जगह इसे दूँ
उतने इत्मीनान से खुद जीऊँ ।

पर उसने रसोई में खाना पकाना शुरू कर दिया ।
खाना स्वादिष्ट था —
मैंने भर-पेट खाना शुरू कर दिया ।

एक दिन लोग रोए
कि वो चल बसा
बड़ा आदमी था
उसके कई चाहने वाले थे
मेरा गुरु था —
लेकिन मैं नहीं रोया ।

रसोई में उस रात भी खाना पका
मैंने मृत्युभोज खाया ।

…मेरे अन्दर एक मुस्कुराहट छिपी है
किसी और की
मेरे अन्दर एक ज़िद्द छिपी है
किसी और की ।
ये मुस्कुराहट मुझे रोने नहीं देती
ये ज़िद्द मुझे हारने नहीं देती ।

मेरे अन्दर एक रसोई छिपी है
मेरे गुरु की
ये रसोई मुझे भूखा सोने नहीं देती ।

खोज 

जब दादी कहानी सुनाती
मैं दादी की गोद में लेटती
हर थोड़ी देर में ‘हम्म्’ बोलती
पूरी कहानी खुली आँखों से सुनती
कहानी : खोज का ज़रिया — ख़ुशी की खोज ।

अब मैं कहानी सुना रही ।
दादी गोद में नहीं ।
दादी ‘हम्म्’ नहीं बोल रही ।
दादी की आँखें बन्द हैं ।
कहानी : खोज का ज़रिया — दादी की खोज ।

ना

हाँ की शुरुआत
अक्सर ना से होती है
क्योंकि ना बोलकर मैं सोच सकता हूँ ।
हाँ बोलकर मैं फंस जाऊँगा

ना को मैं बदल सकता हूँ
हाँ को हिला नहीं पाऊँगा

ना के बाद हाँ होने में एक ख़ुशी है
जबकि हाँ के बाद ना में मायूसी है।

मैं मायूसी से डरता हूँ
इसलिए ना का इस्तेमाल करता हूँ।

जी, घमण्डी नहीं हूँ।

एक मित्रता

किताब खुली
कवि को देखा
कवि ने
आँखें मिलीं
हैरानी हुई
फिर पहचान

विचार — एक की आँख से छलके
दूसरी में चमके।

सदियों को जोड़ती
एक मित्रता हो गई
प्राचीन की
नवीन से ।

दफ़न

वो देखो वहाँ दफ़न हूँ मैं
क्या लगता वहाँ मगन हूँ मैं ?

पढ़ रहा ये जग
दुविधाएँ मेरी
तमन्नाएँ मेरी
निराशाएँ मेरी
इन सब से सनी — कविताएँ मेरी ।

चाह कर भी समझा नहीं पाता हूँ मैं
असली मकसद मेरा
उससे उपजा दर्द मेरा
असली कारण मेरा
उससे उपजा आचरण मेरा ।
क्योंकि … मौत में इतना मसरूफ़ हूँ मैं।

वो देखो वहाँ दफ़न हूँ मैं
क्या लगता वहाँ मगन हूँ मैं ?

अभी कल की ही तो बात है —
सोते, उठते, बैठते, जगते
हर वक्त जुमले बुनता था मैं
अभी कल की ही तो बात है —
दोष, जोश, क्रोध, विरोध
हर हाल में लिखता था मैं ।

अभी कल की ही तो बात है
कि कबीर को पढ़ता था मैं
अभी कल की ही तो बात है
कि ग़ालिब से जलता था मैं ।

आज —
इर्द ग़ालिब गिर्द कबीरा ?
बीच का अनजान फ़कीरा हूँ मैं…

वो देखो वहाँ दफ़न हूँ मैं
क्या लगता वहाँ मगन हूँ मैं ?

घनश्याम

छोटी-छोटी सड़कें
लम्बे-लम्बे जाम
कैसी नागरिया में आए घनश्याम ।

छोटे-छोटे घर हैं
मोटे-तगड़े दाम
‘किचन’ में लोट लगाएँ घनश्याम ।

मीठे-मीठे बोल हैं
खारे जजमान
फाँस में फँसते जाएँ घनश्याम ।

छोटी-छोटी अँखिया
ख़्वाब तमाम
मोह माया में अटे घनश्याम ।

लघु-लघु दुख है
लम्बे-लम्बे गान
ऊँचे-ऊँचे सुर में गाएँ घनश्याम ।

धुनी-धुनी दुनिया
दौड़े चारों धाम
बांसुरी बजाते जाएँ घनश्याम ।

ग़ालिब और मैं 

जो मैं ग़ालिब की प्रेमिका होती तो ?
सोचो ! ?

सोचो सोचो !

हम दोनों एक साथ रहते
एक ही घर में
घर कैसा होता ?
दीवारें : शायराना
खिड़कियाँ : उलटा रखा पैमाना
जितने रोशनदान उतने दरवाज़े ।
कबूतर यहाँ वहां
— वराण्डे में
अन्धेरी के फ़्लैट में नहीं समा पाता हमारा प्रेम ।
मुझे लगता हमारी ख़ूब जमती :
मैं बी०एम०सी० की बुराई करती,
ग़ालिब हैदराबाद के निज़ाम की ।
मैं अँग्रेज़ी में गिट-पिट करती,
ग़ालिब फ़ारसी में नाज़ !
अक्षर कम पड़ जाते,
होतीं नज़्में अनगिनत !

ग़ालिब जाम के शौक़ीन !
हम मिलकर पीते
पीकर शेर-ओ-शायरी होती
महफ़िल जमती
मैं उनकी सूफ़ी उन्मुक्तता पर मुग्ध
वो मेरी शान्त समझदारी के शुक्रगुज़ार !

हमारा एक कुत्ता होता
जिसे ग़ालिब सुबह ६ बजे
सैर पर ले जाते !
कमाता कौन ?
मैं रंगमंच से ?
या ग़ालिब ज़फर से ?
कमाने की ज़रुरत किसे
सारे ऐश-ओ-आराम तैरते
गज़लों में
और ग़ज़लें होतीं ज़ुबानों पे ।

हमारे झगड़ों की जुगलबन्दी के
लालक़िले में चर्चे होते
‘यूट्यूब’ पर लिंक्स डलते ।
जो जीतती मैं
तो ग़ालिब को चाय बनानी पड़ती
जो जीतते वो …
(वैसे ऐसा होता नहीं !)
तो घर में उस रोज़ गोश्त बनता ।

और अगर कहीं इश्क़ में
हम बिछड़ जाते ?
तो सोचो !
ग़ालिब और मैं —
दो शताब्दियों की जुदाई पर
जाने क्या क्या लिख जाते !

… दिल को बहलाने के लिए
ये ख़याल कैसा है ग़ालिब ?

कलेजा

एक कलेजा पड़ा है थाली पर
लथपथ ख़ून से
अभी-अभी मर गया कोई
और ज़िन्दा छोड़ गया इसे ।

अब ज़िन्दा कलेजे का क्या होगा ?
मूर्ख कहीं का ! मरा क्यूँ नहीं !

तभी OLX पर बोली लग गई
— ‘सेकण्ड-हेण्ड’ कलेजा उपलब्ध
— मुफ़्त डिलीवरी
— एकदम नए जैसा
— आज ही ऑर्डर करें
— और पाएँ 10% की छूट !

पाँच मिनट में कलेजा बिक गया ।

देनदार तृप्त !
लेनदार ख़ुश ।

— और कलेजा ?
कलेजा बिकाऊ !

प्रायश्चित

मैं रिक्शे में
रास्ते में
ज़मीन पर
टूटा-पड़ा-एक पेड़ ।

पेड़ कटवाने वाला अफ़सर
कामोन्माद की आह भर रहा
सिग्नल हरी झण्डी दे रहा
सड़क सीना चौड़ा किए खड़ी
गाड़ियाँ सीटी बजा रही
नौकरी में डूबा सोमवार का सवेरा
एक मिनट व्यर्थ नहीं कर रहा ।
इलैक्ट्रोनिक मीटर का मैकेनिकल रिक्शेवाला
मीटर सी ही चोर-गति से भाग रहा ।

मैं,
रिक्शे को रोक नहीं पाई
पेड़ को अस्पताल ले जा नहीं पाई ।
उसे मारने,
मरते पर हंसने वालों को
पकड़ नहीं पाई ।
आख़िरी वक़्त में उसे ये नहीं कह पाई
कि वो अकेला नहीं है — मैं हूँ ।

मैं उसके सामूहिक उपहास का हिस्सा हूँ
घर आकर मैंने एक कविता लिख दी ।

— इतना सरल प्रायश्चित ?

पूर्ण विराम 

ओझल हुआ ख़ास
उम्र हुई उदास
हंसी का बढ़ा दाम
अब पूर्ण विराम ।

पंछी बोले शोर
चुभने लगा भोर
नियति का है काम
हो दान, पूर्ण विराम ।

दर्द की है धुन
कर्म रहा सुन
जाऊँ,कौनो धाम
जहाँ, पूर्ण विराम ।

बवण्डर

नदी
शान्त
बैठी है

आज
समन्दर की
बारी है

लिखिए आज

अगर अभी नहीं लिखोगे
तो कभी नहीं लिखोगे
आप ।

और आने वाली पीढ़ियाँ समझ जाएँगी
कि हज़ारों की तरह या तो गूंगे थे
आप ।
या तलवारी-हमलावर थे
आप ।
दोनों ही स्थितियों में — कुछ नहीं थे
आप ।

हाँ, अगर लिखकर मरे
तो तब तक ज़िन्दा रहेंगे
आप,
जब तक काग़ज़ के क़त्ल के जुर्म में
सज़ा-ए-मौत ना मुक़र्रर की जाए
आपको ।
या क्या पता किसी बड़े साहित्यिक इनाम
का नाम रखा जाए
नाम पर
आपके ।

लेकिन ये जानने के लिए
कि क्या होगा
आपका ।
लिखिए ।
आज ।

क्यूँकि ख़ून आज बह रहा है ।
और लाल रंग में रंगे बिना
अप्रासंगिक हैं
मैं और
आप ।

रविवार

पेड़ों पर आम दिखाई देते हैं
बिल्डिंगों के नाम दिखाई देते हैं
आसमाँ दिखाई देता है
वक़्त दिखाई देता है
बम्बई की सड़कों पर —
रविवार को ।

असहमत

कविता की दूसरी पँक्ति
कविता की पहली पँक्ति से दूर
जाकर पाँचवी पँक्ति में खड़ी हो जाती है

अलग सी
असहमत
बाहर निकली हुई

इस पँक्ति को बाक़ी पँक्तियाँ ईर्ष्या से देखती हैं
कि कहीं ऐसा तो नहीं कि यही वो ख़ास पँक्ति है
जिसके लिए कविता लिखी गई है

शक से सनी पँक्तियाँ कविता से शिकायत करती हैं
कि इस अकेली पँक्ति को अकेला न रखा जाए
सब-सा बना दिया जाए
लोरी की तरह

कविता कहती है — वो ‘कविता’ है !
कविता कहती है — “अरी पँक्तियो !
क्यों न तुम भी जाकर बिखर जाओ
आड़ी-टेढ़ी लम्बी-छोटी बन जाओ
तब पाँचवी पँक्ति अलग नहीं रहेगी !”

पँक्तियाँ ख़ुशी-ख़ुशी इतर-बितर हो जाती हैं
अलग-अलग कोने पकड़ लेती हैं
कोई लेट जाती है
कोई खड़ी हो जाती है
कोई चौराहे के बीचों बीच बाल बनाती है
सब मगन और आत्म तल्लीन

कवि कविता को आख़िरी बार पढ़ता है
पाँचवी पँक्ति को शीर्षक बना देता है ।

कविता का रोना

“जी ! ये कविता न लें”
— क्यों ?
“ये कविता रोती बहुत है”
— कौन सी कविता नहीं रोती ?
— दे दो

और कविता दे दी गई ।

अब कविता उसके पास है
उसके बिस्तर पर सोती है
उसके बच्चों से खेलती है
उसकी माँ का मन बहलाती है
पर उसकी बीवी…
बीवी से चिढ़ती है ।

बीवी से कविता का हुआ तिरस्कार
कविता ने बीवी का किया कु-प्रचार ।
अब कविता का रोना बढ़ गया है
वो उसे लौटाने चला आया है ।

— मुझे नहीं चाहिए
“क्यों ?”
— ये कविता रोती बहुत है
“कौन सी कविता नहीं रोती ?
घर ले जाने पे ?
यहीं प्रेम कर लो — बाज़ार में ।”

हिन्दी कवि

हिन्दी कवि झेंपता है
अकेला खड़ा है
धीमी आवाज़ में बोलता है
कि कहीं उसे कोई सुन न ले
— हिन्दी में बोलते ।

हिन्दी कवि बड़ी-बड़ी बातें कह जाता है
लोग उसे अँग्रेज़ी में समझने की कोशिश करते हैं
और निरर्थक पाते हैं ।

हिन्दी कवि, कवि नहीं है
शौकिया कविताएँ लिखता है
— ऐसा कहता है
ताकि कोई ये न सोचे कि वो कुछ नहीं कमाता
— बेचारा ।

हिन्दी कवि बेचारा नहीं दिखना चाहता
पर वो हिन्दी के कपड़े पहने खड़ा है
— झोला लिए
अँग्रेज़ी कपड़ों में हिन्दी कविता कहेगा
तो लोग बईमान कहेंगे ।

सो वो बेचारे की तरह खड़ा है
उसके पसीने छूट रहे हैं
उसकी कविता समाप्त हो गई है
और किसी को पता ही नहीं चला है ।

वो मंच से उतरने से पहले
दो शब्द अँग्रेज़ी में कहता है :
Thank You

— सभाघर तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठता है ।

शब्द

“ क्या तुम्हें गोद में ले लूँ —
आत्म-मोही बच्चे की तरह
— झूला झुला दूँ, लोरी सूना दूँ ?

क्या तुम्हें सर पर बिठा दूँ —
घमण्डी प्रेमी की तरह
— दिन का हर मिनट तुम्हारे नाम लिख दूँ ?

के तुम्हें थप्पड़ लगा दूँ
गाली दे दूँ
बाल खींचकर
अन्धेरे कमरे में
महीने भर के लिए तुम्हें
बन्द कर दूँ ? —
— बिना पानी, बिना हवा, बिना बातचीत के ?

और जब तुम ज़ोर-ज़ोर से
चीख़ो
चिल्लाओ
झुलसो
रोओ
तड़पो
सहमो
काँपो
… और हार जाओ
तब बाहर निकाल कर
चाय पे पूछूँ तुमसे
मेरे साथ रहोगे ? ”

— कवि ने कहा शब्द से ।

तर्क वाली कविता

कवि से कहा गया —
‘निकालो क़लम और लिख डालो कविता !’

कवि मन्द-मन्द मुस्काया
लो इतनी-सी बात !
इसी के लिए जगाया ?
मैं तो सोए-सोए लिख देता, कविता ।

‘एक शर्त है —
कविता में तर्क होना चाहिए।’
—हैं ! ये कौन-सी कविता हुई ?

‘हाँ जी !’
राजाजी हैं अर्थशास्त्र में पारंगत
उन्होंने जोड़-बाँटा किया
और बताया
कि जीवन में एक ही है चीज़
जो उनकी समझ से है परे
कविता !
क्योंकि कविता बे-तुकी होती है
तर्क-हीन होती है !

तो अब राजाजी का हुक़्म है —
तो कवि से कहो
कि वो कविता लिखे
हो शामिल – तर्क जिसमें ।
जिसे वो पढ़ें
समझें
मुस्काएँ
और वाह-वाही दें –
कि ‘सुभान-अल्लाह, क्या ख़याल है !’

कवि के हाथ लगे काँपने
उसने उन्हें समझाया
सुझाया
गिड़गिड़ाया
झल्लाया
पर हुक़्म था पक्का –
जो न लिखा, तो मौत ।

कवि ने दिन-रात एक किया
खाना-पीना छोड़ दिया
बीमारियों से घिर गया ।
ठण्ड में काँप-काँप कर
गर्मी में झुलस-झुलस कर
वर्षा में रो-रो कर
हर रूप, रंग, भेस, भाषा में की कोशिश
पर तर्क वाली कविता न बनी ।

कभी तर्क से शुरू होता
तो आधे रस्ते ख़्वाबों में तैरने लगता ।
कभी ख़्वाबों से शुरूआत करता
तो उनमें तर्क पैदा करने के चक्कर में
ख़्वाब चूर हो जाते ।

पर वो लिखता रहा
पोथियाँ, काग़ज़, दीवार, पेड़
इमारत, हवा, पानी…
जो मिलता उस पर लिखता
…लिखते-लिखते एक दिन वो मर गया ।

राजाजी खुद उसके घर आए
इस आस में कि
कम-स-कम एक कविता तो पढ़ कर समझ पाएँ
पर सारी पोथियाँ, बर्तन, दीवारें थीं –
बे-तुकी कविताओं से भरीं।

मायूस राजाजी ने हुक़्म दिया :
‘नामुराद को दिया जाए — जला !’
तभी उसकी छाती पर राजाजी की
नज़र पड़ी,
लिखा था :

“जो मेरे जिस्म के टुकड़े-टुकड़े कर दो तो,
हर टुकड़े में भी
एक तर्क-हीन कविता ही मिलेगी तुमको ।”

-‘यही सही !’
उत्तेजित राजाजी ने हुक्म दिया —
-‘काट दो !’

अब कवि राजा के सामने पड़ा था
टुकड़े-टुकड़े हुआ —
कविता-हीन
प्राण-हीन
तर्क-हीन ।

राजाजी ग्लानि से भर उठे
राजपाट छोड़ने लगे ।
उन्हें सपनों में कवि के टुकड़े दिखते,
टुकड़ों में बैठी कविताएँ दिखतीं
जो उनपर हंसती :
खिल-खिलाकर,
कह-कहा लगाकर
राजाजी उन्हें छूने की कोशिश करते
तो कवि के टुकड़े लहू के आँसू रोने लगते ।

शाही हक़ीम ने उनको पागल घोषित कर दिया
कहा – राजाजी भारी पीड़ा से ग्रसित हैं,
कमरे में चलते रहते हैं दिन भर
बिना तर्क की बेतुकी बातें करते हैं
और कहते हैं –
‘कविता मिल गई ।’

शीर्षकहीन कविताएँ

(चुहल)

1.

ओस की बूँद
बारिश की बूँद
से बोली —
शऽऽऽऽऽऽऽऽ !
हल्ला करने की क्या ज़रुरत
पगली !

2.

छोटी छोटी बातें बैठी हैं
कब बड़ी-बड़ी बातें ख़त्म होंगी
तो हमारा नम्बर आएगा …

3.

शहर के कुत्ते और सड़कें सिकुड़ते जा रहे हैं
एक दिन शहर सिकुड़ कर
एक लकीर बन जाएगा
और दिल्ली वाले कहेंगे — ‘हमारी ज़्यादा लम्बी है’
और आप कहेंगे ” भौ भौ “

4.

इन आँखों का
इलाज कराओ, मेरे अज़ीज़ !

ये दो हो कर भी …
एक ही को देखती हैं।

5.

उस मोड़ से आज फिर गुज़री …
पुरानी एक सिसकी
अब भी
गुमसुम खड़ी थी …

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