रवि कुमार की रचनाएँ

मैं जाग रहा होता हूँ रात रात

जबकि सभी लगे हैं
इमारतों की उधेड़बुन में
मैं एक बुत तराश रहा हूँ
जबकि कांटों की बाड़ का चलन
आम हो गया है
मैं महकते फूलों की
पौध तैयार कर रहा हूँ
जबकि सभी चाहतें हैं
आसमानों को नापना
मैं गहराईयों को टटोल रहा होता हूँ
यह अक्सर ही होता है
लोग समन्दर पी जाते हैं
मैं चुल्लू बनाए
झुका रह जाता हूँ
या कि जब लोग सोए होते हैं
हसीन ख़्वाबों में खोए
मैं जाग रहा होता हूँ रात रात
मैं कर रहा होता हूँ कविता

फ़लक भी ख़ौफ़ज़दा है उससे 

एक बच्चा
किवाड़ की दराज़ से बाहर झांका
और गुलेल हाथ में लिए
हवा सा फुर्र हो गया
पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी की तरफ़
बस्ती की जर्जर चौखटों में
ख़ौफ़ तारी हो गया
कोई दहलीज़ नहीं लांघता
पर यह सभी जानते हैं
वह अपनी अंटी में सहेजे हुए
छोटे छोटे कंकरों से
सितारों को गिराया करता है
चट्टानों को बिखराकर लौटती
उसकी मासूम किलकारियाँ
मुनांदी की मुआफ़िक़
हर ज़ेहन में गूंज उठती हैं
ज़मीं तो ज़मीं
फ़लक भी ख़ौफ़ज़दा है उससे
वह आफ़्ताब को
गिरा ही लेगा बिलआख़िर
वह फिर से
हवा सा फुर्रsss हो रहा है

एक नए जहां का आग़ाज़

मैं एक नदी को
मुंजमिद होते नहीं देख सकता
और ना ही एक आफ़्ताब पर
बादलों का साया चस्पा होते
मैं आग की एक कश्ती बनाउंगा
हौसलों के चप्पू
फिर तुम्हें साथ लेकर
एक मुसल्सल
सफ़र पर निकल जाऊंगा
मादूम होते ख़्वाबों से परे
हमारे दिल ढूंढ़ ही लेंगे शायद
कोई पुरसुकून मुक़ाम
मुंजमिद नदी पिघलती जाएगी
हम अपने पसीनें की बूंदों से
एक नए जहां का आग़ाज़ करेंगे
बोसों की गर्मी से एक आफ़्ताब
रोटी की ठण्डक से एक चाँद
नज़रों की चमक से
एक कुतुब सितारा ईजाद करेंगे
और तुम्हारे आँचल के आसमान पर
इन्हें नज़ाकत से सजा देंगे
हम उस पल का जश्न मनाएंगे
जब पहली बार तुम्हारे गालों पर
सुर्खी छाई थी
और तुम गुलाब सी महक उठी थी
मैं हवा का साथ चाहता हूँ
और बादलों की ओट से आफ़्ताब को
फिर से दमकता देखना
नदी और समन्दर के विसाल को
कोई मुज़ाहमत नहीं रोक सकती
और ना ही कोई हस्सास अस्लाह
गुलाब से महक को जुदा कर सकता है
मैं नदी की ताक़त को जानता हूँ
और आफ़्ताब के तेज़ को भी

ज़माना ख़ौफ़ज़दा है हमसे

ज़माना परेशान है
कि हमारे पुरसुकून चहरों पर
परेशानी की कोई शिकन नहीं
कि हम हमेशा ही
मुस्कुराए और चहकते रहे
कि हमने गुनगुनाए अक्सर
उल्लास भरे गीत
ज़माने को जुकाम हो गया है
कि हम कमर में हाथ डाले
मूसलाधार बारिश में भीगे थे घण्टों
कि हमने जनवरी के महिने में
आइसक्रीम जमाई
और मुंजमिद झील पर लेटकर
उसे एक दूसरे को खिलाया
ज़माने को हैजा हो गया है
कि हम तपती दोपहर में
लू के थपेड़ों के संग निकल गये थे
रेगिस्तान की तफ़रीह पर
कि हमने बाज़ार में चटखारे लेते हुए
खुली रखी चाट खाई
कि हमारे घर की तमाम मक्खियों ने
हमारा साथ छोड दिया है
क्योंकि उन्हें गंदगी पसन्द थी
ज़माने को घुटन महसूस हो रही है
कि हमने खाली वक्त में
छत की शिगाफ़ों में सीमेंट लगाया
कि हमने अपना आंगन बुहारा
पौधों को पानी दिया
कि हमने लुकाछिपी का खेल खेला
अलाव जलाकर बदन गर्माया
कि हम हाथों मे हाथ लिए
यूं ही टहलते रहे देर रात तक
ज़माना हमसे ख़फ़ा है
कि हमने अपने घर की दीवारों पर
रंगीन चित्रकारी की
कि हमने रात्रि के तीसरे पहर
बांसुरी पर एक सुरीली तान छेडी
कि हम सुबह देर तक
एक दूसरे से लिपटे सोए रहे
ज़माना ख़ौफ़ज़दा है हमसे
कि हमारे घर का दरवाज़ा
हमेशा खुला रहता है
कि हमारे पास कोई हथियार नहीं है
कि हमारे चूल्हे में
हमेशा आंच रहती है
कि हमारे ख़िलाफ़
उनकी हर साज़िश नाकाम हुई है
ज़माना परेशान है, ख़फ़ा है हमसे
ज़माने की तबियत नासाज़ है
ख़ौफ़ज़दा है हमसे
बिल आख़िर
ज़माना ख़ुदकुशी कर लेगा एक दिन

हमारी आंखें लुप्त हो रही हैं

हम एक अंधेरी खान में जी रहे हैं

हम कई घंटों तक
रोजी-रोटी की आपाधापी में रहते हैं
सोते हैं कई घंटे
बाकी समय में
खु़द को उलझाए रखने के लिए
हमने कई साज़ोसामान जुटाए हुए हैं

हम उलझे रहते हैं
हम इतना व्यस्त रहते हैं कि
खान के मुहानों के बारे में सोचने की
हमें फ़ुर्सत नहीं रहती
और ना ही खान के मुहाने टटोलने लायक
उर्जा ही हममें शेष बचती

हम अंधेरे को ही
अपनी नियति समझने लगे हैं
और खोजते रहते हैं शास्त्रों में
अंधेरे की सनातनता

हम कोशिश करते हैं कि
हम रोशनी के मायने भी भूल जाएं
दरअसल
अंधेरा हमारे अन्दर
इतना गहरा पैठ गया है
कि हम जुगनुओं से भी भय खाते हैं
जरा भी रोशनी हमें बर्दाश्त नहीं होती

अंधेरा हमारे जीवन की
अनिवार्यता होता जा रहा है
हम खु़द-ब-खु़द
अंधेरा होते जा रहे हैं

चूंकि अंधेरे में
इनकी कोई आवश्यकता नहीं होती
हमारी आंखें
लुप्त हो रही हैं धीरे-धीरे

भूख एक बेबाक बयान है

भूख के बारे में शब्दों की जुगाली
साफ़बयानी नहीं हो सकती
भूख पर नहीं लिखी जा सकती
कोई शिष्ट कविता
भूख जो कि कविता नहीं कर सकती
उल्टी पडी डेगचियों
या ठण्डे़ चूल्हों की राख में कहीं
पैदा होती है शायद
फिर खाली डिब्बों को टटोलती हुई
दबे पांव/ पेट में उतर जाती है
भूख के बारे में कुछ खा़स नहीं कहा जा सकता
वह न्यूयार्क की
गगनचुंबी ईमारतों से भी ऊंची हो सकती है
विश्व बैंक के कर्ज़दारों की
फहरिस्त से भी लंबी
और पीठ से चिपके पेट से भी
गहरी हो सकती है
वह अमरीकी बाज़ की मानिंद
निरंकुश और क्रूर भी हो सकती है
और सोमालिया की मानिंद
निरीह और बेबस भी
निश्चित ही
भूख के बारे में कुछ ठोस नहीं कहा जा सकता
पर यह आसानी से जाना जा सकता है
कि पेट की भूख
रोटी की महक से ज़ियादा विस्तार नहीं रखती
और यह भी कि
दुनिया का अस्सी फीसदी
फिर भी इससे बेज़ार है
भूख एक बेबाक बयान है
अंधेरे और गंदे हिस्सों की धंसी आंखों का
मानवाधिकारों का
दम भरने वालों के खिलाफ़
दुनिया के बीस फीसदी को
यह आतिशी बयान
कभी भी कटघरे में खड़ा कर सकता है

पक चुकी आँखों की ताबिश

जब कलम से रिसता लहू
जमने लगा हो
सफ़हात पर काला डामर सूखने
आँखों में रेगिस्तान ठहरा हो
और ज़ुबां पर लहलहाने लगे
नासूरों का सहरा
जब हमदर्दी की चाह लिए
अश्क भाप होने लगें
अदाएं खो रही हो अपना सरूर
और आहें दफ़्न हो जाए
किसी मिकानिकी तदबीर में
जब हवा चाँद पर जा छिपे
सूरज किसी दरख़्त के साये में
पानी ज़मीं की गोद में समा गया हो
और ज़मीं बिलआखिर
समन्दर की पनाह लेले
ऐसे ही वक्त के वाइस
ईज़ाद हुई है कविता
मैं उन सफ़हात से
जिन पर तहरीर हैं माकूल नज़्में
एक कश्ती दरयाफ़्त करूंगा
और समन्दर में उतर जाऊंगा
चाँद पर सूत कातती बुढ़िया की
पक चुकी आँखों की ताबिश
मुझे हौसला दे रही हैं

जिन्हें नज़ाकत से जिया है मैंने 

मैंने जिद्दोजिहद की हर पल से
और हार जाने से पहले
खू़ने-ज़िगर में डूबी उंगलियों से
फ़िज़ां में उकेरे कुछ ज़ज़्बात
वे हर दिल में गहरे पैठ गए
और कविता में मुन्तकिल हो गए
मैंने चाँद देखा
फिर महबूबा की आँखों की गहराई
मेरे दिल में हर शै के लिए
बेपनाह मुहब्बत पैदा हो गई
मैंने कैक्टस से चुने कुछ कांटे
और उन्हें चूम लिया
वे खिल कर गुलाब हो गए
और कविता में मुन्तकिल हो गए
मैंने आफ़तज़दा कारवां को
पानी पिलाया और राह दिखाई
इसी सबब मुझे जंजीरों से सजाया गया
और एक गोरकन को नशे में डुबोकर
जबरदस्ती तैयार किया गया
जब तक कब्र खुदती
मैंने बेतकल्लुफ़ी से हँसी लुटाई
और कु़र्बानगाह में फुसफुसाकर
अपने आप से की बेबाक गुफ़्तगूं
वह हर ख़ित्ते में गूंज गई
और कविता में मुन्तकिल हो गई
मैं ज़मीं के इस सिरे से दूसरे सिरे तक
बोने में जुटा हूँ तमाम कविताएं
जिन्हें नज़ाकत से जिया है मैंने
जैसे ही वे अंकुराएंगी
एक लाल नदी
सैलाब आते दरिया में तब्दील हो जाएगी

चाहे मुझे पागल करार दिया जाए

कोई यदि पूछेगा
सबसे बेहतर रंग कौनसा है
मैं कहूँगा मिट्टी का
यदि कोई पूछेगा
सबसे दिलकश गंध किसकी है
मैं कहूँगा पसीने की
कोई यदि पूछेगा
स्वाद किसका सबसे लज्जत है
मैं कहूँगा रोटी का
यदि कोई पूछेगा
स्पर्श किसका सबसे उत्तेजक है
मैं कहूँगा आग का
कोई यदि पूछेगा
किसकी आवाज़ में सबसे ज़्यादा खनक है
मैं कह उठूंगा मेरी ! तुम्हारी !
चाहे मुझे पागल करार दिया जाए

फिर से लौटेंगे भेड़िए

फिर से लौटेंगे भेड़िए

अंधेरा ही उनकी ताक़त है
और छंटा नहीं है अभी अंधेरा
वे लौटते रहेंगे रौशनी होने तक

हर बार और उतावले
और खूंखार होकर

उनका और खूंखार होते जाना ही
उनकी कमजोरी का परिचायक होगा

समन्दर कभी ख़ामोश नहीं होता

समन्दर
कभी ख़ामोश नहीं हुआ करता
उस वक़्त भी नहीं
जबकि सतह पर
वह बेहलचल नज़र आ रहा हो
लाल क्षितिज पर सुसज्जित आफ़ताब को
अपने प्रतिबिंब के
समानान्तर दिखाता हुआ
बनाता हुआ
स्याह गहराते बादलों का अक़्स
उस वक़्त भी सतह के नीचे
गहराइयों में
जहां कि आसमान
तन्हाई में डूबा हुआ लगता है
एक दुनिया ज़िन्दा होती है
अपनी उसी फ़ितरत के साथ
जिससे बावस्ता हैं हम
कई तूफान
करवटें बदल रहे होते हैं वहां
कई ज्वालामुखी
मुहाने टटोल रहे होते हैं वहां
ज़िंदगी और मौत के
ख़ौफ़नाक खेल
यूं ही चल रहे होते हैं वहां
उस वक़्त भी
जबकि समन्दर
बेहद ख़ामोश नज़र आ रहा होता है

एक ऐसे समय में

एक ऐसे समय में
जब काला सूरज ड़ूबता नहीं दिख रहा है
और सुर्ख़ सूरज के निकलने की अभी उम्मीद नहीं है
एक ऐसे समय में
जब यथार्थ गले से नीचे नहीं उतर रहा है
और आस्थाएं थूकी न जा पा रही हैं
एक ऐसे समय में
जब अतीत की श्रेष्ठता का ढ़ोल पीटा जा रहा है
और भविष्य अनिश्चित और असुरक्षित दिख रहा है
एक ऐसे समय में
जब भ्रमित दिवाःस्वप्नों से हमारी झोली भरी है
और पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक रही है
एक ऐसे समय में
जब लग रहा है कि पूरी दुनिया हमारी पहुंच में है
और मुट्ठी से रेत का आख़िरी ज़र्रा भी सरकता सा लग रहा है
एक ऐसे समय में
जब सिद्ध किया जा रहा है
कि यह दुनिया निर्वैकल्पिक है
कि इस रात की कोई सुबह नहीं
और मुर्गों की बांगों की गूंज भी
लगातार माहौल को खदबदा रही हैं
एक ऐसे समय में
जब लगता है कि कुछ नहीं किया जा सकता
दरअसल
यही समय होता है
जब कुछ किया जा सकता है
जब कुछ जरूर किया जाना चाहिए

रंग

रंग बहुत महत्वपूर्ण होते हैं
इसलिए भी कि
हम उनमें ज़्यादा फ़र्क कर पाते हैं
कहते हैं पशुओं को
रंग महसूस नहीं हो पाते
गोया रंगों से सरोबार होना
शायद ज़्यादा आदमी होना है
यह समझ
गहरे से पैबस्त है दिमाग़ों में
तभी तो यह हो पा रहा है
कि
जितनी बेनूर होती जा रही है ज़िंदगी
हम रचते जा रहे हैं
अपने चौतरफ़ रंगों का संसार
चहरे की ज़र्दी
और मन की कालिख
रंगों में कहीं दब सी जाती है

हम कवि और हमारी कविताएँ

हम सभी संवेदनशील हैं
विचारशील भी
हमारा सौन्दर्यबोध
हर कुरूपता पर हमें द्रवित करता है
हमारे पास शब्द हैं
और कहने की बाजीगरी भी
हम लिख लेते हैं कविता
पर हमारी बदनसीबी
हमारा समय क्रांतिकारी नहीं है
यह इस नपुंसक दौर की
नियति ही है शायद
कि हमारी कविताएं
परिवर्तन का औजार बनने की बजाए
श्रेष्ठता बोध की तुष्टि का
जरिया बनकर उभरती हैं
पूंजी को चुनौती देती
हमारी कविताएं
धीरे-धीरे तब्दील होती जाती हैं
हमारी सबसे बड़ी पूंजी में
व्यवस्था के ख़िलाफ़ लिखी
अपनी इन्हीं कविताओं के जरिए
हम इसी व्यवस्था में
बनाना चाहते हैं अपना मुकाम
किसी प्रकाशक
या मूर्धन्य आलोचक की कृपा-दृष्टि
को टटोलते हम
श्रेष्ठ कवियों की गिनती में
शामिल हो जाना चाहते हैं

सत्य की उपलब्धि के नाम पर

सत्य
कहते हैं ख़ुद को
स्वयं उद्‍घाटित नहीं करता
सत्य हमेशा
चुनौती पेश करता है
अपने को ख़ोज कर पा लेने की
और हमारी जिज्ञासा में अतृप्ति भर देता है
कहते हैं सत्य बहुत ही विरल है
उसे खोजना अपने आप में एक काम होता है
वह मथ ड़ालता है सारी बनी-बनाई परिपाटियों को
दरअसल
सत्य कभी एक साथ पूरा नहीं खुलता
वह उघड़ता है परत दर परत
और एक यात्रा चल निकलती है
अनंत सी, अनवरत
यह अलग बात है कि
हममें से अधिकतर पर
गुजरता है यह दुरूह और दुष्कर
उसे ही सत्य मान लेते हैं
जो मिल जाता हैं इधर-उधर
हारे हुए हम
बुन लेते हैं चौतरफ़ चारदीवारियां
सचेत और चौकस होते जाते हैं
रूढ़ और कूपमण्डूक
भ्रमों की आराधना को अभिशप्त
यही बाकी बचता है
हमारे पास
सत्य की उपलब्धि के नाम पर

मैं पुरुष खल कामी

मैं पुरुष हूँ
एक लोहे का सरिया है
सुदर्शन चक्र सा यह
बार-बार लौट आता है, इतराता है
यह भी मैं ही हूँ
आदि-अनादि से, हजारों सालों से
मैं ही हूँ जो रहा परे सभी सवालों से
मैं सदा से हूँ
मैं अदा से हूँ
मैं ही दुहते हुए गाय के स्तनों को
रच रहा था अविकल ऋचाएं
मैं ही स्खलित होते हुए उत्ताप में
रच रहा था पुराण गाथाएं
मैं ही रखने को अपनी सत्ता अक्षुण्ण
गढ़ रहा था अनुशासन स्मृतियां
मैं ही स्वर्गलोक के आरोहण को
गढ़ रहा था महाकाव्य-कृतियां
मैं ही था हर जगह
शासन की परिभाषाओं में
शोर्य की गाथाओं में
मैं ही था स्वर्ग के सिंहासन पर
अश्वमेधी यज्ञों पर
चतुर्दिक लहराते दंड़ों पर
मैं ही निष्कासनों का कर्ता था
मैं ही आश्रमों-आवासों में शील-हर्ता था
मैंनें ही रास रचाए थे
मैंने ही काम-शास्त्रों में पात्र निभाए थे
मै ही क्षीर-सागर में पैर दबवाता हूँ
मैं अपनी लंबी आयु के लिए व्रत करवाता हूँ
मैं ही उन अंधेरी गंद वीथियों में हूँ
मैं ही इन इज्ज़त की बंद रीतियों में हूँ
मैं ही परंपराएं चलाती खापों में हूँ
गर्दन पर रखी खटिया की टांगों में हूँ
ये मेरे ही पैर हैं जिसमें जूती है
ये मेरी ही मूंछे है जो कपाल को छूती हैं
ये मेरा ही शग़ल है, वीरता है
ये मेरा ही दंभ है जो सलवारों को चीरता है
कि नरक के द्वार को
मैं बंद कर सकता हूँ तालों से
मैं पत्थरों से इसे पाट सकता हूँ
मैं इसे नाना तरीक़ों से कील सकता हूँ
मैं ब्रह्म हूँ, मैं नर हूँ
मैं अजर-अगोचर हूँ
मेरी आंखों में
हरदम एक भूखी तपिश है
मेरी उंगलियों में
हरदम एक बेचैन लरजिश है
मेरी जांघों में
एक लपलपाता दरिया है
मेरे हाथों में
एक दंड है, एक सरिया है
मैं सदा से इसी सनातन खराश में हूँ
मैं फिर-फिर से मौकों की तलाश में हूँ…

कि ऐसी दुनिया नहीं चाहिए हमें

आओ मेरे बच्चों कि ये रात बहुत भारी है
आओ मेरे बच्चों कि बेकार परदादारी है
मैं हार गया हूँ अब ये साफ़ कह देना चाहता हूँ
सीने से तुमको लिपटा कर सो जाना चाहता हूँ

मेरी बेबसी, बेचारगी, ये मेरे डर हैं
कि हर हत्या का गुनाह मेरे सर है
मेरी आंखों में अटके आंसुओं को अब बह जाने दो
उफ़ तुम्हारी आंखों में बसे सपने, अब रह जाने दो
आओ कि आख़िरी सुक़ून भरी नींद में डूब जाएं
आओ कि इस ख़ूं-आलूदा जहां से बहुत दूर जाएं
काश कि यह हमारी आख़िरी रात हो जाए
काश कि यह हमारा आख़िरी साथ हो जाए
कि ऐसी सुब‍हे नहीं चाहिए हमें
कि ऐसी दुनिया नहीं चाहिए हमें
जहां कि नफ़रत ही जीने का तरीक़ा हो
जहां कि मारना ही जीने का सलीका हो
इंसानों के ख़ून से ही जहां क़ौमें सींची जाती हैं
लाशों पर जहां राष्ट्र की बुनियादें रखी जाती हैं
ये दुनिया को बाज़ार बनाने की कवायदें
इंसानियत को बेज़ार बनाने की रवायतें
ये हथियारों के ज़खीरे, ये वहशत के मंज़र
ये हैवानियत से भरे, ये दहशत के मंज़र
जिन्हें यही चाहिए, उन्हें अपने-अपने ख़ुदा मुबारक हों
जिन्हें यही चाहिए. उन्हें ये रक्तरंजित गर्व मुबारक हों
जिन्हें ऐसी ही चाहिए दुनिया वे शौक से बना लें
अपने स्वर्ग, अपनी जन्नत वे ज़ौक़ से बना लें
इस दुनिया को बदल देने के सपने, अब जाने दो
मेरे बच्चों, मुझे सीने से लिपट कर सो जाने दो
कि ऐसी सुब‍हे नहीं चाहिए हमे
कि ऐसी दुनिया नहीं चाहिए हमें

लड़े बिना जीना मुहाल नहीं

लोग लड़ रहे हैं
लड़े बिना जीना मुहाल नहीं है
गा रही थी एक बया
घौंसला बुनते हुए
कुछ चींटियां फुसफुसा रही थीं आपस में
कि जितने लोग होते है
गोलियां अक्सर उतनी नहीं हुआ करतीं
जब-जब ठानी है हवाओं ने
गगनचुंबी क़िले ज़मींदोज़ होते रहे हैं
एक बुजुर्ग की झुर्रियों में
यह तहरीर आसानी से पढ़ी जा सकती है
लड़ कर ही आदमी यहां तक पहुंचा है
लड़ कर ही आगे जाया जा सकता है
यह अब कोई छुपाया जा सकने वाला राज़ नहीं रहा
लोग लड़ेंगे
लड़ेंगे और सीखेंगे
लड़कर ही यह सीखा जा सकता है
कि सिर्फ़ पत्तियां नोंचने से नहीं बदलती तस्वीर
लोग लड़ेंगे
और ख़ुद से सीखेंगे
झुर्रियों में तहरीर की हुई हर बात
जैसे कि
जहरीली घास को
समूल नष्ट करने के अलावा
कोई और विकल्प नहीं होता

शैतानी रूहें भी कांपती है

वे समझते थे
हमारी समझ में, हमारे ख़ून में
वे छाये हुए हैं चौतरफ़
वे समझते थे
वे हमें समेट चुके हैं अपने-आप में
कि हम अपनी-अपनी चौहद्दियों में
कै़द हैं और मस्त हैं
वे समझते थे कि हर जानिब उनका ज़ोर है
वे समझते थे कि हर स्मृति में उनका ख़ौफ़ है
वे हैं सरमाया हर शै का
वे हैं जवाब हर सवाल का
वे समझते थे कि हमारी ज़िंदगी
उनके रंगों में ही भरपूर है
कि हमारे शरीर गुलाम रहने को मजबूर हैं
कि हमारी रूहें उनके मायाजाल में उलझी हैं
कि मुक्ति के हर वितान अब नासमझी है
गो बात अब बिगड़-बिगड़ जाती है
कि सुनते हैं
शैतानी रूहें भी कांपती है
और हैलीकॉप्टर गोलियां बरसाने लगते हैं
और बम-वर्षक विमान उड़ान भरने लगते हैं
और आत्माओं को भी टैंकर रौंदने लगते हैं
यह विरोध के भूमंडलीकरण का दौर है
वे इसे ख़ौफ़ के भूमंडलीकरण में
तब्दील कर देना चाहते हैं
वे समझते हैं
कि हमें कुचला जा सकता है कीड़ो-मकौड़ो की तरह
हा – हा – हा – हा
अपनी हिटलरी मूंछौं के बीच से
चार्ली चैप्लिन
हँस उठते हैं बेसाख़्ता

उम्मीद अभी बाकी है

तपती हुई लंबी दोपहरों में
कुदालें खोदती हैं हथौड़ा दनदनाता है
गर्म लू के थपेड़ों को
पसीना अभी भी शीतल बनाता है
पेड़ों के पत्ते सरसराते हैं
उनके तले अभी छाया मचलती है
घर लौटती पगडंडियों पर
अभी भी हलचल फुदकती है
चूल्हों के धुंए की रंगत में
अभी भी शाम ढलती है
मचलते हैं अभी गीत होठों पर
कानों में शहनाई सी घुलती है
परिन्दों का कारवां अभी
अपने बसेरों तक पहुंचता है
आंगन में रातरानी का पौधा
अभी भी ख़ूब महकता है
दूर किसी बस्ती में
एक दिये की लौ थिरकती है
एक मायूसी भरी आंख में
जुगनु सी चमक चिलकती है
लंबी रात के बाद अभी भी
क्षितिज पर लालिमा खिलती है
धरती अभी भी अलसाई सी
आसमां के आगोश में करवट बदलती है
मां के आंचल से निकलकर
एक बच्चा खिलखिलाता है
अपने पिता की हंसी को पकड़ने
उसके पीछे दौड़ता है
एक कुत्ता भौंकता है
एक तितली पंख टटोलती है
एक मुस्कुराहट लब खोलती है
अभी भी आवाज़ लरजती है
अभी भी दिल घड़कता है
आंखों की कोर पर
अभी भी एक आंसू ठहरता है
माना चौतरफ़
नाउम्मीदियां ही हावी हैं
पर फिर भी मेरे यार
उम्म्मीद अभी बाकी है
चीखों में लाचारगी नहीं
जूझती तड़प अभी बाकी है
मुद्राओं में समर्पण नहीं
लड़ पाने की जुंबिश अभी बाकी है
उम्मीद अभी बाकी है

मैंने जद्दोजहद की हर पल से

मैंने जद्दोजहद की हर पल से
और हार जाने से पहले
खू़ने-ज़िगर में डूबी उँगलियों से
फ़िज़ां में उकेरे कुछ ज़ज़्बात
वे हर दिल में गहरे पैठ गए
और कविता में मुन्तकिल[1] हो गए
मैंने चाँद देखा
फिर महबूबा की आँखों की गहराई
मेरे दिल में हर शै के लिए
बेपनाह मुहब्बत पैदा हो गई
मैंने कैक्टस से चुने कुछ काँटे
और उन्हें चूम लिया
वे खिलकर गुलाब हो गए
और कविता में मुन्तकिल हो गए
मैंने आफ़तज़दा कारवाँ को
पानी पिलाया और राह दिखाई
इसी सबब मुझे ज़ंजीरों से सजाया गया
और एक गोरकन[2] को नशे में डुबोकर
ज़बरदस्ती तैयार किया गया
जब तक क़ब्र खुदती
मैंने बेतकल्लुफ़ी से हंसी लुटाई
और कु़र्बानगाह[3] में फुसफुसाकर
अपने आप से की बेबाक गुफ़्तगू
वह हर ख़ित्ते[4] में गूँज गई
और कविता में मुन्तकिल हो गई
मैं ज़मीं के इस सिरे से दूसरे सिरे तक
बोने में जुटा हूँ तमाम कविताएँ
जिन्हें नज़ाकत से जिया है मैंने
जैसे ही वे अँकुराएँगी
एक लाल नदी
सैलाब आते दरिया में तब्दील हो जाएगी ।

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