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ज़िया जालंधरी की रचनाएँ

क्या सरोकार अब किसी से मुझे

क्या सरोकार अब किसी से मुझे
वास्ता था तो था तुझी से मुझे

बे-हिसी का भी अब नहीं एहसास
क्या हुआ तेरी बे-रूख़ी से मुझे

मौत की आरज़ू भी कर देखो
क्या उम्मीदें थीं जिंदगी से मुझे

फिर किसी पर न ए‘तिबार आए
यूँ उतारो न अपने जी से मुझे

तेरा ग़म भी न हो तो क्या जीना
कुछ तसल्ली है दर्द ही से मुझे

कितना पुरकार हो गया हूँ कि था
वास्ता तेरी सादगी से मुझे

कर गए किस क़दर तबाह ‘ज़िया’
दुश्मन अंदाज़-ए-दोस्ती से मुझे

जब उन्ही को न सुना पाए ग़म-ए-जाँ अपना

जब उन्ही को न सुना पाए ग़म-ए-जाँ अपना
चुप लगी ऐसी कि ख़ुद हो गए ज़िंदाँ अपना

ना-रसाई का बयाबाँ है कि इरफ़ाँ अपना
इस जगह अहरमन अपना है न यज़्दाँ अपना

दम की मोहलत में है तस्ख़ीर-ए-मह-ओ-मेहर की धुन
साँस इक सिलसिला-ए-ख़्वाब-ए-दरख़्शाँ अपना

तलब उस की है जो सरहद-ए-इम्काँ में नहीं
मेरी हर राह में हाइल है बयाबाँ अपना

कैसी दूरी उसी शोले की है ज़ौ मेरा जमाल
जिस से ताबिदा रहा दीदा-ए-गिर्यां अपना

अर्मुंगाँ हैं तिरी चाहत के शगुफ़्ता लम्हे
बे-ख़ुदी अपनी शब अपनी मह-ए-ताबाँ अपना

इस तरह अक्स पड़ा तेरे शफ़क़ होंटों का
सुब्ह-ए-गुलज़ार हुआ सीना-ए-वीराँ अपना

ऐसी घड़ियाँ कई मुझ ऐसों पे आई होंगी
वक़्त ने जिन से सजा रक्खा है ऐवाँ अपना

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