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याहि मत जानौ है सहज कहै रघुनाथ 

याहि मत जानौ है सहज कहै रघुनाथ,
अति ही कठि

न रीति निपट कुढँग की ।
याहि करि काहू काहू भाँति सो न कल पायो ,
कलपायो तन मन मति बहु रँग की ।
औरहू कहौँ सो नेकु कान दै के सुन लीजै ,
प्रगट कही है बात बेदन के अँग की ।
तब कहूँ प्रीति कीजै पहिले ही सीख लीजै ,
बिछुरन मीन की औ मिलन पतँग की ।

रघुनाथ का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

मेघ जहाँ-तहाँ दामिनी है अरु दीप जहाँ-तहाँ जोति है भातें

मेघ जहाँ-तहाँ दामिनी है अरु दीप जहाँ-तहाँ जोति है भातें ।
केस जहाँ-तहाँ माँग सुबेस है है गिरि गेरू तहाँ रंग रातें ।
मोहन सों मिलिबे को बलाल्यों मैं रघुनाथ कहौ हठि यातें ।
होत नयो नहीं आयो चल्यो रंग साँवरे गोरे को संग सदा ते।

रघुनाथ का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

लखो अपनी अँखियांन सोँ मैँ जमुना तट आजु अन्हात मे भोर

लखो अपनी अँखियांन सोँ मैँ जमुना तट आजु अन्हात मे भोर ।
लगे दृग रावरे सोँ उनके लगे रावरे के उनके मुख ओर ।
दुरावति हौ सहवासिनि सोँ रघुनाथ वृथा बतियान के जोर ।
सुनो जग मेँ उपखान प्रसिद्ध है चोरन की गति जानत चोर ।

रघुनाथ का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

ऐसे बने रघुनाथ कहै हरि काम कला छबि के निधि गारे

ऐसे बने रघुनाथ कहै हरि काम कला छबि के निधि गारे ।
झाँकि झरोखे सो आवत देखि खड़ी भई आनि कै आपने द्वारे ।
रीझी सरूप सौँ भीजी सनेह योँ बोली हरे रस जाखर भारे ।
ठाढ़ हो तोँसो कहौँगी कछू अरे ग्वाल बड़ी बड़ी आँखिन वारे ।

रघुनाथ का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

गावत बाँदर बैठ्यो निकुञ्ज मेँ ताल समेत मैँ आंखिन पेखे

गावत बाँदर बैठ्यो निकुञ्ज मेँ ताल समेत मैँ आंखिन पेखे ।
तेँ जो कह्यो यह सो सुनि कै अपने मन मेँ इन साँच न रेखे ।
यामे न झूठ कछू रघुनाथ है ब्रम्ह सनातन माया के लेखे ।
गाँव में जायके मैँ हूँ बछानि को बैलहिँ वेद पढ़ावत देखे ।

रघुनाथ का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

बहु नायक हौ सब लायक हौ सब प्यारिन के रस को लहिये

बहु नायक हौ सब लायक हौ सब प्यारिन के रस को लहिये ।
रघुनाथ मनैँ नहिँ कीजै तुम्हे जिय बात जु है सु सही कहिये ।
यह माँगति हौँ पिय प्यारे सदा सुख देखिबे ही को हमैँ चहिये ।
इतने के लिये इत आइए प्रात रुचै जहाँ रात तहाँ रहिये ।

रघुनाथ का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

औधि आधी रात की दै आपनो बतायो गेह

औधि आधी रात की दै आपनो बतायो गेह ,
देखि अभिलाष मिलिबे को सुखदायके ।
भूमि मे ही कैयो डारि तोसक बिछौना कीन्हेँ ,
आस पास धर दीन्हेँ चौसर बनाय के ।
पानी पान अतर नजीक सब राखे लाय ,
गूजरेटी रघुनाथ औरौ चित चाय के ।
खोलि राखी खिरकी बुझाइ राखे दीप द्वार ,
लाइ राखे नैन कान आहट मेँ पाय के ।

रघुनाथ का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

देखिबे को दुति, पूनो के चंद की

देखिबे को दुति, पूनो के चंद की, हे ‘रघुनाथ श्री राधिका रानी।
आई बोलाय के, चौंतरा ऊपर, ठाढी भई, सुख सौरभ सानी॥

ऐसी गई मिलि, जोन्ह की जोति में, रूप की रासि न जाति बखानी।
बारन तें, कछु भौंहन तें, कछु नैनन की छवि तें पहिचानी।

देखिए देखि या ग्वारि गँवारि की

देखिए देखि या ग्वारि गँवारि की, नेकुी नहीं थिरता गहती है।
आनंद सों ‘रघुनाथ पगी-पगी, रंगन सों फिरतै रहती हैं॥

कोर सों छोर तरयना के छ्वै करि, ऐसी बडी छबि को लहती हैं।
जोबन आइबे की महिमा, ऍंखियाँ मनौ कानन सों कहती हैं॥

ऐसे बने ‘रघुनाथ कहै हरि

ऐसे बने ‘रघुनाथ कहै हरि, काम कलानिधि के मद गारे।
झाँकि झरोखे सों, आवत देखि, खडी भई आइकै आपने द्वारे॥

रीझी सरूप सौं भीजी सनेह, यों बोली हरैं, रस आखर भारे।
ठाढ हो! तोसों कहौंगी कछू, अरे ग्वाल, बडी-बडी ऑंखिनवारे॥

दै कहि बीर! सिकारिन को

दै कहि बीर! सिकारिन को, इहि बाग न कोकिल आवन पावै।
मूँदि झरोखनि मंदिर के, मलयानिल आइ न छावन पावै॥

आए बिना ‘रघुनाथ बसंत को, ऐबो न कोऊ सुनावन पावै।
प्यारी को चाहौ जिवाओ धमारा तौ गाँव को कोऊ न गावन पावै॥

 

केसरि सों पहिले उबटयो ऍंग

केसरि सों पहिले उबटयो ऍंग, रंग लस्यो जिमि चम्पकली है।
फेरि गुलाब के नीर न्हवाय, पिन्हाई जो सारी सुरंग लली है॥

नाइन या चतुराइन सौं, ‘रघुनाथ करी बस गोप लली है।
पारत पाटी कह्यो फिरिय यों, ब्रजराज सों आज मिलौ तौ भली है॥

 

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