रणजीत की रचनाएँ

जूझती प्रतिमा

नहीं रहा मैं अपने पथ पर आज अकेला
क्योंकि तुम्हारी भी आँखों में
कल के विकल स्वप्न जागे हैं
तुमने भी निर्मम होकर, अतीत के
तोड़े सभी मोह-तागे हैं
स्मृतियों में जीना तुमने भी छोड़ दिया है
और धधकते वर्तमान का
तुमने भी विष-पान किया है
ताकि भविष्यत् के अपने सपनों को
तुम भी सुधा-सिक्त कर पाओ
समझ गई हो तुम भी, इस मानव-समाज के
अनगढ़ शिला-खंड के भीतर
मूर्तिमान होने को जूझ रही जो
प्रतिमा –
सब पाषाणी बन्ध काट कर
उसको बाहर लाना होगा
मिट्टी की परतों में दबी हुई छटपटा रही जो
एक अजन्मी दुनिया की उस नई पौध को
हृदय-रक्त से सींच हमें उमगाना होगा।
सहमी-सी नज़रों से पर इस तरह न देखो
सपनों के रखवाले केवल हम ही नहीं हैं
हम पर ही उन्माद नहीं छाया भविष्य का
जगती के सुख-दुख के मस्ले
सिर्फ़ हमारे ही दिल पर के भार नहीं हैं
हम-मंज़िल हैं बहुत हमारे
जो नयनों में सपन
दिलों में तपन
सिरों पर कफ़न बाँध चलते हैं।
आओ हम भी जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाएँ
अँधियारे के दैत्यों से जो लड़े जा रहे
नवयुग का ध्वज लिए हाथ में बढ़े जा रहे
रक्त-बीज बो-बो कर जो आगामी कल को
लाल किरन से मढ़े जा रहे
उन लोक-हरावल में चलने वालों से क़दम मिलाएँ
ताकि हमारी सबकी आँखों में जो छाए
वे संघर्षरत स्वप्न कभी सच्चे बन पाएँ ।

शब्द-सैनिकों से

जाओ !
ओ मेरे शब्दों के मुक्ति-सैनिको, जाओ !
जिन-जिन के मन का देश अभी तक है ग़ुलाम
जो एकछत्र सम्राट स्वार्थ के शासन में पिस रहे अभी हैं सुबह-शाम
घेरे हैं जिनको रूढ़ि-ग्रस्त चिन्तन की ऊँची दीवारें
जो बीते युग के संस्कारों की सरमायेदारी का शोषण
सहते हैं बेरोकथाम
उन सब तक नई रोशनी का पैग़ाम आज पहुँचाओ
जाकर उनको इस क्रूर-दमन की कारा से छुड़वाओ !
जाओ,
ओ मेरे शब्दों के मुक्ति-सैनिको, जाओ !

 

कभी-कभी

कभी-कभी डर-सा लगता है
इस पीले प्रेतों की बस्ती में रहते-रहते ही
प्रेत न मैं ख़ुद ही हो जाऊँ
उन सब ज़िन्दा इन्सानों की तरह जिन्होंने
पहले स्वर में –
मानवता की विजय-पताका फहराई थी
किन्तु जिन्हें फुसला-फुसला कर
चाँदी के इस चक्रव्यूह में लाकर
इन प्रेतों ने
आज प्रेत ही बना लिया है ।

यों तो अपने पर मुझको विश्वास बहुत है, लेकिन
आसपास की स्थितियों के प्रभाव को भी
झुठलाना मुश्किल है
ठीक है –
इन्सानियत के प्यार की यह वृत्ति कुछ हल्की नहीं है
कभी-कभी पर
नोटों के काग़ज भी कहीं अधिक भारी हो जाया करते हैं

मन के गहरे विश्वासों को
तन की भूख हिला देती है
रोटी की छोटी सी क़ीमत भी कभी-कभी
इन बड़े-बड़े आदर्शों को रेहन रख कर
मिट्टी में गर्व मिला देती है ।

यदि ऐसा हो कभी:
कि डस ले पूंजी का अजगर मुझको भी
प्रेतों के हाथों मैं भी बिक जाऊँ
मानवीय क्षमता, समता के गीत छोड़ कर
प्रेतों का ही यशोगान करने लग जाऊँ
तो ओ छलना से बचे हुए ज़िन्दा इन्सानो !
मुझको मेरे वे गीत सुनाना
जो मैंने कल प्रेतों को इन्सान बनाने को लिक्खे थे
प्रेतों में सोया ईमान जगाने को लिक्खे थे

एक और बिकते आदम पर
एक और बनती छाया पर
उन गीतों की शक्ति तौलना
हो सकता है
उनकी गर्म साँस फिर मेरे
मुर्दा मन में प्राण फूँक दे
किरणों की अंगुलियाँ उनकी
चाँदी की पर्तों में दबे पड़े
इन्सानी बीजों को अंकुर दे जाएँ
फिर से शायद
भटका साथी एक तुम्हारा राह पकड़ ले
और तुम्हारा परचम लेकर
लड़ने को प्रस्तुत हो जाए –

कभी-कभी डर-सा लगता है ।

लड़ाई जारी रहेगी

प्यार और बग़ावत के मैं गीत लिखता हूँ
हैवानियत की हार और इंसानियत की जीत लिखता हूँ
लड़ाई ज़ारी रहेगी जब तक ‘इंसान’ इंसान नहीं बनता
इसलिये अपना नाम अभी ‘रणजीत’ लिखता हूँ ।

 

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