लक्ष्मीनाथ परमहंस की रचनाएँ

नाथ हो कोटिन दोष हमारो

नाथ हो कोटिन दोष हमारो ।
कहाँ छिपाऊँ, छिपत ना तुमसे, रवि ससि नैन तिहारौ ।। टेक ।।
जल, थल, अनल, अकास, पवन मिलि, पाँचो है रखवारो ।
पल-पल होरि रहत निसी बासर तिहुँ पुर साँझ सकारो ।।
जागत, सोवत, उठत, बैठत करत फिरत व्यवहारो ।
रहत सदा संग, साथ न छोड़त, काल पुरुष बरियारो ।।
बाहर भीतर बैठि रह्यो है, घट-घट बोलनि हारो ।
दुख-सुख पाप-पुन्य के मालिक, निज जन जानि उबारो ।।
कहाँ लाज करि नारि नाह सों जो देखत तन सारो ।
‘लक्ष्मीपति’ के स्वामी केशव भव-नद पार उतारो ।।

मोहन बिनु कौन चरैहैं गैया 

मोहन बिनु कौन चरैहैं गैया ।
नहिं बलदेव नहिं मनमोहन रोवहिं यशोदा मौया ।
को अब भोरे बछरू खोलिहैं को जैहैं गोठ दुहैया ।
एकसरि नंद बबा क्या करिहिं दोसरो न काउ सहैया ।
को अब कनक कटोरा भरि-भरि माखन क्षीर लुटैया ।
को अब नाचि-नाचि दधि खैहैं को चलिहैं अधपैया ।
को अब गोप सखा संग खेलिहैं को ब्रज नागरि हँसैया ।
को गोपियन के चीर चोरैहैं को गहि मुरली बजैया ।
को अब इत उत तैं घर ऐहैं बबा-बबा गोहरैया ।
‘लक्ष्मीपति’ गोपाल लाल गुण सुमरि-सुमरि पछतैया ।

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