श्रद्धा जैनकी रचनाएँ

तुम्हें भी आँख में तब क्या नमी महसूस होती है ? 

ख़ुशी बेइंतहा जब भी कभी महसूस होती है
तुम्हें भी आँख में तब क्या नमी महसूस होती है ?

कभी फुरकत भी जाँ परवर लगे, होता है ऐसा भी
कभी कुर्बत में कुर्बत की कमी महसूस होती है

मिले शोहरत, मिले दौलत, तमन्ना कोई पूरी हो
ख़ुशी कैसी भी हो, बस दो घड़ी महसूस होती है

कोई अल्हड़ सी लड़की प्यार के क़िस्से सुनाये तो
मुझे भी अपने दिल में गुदगुदी महसूस होती है

खिलें कुछ फूल सहरा में तमन्ना है यही दिल की
मगर ये फ़िक्र मुझको सरफिरी महसूस होती है

उसे आदत है मुझको छेड़ने और तंग करने की
मुझे ये दिल्लगी दिल की लगी महसूस होती है

शिकायत सुनके वो चुपचाप रहता है मगर ‘श्रद्धा’
लबों पे उसके हल्की कँपकँपी महसूस होती है

न मंज़िल का, न मकसद का , न रस्ते का पता है 

न मंज़िल का, न मकसद का , न रस्ते का पता है
हमेशा दिल किसी के पीछे ही चलता रहा है

थे बाबस्ता उसी से ख्वाब, ख्वाहिश, चैन सब कुछ
ग़ज़ब, अब नींद पर भी उसने कब्ज़ा कर लिया है

बसा था मेरी मिट्टी में , उसे कैसे भुलाती
मगर देखो न आखिर ये करिश्मा हो गया है

मोहब्बत बेज़ुबां है, बेज़ुबाँ थी , सच अगर है
बताओ, प्य़ार क्यूँ किस्सा-कहानी बन गया है ?

सभी शामिल है उसके चाहने वालों में श्रद्धा ”
कोई तो राज़ है इसमें , कि वो सचमुच भला है

समझ कर हमने वादा कर लिया है 

अभी से खुद को आधा कर लिया है
बिछड़ने का इरादा कर लिया है

मोहब्बत से भी हम उकता गए हैं
ये सौदा भी ज़ियादा कर लिया है

भला वादे निभाये जाते हैं क्या ?
समझ कर हमने वादा कर लिया है

ये दुनिया आज भी रंगीन ही है
हम ही ने खुद को सादा कर लिया है

मुआफ़ उसको नहीं करना था लेकिन
अब इस दिल को कुशादा कर लिया है

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