सुदर्शन प्रियदर्शिनी की रचनाएँ

अंधेरों के नाम

यह रात का
बचा खुचा अंधेरा
है या मेरे मन
का घटाटोप
जो खिङकी की
चौखट पर
जम कर बैठा
अन्दर झांक
रहा है

खिङकी की
सलवटों के
बाहर बिछी
हैं न जाने
कितनी
अनकही
अनब्याही
अनाहूत
विवशतांए
और आकांशायें
जिन पर
बिखर रहे हैं
गहरी पावस से
शिथिलित
अपने जनों के
आंसू

आंसू
पत्धर
बन कर
चिपक गये हैं
दरीचों के
बीचो बीच
दीमक से
चाटते रहे हैं
घर की
हर दीवार
और चौखट
खिङकी खोल भी
क्या होगा

आवाज दो

आज तुम
इस शाम
मुझे
इस अंधियारे
में उसी नाम
से पुकारो
जिस नाम से
पहली बार
तुम ने
बुलाया था
ताकि मैं
वही पुरानी
हूक में
डूब कर
सारा मालिन्य
धो कर
तुम्हारी आवाज पर
फिर से
लौट पाउं

दीमक

आशाओं
और अपेक्षाओं
के रथ पर
सवार
रहते हैं हम
नही जानते
किसी ने
पहियों को
दीमक चटा
रखी है

दंभ

चटपट
खतम हो जाता है
सौहार्द
आत्मीयता
और अपनापन
जब निकल
आता है
दांत निपोरे
असली स्वार्थ
स्‍वेच्‍छा और
दंभ

अहंकार

चौकड़ी मार कर
बैठा रहता है
मेरे ऊपर
मेरा अहंकार
चमगादड़-सा लिपट जाता है
ज्यों-त्यों हर बार

कुछ न होने पर ही
चढ़ता है यह नशा
खाली चना बाजे घना का अवतार
कैसे उतारू या हटकूँ
इसे बार-बार

काश!
मार सकती मैं
इसे दुल्लती
फिर दुत्कारती इसे
यह घायल कुत्ते-सा
रिरियाता चूँ-चूँ करता
घुस जाता किसी और घर
छोड़ कर मेरा मन द्वार।

चाँद

खिडकी के रास्ते
उस दिन
चाँद मेरी देहली पर
मीलों की दूरी नापता
तुम्हें छू कर आया
बैठा
मेरी मुंडेर पर
मैंने हथेली में भीच कर
माथे से लगा लिया।

जनम जनम

सदियों से
हम रहते आए हैं।
किसी न किसी में।
सूरत बन कर
या सीरत बन कर…
बाप का बेटा
बेटे का बेटा
और भी
हमारी चाहना
बढ़ती जाती है…
जीने की…
इच्छा मरती नहीं
आजन्म
फिर मोक्ष का
प्रश्न कैसा।

देहरी

तुम्हारी
देहरी के अन्दर की यातनाएँ
दुर्योधन की बिछी बिसातें
टेढी चाल चलने वाले
मोहरों की तरह
आज भी
युधिष्ठिर को हराती हैं

वही बेढंगे सवाल
वही मेरे वजूद को
मेरे कपड़ों के दर से
बेधती हुई निगाहें

मेरे भावों
और अभावों
की उड़ती हुई खिल्ली
मुझे बाहर के झझांवतों से
कहीं ज्यादा सालती है।

धीरे धीरे

धीरे-धीरे
घर करती जाती हैं
सम्पदाएँ
पोर-पोर
रग-रग और
स्पन्दन में भी।

भूल जाता है
रिश्ते आदमी

नहीं रह पाता
वह अपनी
माँ की कांख से
बँधा शिशु
बालक होने के बाद।

भटकन

इतना मायावी तांत्रिक जाल
इतना भक भक उजाला
इतना भास्कर देय तेज
इतनी भयावह
हरियाली
इतना ताम झाम
इतने मुँह बाये
खडे सगे संबधी
पहले से ही
तय रास्ते
पगडडियाँ
और छोड देता है
वह नियन्ता
हमें सूरदास
की तरह
राह टटोलने।

 

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