‘हफ़ीज़’ जालंधरी की रचनाएँ

ग़ज़लें

आ ही गया वो मुझ को लहद में उतारने 

आ ही गया वो मुझ को लहद में उतारने
ग़फ़लत ज़रा न की मिरे ग़फ़लत-शेआर ने

ओ बे-नसीब दिन के तसव्वुर ये ख़ुश न हो
चोला बदल लिया है शब-ए-इंतिज़ार ने

अब तक असीर-ए-दाम-ए-फ़रेब-ए-हयात हूँ
मुझ को भुला दिया मिरे परवरदिगार ने

नौहा-गारों को भी है गला बैठने की फ़िक्र
जाता हूँ आप अपनी अजल को पुकारने

देखा न कारोबार-ए-मोहब्बत कभी ‘हफ़ीज’
फ़ुर्सत का वक़्त ही न दिया कारोबार ने

अब तो कुछ और भी अँधेरा है

अब तो कुछ और भी अँधेरा है
ये मिरी रात का सवेरा है

रह-ज़नों से तो भाग निकला था
अब मुझे रह-बरों ने घेरा है

आगे आगे चलो तबर वालो
अभी जंगल बहुत घनेरा है

क़ाफ़िला किस की पैरवी में चले
कौन सब से बड़ा लुटेरा है

सर पे राही की सरबराही ने
क्या सफाई का हाथ फेरा है

सुरमा-आलूद ख़ुश्क आँसुओं ने
नूर-ए-जाँ ख़ाक पर बिखेरा है

राख राख उस्तख़्वाँ सफ़ेद सफ़ेद
यही मंज़िल यही बसेरा है

ऐ मिरी जान अपने जी के सिवा
कौन तेरा है कौन मेरा है

सो रहो अब ‘हफीज़’ जी तुम भी
ये नई ज़िंदगी का डेरा है

अगर मौज है बीच धारे चला चल 

अगर मौज है बीच धारे चला चल
वगरना किनारे किनारे चला चल

इसी चाल से मेरे प्यारे चला चल
गुज़रती है जैसे गुज़ारे चला चल

तुझे साथ देना है बहरूपियों का
नए से नया रूप धारे चला चल

ख़ुदा को न तकलीफ़ दे डूबने में
किसी नाख़ुदा के सहारे चला चल

पहुँच जाएँगे क़ब्र में पाँव तेरे
पसारे चला चल पसारे चला चल

ये ऊपर का तबक़ा ख़ला ही ख़ला है
हवा ओ हवस के ग़ुबारे चला चल

डुबोया है तू ने हया का सफ़ीना
मिरे दोस्त सीना उभारे चला चल

मुसलसल बुतों की तमन्ना किए जा
मुसलसल ख़ुदा को पुकारे चला चल

यहाँ तो बहर-ए-हाल झुकना पड़ेगा
नहीं तो किसी और द्वारे चला चल

तुझे तो अभी देर तक खेलना है
इसी में तो है जीत हारे चला चल

न दे फुर्सत-ए-दम-ज़दन ओ ज़माने
नए से नया तीर मारे चला चल

शब-ए-तार है ता-ब-सुब्ह-ए-क़यामत
मुकद्दर है गर्दिश सितारे चला चल

कहाँ से चला था कहाँ तक चलेगा
चला चला मसाफ़त के मारे चला चल

बसीरत नहीं है तो सीरत भी क्यूँ हो
फ़कत शक्ल ओ सूरत सँवारे चला चल

‘हफीज’ इस नए दौर में तुझ को फ़न का
नशा है तो प्यारे उतारे चला चल

दिल अभी तक जवान है प्यारे

दिल अभी तक जवान है प्यारे
किसी मुसीबत में जान है प्यारे

तू मिरे हाल का ख़याल न कर
इस में भी एक शान है प्यारे

तल्ख़ कर दी है ज़िंदगी जिस ने
कितनी मीठी है ज़बान है प्यारे

वक़्त कम है न छेड़ हिज्र की बात
ये बड़ी दास्तान है प्यारे

जाने क्या कह दिया था रोज़-ए-अज़ल
आज तक इम्तिहान है प्यारे

हम हैं बंदे मगर तिरे बंदे
ये हमारी भी शान है प्यारे

नाम है इस का नासेह-ए-मुश्फ़िक़
ये मिरा मेहरबान है प्यारे

कब किया मैं ने इश्क़ का दावा
तेरा अपना गुमान है प्यारे

मैं तुझे बे-वफ़ा नहीं कहता
दुश्मनों का बयान है प्यारे

सारी दुनिया को है ग़लत-फ़हमी
मुझ पे तो मेहरबान है प्यारे

तेरे कूचे में है सुकूँ वर्ना
हर ज़मीं आसमान है प्यारे

ख़ैर फरियाद बे-असर ही सही
ज़िंदगी का निशान है प्यारे

शर्म है एहतिराज़ है क्या है
पर्दा सा दरमियान है प्यारे

अर्ज़-ए-मतलब समझ के हो न ख़फ़ा
ये तो इक दास्तान है प्यारे

जंग छिड़ जाए हम अगर कह दें
ये हमारी ज़बान है प्यारे

दिल-ए-बे-मुद्दआ है और मैं हूँ

दिल-ए-बे-मुद्दआ है और मैं हूँ
मगर लब पर दुआ है और मैं हूँ

न साक़ी है न अब वो शय है बाकी
मिरा दौर आ गया है और मैं हूँ

उधर दुनिया है और दुनिया के बंदे
इधर मेरा ख़ुदा है और मैं हूँ

कोई पुरसाँ नहीं पीर-ए-मुगाँ का
फ़क़त मेरी वफ़ा है और मैं हूँ

अभी मीआद बाकी है सितम की
मोहब्बत की सज़ा है और मैं हूँ

न पूछो हाल मेरा कुछ न पूछो
कि तस्लीम ओ रज़ा है और मैं हूँ

ये तूल-ए-उम्र ना-माकुल ओ बे-कैफ़
बुज़ुर्गो की दुआ है और मैं हूँ

लहू के घूँट पीना और जीना
मुसलसल इक मज़ा है और मैं हूँ

‘हफीज’ ऐसी फ़लाकत के दिनों में
फ़क़त शुक्र-ए-ख़ुदा है और मैं हूँ

है अज़ल की इस ग़लत बख़्शी पे हैरानी मुझे

है अज़ल की इस ग़लत बख़्शी पे हैरानी मुझे
इश्क़ ला-फ़ानी मिला है ज़िंदगी फ़ानी मुझे

मैं वो बस्ती हूँ कि याद-ए-रफ़्तगाँ के भेस में
देखने आती है अब मेरी ही वीरानी मुझे

थी यही तम्हीद मेरे मातमी अंजाम की
फूल हँसते हैं तो होती है पशेमानी मुझे

हुस्न बे-परवा हुआ जाता है या रब क्या करूँ
अब तो करनी ही पड़ी दिल की निगह-बानी मुझे

बाँध कर रोज़-ए-अज़ल शीराज़ा-ए-मर्ग-ओ-हयात
सौंप दी गोया दो आलम की परेशानी मुझे

पूछता फिरता था दानाओं से उल्फ़त के रमूज़
याद अब रह रह के आती है वो नादानी मुझे

हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके

हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके
तुम ने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके

तुम ही न सुन के अगर क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन
किस की ज़बान खुलेगी फिर हम न अगर सुना सके

होश में आ चुके थे हम जोश में आ चुके थे हम
बज़्म का रंग देख कर सर न मगर उठा सके

रौनक़-ए-बज़्म बन गए लब पे हिकायतें रहीं
दिल में शिकायतें रहीं लब न मगर हिला सके

शौक़-ए-विसाल है यहाँ लब पे सवाल है यहाँ
किस की मजाल है यहाँ हम से नज़र मिला सके

ऐसा ही कोई नामा-बर बात पे कान धर सके
सुन के यक़ीन कर सके जा के उन्हें सुना सके

इज्ज़ से और बढ़ गई बरहमी-ए-मिज़ाज-ए-दोस्त
अब वो करे इलाज-ए-दोस्त जिस की समझ में आ सके

अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल
कौन तिरी तरह ‘हफ़ीज’ दर्द के गीत गा सके

हुस्न ने सीखीं ग़रीब-आज़ारियाँ 

हुस्न ने सीखीं ग़रीब-आज़ारियाँ
इश्क़ की मजबूरियाँ लाचारियाँ

बह गया दिल हसरतों के ख़ून में
ले गईं बीमार को बीमारियाँ

सोच कर ग़म दीजिए ऐसा न हो
आप को करनी पड़ें ग़म-ख़्वारियाँ

दार के क़दमों में भी पहुँची न अक़्ल
इश्क़ ही के सर रहीं सरदारियाँ

इक तरफ़ जिंस-ए-वफ़ा क़ीमत-तबल
इक तरफ़ मैं और मिरी नादारियाँ

होते होते जान दूभर हो गई
बढ़ते बढ़ते बढ़ गईं बे-ज़ारियाँ

तुम ने दुनिया ही बदल डाली मिरी
अब तो रहने दो ये दुनिया-दारियाँ

इश्क़ में छेड़ हुई दीदा-ए-तर से पहले

इश्क़ में छेड़ हुई दीदा-ए-तर से पहले
ग़म के बादल जो उठे तो यहीं पर से पहले

अब जहन्नम में लिए जाती है दिल की गर्मी
आग चमकी थी ये अल्लाह के घर से पहले

हाथ रख रख के वो सीने पे किसी का कहना
दिल से दर्द उठता है पहले कि जिगर से पहले

दिल को अब आँख़ की मंज़िल में बिठा रक्खेंगे
इश्क़ गुज़रेगा इसी राह-गुज़र से पहले

वो हर वादे से इंकार ब-तर्ज़-ए-इक़रार
वो हर इक बात पे हाँ लफ़्ज-ए-मगर से पहले

मेरे क़िस्से पे वही रौशनी डाले शायद
शम-ए-कम-माया जो बुझती है सहर से पहले

चाक-ए-दामानी-ए-गुल का है गिला क्या बुलबलु
कि उलझता है ये ख़ुद बाद-ए-सहर से पहले

कुछ समझ-दार तो हैं नाश उठाने वाले
ले चले हैं मुझे इस राह-गुज़र से पहले

दिल नहीं हारते यूँ बाज़ी-ए-उल्फ़त में ‘हफीज’
खेल आगाज़ हुआ करता है सर से पहले

जहाँ क़तरे को तरसाया गया हूँ 

जहाँ क़तरे को तरसाया गया हूँ
वहीं डूबा हआ पाया गया हूँ

ब-हाल-ए-गुम-रही पाया गया हूँ
हरम से दैर में लाया गया हूँ

बला काफ़ी न थी इक ज़िंदगी की
दोबारा याद फरमाया गया हूँ

ब-रंग-ए-लाला-ए-वीराना बेकार
खिलाया और मुरझाया गया हूँ

अगरचे अब्र-ए-गौहर-बार हूँ मैं
मगर आँखों से बरसाया गया हूँ

सुपुर्द-ए-ख़ाक ही करना मुझ को
तो फिर काहे को नहलाया गया हूँ

फ़रिश्ते को न मैं शैतना समझा
नतीजा ये कि बहकाया गया हूँ

कोई सनअत नहीं मुझ में तो फिर क्यूँ
नुमाइश-गाह में लाया गया हूँ

ब-क़ौल-ए-बरहमन क़हर-ए-ख़ुदा हूँ
बुतों के हुस्न पर ढाया गया हूँ

मुझे तो इस ख़बर ने खो दिया है
सुना है मैं कहीं पाया गया हूँ

‘हफ़ीज़’ अहल-ए-ज़बाँ कब मानते थे
बड़े ज़ोरों से मनवाया गया हूँ

ख़ून बर कर मुनासिब नहीं दिल बहे

ख़ून बर कर मुनासिब नहीं दिल बहे
दिल नहीं मानता कौन दिल से कहे

तेरी दुनिया में आए बहुत दिन रहे
सुख ये पाया कि हम ने बहुत दुख सहे

बुलबुलें गुल के आँसु नहीं चाटतीं
उन को अपनी ही मरग़ूब हैं चहचहे

आलम-ए-नज़ा में सुन रहा हूँ में क्या
ये अज़ीज़ों की चीख़ें हैं कया क़हक़हे

इस नए हुस्न की भी अदाओं पे हम
मर मिटेंगे ब-शर्ते-के ज़िंदा रहे

तुम ‘हफ़ीज’ अब घिसटने की मंज़िल में हो
दौर-ए-अय्याम पहिया है ग़म हैं रहे

कोई दवा न दे सके मशवरा-ए-दुआ दिया

कोई दवा न दे सके मशवरा-ए-दुआ दिया
चारा-गरों ने और भी दिल का दर्द बढ़ा दिया

दोनों को दे के सूरतें साथ ही आईना दिया
इश्क़ बिसोरने लगा हुस्न ने मुस्कुरा दिया

जौक़-ए-निगाह के सिवा शौक़-ए-गुनाह के सिवा
मुझ को बुतों से क्या मिला मुझ को ख़ुदा ने क्या दिया

थी न ख़िजाँ की रोक-थाम दामन-ए-इख़्तिसार में
हम ने भरी बहार में अपना चमन लुटा दिया

हुस्न-ए-नज़र की आबरू सनअत-ए-बरहमन से है
जिस को सनम बना लिया उस को ख़ुदा बना दिया

दाग़ है मुझ पे इश्क़ का मेरा गुनाह भी तो देख
उस की निगाह भी तो देख जिस ने ये गुल खिला दिया

इश्क़ की मम्लिकत में है शोरिश-ए-अक्ल-ए-ना-मुराद
उभरा कहीं जो ये फ़साद दिन ने वहीं दबा दिया

नक़्श-ए-वफ़ा तो मैं ही था अब मुझे ढूँडते हो क्या
हर्फ़-ए-गलत नज़र पड़ा तुम ने मुझे मिटा दिया

ख़ुब्स-ए-दुरूँ दिखा दिया हर दहन-ए-ग़लीज ने
कुछ न कुछ कहा ‘हफ़ीज़’ ने हँस दिया मुस्कुरा दिया

क्यूँ हिज्र के शिकवे करता है क्यूँ दर्द के रोने रोता है

क्यूँ हिज्र के शिकवे करता है क्यूँ दर्द के रोने रोता है
अब इश्क़ किया तो सब्र भी कर इस में तो यही कुछ होता है

आग़ाज-ए-मुसीबत होता है अपने ही दिल की शामत से
आँखों में फूल खिलाता है तलवों में काँटें बोता है

अहबाब का शिकवा क्या कीजिए ख़ुद जाहिर ओ बातिन एक नहीं
लब ऊपर ऊपर हँसते हैं दिल अंदर-अंदर रोता है

मल्लाहों को इल्ज़ाम न दो तुम साहिल वाले क्या जानो
ये तूफाँ कौन उठाता है ये कश्ती कौन डुबोता है

क्या जानिए ये क्या खोएगा क्या जानिए ये क्या पाएगा
मंदिर का पुजारी जागता है मस्जिद का नमाज़ी सोता है

ख़ैरात की जन्नत ठुकरा दे है शान यही ख़ुद-दारी की
जन्नत से निकाला था जिस को तू उस आदम का पोता है

तीर चिल्ले पे न आना कि ख़ता हो जाना 

तीर चिल्ले पे न आना कि ख़ता हो जाना
लब तक आते हुए शिकवे का दुआ हो जाना

याद है उस बुत-ए-काफिर का ख़फा हो जाना
और मिरा भूल के माइल-ब-दुआ हो जाना

हैरत-अंगेज है नक्काश-ए-अज़ल के हाथों
मेरी तस्वीर का तस्वीर-ए-फ़ना हो जाना

दस्त-ए-तक़दीर में शमशीर-ए-जफ़ा देना है
ख़ुद-ब-ख़ुद बंदा-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा हो जाना

उस की उफ़्ताद पे ख़ुर्शीद की रिफ़त कुर्बां
जिस को भाया तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा-हो जाना

रौनक़-ए-बज़्म है शेवन से तो शेवन ही सही
हम-सफ़ीरान-ए-चमन फिर न ख़फा हो जाना

दावर-ए-हश्र का इंसाफ़ इशारे उन के
बस यही है किसी बंदे का ख़ुदा हो जाना

उभरे जा ख़ाक से वो तह-ए-ख़ाक हो गए 

उभरे जा ख़ाक से वो तह-ए-ख़ाक हो गए
सब पाइमाल-ए-गर्दिश-ए-अफ़लाक हो गए

रखती थी लाग मेरे गिरेबाँ से नौ-बहार
दामन गुलों के बाग़ में क्यूँ चाक हो गए

थे दीदा-हा-ए-ख़ुश्क मोहब्बत की आबरू
कम-बख़्त उन के सामने नम-नाक हो गए

ऐसा भी क्या मिज़ाज क़यामत का दिन है आज
पेश-ए-ख़ुदा तुम और भी बे-बाक हो गए

आते ही बज़्म-ए-वाज़ से चलते बने ‘हफीज’
दो हर्फ़ सुन के साहिब-ए-इदराक हो गए

वो सर-ख़ुशी दे कि ज़िंदगी को शबाब से बहर-याब कर दे

वो सर-ख़ुशी दे कि ज़िंदगी को शबाब से बहर-याब कर दे
मिरे ख़्यालों में रंग भर दे मिरे लहू को शराब कर दे

हक़ीक़तें आशकार कर दे सदाक़तें बे-हिजाब कर दे
हर एक ज़र्रा ये कह रहा है कि आ मुझे आफ़्ताब कर दे

ये ख़्वाब क्या है ये ज़िश्त क्या है जहाँ की असली सरिश्त क्या है
बड़ा मजा हो तमाम चेहरे अगर कोई बे-नकाब कर दे

कहो तो राज़-ए-हयात कह दूँ हक़ीक़त-ए-काएनात कह दूँ
वो बात कह दूँ कि पत्थरों के जिगर को भी आब आब कर दे

ख़िलाफ़-ए-तक़दीर कर रहा हूँ फिर एक तक़सीर कर रहा हूँ
फिर एक तदबीर कर रहा हूँ ख़ुदा अगर कामयाब कर दे

तिरे करम के मुआमले को तिरे करम ही पे छोड़ता हूँ
मिरी ख़ताएँ शुमार कर ले मिरी सज़ा का हिसाब कर दे

‘हफीज़’ सब से बड़ी ख़राबी है इश्क़ में लुत्फ़-ए-काम-याबी
किसी की दुनिया तबाह कर दे किसी की उक़्बा ख़राब कर दे

ये क्या मक़ाम है वो नज़ारे कहाँ गए 

ये क्या मक़ाम है वो नज़ारे कहाँ गए
वो फूल क्या हुए वो सितारे कहाँ गए

यारान-ए-बज़्म जुरअत-ए-रिंदाना क्या हुई
उन मस्त अँखड़ियों के इशारे कहाँ गए

एक और दौर का वो तक़ाज़ा किधर गया
उमड़े हुए वो होश के धारे कहाँ गए

उफ़्ताद क्यूँ है लग्ज़िश-ए-मस्ताना क्यूँ नहीं
वो उज्र-ए-मय-कशी के सहारे कहाँ गए

दौरान-ए-ज़लज़ला जो पनाह-ए-निगाह थे
लेटे हुए थे पाँव पसारे कहाँ गए

बाँधा था क्या हवा पे वो उम्मीद का तिलिस्म
रंगीनी-ए-नज़र के ग़ुबारे कहाँ गए

उठ उठ के बैठ बैठ चुकी गर्द राह की
यारो वो क़ाफ़िले थके हारे कहाँ गए

हर मीर-ए-कारवाँ से मुझे पूछना पड़ा
साथी तिरे किधर को सिधारे कहाँ गए

फ़रमा गए थे राह में बैठ इंतिजार कर
आए नहीं पलट के वो प्यारे कहाँ गए

तुम से भी जिन का अहद-ए-वफ़ा उस्तुवार था
ऐ दुश्मनों वो दोस्त हमारे कहाँ गए

कश्ती नई बनी कि उठा ले गया कोई
तख़्ते जो लग गए थे किनारे कहाँ गए

कश्ती नई बनी कि उठा ले गया कोई
तख़्ते जो लग गए थे किनारे कहाँ गए

अब डूबतों से पूछता फिरता है नाख़ुदा
जिन को लगा चुका हूँ किनारे कहाँ गए

बे-ताब तेरे दर्द से थे चाराग़र ‘हफ़ीज’
क्या जानिए वो दर्द के मारे कहाँ गए

जिंदगानी का लुत्फ़ भी आ जाएगा

जिंदगानी का लुत्फ़ भी आ जाएगा
ज़िंदगानी है तो देखा जाएगा

जिस तरह लकड़ी को खा जाता है घुन
रफ़्ता रफ़्ता ग़म मुझे खा जाएगा

हश्र के दिन मेरी चुप का माज़रा
कुछ न कुछ तुम से भी पूछा जाएगा

मुस्कुरा कर मुँह चिड़ा कर घूर कर
जा रहे हो ख़ैर देखा जाएगा

कर दिया है तुम ने दिल को मुतमइन
देख लेना सख़्त घबरा जाएगा

हज़रत-ए-दिल काम से जाऊँगा मैं
दिल-लगी में आप का क्या जाएगा

दोस्तों की बे-वफ़ाई पर ‘हफीज़’
सब्र करना भी मुझे आ जाएगा

नज़्में

अभी तो मैं जवान हूँ 

हवा भी ख़ुश-गवार है
गुलों पे भी निखार है
तरन्नुम-ए-हज़ार है
बहार पुर-बहार है
कहाँ चला है साक़िया
इधर तो लौट इधर तो आ
अरे ये देखता है क्या
उठा सुबू सुबू उठा
सुबू उठा प्याला भर
प्याला भर के दे इधर
चमन की सम्त कर नज़र
समाँ तो देख बे-ख़बर
वो काली काली बदलियाँ
उफ़ु़क़ पे हो गईं अयाँ
वो इक हुजूम-ए-मय-कशाँ
है सू-ए-मय-कदा रवाँ
ये क्या गुमाँ है बद-गुमाँ
समझ न मुझ को ना-तवाँ
ख़याल-ए-ज़ोहद अभी कहाँ
अभी तो मैं जवान हूँ
इबादतों का ज़िक्र है
नजात की भी फ़िक्र है
जुनून है सवाब का
ख़याल है अज़ाब का
मगर सुनो तो शैख़ जी
अजीब शय हैं आप भी
भला शबाब ओ आशिक़ी
अलग हुए भी हैं कभी
हसीन जल्वा-रेज़ हों
अदाएँ फ़ित्ना-ख़ेज़ हों
हवाएँ इत्र-बेज़ हों
तो शौक़ क्यूँ न तेज़ हों
निगार-हा-ए-फ़ित्नागर
कोई इधर कोई उधर
उभारते हों ऐश पर
तो क्या करे कोई बशर
चलो जी क़िस्सा-मुख़्तसर
तुम्हारा नुक़्ता-ए-नज़र
दुरूस्त है तो हो मगर
अभी तो मैं जवान हूँ
ये गश्त कोहसार की
ये सैर जू-ए-बार की
ये बुलबुलों के चहचहे
ये गुल-रूख़ों के क़हक़हे
किसी से मेल हो गया
तो रंज-ओ-फ़िक्र खो गया
कभी जो बख़्त सो गया
ये हँस गया वो रो गया
ये इश्क़ की कहानियाँ
ये रस भरी जवानियाँ
उधर से मेहरबानियाँ
इधर से लन-तनारियाँ
ये आसमान ये ज़मीं
नज़ारा-हा-ए-दिल-नशीं
इन्हें हयात-आफ़रीं
भला मैं छोड़ दूँ यहीं
है मौत इस क़दर क़रीं
मुझे न आएगा यक़ीं
नहीं नहीं अभी नहीं
अभी तो मैं जवान हूँ
न ग़म कुशूद-ओ-बस्त का
बुलंद का न पस्त का
न बूद का न हस्त का
न वादा-ए-लस्त का
उम्मीद और यास गुम
हवास गम क़यास गुम
नज़र से आस पास गुम
हमा-बजुज़ गिलास गुम
न मय में कुछ कमी रहे
क़दह से हमदमी रहे
नशिस्त ये जीम रहे
यही हमा-हामी रहे
वो राग छेड़ मुतरिबा
तर्ब-फ़ज़ा अलम-रूबा
असर सदा-ए-साज़ का
जिगर में आग दे लगा
हरेक लब पे हो सदा
न हाथ रोक साक़िया
पिलाए जा पिलाए जा
अभी तो मैं जवान हूं

इकबाल के मज़ार पर

लहद में सो रही है आज बे-शक मुश्त-ए-ख़ाक उस की
मगर गर्म-ए-अमल है जागती है जान-ए-पाक उस की
वो इक फ़ानी बशर था मैं ये बावर कर नहीं सकता
बशर इक़बाल हो जाए तो हरगिज़ मर नहीं सकता
ब-ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार-ए-मस्जिद है जो आसूदा
ये ख़ाकी जिस्म है सत्तर बरस का राह पैमूदा
ये ख़ाकी जिस्म भी उस का बहुत बेश-क़ीमत था
जिसे हम-जल्वा समझे थे वो पर्दा भी ग़नीमत था
उसे हम नापते थे ले के आँखों ही का पैमाना
ग़ज़ल-ख्वाँ उस को जाना हम ने शाइर उस को गर्दाना
फ़क़त सूरत ही देखी उस की मअ’नी हम नहीं समझे
न देखा रंग-ए-तस्वीर आइने को दिल-नशीं समझे
हमें ज़ोफ़-ए-बसारत से कहाँ थी ताब-ए-नज़्ज़ारा
सिखाए उस के पर्दे ने हमें आदाब-ए-नज़्ज़ारा
ये नग़्मा क्या है ज़ेर-ए-पर्दा-हा-साज़ कम समझे
रहे सब गोश-बर-आवाज़ लेकिन राज़ कम समझे
शिकस्त-ए-पैकर-ए-महसूस ने तोड़ा हिजाब आख़िर
तुलू-ए-सुब्ह-ए-महशर बन के चमका आफ़्ताब आख़िर
मुकय्यद अब नहीं ‘इक़बाल’ अपने जिस्म-ए-फ़ानी में
नहीं वो बंद हाइल आज दरिया की रवानी में
वजूद-ए-मर्ग की क़ाएल नहीं थी जिं़दगी उस की
तआला अल्लाह अब देखे कोई पाइंदगी उस की
जिस हम मुर्दा समझे ज़िंदा पर पाइंदा तर निकला
मह ओ खुर्शीद से ज़र्रे का दिल ताबिंदा तर निकला
अभी अंदाज़ा हो सकता नहीं उस की बुलंदी का
अभी दुनिया की आँखों पर है पर्दा फ़िरक़ा-बंदी का
मगर मेरी निगाहों में चेहरे उन जवानों के
जिन्हें ‘इक़बाल’ ने बख़्शे हैं बाज़ू कहर-मानों के

इरशाद की याद में

इक बार फिर वतन में गया जा के आ गया
लख़्त-ए-जिगर को ख़ाक मे दफ़ना के आ गया
हर हम-सफर पे ख़िज्र का धोका हुआ मुझे
आब-ए-बक़ा की राह से कतरा के आ गया
हूर-ए-लहद ने छीन लिया तुझ को और मैं
अपना सा मुँह लिए हुए शरमा के आ गया
दिल ले गया मुझे तिरी तुर्बत पे बार बार
आवाज़ दे के बैठ के उक्ता के आ गया
रोया कि था जहेज़ तिरा वाजिब-उल-अदा
मेंह मोतियों का क़ब्र पे बरसा के आ गया
मेरी बिसात क्या थी हुज़ूर-ए-रज़ा-ए-दोस्त
तिनका सा एक सामने दरिया के आ गया
अब के भी रास आई न हुब्ब-ए-वतन ‘हफ़ीज’
अब के भी एक तीर-ए-क़ज़ा खा के आ गया

एक लड़की शादाँ

एक लड़की थी छोटी सी
दुबली सी और मोटी सी
नन्ही सी और मुन्नी सी
बिल्कुल ही थन मथनी सी
उस के बाल थे काल से
सीधे घुँघराले से
मुँह पर उस के लालीस सी
चिट्टी सी मटियाली सी
उस की नाक पकौड़ी सी
नोकीली सी चौड़ी सी
आँखे काली नीली सी
सुर्ख़ सफ़ेद और पीली सी
कपड़े उस के थैले से
उजले से और मैले से
ये लड़की थी भोली सी
बी बी सी और गोली सी
हर दम खेल था काम उस का
शादाँ बीबी नाम उस का
हँसती थी और रोती थी
जागती थी और सोती थी
हर दम उस की अम्माँ जान
खींचा करती उस के कान
कहती थीं मकतब को जा
खेलों में मत वक़्त गँवा
अम्मी सब कुछ कहती थी
शादाँ खेलती रहती थी
इक दिन शादाँ खेल में थी
आए उस के अब्बा जी
वो लाहौर से आए थे
चीज़ें वीज़ें लाए थे
बॉक्स में थीं ये चीज़ें सब
ख़ैर तमाशा देखो अब
अब्बा ने आते ही कहा
शादाँ आ कुछ पढ़ के सुना
गुम थी इक मुद्दत से किताब
क्या देती इस वक़्त जवाब
दो बहनें थी शादाँ की
छोटी नन्ही मुन्नी सी
नाम था मंझली का सीमाँ
गुड़िया सी नन्ही नादाँ
वो बोली ऐ अब्बा जी
अब तो पढ़ती हूँ मैं भी
बिल्ली है सी ऐ टी कैट
चूहा है आर ऐ टी रैट
मुँह माउथ है नाक है नोज़
और गुलाब का फूल है रोज़
मैं ने अब्बा जी देखा
ख़ूब सबक़ है याद किया
शादाँ ने उस वक़्त कहा
मैं ने ही तो सिखाया था
लेकिन अब्बा ने चुप चाप
खोला बॉक्स को उठ कर आप
इस में जो चिज़ें निकलें
सारी सीमाँ को दे दें
इक चीनी की गुड़िया थी
इक जादू की पुड़िया थी
इक नन्ही सी थी मोटर
आप ही चलती थी फ़र फ़र
गेंदों का इक जोड़ा था
इक लकड़ी का घोड़ा था
इक सीटी थी इक बाजा
एक था मिट्टी का राजा
शादाँ को कुछ भी न मिला
यानी खेल क पाई सज़ा
अब वो ग़ौर से पढ़ती है
पूरे तूर पढ़ती है

पिए जा

शराब-ख़ाना है बज़्म-ए-हस्ती
हर एक है महव-ए-ऐश ओ मस्ती
मआल-बीनी ओ मय-परस्ती
अरे ये ज़िल्लत अरे ये पस्ती
शिआर-ए-रिंदाना कर पिए जा
अगर कोई तुझ को टोकता है
शराब पीने से रोकता है
समझ इसे होश में नहीं है
ख़िरद के आग़ोश में नहीं है
तू उस से झगड़ा न कर पिए जा
ख़याल-ए-रोज़-ए-हिसाब कैसा
सवाब कैसा अज़ाब कैसा
बहिश्त ओ दोज़ख़ के ये फ़साने
ख़ुदा की बातें ख़ुदा ही जाने
फ़ज़ूल सोचा न कर पिए जा
नहीं जहाँ में मुदाम रहना
तो किस लिए तिश्ना-काम रहना
उठा उठा हाँ उठा सुबू को
तमाम दुनिया की हाव हू को
ग़रीक़-ए-पैमाना कर पिए जा
किसी से तकरार क्या ज़रूरत
फ़ज़ूल इसरार क्या ज़रूरत
कोई पिए तो उसे पिला दे
अगर न माने तो मुस्कुरा दे
मलाल-ए-असला न कर पिए जा
तुझे समझते हैं अहल-ए-दुनिया
ख़राब ख़स्ता ज़लील रूस्वा
नहीं अयाँ उन पे हाल तेरा
कोई नहीं हम-ख़याल तेरा
किसी की परवा न कर पिए जा
ये तुझ पर आवाज़े कसने वाले
तमाम हैं मेरे देखे भाले
नहीं मज़ाक़ उन को मय-कशी का
ये ख़ून पीते हैं आदमी का
तू उन का शिकवा न कर पिए जा

कविताएँ

आज़ादी

शेरों को आज़ादी है आज़ादी के पाबंद रहें
जिसको चाहें चीरें फाड़ें खायें पियें आनंद रहें

शाहीं को आज़ादी है आज़ादी से परवाज़ करे
नन्‍ही मुन्‍नी चिडियों पर जब चाहे मश्‍क़े-नाज़ करे

सांपों को आज़ादी है हर बस्‍ते घर में बसने की
इनके सर में ज़हर भी है और आदत भी है डसने की

पानी में आज़ादी है घड़ियालों और नहंगों को
जैसे चाहें पालें पोसें अपनी तुंद उमंगों को

इंसां ने भी शोखी सीखी वहशत के इन रंगों से
शेरों, संपों, शाहीनों, घड़ियालों और नहंगों से

इंसान भी कुछ शेर हैं बाक़ी भेड़ों की आबादी है
भेड़ें सब पाबंद हैं लेकिन शेरों को आज़ादी है

शेर के आगे भेड़ें क्‍या हैं इक मनभाता खाजा है
बाक़ी सारी दुनिया परजा शेर अकेला राजा है

भेड़ें लातादाद हैं लेकिन सबको जान के लाले हैं
इनको यह तालीम मिली है भेड़िये ताक़त वाले हैं

मास भी खायें खाल भी नोचें हरदम लागू जानों के
भेड़ें काटें दौरे-ग़ुलामी बल पर गल्‍लाबानों के

भेडि़यों से गोया क़ायम अमन है इस आबादी का
भेड़ें जब तक शेर न बन लें नाम न लें आज़ादी का

इंसानों में सांप बहुत हैं क़ातिल भी ज़हरीले भी
इनसे बचना मुश्किल है, आज़ाद भी हैं फुर्तीले भी

सांप तो बनना मुश्किल है इस ख़स्‍लत से माज़ूर हैं हम
मंतर जानने वालों की मुहताजी पर मजबूर हैं हम

शाहीं भी हैं चिड़ियाँ भी हैं इंसानों की बस्‍ती में
वह नाज़ा अपनी रिफ़अत पर यह नालां अपनी पस्‍ती में

शाहीं को तादीब करो या चिड़ियों को शाहीन करो
यूं इस बाग़े-आलम में आज़ादी की तलक़ीन करो

बहरे-जहां में ज़ाहिर-ओ-पिनहां इंसानी घड़ियाल भी हैं
तालिबे-जानओजिस्‍म भी हैं शैदाए-जान-ओ-माल भी हैं

यह इंसानी हस्‍ती को सोने की मछली जानते हैं
मछली में भी जान है लेकिन ज़ालिम कब गर्दानते हैं

सरमाये का जि़क्र करो मज़दूरों की इनको फ़िक्र नहीं
मुख्‍तारी पर मरते हैं मजबूरों की इनको फ़िक्र नहीं

आज यह किसका मुंह है आये मुंह सरमायादारों के
इनके मुंह में दांत नहीं फल हैं ख़ूनी तलवारों के

खा जाने का कौन सा गुर है जो इन सबको याद नहीं
जब तक इनको आज़ादी है कोई भी आज़ाद नहीं

ज़र का बंदा अक़्ल-ओ-ख़िरद पर जितना चाहे नाज़ करे
ज़ैरे-ज़मीं धंस जाये या बालाए-फ़लक परवाज़ करे

इसकी आज़ादी की बातें सारी झूठी बातें हैं
मज़दूरों को मजबूरों को खा जाने की घातें हैं

जब तक चोरों-राहज़नों का डर दुनिया पर ग़ालिब है
पहले मुझसे बात करे जो आज़ादी का तालिब है

कोई चारा नहीं दुआ के सिवा

कोई चारा नहीं दुआ के सिवा
कोई सुनता नहीं खुदा के सिवा

मुझसे क्या हो सका वफ़ा के सिवा
मुझको मिलता भी क्या सजा के सिवा

दिल सभी कुछ ज़बान पर लाया
इक फ़क़त अर्ज़-ए-मुद्दा के सिवा

बरसर-ए-साहिल-ए-मुकाम यहाँ
कौन उभरा है नाखुदा के सिवा

दोस्तों के ये मुक्हाली साना तीर
कुछ नहीं मेरी ही खता के सिवा

ये “हफीज” आह आह पर आखिर
क्या कहे दोस्तों वाह वाह के सिवा

इंसा भी कुछ शेर है, बाकी भेड़ की आबादी है

शेरों को आजादी है, आजादी के पाबंद रहे,
जिसको चाहें चीरे-फाड़ें, खाए पियें आनंद रहे।

सापों को आजादी है हर बसते घर में बसने की,
उनके सर में जहर भी है और आदत भी है डसने की।

शाही को आजादी है, आजादी से परवाज करे,
नन्ही-मुन्नी चिड़ियों पर जब चाहे मश्के-नाज करें।

पानी में आजादी है घडियालों और निहंगो को,
जैसे चाहे पालें-पोसें अपनी तुंद उमंगो को।

इंसा ने भी शोखी सीखी वहशत के इन रंगों से,
शेरों, सापों, शाहीनो, घडियालों और निहंगो से।

इंसा भी कुछ शेर है, बाकी भेड़ की आबादी है,
भेडें सब पाबंद हैं लेकिन शेरों को आजादी है।

शेर के आगे भेडें क्या हैं, इक मनभाता खाजा है,
बाकी सारी दुनिया परजा, शेर अकेला राजा है।

भेडें लातादाद हैं लेकिन सबकों जान के लाले हैं,
उनको यह तालीम मिली है, भेडिए ताकत वाले हैं।

मांस भी खाएं, खाल भी नोचें, हरदम लागू जानो के,
भेडें काटें दौरे-गुलामी बल पर गल्लाबानो के।

भेडियों ही से गोया कायम अमन है इस आजादी का,
भेडें जब तक शेर न बन ले, नाम न ली आजादी का।

इंसानों में सांप बहुत हैं, कातिल भी, जहरीले भी,
उनसे बचना मुश्किल है, आजाद भी हैं, फुर्तीले भी।

सरमाए का जिक्र करो, मजदूर की उनको फ़िक्र नही,
मुख्तारी पर मरते हैं, मजबूर की उनको फ़िक्र नही।

आज यह किसका मुंह ले आए, मुंह सरमायेदारों के,
इनके मुंह में दांत नही, फल हैं खुनी तलवारों के।

खा जाने का कौन सा गुर है को इन सबको याद नही,
जब तक इनको आजादी है, कोई भी आजाद नही।

उसकी आजादी की बातें सारी झूठी बातें हैं,
मजदूरों को, मजबूरों को खा जाने की घातें हैं।

जब तक चोरों, राहजनो का डर दुनिया पर ग़ालिब है,
पहले मुझसे बात करे, जो आजादी का तालिब है।

क्यों हिज्र के शिकवे करता है 

क्यों हिज्र के शिकवे करता है, क्यों दर्द के रोने रोता है?
अब इश्क किया है तो सब्र भी कर, इसमें तो यही कुछ होता है

आगाज़-ए-मुसीबत होता है, अपने ही दिल की शरारत से
आँखों में फूल खिलाता है, तलवो में कांटें बोता है

अहबाब का शिकवा क्या कीजिये, खुद ज़ाहिर व बातें एक नहीं
लब ऊपर ऊपर हँसतें है, दिल अंदर अंदर रोता है

मल्लाहों को इलज़ाम न दो, तुम साहिल वाले क्या जानों
ये तूफान कौन उठता है, ये किश्ती कौन डुबोता है

क्या जाने क्या ये खोएगा, क्या जाने क्या ये पायेगा
मंदिर का पुजारी जागता है, मस्जिद का नमाजी सोता है

ख़ून बन कर मुनासिब नहीं दिल बहे

ख़ून बन कर मुनासिब नहीं दिल बहे
दिल नहीं मानता कौन दिल से कहे

तेरी दुनिया में आये बहुत दिन रहे
सुख ये पाया कि हमने बहुत दुख सहे

बुलबुलें गुल के आँसू नहीं चाटतीं
उनको अपने ही मर्ग़ूब हैं चहचहे

आलम-ए-नज़’अ में सुन रहा हूँ मैं क्या
ये अज़ीज़ों की चीख़ें है या क़हक़हे

इस नये हुस्न की भी अदायों पे हम
मर मिटेंगे बशर्ते कि ज़िंदा रहे

हम ही में थी न कोई बात

हम ही में थी न कोई बात, याद न तुम को आ सके
तुमने हमें भुला दिया, हम न तुम्हें भुला सके

तुम ही न सुन सके अगर, क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन
किस की ज़ुबाँ खुलेगी फिर, हम न अगर सुना सके

होश में आ चुके थे हम, जोश में आ चुके थे हम
बज़्म का रंग देख कर सर न मगर उठा सके

शौक़-ए-विसाल है यहाँ, लब पे सवाल है यहाँ
किस की मजाल है यहाँ, हम से नज़र मिला सके

रौनक़-ए-बज़्म बन गए लब पे हिकायतें रहीं
दिल में शिकायतेन रहीं लब न मगर हिला सके

ऐसा भी कोई नामाबर बात पे कान धर सके
सुन कर यकीन कर सके जा के उंहें सुना सके

अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल
कौन तेरी तरह ‘हफ़ीज़’ दर्द के गीत गा सके

कोई दवा न दे सके, मश्वरा दुआ दिया

कोई दवा न दे सके, मश्वरा दुआ दिया
चारागरों ने और भी दिल का दर्द बढ़ा दिया

ज़ौक़-ए-निगाह के सिवा शौक़-ए-गुनाह के सिवा
मुझको ख़ुदा से क्या मिला मुझको बुतों ने क्या दिया

थी न ख़िज़ाँ की रोक-थाम दामन-ए-इख़्तियार में
हमने भरी बहार में अपनाअ चमन लुटा दिया

हुस्न-ए-नज़र की आबरू सनअत-ए-बराहेमन से है
जिसको सनम समझ लियाउसको ख़ुदा बना दिया

दाग़ है मुझपे इश्क़ का मेरा गुनाह भी तो देख
उसकी निगाह भी तो देख जिसने ये गुल खिला दिया

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