हरिओम राजोरिया की रचनाएँ

लाठी

लाठियाँ बजाने पर भी
कविता होनी चाहिए

कहाँ-कहाँ बजी लाठी
किस-किस पर बजी
देश भर में बजी
ग़रीब-ग़ुरबों पर बजती आई है
ग़रीब -ग़ुरबों पर ही बजी

दौड़ा-दौड़ा कर बजी
मुर्गा बनाकर बजी
ज़मीन पर लिटाकर बजी
देखने वाले तक की रूह काँप गई
ऐसी जबर लहरा के बजी

पीटने वाले को सम्मान मिला
पिटने वाले को बदले में ज्ञान मिला
धीरे-धीरे हुआ इस परम्परा का विकास
देश भर में हुआ लाठी का प्रकाश
विश्वविद्यलय लाठियों पर जाकर टँग गए
रोग से लड़ रहे नागरिकों के
रास्ते में आ गईं लाठियाँ
निर्दोष नागरिकों की पीठ पर जब बरसीं
तो इतिहास बन गईं लाठियाँ

नागरिक समाज लाठियों के नीचे दबा था
लठ्ठम – लट्ठ का हुआ नाच
लाठियाँ स्वर लहरियों पर थिरकीं
कला – संस्कृति के रास्तों पर
लगा दिया गया लाठियों का पहरा
पिटाई की प्रस्तुतियों का हुआ भव्य आयोजन
हास्य अभिनेताओं की भी विषयवस्तु बनीं लाठियाँ

देश भर में हुआ लाठी युग का आगाज़
नागरिक होने का जमकर हुआ उपहास
चालाकी से लाठी को मिला सम्मान
सत्ता की मक्कारी का
लाठी ही थी एक बड़ा प्रमाण
साधारण घरों के लोग थे पीटने वाले

साधारण घरों के नागरिक थे पिटने वाले
लाठियों की मार ने रच दिया इतिहास
लाठियों की कलंक कथाओं पर
मीडिया हाउसों का रहा बायकाट
सरकार में कुछ लोग बोले कि
ज़रूरी हो जाता है ऐसा करना
मजबूर और परेशान लोगों को पीटकर ही
व्यवस्था बनाई जाती है
जो कुछ भी हुआ देशहित में हुआ
देशहित में देश के पक्ष में
इस नए लाठी युग का स्वागत है ।

आठ बजे

आठ बजने का मतलब क्या है
रोज़ ही बजते हैं आठ
अभी रात के तीन बजे है
अभी सुबह के आठ बज जाएँगे

एक रोग के वायरस की पूर्व पीठिका को
प्रतिदिन आठ बजे याद कीजिए
ठीक से सावधानियों का पालन कीजिए
माननीय को पूरी गम्भीरता से लीजिए
आठ बजे का इन्तज़ार कीजिए
और
धीरे से आठ को बज ही जाने दीजिए

नीन्द न आए तो आठ बजे से ही
नीन्द का इन्तज़ार कीजिए
रात के आठ और दिन के आठ का
फ़र्क करना भूल जाइए
काँख में दबीं घोषणाओं का
आदर कीजिए, तनिक सम्मान दीजिए
आठ बजे की स्मृति में कोई गीत लिखिए
आठ को आठ की तरह देखने का
प्रतिदिन सघन अभ्यास कीजिए

चाहो तो आप भी अपने
मन की बात मन में कर सकते हैं
आठ बजे अपना पक्ष रखिए
सुबह आठ तक कल्पनाओं के पँख फैलाइए
सिर दर्द को मत रोइए
लाल-लाल आँखों को पानी से धोइए
रात आठ से सोचना शुरू कीजिए
सुबह आठ तक सो जाइए
बाक़ी अपना ध्यान रखिए

मेहनत-मजूरी करने वाले लाखों लोग
अभी रास्ते में हैं
उन्हें रास्ते में ही रहने दीजिए
शुक्र मनाइए ऊपर वाले का
आप रास्ते में नहीं, घर में हैं
आपके पैरों में छाले नहीं
न पिण्डलियों पर पुलिस की लाठियों के नील
इतने छोटे जीवन में सुबह आठ बजे
आप अपने हाथ की बनी चाय पी रहे हैं
आपके सामने न पहाड़ – सा रास्ता है
न ही पहाड़ – सा इन्तज़ार
चैन से आठ को बज ही जाने दीजिए

सुबह आठ के बाद अब
रात के आठ की तो बात ही मत कीजिए ।

अपरिचय

सुबह रास्ते में कुछ स्त्रियों को देखा
छोटे-छोटे झुण्डों में
होने को सब अलग-अलग
पर एक ही तरह से
एक ही रास्ते पर
एक ही काम को जातीं
हाथ में पुराने कपड़ों के सिले
एक जैसे झोले काँख में दबाए

अज्ञात भय लिए सड़क पर मैं भी
और वे भय रहित
महामारी वाले वायरस से परे
जिससे भयभीत दिग-दिगन्त
दूर घर में बैठे परिजनों से आँख बचा
टेबुल पर फेंक आया चलित फ़ोन
निकल आया सड़क पर
जो माने जैसा मानने को स्वतन्त्र
भला, कोई कब तक
बन्द रह सकता दीवारों से घिरा

उनके चेहरों पर नहीं उदासी का भाव
न थकन आँखों में
श्रम करने को तैयार
काम की हुक और हुलस भीतर
पहिये भले ही रुक गए हों देश में
पर चल रहे इन स्त्रियों के पाँव

किसी के पास नही जा सकता
रोककर पूछ नहीं सकता कुछ बात
मज़दूर स्त्रियों के सापेक्ष
सड़क पर खड़े बिजली के खम्भे के
होने की तरह ही मेरा होना
अपने इस तरह होने से एकबारगी
कोई भी हो सकता भयभीत
कि आपका होना भी उसी तरह
जैसे अकेली एक सड़क
बबूल का एक पेड़
आराम पसन्द काम करने वालों और
कठोर श्रम के बीच
अपरिचय की इतनी बड़ी दीवार

डर था मेरे भीतर
और सुबह का सूरज निकल रहा था
चलता चला जाता आगे और आगे
छोटे छोटे झुण्डों में मिलते जाते
स्त्रियों के और नए समूह
अलग-अलग दबे रँगों के झोलों के साथ
एक स्त्री झोले के साथ
हाथ में टूटी चप्पल लिए चल रही

खेतों में खड़ी फ़सलों के स्वभाव
खेत, हँसिया, गेहूँ की सूखी बाल
और इन स्त्रियों के बारे मे
कितना कम जानता
जबकि अज्ञात वायरस के बारे में
कितना कुछ जान गया हूँ
जिसका भय लिए चल रहा रास्ते पर
इस समय क्या बात कर रही होंगी
दुनिया रुक सी गई है
पर ये कहाँ जा रही हैं रोटी बान्धकर

चैत काटने निकली इन स्त्रियों से
कितना कम परिचय एक कवि का
कैसे झिझकते हुए कविता में प्रवेश
इन स्त्रियों के बारे में
दुख-दुख जीवन का
कितना कम ज्ञान
इनके लिए कितने कम शब्द
एक कवि के शब्दकोश में

कहने को कहता रहता हूँ
कि कितना प्यार हमे वतन से
पर कितना कम जानते हम वतन को
और वतन में रहने वाले बहुसँख्यक
श्रमशील स्त्री समाज को

अन्त

न्याय के पथ पर
रास्ते भर झूठ बोलते हुए ही वे आए
और सीधे मनोनीत हो गए
कैसा सुन्दर शब्द है मनोनीत
इस सुन्दर गति को
मनोनयन की प्रक्रिया के साथ ही
माननीय प्राप्त हुए

उन्होंने झूठ का ही पक्ष चुना
पक्ष के पक्ष में
बहुत सुन्दर निर्णय दिया
बदले में पद विरुद्ध पद पर
उनका मनोनयन हुआ

अन्तरात्मा की पुकार का
भीतर से उठती आवाज़ का
किया जो अनुगमन
विधि के विधान से ही सब हुआ
भगवान जाने क्या हुआ
शायद
भगवान की इच्छा से ही अन्याय हुआ

ऊँचे – ऊँचे ओहदों पर बैठे थे आतताई
ऊपर भी थे उससे ऊपर भी
बीच में भी
उसके नीचे भी
कहाँ नहीं थे ?

जल में, थल में, नभ में
कण – कण में थे व्याप्त
छल – छद्म से होता था आरम्भ
और विस्तार का तो
कहीं कोई अन्त ही नहीं
विचारहीनता का फैला था साम्राज्य

इस तरह रहा नहीं था कहीं
न्याय और अन्याय का फ़र्क
तन्त्र और जनतन्त्र का
यहीं आकर
इस तरह होता था अन्त ।

सरल सूत्र 

वे अपराधी तो थे
पर किसी पंजी में उनके नाम
कुछ भी दर्ज नहीं था

वे कुछ भी दर्ज नहीं करते थे
वे सविधान से इतने ज़्यादा ऊपर उठे हुए थे
कि नीचे बहुत जगह ख़ाली थी

अत्याचार के सरल सूत्र थे उनके पास
सत्ता की कुर्सी पर
उस्तरा लिए बैठे थे
ऐसे काटते कि
टाँका लगाना भी मुश्किल हो जाता

बहुत सारे काम थे उनके पास
समुदायों के बीच घृणा फैलाना
वेरोजगार लड़कों को दंगाई बनाना
खुल्ला झूठ इस तरह बोलना
कि सुनकर सफ़ेद झूठ भी
शर्म से पानी पानी हो जाए

निस्संकोच निरापराध नागरिकों को मारते हुए
इतने ज़्यादा ईश्वरवादी थे
कि हत्याएँ और घर जलाने का काम भी
ईश्वर को साक्षी मानकर करते
वे संविधान की शपथ लेकर
झूठ बोलते हुए ही सत्ता में आए थे

वे संसार को मायारूप
और मनुष्य को
बहुत ही तुच्छ जीव मानते थे
स्त्री उनके लिए पहले से ही अपवित्र थी
घर जलने और तेजाब फेंकने की
कोई नई ख़बर सुनकर ही उन्हें नींद आती

लीला करना, नाना रूप धरना
झूठ के पहाड़ पर बैठकर मुस्कुराना
निरापराध को जेल भेजना
और हत्यारों को छुड़वाना
कानून से इस कलात्मकता के साथ खेलना
कि सब कुछ टूटकर भी
पवित्र न्याय साबुत बचा रहे
इतना विभ्रम और धुन्ध फैलाना
कि सच और झूठ का फ़र्क मिट जाए

वोट से ही आए थे
जनतन्त्र की उँगली पकड़े हुए
कितने मासूम और भोले जान पड़ते
वे आ ही गए थे और अब कुर्सियों पर डटे
धीरे – धीरे अपेक्षित काम को अनजाम देते हुए
अपने काम में पूरी तरह रम गए थे ।

दिल वालों की दिल्ली

बोलना था उन्हें
पर बोले नहीं
बोलने को बहुत बड़े बक्काड हैं
राजधानी पर नहीं बोले तो नहीं बोले
घर जल गए, जलते घर छोड़
जान बचाकर भाग गए लोग
पर राजधानी के इस अकेलेपन पर
नहीं बोले तो नहीं ही बोले

भीतर ही भीतर अकेले से हो गए
जैसा सोचा, सपना देखा
वैसा तो दिल्ली में कुछ हुआ नहीं
दंगा भी हुआ तो क्या दंगा हुआ ?
मुठ्ठी भर लोगों की ही जान ले पाया
देश के दामन पर इतना छोटा धब्बा ??

इस बढ़ती उम्र में
कसमसाकर रह गए विकास कुमार
बोलने को शब्द कम पड़ गए
जैसा सोचा वैसा तो न हुआ
नंगे भी हो गए
नंगा नाच फिर भी न हुआ
नव दंगाइयों ने बोलने लायक नहीं छोड़ा
जन की जन सजकता और समझ ने
कुमार साहिब को भीतर से तोड़ा

क्या बोलें ?
किस मुँह से बोलें ?
आज सब कुछ साधन होते हुए भी ?
दिल्ली ने मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा
ट्वीट करते हुए भी हाथ काँपते हैं
क्या करें ? कहाँ जाएँ ?
सोशल मीडिया को ही छोड़ दें क्या ?
बदलते जा रहे समय को भाँपते हैं
दाँत मिसमिसाते हैं गुस्से से काँपते हैं

जितनी मरने की ख़बरें हैं
उससे ज़्यादा लोगों ने लोगों को बचाया
सदभाव और सहकार के रास्ते में
धर्म आड़े नहीं आया
मात्र सेंकड़ों की संख्या में ही घर जले
ऐसे दंगे – फ़साद का क्या हासिल ?
जबकि दिल पसीजने की गुँजाइश
और आदमी के भीतर मनुष्यता बची रहे

नव दंगाइयों को दंगे का तमीज नहीं
न अनुभव न किसी रहस्य का ज्ञान
कि जानवर हुए बगैर संसार में
किसी भी तरह का दंगा सम्भव नहीं
सब कुछ दाँव पर लग जाता है
बदले में बहुत थोड़ा हिस्से में आता है
ढाँचा नहीं था एक शहर था दिल्ली
तोड़ना तो खूब चाहा
पर ठीक से टूट नहीं पाया

विकास पुरुष की असफलता को
विकास कुमार ही समझ सकते हैं
दिल्ली का क्या है दिल्ली ही है
घाव तो कुछ गहरे लगे हैं
पर धीरे – धीरे भर जाएँगे
दिल्ली फिर से जी उठेगी
दिल वालों की है दिल्ली
दिल वालों की ही रहेगी ।

डंका

दंगा हो जाने के बाद
सत्ता के झूठ का बजता है डंका
अहंकार को अभिव्यक्त करता
स्त्रियों – बच्चों के मान मर्दन के बाद
मर्दानगी का बजता है डंका
डंका है कि बेधड़क – सरेआम
डंके की चोट पर बजता है
और बजता ही चला जाता है

घर जल रहे होते हैं इधर
पृथ्वी के दूसरे छोर पर बहुत दूर
सुनाई पड़ता है डंके का अनुनाद
बावजूद सुनाई नहीं पड़ता
किसी स्त्री का विलाप
न रुदन, न चीत्कार, न हाहाकार

विकास कुमार मन्द – मन्द मुस्कुराते
देख रहे होते हैं
टी० वी० पर जलती हुई राजधानी
विजय घण्ट बजने, घोड़ों के हिनहिनाने
वीरों के हुँकारने और लाचारों को काटने की
मिलती रहती हैं गुप्त सूचनाएँ
दंगा चालू रहता है देश में और
दुनिया में बजता रहता है देश का डंका

बेरोज़गारों पर पड़ती है मार
धिक्कार, धिक्कार, धिक्कार
आँकड़े मिटाकर झूठ बोलती है सरकार
दंगाइयों की भूमिका पर
कभी भी नहीं हो पाता पुनर्विचार
दिल्ली में डंका बजने के बाद
कलकत्ता के लिए सजने लगते हैं हाथी

डंका बज रहा होता है दसों दिशाओं में
और बज – बज कर चपटा हो जाता है ।

चंदूलाल कटनीवाले

इस क़स्बे में उनका आखिरी पड़ाव था
वे सरकारी खर्च पर कबीर को गाने आए थे
सरकार की तरफ़ से थी व्यवस्था उनकी
एस० डी० एम० ने तहसीलदार से कहा
तहसीलदार ने गिरदावर से
गिरदावर ने पटवारियों से
पटवारियों ने दिलवा दिया था उन्हें माइक
स्कूल के हॉल में कुर्सियाँ पहले से पड़ी थीं
ताँगे में ऐलान हुआ था सरकारी ढंग का
जिसमे चंदूलाल कटनीवाले से ज़्यादा
सरकार के संस्कृति विभाग का ज़िक्र हुआ
इतना सब होने के बाद चंदूलाल को सुनने
आए पचासेक लोग

आर्गन पर एक लड़का बैठा था
जिसका चेहरा बहुत सुंदर था
अपनी पोलियोग्रस्त टांगों को उसने
सफ़ाई से छुपा लिया था आर्गन के उस तरफ़
और बैसाखियाँ सरका दी थीं परेड के पीछे
तबलावादक ऎसा जान पड़ता था
जैसे किसी ध्वस्त मकान के मलबे में से
अभी निकलकर आया हो बाहर
उसे मुस्कराने का कोई अभ्यास नहीं था
पर वह मुस्कराए जा रहा था लगातार
चंदूलाल तनकर बैठे थे हारमोनियम लिए
आठ घड़ी किया शाल पड़ा था उनके कन्धों पर

गाने को तत्पर थे चंदूलाल
पर जुट नहीं रहे थे उतने लोग
उनके झक सफ़ेद कपडों में
चुपके से आकर दुबक गई थी उदासी
बेमन से गाने को हुए ही थे चंदूलाल
इतने में अचानक आ गए अपर साहब
अपर साहब को आता देख
खड़े हो गए श्रोता
खड़ा हो गया सरकारी तंत्र
चंदूलाल के गले में अटक गए कबीर भी
खड़े हो गए चंदूलाल के साथ ।

अभिनेता 

मैं एक ऐसे अभिनेता को जानता हूँ
जो स्टेशन पर उतरते ही
चलने लगता है मेरे साथ-साथ
बार-बार लपकता सामान की ओर
पूछता हुआ, ‘‘कहाँ जाना है भाई साहब ?
चलो, रिक्शे में छोड़ देता हूँ,’’
उम्मीद की डोर से बंधा
अपनी घृणा को छुपाता हुआ
वह काफ़ी दूर चलता है मेरे पीछे-पीछे

भर दुपहरी में
जब सब दुबके रहते हैं अपने-अपने घरों में
उस बूढ़े अभिनेता का क्या कहना
बहुत दूर सड़क से
सुनाई पड़ती है उसकी डूबी हुई आवाज़
जो बच्चों के लिए कुल्फ़ी का गीत गाता है

एक लड़का मिलता है टॉकीज के पास
रास्ता चलते पकड़ लेता है हाथ
मैं भयभीत होता हूँ इस अभिनेता से
मैं डरता हूँ उसकी जलेबियों से
वह ज़िद के साथ कुछ खिलाना चाहता है मुझे
मेरे इनकार करने पर कहता है,
‘‘समोसे गरम हैं
कहो तो बच्चों के लिए बांध दूँ ?’’

एक अभिनेता ऐसा है शहर में
जो कपड़ा दुकान के अहाते में
बैठा रहता है कुर्सी लगाए
हर आते-जाते को नमस्कार करता
दिनभर मुस्कुराता ही रहता है
और महीना-भर में
सात सौ रुपया पगार पाता है

गली, मोहल्लों, हाट, बाजार और सड़कों पर
हर कहीं टकरा ही जाते हैं ऐसे अभिनेता
पेट छुपाते हुए अपनी-अपनी भूमिकाओं में संलग्न
जीवन से ही सीखा है उन्होंने अभिनय
जरूरतों ने ही बनाया है उन्हें अभिनेता
ऐसा भी हो सकता है अपने पिता की उंगली पकड़
वे चले आयें हो अभिनय की उस दुनिया में
पर उनका कहीं नाम नहीं
रोटी के सिवाय कोई सपना नहीं उनके पास
ऐसे कुछ लोग भी हैं इस समाज में
जो इन अभिनेताओं की करते हैं नकल
और बन जाते हैं सचमुच के अभिनेता।

विरासत

मेरे पूर्वजों ने बाँधा नहीं नदियों को
जंगल साफ करके बनाये नहीं खेत
यों करने को बहुत कुछ किया
झूठ के बड़े-बड़े पुल खड़े किये
सात कमरों के भीतर क़ैद किया सत्य को
उनके इशारे पर रेते गये कलाकारों के गले
बिछाये गये कामकरों के रास्तों में काँटे
आततायियों के राजतिलक हुए
मक्कारों के वजीफ़े मुकर्रर किये गये

ऐसी ऊँची जात में पैदा होकर
कैसे छुपाऊँ अपनी शर्म को
ऐसे शब्द-शिल्पियों और शिक्षाविदों का क्या करूँ
जो अत्याचार को न्यायसंगत ठहराते रहे
कलंक-गाथाओं को करते रहे महिमा-मण्डित
जिनके रहते अपने ही घरों में
बिलखते-बिलखते गूंगी हो गयीं स्त्रियाँ

कूप-मण्डूकता का पाखाना है मेरे घर में
पोथियों के ढेर में कहाँ जाकर छुपाऊँ चेहरा
अपने मन को कब तलक बरगलाऊँ
पीढ़ियों का सिंचित पाखण्ड
आया है मेरे हिस्से में
किस जल से धोऊँ अतीत की कालिख
इस पवित्रता से कैसे पीछा छुड़ाऊँ !

आम 

असमय हवा के थपेड़ों से
झड़ गये आम
अपने बोझ से नहीं
झड़े समय की मार से

बेमौसम अप्रैल की हवाओं ने
एक घर भर दिया कच्चे आमों से
आम न हों जैसे
भगदड़ में मारे गये
शव हों मासूम बच्चों के

जो आँखों ने सँजोये थे
झड़ गये वे स्वप्न
गयी कई दोपहरों की रखवाली
गयी चमक बूढ़ी आँखों की
इन्तजार गया कई महीनों का
पहले झड़े आम
फिर झर-झर झरी
आँखों से पानी की धार

पहली गिरी अमिया के साथ
चीखी एक औरत
फिर ताबड़तोड़
सब दिशाओं को लपके
ऐसे झड़े आम
कि झड़ते ही गये
झड़ते ही गये।

ऐनक

घर में रहता तो आता किस काम
इसलिए चला आया यह भी
बुढ़िया की अन्तिम यात्रा में

सिर के पास आँटी से अटका
चल रहा है अरथी में साथ-साथ
याद दिलाता हुआ उस स्त्री की
जो कुछ घण्टे पहले
निखन्नी खाट पर बैठी
कुतर रही थी सुपारी
और एक झटके में ही चल बसी

बुढ़िया के होठों पर अब भी
पड़ी है जर्दे की पपड़ी
जो धुल नहीं सकी अन्तिम स्नान में
नसेनी में बँधी है उसकी देह
जो धारण करती थी इसे
जरा से खटके पर
टटोलने लगती थी सिरहाने
और झट चढ़ा लेती थी आँखों पर

निर्जीव चीजें भी हो जाती हैं बेसहारा
जैसे बूढ़ी आँखों से
बिलग होकर यह ऐनक

गानेवाली औरतें 

वे रोते-रोते गाने लगीं
या गाते-गाते रो पड़ीं
ठीक-ठीक कह पाना मुश्किल है

घर से निकलीं तो गाते हुए
हाट-बाजार में गयीं तो गाते-गाते
चक्की पीसी तब भी गाया
आँगन बुहारते वक्त भी
हिलते रहे उनके होठ

अकेले में आयी किसी की याद
तो गाते-गाते भर आया कण्ठ
गाते-गाते रोटियाँ बनायीं उन्होंने
पापड़ बेले, सेवइयाँ और बड़ी बनायीं गाते-गाते
गाते-गाते क्या नहीं किया उन्होंने
वे उस लोक से
गाते-गाते उतरीं थीं इस धरा पर

जन्मीं तब गाया किसी ने गीत
गीत सुनते-सुनते हुआ उनका जन्म
दुलहन बनीं तो बजे खुशियों के गीत
गाते-गाते विदा हो गयीं गाँव से
पराये घर की देहली पर पड़े जब उनके पाँव
गीत सुनकर आँखों में तैरने लगे स्वप्न
वे अगर कभी डगमगायीं तो
किसी गीत की पंक्तियों को गाते-गाते सम्हल गयीं

गाना कला नहीं था उनके लिए
वे कुछ कमाने के लिए नहीं गाती थीं
गीत उनकी जरूरत थे
और गीतों को उनकी जरूरत थी।

संस्कार

खाना खाते वक्त
गिर पड़ता है मुँह का कौर
पता नहीं कौन भूखा है ?
अपनी संस्कारजन्य पीड़ा
परेशान करती है

अभावों को रौंदता हुआ
घाटी तो चढ़ आया
पर बार-बार देखता हूँ पीछे
बार-बार होता हूँ उदास।.

जानकार 

उनकी आँखों में जादू-सा सम्मोहन था
ज्ञान के दम्भ से दमकता था उनका चेहरा
एक रूढ़ हो चुकी
भाषा के तीरकमान थे उनके पास
उन्हें सुने बगैर गुजर पाना मुश्किल था
हर नये आदमी से वे कहते,
‘लेना हो तो झुककर लो’
इस तरह ज्ञान देने से पहले
वे झुकना सिखाते हर एक को

मुस्काते-मुस्काते थकते न उनके होंठ
कोई बोलता तो रोक देते इशारे से
कहते प्रश्नाकुलता अच्छा गुण है
पर बोलने से पहले आज्ञा तो ले लो

हम जो कहते हैं उसी में छुपे हैं समाधान
मनन करो ! गूढ़ बातों की तह तक जाओ
गहरे उतरोगे तो
छँट जाएगा आत्मा का अन्धकार
भीतर पैठकर ही मिलेंगे ज्ञान के मोती

खोलकर देखो अपने ज्ञान-चक्षुओं को
वे मुक्त होने का मन्त्र देते
इस भव की यन्त्रणाओं का करते बकान
तरह-तरह से डरना सिखाते
तरह-तरह से करते भय की निष्पत्ति।

चिंतामणि-1

होनी को कौन टाल पाया है
काल भी कैसा निष्ठुर है
काल के गाल में समा गये चिन्तामणि
मौत के आगे बौने हुए चिन्तामणि
इतना ही लिखा था
जितना जिये चिन्तामणि

क्या करते थे चिन्तामणि ?
चिन्तामणि चिन्ता करते थे
बहुत अच्छा बोलते थे चिन्तामणि
हरदम बात करते जनहित की
कहते, ‘‘विकास की गंगा बहा देंगे,
सड़क देंगे, पुल देंगे, बड़े-बड़े भवन देंगे,’’
उद्घाटनप्रिय थे चिन्तामणि
जन-जन के प्रिय थे चिन्तामणि

चिन्तामणि चले गये
अगर जीते तो पता नहीं क्या होते
मौत भी तमाशा हुई
आयी जब स्क्रीन पर

कितने ब्रेक लगे
कैसा रुक-रुककर मरे
कितना पीटा गया मृत्यु का समाचार
ईश्वर, सबको ऐसी मौत दे
ईश्वर, चिन्तामणि की आत्मा को शान्ति मिले।

चिंतामणि-2 

म राजोरिया

न राम रहे, न रावण
न राजा रहे, न बादशाह
मिट गये नवाबों के भी नवाब
बड़े भइया, छोटे बना, हुकुम, लम्बरदार
सब मिल गये घूरे की धूल में

पर चिन्तामणि तो चिन्तामणि हैं
अजर, अमर, अमिट हैं चिन्तामणि
इतिहास के प्रेत हैं चिन्तामणि

जैसे भूख शाश्वत है
वैसे ही शाश्वत हैं चिन्तामणि
चिन्तामणि का बेटा भी है चिन्तामणि
न हवा सुखा पाएगी उन्हें
न जल भिगो पाएगा
न कभी विभाजित होंगे
न घुल पाएँगे किसी द्रव में

कहाँ मरे हैं चिन्तामणि ?
कपड़े बदल रहे हैं चिन्तामणि।

चिंतामणि-3

चिन्तामणि की मृत्यु से
खाली हो गया खाली स्थान
चिन्तामणि भ्रम थे
उनकी मृत्यु भी भ्रम है
व्यसन थे चिन्तामणि
चिन्तामणि बन गये थे हमारी आदत

हमें अब विकल्प चाहिए
विकल्प नहीं, हमें तो चिन्तामणि ही चाहिए।

हमला

आतंक का ऐसा घेरा
और यह घना अन्धकार
इससे पहले तो कभी नहीं था
ऐसा विकट सन्नाटा

एकता भी कहाँ बचा पायी उन्हें
एका करके चिल्लाए
तो आ गये धमाके की चपेट में
विरोध करने से हुआ कहाँ विरोध

जिन्होंने बचाव में उठाये हथियार
वे हर हाल में मारे गये
जिन्होंने नहीं उठाये हथियार
वे आ गये निर्दोष मृतकों की सूची में
जो हथियार भर बोले
धर लिये गये हथियार कहने के जुर्म में

जो डरते थे हिंसक आँखों से
बाँधे हुए थे मुँह पर मुसीका
पर भाँप न सके हवा का रुख
और अपने ही कपड़ों की सरसराहट से
आ गये उनके अचूक निशाने पर
कराहें, चीखें और किलकारियाँ
दब गयीं भारी बूटों तले
वे कदमताल करते हुए आये
और मारते हुए गुजर गये।

बुलावा

जिस तरह के संबंधों के साथ
जिन लोगों के बीच मैं रहता हूँ
वहाँ तरह तरह के अवसरों पर
तरह तरह से आते हैं बुलावे

दरवाजे पर कार्ड फेंक जाता है कोई
परम पूज्यनीय कैलाशवासी पिता की है बरसी
फलाँ तिथि को है गंगापूजन सो जानना जी
कोई आकर कहता है -फूफाजी ने भेजी है गाड़ी
सब जनानी चलें संतेाषी माता के उद्यापन में
कभी किसी चचेरे भाई का आता है फोन
ग्रह शांति के लिए कर रहे हैं जाप
तुम न आ सको तो बहू को भेज देना

एक रंगीन आमंत्रण ऐसा भी आता है
छपा होता है जिसमें एक बड़ा घर
कभी पड़ोसी हाथ जोड़ करता है मनुहार
दुकान का उद्घाटन है भाईसाहब
आप भी पधारें भक्तांबर पाठ में
अनमना सा एक मित्र करता है शिकायत
आप तो हमें भूल ही गए
आपको छोड़ सब आए घर मिलने
फादर लौटे जब चारों धाम की यात्रा से

इस असंतुलित होते जाते समाज में
एक तरफ जड़ताएँ टूटती जाती हैं
तो दूसरी तरफ से
नई-नई मूर्खताएँ अपनी जड़ें बनाती हैं
आने जाने से फर्क नहीं पड़ता
अगर कोई बुरा भी मान जाता है
तो दूसरे ही दिन एक नया बुलावा आता है

वरीयता

ऐसे-ऐसे भी हैं इस महादेश में
जो अन्धे, लँगड़े या अपंग होने का
अभिनय न कर पाने की लाचारी से विगलित
जो गरीब-गुरबों से भी कुछ नीचे
जिनके पास नहीं है
किसी भी रंग का राशनकार्ड
जिनकी जात का कुछ कियाम नहीं
कोई धर्म जिन्हें झेलने को तैयार नहीं
जो रह गए हैं
जन होने की वरीयता से भी वंचित।

सदाचारी

वे नियम से करते हैं खान-पान
नियम से करते हैं स्नान-ध्यान
नियम से करते हैं व्यायाम
नियम से करते हैं प्रार्थना
नियम से थोड़ा ब्याज खा लेते हैं
पर नियम से कभी प्याज नहीं खाते।

भूल ही जाएँगे

भूल ही जाएँगे एक दिन
टिमटिमाते तारों के बीच
खिलखिलाकर हँसते चाँद को
काली रात की आँखों से
रुक-रुककर रिसते आँसुओं को
ओर बर्फीली हवाओं के बीच
दूर तक फैले घने अंधकार को

भूलना ही पड़ेगा आखिर
अपने दुर्दिनों में हुए अपमानों को
और राख के नीचे
दिपदिपाते हुए लाल अंगार को
एक दिन मान ही लेंगे
कि गुस्सा तो कैसा भी हो अच्छा नहीं
अपनी सहजता के खोल में छुपी
धारदार चालाकी के हाथों
एक दिन खेत हो जाएँगे हम

यही रह जाएगा कहने को
कि हम छले गए समय के हाथों
हम तो भूल ही जाएँगे
पंखुड़िया की दमकती ओजस्विता को
और तितलियाँ पकड़ने वाले हाथों में
लगे रह गए पीले रंग के कणों को।

रफ्तार 

(1)

अलग-अलग लोगों के लिये
अलग-अलग तरह से काम करती है रफ्तार
एक वे जो भागती रेलगाड़ी पर सवार हैं
और जल्द पहुँचना चाहते हैं अपने घर

दूसरे वे जो कभी रेलगाड़ी में नहीं बैठे
जिनके अपने घर ही नहीं
डरे-सहमे से भागती गाड़ी को देखते हैं

एक रफ्तार आगे की तरफ बढ़ाती है कदम
दूसरी कान पर हथौड़े की तरह पड़ती है

(2)

मैं उन तीन करोड़ बच्चों की बात कर रहा हूँ
जिनके लिए काला अक्षर भैंस बराबर है
जो स्कूल जाने की उमर में
खेतों से मटर की फलियाँ तोड़ते हैं
दुनिया भर के न जाने कितने काम
अनचाहे आ गए उनके हिस्से में

एक दिन यूँ कर बैठते हैं
रेल की पटरी से उठा लेते हैं गिट्टियाँ
और रेलगाड़ी पर टूट पड़ते हैं

ये घातक निशानेबाज
जिनके बदन पर कुल जमा
एक मैली पट्टे की चड्डी है
जो प्रतियोगी शब्द का तो अर्थ भी नहीं जानते
मेले-ठेलों में जिन्हें कभी
एक फुग्गा तक फोड़ने को नहीं मिला
गिट्टी के अचूक निशाने से
फोड़ देते हैं यात्रियों के सिर

क्या हो जाता है अचानक
कि भागती रेलगाड़ी की रफ्तार
आँखों को चुभने लगती है
यह एक ऐसी अपराधी रफ्तार है
जो किसी को भी एक दिन
मामूली होने के अहसास से भर देती है

स्वप्न भर नहीं है यह नाटक

पथरीले रास्ते पर चला जा रहा ट्रेक्टर
पीठ किये हुए सिर झुकाए बैठीं नंगी पहाड़ियाँ
पीछे छूटती जा रही हैं चाँदनी में
हम सब एक ट्राॅली में बैठे हैं
वह भी बैठी है बनारसी साड़ी पहिने
पाउडर पोत रखा है उसने चेहरे पर
और दो-दो रंगों की लिपिस्टिक लगा रखी है होंठों पर
एक विदेशी स्त्री बैठी है उसके पास
और हमारी बोली में बतिया रही है

पता नहीं कहाँ को जा रहे हैं हम
एक लड़का जोर-जोर से संवाद पढ़े जा रहा है
कुछ लोग हँस रहे हैं लड़के को देखकर
कोई कह रहा है-‘अब हमे शुरू करना चाहिए’
पर उसकी पलकें तो शर्म से झुकी हैं
मजदूरन बनकर भी वह सुंदर दिखना चाह रही है
विदेशी स्त्री कोंच रही है कि कुछ बोलो भी
इस तरह तो न हो पाएगी रिहर्सल
कोई कह रहा है कि दचके तो बहुत लग रहे हैं
ऐसे में कैसे पढ़ सकते हैं हम अपने संवाद

पता नहीं क्या-क्या हो रहा है
विचित्रताओं में कही कोई तालमेल नहीं
जंगल से एक बच्चे के रोने की आवाज आ रही है
और बबूल के रूखों पर
सहमे हुए तोते बैठे हैं

बड़े भाईसाहब चटाइयों का गठ्ठर लिए हैं कंधे पर
उनका चेहरा तीस साल पुराना है
थेगड़ा लगी पेंट पहिनी हुई है उन्होंने
और कह रहे हैं- ‘‘तुम अपना नाटक करना
और मैं अपनी चटाइयाँ बेचूँगा हाट में’’
विदेशी स्त्री कह रही है कि वह भी
सीताफल की एक खास किस्म के बीज लाई है
और अपनी दुकान सजाएगी हाट में
रोनी सूरत लिए बैठे हैं साहिबाबाद वाले फूफाजी
उनकी नौकरी छूट गई है
वे हाट में अपना गुड़ बेचने जा रहे हैं

बदहवास सा एक जन चिल्लाए जा रहा है
और तेज…..और तेज….जल्दी-जल्दी चलो
हमारे पीछे आ रहा है मधुमक्खियों का झुण्ड
पर उस आदमी की तरफ किसी का ध्यान नहीं
रामचरण मिस्त्री संचालक की नकल उतार रहा है
‘एक रुपया जी.एम. साहिबान की ओर से
राम का पाठ अदा करने वाले
चुन्ना खवास को प्राप्त हुआ है
मण्डल की ओर से मैं उन्हे धन्यवाद देता हूँ’’
एक जन चिल्ला रहा है
भैया इस ट्रेक्टर को जरा रुकवाओ तो सही
गोरी बहिनजी को शूऽऽशूऽऽ आ रही है

मैं डरा हुआ हूँ मधुमक्खियों से
और विदेशी स्त्री खुली बाहों को
कम्बल से ढँकने की कोशिश कर रहा हूँ
मेरा हाथ झटकते हुए वह हँसे जा रही है
मेरी बनियान पर अरहर की दाल के धब्बे हैं
मैं बनियान उतार रहा हूँ तो
उसके नीचे एक ऊनी स्वेटर निकल रहा है
स्वेटर के नीचे फिर एक रंगीन कमीज है
मैं उतारता जा रहा हूँ कमीजें
पर निकलती ही जा रहीं हैं
कमीज के भीतर से और नई कमीजें
मैं हाँफ रहा हूँ और घबराया हुआ हूँ
विदेशी स्त्री हँसे जा रही है लगातार
कोई कह रहा है- ‘देखो जंगल में आग लग गई है
और इन मूरख तोतों को कुछ खबर ही नहीं’

दूर कहीं बाजे बज रहे हैं
पहाड़ के पीछे उठ रहे हैं रोशनियों के पुँज
कई जन भोंपू पर चीखे जा रहा है
पत्थरों से टकरा टकरा कर
सब दिशाओं में फैल रहे हैं शब्द-
‘हम सबसे खराब सोयाबीन को भी
सबसे ऊँचे दामों में खरीदेंगे
यह कोई चालू काँटा नहीं है भाईसाहब
यह तो कम्प्यूटर वाला काँटा है श्रीमान
खून चूसने वालों से सावधान
हम देंगे किसान के एक-एक दाने का दाम’

सबकुछ गड्डमगड्ड होता जा रहा है
विदेशी स्त्री कह रही है कि देखो
तुम्हारे बालों से चूती पसीने की धार ने
तुम्हें एक मजदूरन के कितने करीब ला दिया है
और धूल से लथपथ यह तुम्हारी साड़ी
अब सिर्फ एक चिथड़ा जान पड़ती है

इधर मोहनलाल पगला गया है
और हवा से ऊलजलूल बातें कर रहा है-
‘इस लाल मुँह वाले लड़के को रस्सी से उतारो
किसने कहा था इतना कसकर लंगोट बाँधो
देखो कहीं रस्सी के दाब से
इसके अण्डकोष न फूट जाएँ
सम्हलो! वह गिरा… देखो वह गिरा…
वह लंका के ऊपर नहीं
हमारे ऊपर गिर रहा है’

एक भोंपू पर लंगुरिया बज रही है
तो दूसरे भोंपू पर कुछ लोग राई गा रहे हैं-
‘भैया भरत से न मिले
ढूँढ़े तीनई लोक…भैया भरत से….
तीसरे भोंपू पर फिर वही शब्द हैं-
‘यह डाबर चना है भाईसाहब
इसे हर कोई नहीं पचा सकता
इसे साहिब लोग ही खाते हैं
काबुली घोड़े ही इसे पचा पाते हैं
जो भाई अपनी तौल करवा चुके हैं
वो बगल को हो जाएँ
और सब भाइयों से गुजारिश है
कि वे हमारी दुकान में जरूर आएँ’

था भोंपू किसी हँसोड़ ने थाम लिया है
और वह बेसुरी होली गा रहा है-
‘ताती जलेबी दूदा के लाड़ू
खाबत नइएँ, बलम रूठे
ठठरी के लगे……’’
हँसोड़ा अब कुछ और मजे में आ गया है
और गाते-गाते ही भोंपू पर
मन्दिर के पुजारी को चिढ़ा रहा है-
’हे! पुजना सोच न करो
हे! मंगता सोच न करो
हे! खउआ सोच न करो
खुल गई खुसनियाँ, खुल जान दो’

ट्रेक्टर में कुछ सन्नाटा है
उसकी आँखों में लाल डोरे तैर रहे हैं
विदेषी स्त्री उसे हिचकोलों में सहारा दे रही है
कुछ कहने के लिए मजदूरन के होंठ हिले हैं-
‘उड़ जाओ सुआ!
मुझ पर तो कर लो भरोसा
किसी न किसी पर तो करना पड़ता है भरोसा
हालाँकि डर बहुत है
शोर भी कितना है हर तरफ
कि सहम कर चुप बैठ जाने में भला है
पर इस तरह ही चुप बैठे रहे सहमे हुए
तो झुलस जाओगे जंगल की आग में
उड़ जाओ सुआ!
उड़ जाओ मेरे ललना
अगर कहीं तुम उड़ो तो
उनके नीम पर कभी मत बैठना
वे तुमसे कहेंगे -’बोल बेटा सीऽऽऽताराम’
और कहीं तुम चुप रहे
तो उखाड़ लेंगे तुम्हारे पंख
उड़ जाओ सुआ! उड़ जाओ!
सारे आसमान पर छा जाओ
फैल जाओ सब दिशाओं में’

उठा का उठा रह गया उसका हाथ
इधर रामचरण को कुछ हो रहा है
उसकी आँखें बाहर निकल आई हैं
और थूक उचटाता हुआ वह
हवा को चेतावनी दे रहा है-
’बचोऽऽ देखो! वो हमारे ठीक पीछे हैं
कितनी तेजी से बढ़ रही हैं मधुमख्खियाँ
सम्हलो! नहीं तो आ जाओगे इनकी चपेट में
चेहरे ढाँप लो! चेहरे ढाँप लो!
कम से कम चेहरे तो बचे रहें’

रामचरण की कोई नहीं सुन रहा
विदेशी स्त्री कह रही है कि कविता क्यों रोक दी
कविता नहीं यह सच है
और सच को तो आना ही चाहिए नाटक में
हिचकोले खाते हुए भी जारी रखना है इसे
नाटक में लय, संगीत, संवाद, अभिनेता और अंतर्विरोध से पहले
सच का होना कितना जरूरी है

कितना सारा मुर्दाशंख पोत लिया है मोहन लाल ने
आँखों की कोरों में लगाए हैं काजर के डिठौने
और पेट से बाँध लिया है एक मटका
उसने फूफाजी को नीचे पटक लिया है
और दोंनो हाथों में उनका चेहरा लिए
वह फफक-फफक कर रो रहा है-
’उठो मेरे प्राणनाथ! उठो!
एक बार….सिर्फ एक बार लगा लो गले
कैसे बिलख रही हूँ तुम्हारे वियोग में
कितने बाण मारे हैं उस वनवासी ने
सिर धड़ से अलग कर दिया
कल ही तो तीन घड़े सोमरस पीया था तुमने
और मेरे हाथ की पुंआर की भाजी खाकर सोये थे
सुषेण की जड़ी-बूटियाँ तुम्हें लगती नहीं
और हरनारायण की सुई से तुम डरते हो
राक्षस जात में कौन मानता है स्त्रियों का कहा
तुम आ ही गए दादा भाई की बातों में
उठो मेरे प्राणनाथ! उठो!
एक बार तो निरख लो अपनी प्राणप्यारी को
ये आर्य किसी को नहीं छोड़ेंगे
ये आर्य सब कुछ नष्ट कर देंगे एक दिन
हमारी पहचान, सभ्यता और हमारे रोजगार’

रोशनियों के नजदीक पहुँच रहे हैं हम
और भोंपुओं की आवाज तेज होती जा रही है
संकरे रास्ते वाली पहाड़ी घाटी पर
हुरऽऽहुरऽऽ करता हुआ चढ़ रहा ट्रेक्टर
चाँदनी में घुल रहे हैं जादुई शब्द
भोंपू फिर बोल रहा है-
’जिन भाइयों का हिसाब हो चुका है
वे अभी घर न जाएँ
आँख भर एक बार जरूर देखें हमारी दुकान
देखने का कोई दाम नहीं है
मोल-भाव का कोई काम नहीं है
दुकानें तो बहुत देखी होंगी भाईसाहब
पर ऐसी ठण्डाई नहीं देखी होगी कहीं

जो लेना है,ले जाओ
जितना लेना है, उतना ले जाओ
सामान ही सामान है
सामान ही सामान है…
सुई से लेकर ट्रेक्टर तक ले लो
और फिर यह दुकान तो इतनी बड़ी है
कि तुम्हारे सारे बाजार इसमें समा जाएँगे’

बड़े भाईसाहब मेरा कंधा झिंझोड़ रहे हैं
उन्होंने एक कोने में खींच लिया है मुझे
और अपना गुस्सा दबाते हुए पूछ रहे हैं-
’अब किसका इंतजार कर रहे हो ?
कपडे़ पहिन लो और जल्दी करो!
नाटक हो या स्वप्न पर यह सच है
कि वे लोग तो अब आ ही चुके हैं
और अब हमारे ठीक सामने हैं
नाटक ही होता रहेगा या अब भी कुछ करेंगे
कब से कहे जा रहा हूँ कि इन्हें रोको
मादरचोदों को मत घुसने दो हमारे घरों में
रोकोऽऽ इन्हें रोको
तिलचट्टे हैं ये तिलचट्टे
माटी के घरों को चट कर जाएँगे एक दिन’।

चूल्हे का दुख 

मेरे धुएं के उस पार
कांपते हुए कुछ चेहरे हैं।

मैं अपराधी हूँ एक स्त्री का
जो निकालती है मेरे भीतर से राख
धो पोंछकर सुलगाती है मुझे
और घंटो बैठी रहती है अकेले
मेरे न जल पाने की चिंता में

कैसे कहूँ डरता हूँ
उसकी चूडियों की खनक से
मेरे काले रंग में घुल रही है
उस अकेली स्त्री की उदासी

मै अपराधी हूँ उसका
जो बार-बार फेरती है
पीली मिट्टी का पोता
और मैं हर बार
दीवारों पर छोड जाता हूँ कालिख़।

हंसीघर

अब नहीं लगता मेला
नहीं आता क़स्बे में हंसीघर
हंसना भूल गये हैं पिता
दर्पण में दिखाने को
नहीं रहे उनके पास दांत
और मेरे पेट में
दांत उग आये हैं

दो आने के टिकट में
लंबे और चपटे हो जाते थे चेहरे
यह खेल उम्दा था
सबसे सस्ता था यह खेल
विपदा के मारे हुए लोग
चले आते थे यहां हंसने
पिता की अंगुली पकड बहुत पहले
मै भी गया था हंसीघर
सस्ते दामों में हंसना
उन दिनो पिता के लिये ज़रूरी था
पिता के पेट में बल
और मेरी धमनियों में भय ने
प्रवेश किया था उस दिन

हंसीघर में आकर
बच्चों की तरह हो गए थे पिता
और मैने उसी दिन देखा
कि उथले और उभरे दर्पणों में जाकर
बिगड जाते हैं हमारे चेहरे

अब तो मै जवान हो गया हूँ
जांचकर ख़रीदता हूँ दर्पण
बनकर जाता हूँ दर्पण के सामने से
अब मैने सीख लिया है
ठीक तरह हज़ामत बनाना
सारे बेडौल और टूटे दर्पणों को मैं
कूडे के ढेर में डाल आया हूँ।

अभिनय

अपनी तरह से नहीं
उनकी तरह से करना था अभिनय
वही थे नियन्ता
हमें तो करते चले जाना था अनुसरण
संकेतों से समझने थे निहितार्थ
संकेतों से करनी थी एक झूठ की निष्पत्ति

अन्धकार से भागना था
प्रकाश वृत्तों की ओर
बोलते-बोलते वहाँ से?
लौट आना था अन्धकार में
कहा जाता चार क़दम चलने को
तो चलना था चार ही क़दम
बोलना था
बोलकर ठिठक जाना था
ठिठककर
फिर चले जाना था नेपथ्य में
कभी मारना था जोर से ठहाका
कभी रोना था बुक्का फाड़कर
कुछ भूमिकाओं में तो
चुप ही रहना था पूरे वक़्त

इस तरह की भी थी एक भूमिका
कि एकाएक मनुष्य से
तब्दील हो जाना था एक घोड़े में
घोड़े से फिर एक व्यापारी में
व्यापारी से फिर एक निरीह ख़रीदार में
यही थी अभिनय की नियति
जीवन ही था एक नाटक का होना
जहाँ अन्ततः
तब्दील होना था हमें एक ग्राहक में।

इन्तज़ाम 

देश में यह कैसा इन्तज़ाम?
एक आदमी के पास घर नहीं
एक के पास पाँच-पाँच मकान

एक आदमी के पास इस्पात की तिजोरियाँ
कपड़ा, गहना, गुरिया सामान ही सामान
एक के पास चीथड़ों की पोटली
पायजामें में फटी जेबें
इन्तज़ार, तिरस्कार, अभाव और अपमान
देश में यह कैसा इन्तज़ाम?

भूख की मार से जहाँ मर जाएँ लोग
ग़म खाकर जहाँ ठहर जाएँ लोग
इतने आ गए और न आएँ लोग
बच गए कहाँ जाएँ वे लोग
जब कोई दवा करती न हो काम
देश में यह कैसा इन्तज़ाम?

उल्लू

एक लकवाग्रस्त बूढ़े आदमी की बड़बड़ाहट से
कितनी मिलती-जुलती है तुम्हारी आवाज़
वर्षों से नहीं आए तुम गली में
पहले तो डैने फड़फड़ाते हुए
रात के तीसरे पहर
रोज़ ही आ फटकते थे

विपदाओं को तो आना ही होता था
संयोग से तुम भी आए उन्हे रास्ता देते हुए
वे जो ख़ुशहाल थे
तुम से जुड़ी डरावनी कहानियाँ
नहीं सुनीं उनके बच्चों ने
जिस रास्ते में पड़ती थी ख़ुशहाली
नहीं था वह तुम्हारा रास्ता

तुम तो उजाड़ से होते हुए
आते रहे मनहूस गलियों में
बिजली के खम्भे पर बैठ
गर्दन घुमा-घुमाकर
मुआयना करते रहे पुरानी बसाहट का

बदल रहा था क़स्बा
गलियाँ बाज़ारों में तब्दील हो रहीं थीं
कम से कमतर होते जाते थे तुम्हारे ठिकाने
पिछली बरसात में गिर गया वह बरगद
जहाँ बैठकर अक्सर तुम उस
खण्डहरनुमा लड़कियों के स्कूल को देखते थे
जिसकी दीवारें किसी जादू के सहारे खड़ी हैं

कुर्सी 

एक आदमी कुर्सी के लिए दौड़ता है
एक तनिक ठिठककर
तपाक से बैठ जाता है कुर्सी पर
कभी-कभी ज़िला सदर की कुर्सी
और एक घूसखोर की कुर्सी
एक ही तरह की लकड़ी से बनी होती है

एक कुर्सी ऐसी होती है
जिस पर बैठते ही शर्म मर जाती है
एक कुर्सी बैठते ही काट खाती है
कुछ कुर्सियाँ कभी न्याय नहीं कर पातीं
कुछ कुर्सियों के साथ न्याय नहीं हो पाता

एक कुर्सी ऐसी जिस पर बैठते ही
आदमी का चैन छिन जाता है
एक कुर्सी ऐसी जिसे देख एक आदमी
अपनी ही हथेलियों को दाँतों से चबाता है

इन्तज़ार के लिए बनाई गईं कुर्सियाँ
और फेंककर मारे जाने वाली कुर्सियाँ
सामान्यतः कुछ हल्की होती हैं

हमेशा पैसा फेंककर चीज़ें ख़रीदने वाले
नहीं मान सकते उन हाथों का लोहा
जो कुर्सियों को आरामदेह बनाते हैं
और इस दरम्यान कभी आराम नहीं कर पाते
जो सूखे पेड़ों को काटते हैं
जो पेट से धकेलकर लकड़ी को
मशीन पर घूमती आरी तक ले जाते हैं
जो ऊँघने वालों के लिए
एक पसरी हुई कुर्सी बनाते हैं

काला पत्थर 

एक सूरत ढल गई काले पत्थर में
गल्ला मण्डी चौराहे पर आकर
जम गई एक काली मूरत
अब अनाज से लदी बैलगाड़ियाँ
चौराहे को उनके पिता के नाम से जानेंगी

फूलों के हारों से लदे कैलाशवासी पिता
तनकर बैठे हैं नक्कासीदार सिंहासन पर
देहात से आए किसान
जैसे काँख में दबाए रहते हैं फटी छाता
पिता की काँख में भी
वैसी ही दबी है पत्थर की तलवार
दूसरे हाथ में लिए हैं काले पत्थर का गुलाब
काले पत्थर में दमकता रोबीला चेहरा
काले होंठों पर फैली रहस्यमयी काली मुस्कान
पर कुआँर की इस चटकती धूप में
काले माथे पर नहीं हैं
काले पसीने की महीन काली बून्दें

अपने दाहिने हाथ से वे
हटा रहे हैं रेशम की पीली चादर
नमन करते हुए पिता की स्मृति को
अनेक चेहरे हैं उनके आसपास
पर वे दूर कहीं
सूने आसमान की तरफ देखते हैं
पास ही देशी दारू की कलाली है
जहाँ से लौट रहे हैं झुकी कमर वाले हम्माल

अपने भीतर ही डूबे हुए चुपचाप
हम्माल जा रहे हैं म
मण्डी की ओर
पर वे सोचते ज़रूर होंगे
ये गोरे-भूरे साफ़-सुथरे आदमी
काले पत्थरों में ही क्यों ढलते हैं।

ख़ाली तार

कैसे-कैसे रो-झींककर मिली आज़ादी
आज़ादी मिलते ही मची मार-काट
सिर्फ दो-चार दिन ही रही आसपास
फिर तार पर बैठी चिड़िया-सी फुर्रऽऽ हो गई
गुण्डे, भक्त, साहूकार, धन्नासेठ हो गए आज़ाद
हमारे हिस्से में आया ख़ाली तार

गुप्त 

वे जब कुछ लिख रहे होते हैं
लिखते-लिखते डर जाते हैं अचानक
उन्हें पता है दीवारों के कान होते हैं
दीवारों, दरवाज़ों, रोशनदानों से डरते हैं वे
वे डरते-डरते ही काम करते हैं

वे गुप्त के सरोकारों से अनुप्रेरित हैं
जो जानना चाह रहे होते हैं
उसे छुपकर ही जानना चाहते हैं
वे गुप्त बने रहकर
जायजा लेते हैं खुली चीज़ों का

वे सरल-सी बातों को
गूढ़ बना देना चाहते हैं
बार-बार मन करता है उनका
चले जाएँ दुर्गम कन्दराओं में
पर हमेशा मिलते हैं खुली बसाहटों में

वे गुप्त सुचनाओं का सँग्रह करते हैं
पढ़ते हैं गुप्त रहस्यों से भरी पुस्तकें
शरीक होते हैं गुप्त वार्ताओं में
गुप्त नामों से ही लोग उन्हें पहचानते हैं
स्वप्न, हँसी, दुख और अपने सरोकार
बड़ी चालाकी से छुपा लेते हैं वे
अकेलापन और अन्धकार
कभी परेशान नहीं करता उन्हें

गुप्त बने रहना
नहीं है उनकी पेशागत मजबूरी
वे लोभ और अज्ञान के चलते
अपने आप से ही ख़ुद को छुपाते हैं
जिस तरह मशगूल हैं आज अपने काम में
उन्हें तो यह भी याद नहीं
कि उन्होंने तो चुना ही नहीं था यह काम

चोर बदन 

क्या उनके बारे में आप जानते हैं
जो काम से काम रखते हैं
काम पर जाते हैं काम से
काम नहीं तो घर लौट आते हैं
घर लौटकर काम का काम करते हैं
मसलन उनके काम के कामों के
होते हैं तमाम प्रकार

आड़ा या खड़ा वक़्त नहीं होता
उनका वक़्त अपना वक़्त होता है
जिनसे कभी काम नही पड़ता
भला, उनसे क्या वास्ता
ख़ुदा न खास्ता कभी पड़ ही जाए काम
तो खूँटी पर टाँग देते हैं मान-सम्मान
उनके भीतर कहीं पानी से भरा डिब्बा होता है
जो गाहे-बगाहे कभी थोड़ा-बहुत बजता है

जो अपने काम से ही काम रखते हैं
कैसा होता होगा उनके भीतर का संसार
मोर, हिरण, हवा, पहाड़, झरना होते होंगे उसमें
हो सकता है जब काम से ही
उन्हें जाना पड़ जाता होगा पहाड़
तब अपने भीतरी संसार में
कितनी जगह दे पाते होंगे वे पहाड़ को
काम में लगे रहना
और अपने ही काम में लगे रहना
दो अलग-अलग स्थितियाँ हैं
डर लगता है इन चोर बदन काम वालों से
जो इनसे डरते नहीं
वे उनके मित्र हो जाते हैं
फिर काम से घर लौटते वक़्त
काम से होती हैं उनकी मुलाक़ातें

काम से काम रखने वाले
बना लेते हैं पैसे की पकड़
पैसे की पकड़ से आदमी की भी पकड़ होती है
जिस तरह गुड़ से लगती हैं मक्खियाँ
उसी तरह आदमी और मक्खी में
वे ज्यादा फ़र्क नहीं कर पाते
काम से काम रखने वालों के जीवन में
सामान्यतः दो ही तरह के ख़तरे हैं
पहला बुरा समय और दूसरा बीमारी
मौत के बाद तो आदमी ही नहीं रहता
मौत पर सोचते-सोचते
वे थककर सो जाते है

जनेऊ

अपने अहसास से ही खलल पैदा करता
मल-मूत्र के विसर्जन के वक़्त
हरदम चढ़ा रहता कान पर
अपनी शुचिता के आतंक से धमकाता
नित नए भय के सृजन में संलग्न
यह जनेऊ ही है
या मेरा पीछा करता कोई आखेटक
सदियों से हूँ मैं इसके निशाने पर।

यह जनेऊ है या किसी जानकार का टोटका
जैसे जादू किया हो किसी ने
देह पर यह कैसा अपरिभाषित अनुशासन
अपनी सघनता से धुँधलका बनाता दृष्टि में
लगातार करता मस्तिष्क पर हमला
चेतना को कुन्द और गति को करता मँथर।

एक बगल से होता हुआ
पहुँचता दूसरे कन्धे पर
तिर्यक रेखा में काटता पीठ, छाती और पेट को
कसता और कसता जाता अपनी नागफाँस में
एक पूरी परम्परा को बोझा है जनेऊ
चौबीसों घण्टों लटका हुआ छाती पर
रोम-रोम को झकझोरता
त्वचा में पैदा करता सिहरन।

तीन धागों से मिलकर बना है यह जनेऊ
पर अपने गठन में कैसा मजबूत
हाथों का पूरा जोर लगाकर भी
आसान नहीं इसे तोड़ पाना
फिर अकेला धागा भर नहीं है।

तर्जुमा

क्या कभी कर पाऊँगा तुम्हारा तर्जुमा
एक बच्ची की हँसी को
शब्दों में लिख पाना कितना मुश्किल
जैसे खिन्नी और सीताफल के पेड़ को
झाड़ से ज़ियादा क्या लिख सकता हूँ

भुखमरी का कुछ नहीं कर सकता
सरकार की तरह मैं भी विवश हूँ
संस्कृति मंत्री का भाषण नहीं है कविता
कि झट तर्जुमा करके फेंक दूँ
रामपाल, जनकसिंह और प्यारेलाल चपरासी को
किस तरह पलटूँगा किसी पराई भाषा में
अपढ़ माँ जिसे निश्वत कहती थी
उसे रिश्वत जैसा ही कुछ लिख पाऊँगा

पिता के बाज़ार जाने का तो तर्जुमा कर दूँगा
पर उनके ख़ाली झोलों पर क़लम ठहर जाएगी
कविता का चेहरा तो बना लूँगा
पर आँखें बनाने में मुश्किल पेश आएगी
दो बहिनें कभी-कभी बहुत मिलती हैं चेहरे से
जैसे आज सुनी कोई आवाज़
बीस साल पहले सुनी
किसी पहचानी आवाज़ की याद दिलाती हे
इसी तरह का ही कुछ-कुछ
हो सकता है कविता का तर्जुमा

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