हरीश करमचंदाणी की रचनाएँ

अंतःकरण 

वह साहस
बहुत मुश्किल से आता हैं
आपके भीतर से कोई चीखता हैं
रुकना नहीं
जो होगा देखा जायेगा
आप ठिठक देखते हैं
कोई नहीं हैं
आसपास
साथ आपके
अकेले हैं
फिर भी रुकते नहीं
कोई हैं
संग बरसो से
जो पला बढा हैं
जो जानता हैं आपको
एक एक अंश
अणु अणु आपका
धड़कन आपके दिल की
वह हैं जो आपका अपना हैं
हिस्सा हैं आपका
आपके भीतर जो बैठा हैं
यूँ कह लो आप खुद हो
हाँ ,वही देता हैं
वह साहस

अनजान होना

चिड़िया को नहीं मालूम कितना मीठा गाती है
मोगरा भी हैं बेखबर अपनी महक से
और हवा जो बहती रहती हरदम
नहीं पता उसे कितनी जरुरी हैं वह
और आदमी जो जानता इतना इतना

अनजान होना हमेशा बुरा तो नहीं होता

अनुकरण

किसी इतवार को
या छुट्टी के दिन
बच्चों के बहाने
हम खेलेंगे घर-घर वाला खेल
शायद इसी तरह
हम सीख जाएँ एक दिन
घर बनाना

आगाह

अँधेरा
झपटा मार दबोच लेगा
रोशनी को
चुस्त चीते की तरह
और नाखुनो, पंजों ,मजबूत गिरफ्त से
बच नहीं पायेगा रोशनी का बदन

कहो रोशनी से रफ्तार अपनी तेज करे

आदत

देखना एक दिन
क्या गुल खिलाएगी तुम्हारी यह आदत
अगर छूटी नहीं तो कहीं के ना रहोगे
ना रहने दोगे हमें भी
छोड़ी ना जो यह आदत
बचेगा ना कोई दोस्त
खैर दुश्मनों की फेहरिस्त तो काबिले रश्क होगी
अपने तो बेशक हो ही जायेंगे पराये
आईना भी मुँह मोड़ लेगा
अकेले भी रह जाओगे
इसका भी मत रखना यकीन
अब भी संभल जाओ
और छोड़ दो यह आदत
सच बोलने की

इस समय

कविता लिखने की सोचता था
और डर जाता था
सच लिखना बोलने से ज्यादा ना हो बेशक
पर खतरनाक तो था ही
और अभी मैं ज़ख़्मी था
हाँफ रहा था
चाहता था विश्राम
साँस भरना ज़रूरी था अभी

उदास

इस तरह तो मत होना उदास
कि मैं पस्त हो जाऊं
और सोच ही नहीं सकूं
कुछ भी अच्छा और आशा से भरा

इस तरह तो मत होना उदास
कि हंस ही न सके इस बार
जिस बात पर दुहरे हुए थे
हंसी के मारे पिछली बार

मत होना
मत होना
मत होना उदास
कि उदासी बुरी होती है
उस चेहरे पर तो बहुत
जिसने दुःख से लड़ी हो लडाई
हंसते हंसते .

उस तरह 

वह कोई सपना नहीं
छू सकता हूँ मैं उसे
आँसू की तरह
आँख से बहकर
हौले से लुढकने तक
वह सिर्फ मेरा हैं
फिर मिट्टी में
कण की शक्ल अख्तियार करते हुए
जान लेता हूँ मैं
जीवन के उच्छ्वास
मैं भय से सिहर जाता हूँ
तब नहीं आता पास तुम्हारे

तुम्हे भय से नजदीकियां पसंद नहीं
मैं उससे मुक्त हो
चाहता आना पास तुम्हारे
प्रेम तुम्हारा पाने को

उसकी दुनिया

उसकी दुनिया दूसरी थी
औरो से अलग
उसमे सपने थे
खूशबू थी
हँसी थी
सफ़ेद कबूतर थे
और भोले खरगोश भी

कल

पीछे मुड़-मुड़ कर देखना चाहता हूँ
पर नहीं देखता
देखता हूँ तो आगे
नया कुछ जो नहीं देखा अब तक
आगे ही तो हैं
हाँ ,आगे ही तो हैं
जिसे पा लेने को चलते हैं सब
नहीं हैं जो मरीचिका
तय हैं
आगे हैं
समय की अनंत नदी
जिसमे बहता जल
कल कल
होगा अपूर्व अनुपम
हाँ ,आने वाला कल

कविता में दिलचस्पी लेता बच्चा 

कोरे कागज़ पर कुछ लिखते देख पूछा बच्चे ने -लिख रहे हैं कविता ?
हाँ
बरसात पर …नदी ,पहाड़ पर…फूल पतों पर…या फिर चिडिया पर
नहीं …इनपर नहीं
फिर किस पर ?
तुम पर
पता भी हैं मैं क्या सोच रहा हूँ ?
हाँ ,नहीं …शायद
अच्छा बताता हूँ मैं
बरसात में जब भीग गए चिडिया के पंख
उड़ नहीं पाई तो झपट लिया बिल्ली ने
यह रहा उसका नुचा पंख
बच्चा रुआंसा था
फिर आहिस्ता से बोला
मैं भी लिखूंगा कविता उस चिडिया पर
उस दुःख पर उसकी पीड़ा कितनी सच्ची थी
मान हुआ बच्चे पर
भयभीत भी हुआ मगर
लगातार और तेजी से
क्रूर होती जा रही इस दुनिया में
इस मन के साथ
खुद को बच्चा पाना कितना मुश्किल होगा ?
एक पिता अपने पुत्र के लिए चिंतित था

किनारे पर 

भूल तो नहीं गया मैं रचना
कुछ इस तरह जैसे सपने से जगा
और भूल गया सपना
नहीं पर ऐसा नहीं हुआ था
हुआ था वैसा ही
जैसा तैरना सीख जाने के बाद
ना तैरो बरसो बेशक
पर पानी में फेंको तो
चलने लगते हैं हाथ पाँव
पा ही जाती हैं देह किनारा
ठीक ऐसे ही
पहुँच गया
ना जाने कैसे
पास तुम्हारे

कोयल, कव्वा और गिद्ध 

एक कव्वे ने जोर से कांव -कांव की
और गर्दन फुलाकर बोला ,
सुना कितना मीठा गाता हूँ मैं
कोयल सहित सभी पक्षी सुनते रहे
जिन पछियों ने सुरीली आवाज नही सुनी थी
या जिन्हे पहचान न थी सुर की शायद
या फिर पता नही क्यूं
वे मान गए हाँ कितना मीठा गीत
कोयल ने तब पुकारा धीमे -धीमे कुहू -कुहू
कव्वे ने इतने जोर से की कांव- कांव
की दब गई वह मधुर तान
नहीं , मुझे शिकायत कव्वे से नहीं
उसका तो यही धर्म था और स्वार्थ भी
मुझे कोयल से भी नहीं कहना है कुछ
उसे सुना ही नहीं गया
बाकी पंछियों को क्या हुआ था
क्या वे कव्वे की तीखी नुकीली चोंच से
डर गए थे
या की उन्हें भी नहीं था मालूम
फर्क मीठे और कड़वे का
और उस बेडौल पछी का मत कहिये
वह तो गिद्ध था

कौतुक

अजीब हैं आप
पूछते हैं आप
रास्ता
अजनबी से

क्यूँ?

आदमी

कितने प्रकाश वर्ष दूर

आदमी से

गुब्बारा

एक बच्चा खुश हुआ
खरीद कर गुब्बारा
दूसरा बच्चा खुश हुआ
बेच कर गुब्बारा

घर से दूर

इस बात पर हुए हम बहुत उदास
नहीं जा पाएंगे घर इस बार
गोकि याद बहुत सताती हैं
घर परिवार दोस्त यार ही नहीं
वह खिड़की भी बहुत याद आती है
जिससे होकर रोशनी मेरपासआती थी
वह खिड़की जब बंद होती थी
रोशनी कहीं और होती थी
मैं जब खोलता था खिड़की धीरे धीरे
लपक रोशनी दोडी आती थी
मेले में बिछड़े किसी अपने की तरह
बिछड़े हुए अपने मिलने पर
और भी अपने लगते हैं
सच कहूं तो
खिड़की से आती रोशनी में
जो अपने नहीं
वो भी अपने लगते हैं
सोचता हूँ
किसी दिन
वह खिड़की मैं यहीं ले आऊं

चौकीदार

अँधेरे और सन्नाटे को चीरती
गूंजती हैं आवाज़
जागते रहो
यह आवाज़ सिर्फ वे सुनते हैं
जो जाग रहे होते हैं
सोये हुए लोग सोये ही रहते हैं
सोचता हूँ
सोये हुओं को
जगाने को
जो कहे
वह आदमी कब आएगा

जिंदगी

फिसल गई
हाथ से
खुरदरी थी बहुत
फिर भी

ढाबे में लड़का

ढाबे में
मेज बजा कर
मैंने लड़के से पानी को कहा
उसने लापरवाही से मेरी तरफ देखा
और पानी भरा गिलास मेज पर पटका
मेरा ध्यान पानी में डूबी उसकी उँगलियों पर था
नन्ही पतली सी उन उँगलियों में तो
रंगीन पेंसिल होनी चाहिए
मुझे बेतहाशा अपना बेटा याद आया
फिर मुझसे वहां रुका ना गया

दरकता हुआ चुपचाप

मुझे एक दिन वही करना था
सवाल उठता हैं
तो पहले ही क्यों नहीं किया
जवाब यह होगा या होना चाहिए
कि तब यह शायद संभव ही नहीं था
पर नहीं यह जवाब नहीं होता
जवाब में फिर एक सवाल छिपा होता हैं
क्या कोई जानता हैं कब क्या होता
वही सब जो अब किया
तब नहीं किया
अच्छा किया
उस भार से मुक्त रहे अब तक
यह क्या कम हैं
और कम तो यह भी नहीं कि
वह भार अब यूँ भी अब वैसा नहीं लग रहा
कंधे मजबूत हो गए या फिर आदत भी बदल गयी
पहचान करने की
दुखता नहीं पहले की तरह अब और यह भी
कि रोना नहीं होता
बस कुछ टूटता सा हैं भीतर
शुक्र हैं बाहर सब कुछ साबुत दिखता हैं

दायित्व

तुम्हारा काम था दीया जलाना
तुमने जलाया
दीये का काम था रोशनी देना
उसने दी
रोशनी का काम थाअँधेरा मिटाना
उसने मिटाया
तेल चुक गया
दीया बुझ गया
रोशनी ना रही
अँधेरा फिर छा गया
कैसे कहते हो
तुम्हारा कोई दोष नहीं

दिल

पत्थर माना
मगर टूटा
प्रहार प्रबल था

दुःख 

दुःख आदमी को तोड़ता हैं
दुःख पहचान कराता दोस्त दुश्मन की
दुःख गढ़ता परिभाषा सुख की
दुःख बनाता आदमी को आदमी

दोष 

नक्शा बहुत साफ़ था
मेरे मन में था
मैं चाहता था
वह निर्दोष साबित हो
क्योंकि वह निर्दोष था
और इसीलिए यह साबित करना
बहुत मुश्किल था

दोस्ती

दोस्ती
निभाना
मगर इस तरह नहीं
कि
मुस्कुराये
दुश्मन

धुला मन

मुझे इस बात का यकीन है
सुबह जब तुम उठोगी नींद के बाद
तुम भूल चुकी होगी सारी कड़वाहटे,
अपनी आदत के अनुसार
मुस्कराते हुए पॉँच मिनट के अन्दर
चाय की केतली, दो बिस्कुट मेरी के ट्रे में लिए
तुम आ बैठोगी बगल में धरी कुर्सी पर
पूछोगी फिर वही हर दिन का पहला सवाल
कुछ खास खबर है आज
अखबार से सिर निकाल
बुदबुदाउंगा… न नहीं नया कुछ नहीं
वही सब
तुम कपों में उधेलते हुए चाय
एक नजर अख़बार के पन्नों पर डालोगी
तुम मेरे उन पढ़े हुए पन्नो में से ही
कोई अच्छी खबर अनायास ढूँढा लोगी
जो पता नहीं कैसे मैं पढ़ ही नहीं
पाया जिसे पढ़कर सुनाते-सुनाते
गमले के बिरवे को संभालने लगोगी
जहाँ टूटे हुए पात पत्तों के बावजूद
खिले हुए हैं फूल
फूल तुम्हारे बालों में खिला ही रहता
कहना चाहता हूँ मैं
पर कहता नहीं
कि मेरे हाथ मैं है
तमाम बुरी खबरों से भरा अखबार

और मन भी तो अभी धुला नहीं

परवाह 

किसीको किसी की परवाह नहीं
सब अपने आप में रहते हैं मस्त
मैं समझ नहीं पाया
वह इसे किस अर्थ में कह रहा था

मैंने देखा
वह हँसा
मैं इतमिनान की साँस लूँ
पेशतर मुझे सुनाई दी
उसी की कराह

पल पल मन

एक दिन सुख मेरे पास दबे पांव आया
उस समय मैं सो रहा था
दुखो से घिरा था मैं
बड़ी मुश्किल से बहुत देर से आई थी नींद
मैं झुंझलाया हुई भारी कोफ्त
झिड़क ही दिया उसे
और वह भी दुःख हो गया
एक दिन दुःख मुझसे बोला
जाता हूँ तुम्हे छोड़ कर
कहीं और जाना बेहद जरूरी हैं
पर भूल मत जाना मुझे
आऊंगा फिर
मगर कब…. नहीं कह सकता अभी
मुझे उसकी पीठ दिखाई दी
वह मेरा सुख बन गया
फिर एक दिन वे आये साथ साथ
मुझे चौंकाते,
लगभग स्तब्ध करते
मैं अवाक् देखता रहा उन्हें चुपचाप
बोले -यार ,ऐसा भी क्या
जो हो रहे हो अचंभित
आखिर हमारा भी तो मन हैं
करता है कभी कभी साथ रहने को
मैं सुनता रहा हँसता रहा….
फिर एकाएक रो पड़ा हंसते हंसते

पहल

बच्चों को शोर मचाने से रोको मत
बच्चों को सोने को मत कहो
बच्चे सो जायेंगे तो जागेगा फिर कौन
बच्चे चुप हो जायेंगे तो जगाएगा फिर कौन

पिता और पुत्र

बहुत तेज दोड़ते थे पिता
इतना तेज
कि निकल जाते थे सबसे आगे
सबसे पीछे खड़े होते जानबूझ कर
और निकल जाते थे सबसे आगे
दोड़ना उनको अच्छा लगता था
बरसो से दोड़ते ही आ रहे थे
एक दिन जब हम दोड़ रहे थे साथ-साथ
पिता पिछड़ने लगे
लगा वे थक रहे थे
देखा
वे हाँफ रहे हैं
मैं डर गया था
पर
आगे निकल गया था

पिता बोले थे

पिता बोले थे

सदा सच बोलना
मैं झूठ कभी नहीं बोला

पिता बोले थे
हमेशा ईमानदार रहना
मैंने बेईमानी नहीं की कोई

पिता बोले थे
न्याय के संग साथ रहना
मैंने अन्याय का दामन कभी नहीं थामा

पिता बोले थे
सदा सुखी संपन्न रहना
पिता की हर बात मानना क्या संभव भी है ?

पृथ्वी

उसने बताया
वह तो बस माँ हैं
किसी वाद ,दर्शन या राजनीति से
उसका कुछ वास्ता नहीं
पर चश्मदीद गवाहों ने देखा था
वह सबको बराबर बराबर बाँट रही थी

पेड़ 

पेड़ कट रहा था
और मेरे पास शब्द नहीं थे
लकड़हारे के विरूद्व
काट रहा था
वह तो ठेकेदार के लिए
मैंने गौर से देखा उसे
लगा वह खुद भी कट रहा था
साथ साथ

और उसका कटना
पेड़ के कट कर गिर जाने के बाद भी जारी था

प्रतिफल

बच्चे की हंसी में
आप पा सकते हैं
फिर से वह सब कुछ
जो छीना रौंदा जा चुका हो आपका
आपको तो बस बचानी है बच्चे की हंसी

प्रतिबद्ध

ज़मीन का दुःख
जड़ो से होता हुआ
शीर्ष तक पहुंचा
और पेड़ सूख गया

प्रार्थना

देना
इतनी शक्ति भर
कि अन्याय को न सहन कर सके
लाख शत्रु बढ़ जाये
हो
इतनी शक्ति भर
कि शामिल न हो उनके कृत्यों में
शक्ति अन्याय की लाख बढ़ जाये

प्रेम

अभी चुका नहीं हैं
बेहद प्रचलित यह शब्द
प्रेम
अर्थ की गरिमा और पवित्रता के साथ
खड़ा हैं तन कर
मैं चाहता हूँ टाँक दूं उसे
तुम्हारे जूडे में फूल की तरह
उसकी पंखडियों में
खिल रही हैं इच्छाएं
आ रही हैं लगाव की महक
यकीनन चिड़िया चहकना
और हवा बहना नहीं छोड़ेगी
बिना जाने भी
प्रेम की परिभाषा

फूल

सवेरे उठा तो फूल खिला था
मैं उससे हौले से बतियाया
उसकी बातों से और
भीनी भीनी गंध से भी
झलकता था साफ-साफ
कि वह बहुत खुश हैं
हालाँकि गमले में पानी डालना
दो दिन से भूल गया था मैं
और एक कांटा ठीक सिर के नीचे
उसके भाले सा तना था
हाँ ,वह फूल
इतना खुश और निश्चिंत
लग रहा था
भला कोई कैसे सोच सकता था
शाम होते होते वह मुरझा जायेगा
और कल तक अपनी झाडी से
जायेगा झड़

महक उसकी तो बसी रहेगी
सदा मन में

फेहरिस्त

मेरे दुश्मनों की फेहरिस्त
बहुत लम्बी हैं
लम्बी इतनी कि
उड़ जाये नींद रातों की
जबकि चाहता हूँ मैं सोना
लम्बी तान कर
कबीर की तरह
जिसके दुश्मनों की फेहरिस्त
और भी लम्बी हैं

बचपन

चुपके से कोई आएगा पीछे से
आँखे बंद कर देगा अपनी हथेलियों से
और बूझने को कहेगा
बताओ कौन
आप जब तक करेंगे कोशिश
याद करने की
खुरदरे हाथों के
कोमल स्पर्श को
अनुभूत करने की
वह झट से खड़ा हो जायेगा सामने
चहक कर पूछेगा
नहीं पहचाना ना
याद आया?
आप झेंप कर मुस्करा भर देंगे

गले में झूलती बिटिया
बताएगी उंगली रख
एल्बम के उस फोटो पर
ये आप ही हैं ना पापा !

बहुत पास

.हर तारा चमकता हैं
अँधेरे को चीरती हैं रोशनी
अनगिनत आँखों तक पहुँचती हैं
हर तारा कितना अकेला हैं
मगर बेचारा नहीं कोई
कितना सुन्दर
आँखों का तारा
हर तारा
कितना प्यारा

बाद में

वे चुप थे
जब हो रही थी हत्या
उनके सामने
हाँ ,उन्हें आ रही थी अब शर्म
कि हत्या हो रही थी और वे चुप थे
किया नहीं प्रतिरोध
जरा सा भी नहीं ,
उन्हें सचमुच शर्म आ रहीं थी
पर क्या फर्क पड़ता
अगर उन्हें शर्म नहीं भी आ रही हो अब
हत्या हो चुकी थी

बिटिया की गुल्लक

जरूरत के मजबूर और बुरे दिनों में
फोडी गयी गुल्लक
इस वादे के साथ
कि नयी गुल्लक भर दी जायेगी
पहली तारीख को
तब से हर महीने पहली तारीख तो आती है
पर गुल्लक खाली ही रह जाती है
जरूरतें गुल्लक से कहीं बड़ी जो हैं
हर बार शर्मिंदा पिता
पूछते हैं
दुलार से
कातर भाव से
बिटिया, क्या तुम्हारे पास थी बस एक ही गुल्लक

बीमार बच्चे की माँ

दुनिया की सबसे दुखी औरत होती हैं
पर कमज़ोर नहीं होती
बीमार बच्चे की माँ
वह जोरो से रेडियो चलाते
पड़ोसी से लेकर
लापरवाह डॉक्टर तक
सबसे लड़ सकती हैं
उसे जरा सा भी शक हो जाये
दवा के बारे में
केमिस्ट का गला पकड़ सकती हैं
अपने जेंटिलमेन पति की तरह
मिमिया कर चुप नहीं रह जाती
बीमार बच्चे की माँ

अस्पताल में भर्तीबच्चा
जब बेचैनी से बदलता हैं करवट
वह ऊँघते जेठ को
झकझोर कर उठा सकती हैं
जिससे उम्र भर करती रही पर्दा

बीमार बच्चे की माँ को कुछ नहीं भाता
पति का साथ भी नहीं सुहाता
हर वक़्त घेरे रहती हैं उसे बच्चे की पीड़ा

आप बच्चे की वेदना माप सकते हैं देख कर माँ का चेहरा

मनुष्य

आसान था कहलाना मनुष्य
मुश्किल था बनना मनुष्य
मनुष्य बनने के लिए
बरतनी पड़ती मनुष्यता
जो बहुत महँगी पड़ती
दुनियादारी के हिसाब से

महानगर की बस में

भीड़ भरी बस में
अनजाने में कुचल गया पांव
माफ़ करना भाई, कहा सहयात्री ने

अच्छा लगा
दिया घाव
पर बहुतदिनों बाद मिला
एक आत्मीय संबोधन

मिट्टी

अजब रिश्ता
कितना झाडा पोंछा
पर साँस में भी

मृत्यु 

एक दिन नश्वरता का होगा
भीगी पलकों
रुंधे कंठ और
हृदय में हाहाकार का होगा
शेष सबका होगा
बस तुम्हारा न होगा
वह एक दिन

राजा का भविष्य

राजा गुस्से में हैं
उसकी इच्छा थी
छाया रहे अंधकार
बावजूद हुआ सूर्योदय
उसने चाहा था वर्षा न हो आज
आकाश बरसता रहा सारा दिन
उसकी मर्ज़ी थी पसरे श्मशान सा सन्नाटा
चहकती रही चिडिया लगातार
उसका मन था प्रजा दे सलामी
हो गए सभी दंडवत बच्चो को छोड़ कर
राजा गुस्से में हैं
नहीं मानता कोई उसकी बात
अलावा गुलामों के
राजा जान चुका हैं अपनी औकात
और अपना भविष्य भी

राजा को भाए..

राजा को भाते बस
मुस्काते हँसते चेहरे
चेहरों पर आये मुस्कान
करना पड़ेगा राजा को
बहुत कुछ
नहीं कुछ
सरोकार पर राजा को

उसे तो बस भाते हैं
मुस्काते हँसते चेहरे

रैनबसेरा

दिन भर के थके पावों

ठिठुरती देह
और पेट की दकती आग के साथ जब मैंने प्रवेश किया
रैनबसेरा चिढा रहा था मेरा मुहँ
यह रही तुम्हारी दरी
यह रहा तुम्हारा कम्बल
यह रहा तुम्हारा आज का कोना
बिछाओ ,लेटो और सो जाओ
हाँ ,जबकि उनकी साजिश थी
मैं भी सो सो जाऊँ
भूख ने मुझे जगाये रखा

रोशनी

दिवाली पर रोशनी करते
मिठाई खाते और बधाइयाँ देते
उन्होने सोचा तक नहीं
एक पल को भी
उड़ीसा की तबाही के बारे में

उड़ीसा की तबाही के बारे में
समाचार पढ़ते,सुनते और देखते
उन्होने न बिसराया
एक पल को भी
कि आज दिवाली हैं

उड़ीसा में अँधेरा ही रहा
उनके दिलों में भी
कहाँ थी रोशनी

(उड़ीसा में दिवाली के दिन जब तूफान आया था )

विधा

वह सच कह रहा था
लोगों ने कहा कहानी
वह रो ही पड़ा
लोगो ने बताया नाटक
वह चुप रहा
लोगो ने समझी कविता

इस बार लोग गलत न थे

वेदना

उस चीख के भीतर
छुपी थी कराह
किसी ने न सुनी
चीख सबने सुनी

सच 

सच का साथ देने
और सच का सामना करने में फर्क था
साथ देना खतरे उठाना था
बहुतकुछ गवाना था
और सच का सामना करना
कुछ कुछ गवाना था
बदले में बहुत कुछ पाना भी था
एक की कीमत बाज़ार में कुछ न थी

सच की शक्ति

किसने कहा था
सच की होगी जीत
और अंत में
झूठ हारेगा

हाँ ,जिसने भी कहा था
माना घोर आशावादी था
मगर कितना बड़ा वीर

सभ्यता 

बहुत छोटी सी कहानी हैं
मनुष्य के विकास की
इतनी छोटी कि
फिर फिर आ जाता हैं
वहीं प्रस्थान बिंदु पर
मनुष्य
जहां से शुरू हुई थी
उसकी यात्रा

सहना

जब गलत को सहा
सही को सहने पर क्षोभ किसलिए ?
उसने गर्दन झुकायी
और धीरे से बोला
सहने की आदत ही गलत हैं
यह जान लेने के बाद
अब कुछ भी सहना ठीक होगा ?

सहयात्री

उस पार जिंदगी हो
कि न हो
पर यह
तय हैं
इस पार जिंदगी
आ सकती हैं
तुम चाहो तो

सार

फल की चिंता नहीं की
चखते रहे हमेशा दूसरे
रहा कर्मवत सदा वह तो
मैंने पूछा
कयूँ ?
किसलिए ?
वह चुप रहा और अविचलित भी
उसके मौन में बाँच ली मैंने
पूरी गीता

सीढ़ी 

बच्चा
घुटनों के बल चलता
चढ़ गया सीढियाँ
घबराई माँ की चीख से चौंक
बच्चा पीछे मुडा और लुढ़क गया
माँ नहीं डरती
तो बच्चा पार कर जाता सारी सीढीयाँ
उसने सोचा और उदास हो गयी

सुख 

पेडों पर उगती थी टॉफियाँ
फंव्वारे उंडेलते थे आइसक्रीम
जिन्हें मिल बाँट कहते तुम
नहीं ही भूलते थे
मोती काका के कालू को भी

पृथ्वी पर उपलब्ध
सुख सारा पाने की कोशिश में
तुमने खो डाला
साझा सुन्दर सपना
कितना अपना

सच बताना
तुम जानते तो हो ना
सुख क्या है

सूत्र 

आप चुप हैं
आप अच्छे हैं
आप को होना ही चाहिए अच्छा
आप को रहना ही चाहिए चुप

हौंसला

बड़ा बहुत बड़ा था वह काम
बड़ा बहुत बड़ा था उसका हौंसला
बड़ा बहुत बड़ा था उन दोनों के बीच
बाधाओं का पहाड़
पर इससे क्या
पहाड़ तो होते ही हैं पार करने के लिए

हिंदी 

हिंदी बोली
हिंदी दिवस सेलिब्रेट कर लिया
स्तब्ध मैं परेशान हो गया
समझ गयी वह
इसमें क्याहैं
तुम लोगो के बीच ही तो रहती हूँ मै
फिर क्या उतर देता

अपनी भाषा देख रहा हूँ

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