‘हसरत’ अज़ीमाबादी की रचनाएँ

आश्‍ना कब हो है ये ज़िक्र दिल-ए-शाद के साथ

आश्‍ना कब हो है ये ज़िक्र दिल-ए-शाद के साथ
लब को निस्बत है मिर ज़मज़म-ए-दाद के साथ

बस कि है चश्‍म-ए-मुरव्वत से भरा गिर्या-ज़ार
पड़ा फिरता है मिरे नाला ओ फ़रियाद के साथ

याद उस लुत्फ़-ए-हुज़ूरी का करें क्या हासिल
आ पड़ा काम फ़क़त अब तो तिरी याद के साथ

ज़ुल्म है हक़ में हमारे तिरा अब तर्क-ए-सितम्
दिल को है उन्स सा इक उस तिरी बेदाद के साथ

ज़ुल्फ ओ काकुल से क़वी हुस्न का बाज़ू है मुदाम
क़फ़स ओ दाम रहे जैसे कि सय्याद के साथ

ख़ून-ए-ना-हक़ रहा परवेज़ की गर्दन पे वले
लुत्फ-ए-शीरीं ने सितम ये किया फरहाद के साथ

रास्ती से भला इतना भी गुज़रना क्या है
निस्बत इस क़द को न दो सर्व के शमशाद के साथ

दस्त ओ पा कर के मैं गुम निकला दबे-पाँव क्या
मिला वो तिफ़्ल मुझे रात जो उस्ताद के साथ

‘हसरत’ इतना जो तू माइल है गिरफ़्तारी का
कुछ अदावत है तुझे ख़ातिर-ए-आज़ाद के साथ

आता हूँ जब उस गली से सौ सौ ख़्वारी खींच कर

आता हूँ जब उस गली से सौ सौ ख़्वारी खींच कर
फिर वहीं ले जाए मुझ को बे-क़रारी खींच कर

पहुँचा है अब तो निहायत को हमारा हाल-ए-ज़ार
ला उसे जिस-तिस तरह तासीर-ए-ज़ारी खींच कर

कोह-ए-ग़म रखती है दिल पर इस ख़िराम-ए-नाज़ से
ख़ज्लत-ए-रफ़्तार-ए-कबक-ए-कोहसारी खींच कर

किस के शोर-ए-इश्‍क़ से यूँ रोता रहता है सदा
नाला ओ फरियाद ये अब्र-ए-बहारी खींच कर

बाँधू हूँ वारस्तगी का दिल में अपने जब ख़याल
बाँध ले जाएँ हमें ज़ुल्फें तुम्हारी खींच कर

कल जो तू घर से न निकला उठ गया कर के दुआ
सुब्ह से ता-शाम मैं क्या इंतिज़ारी खींच कर

गालियाँ दे मार ले या क़त्ल कर मुख़्तार है
लाई अब तो याँ मुझे बे-इख़्तियारी खींच कर

साक़िया पैहम पिला दे मुझ को माला माल जाम
आया हूँ याँ मैं अज़ाब-ए-होश-यारी खींच कर

‘हसरत’ उस की बज़्म के जाने से रख मुझ को मुआफ़
मुफ़्त में रोएगा वाँ से शर्म-सारी खींच कर

अब तुझ से फिरा ये दिल-ए-काम हमारा 

 अब तुझ से फिरा ये दिल-ए-काम हमारा

इस कूचे में कम ही रहेगा काम हमारा

है सख़्त मिरे दरपा-ए-जाँ तेरा ग़म-ए-हिज्र
जानाँ से कहे जा कोई पैग़ाम हमारा

जागीर में है ग़ैर की वो बोस-ए-लबगो
क़ाएम रहे ये मंसब-ए-दुश्‍नाम हमारा

होने नहीं पाते ये मिरे दीदा-ए-तर ख़ुश्‍क
दौलत से तिरी तर है सदा जाम हमारा

दो दिन में किसी काम का रहने का नहीं तू
कुछ तुझ से निकल ले कभी तो काम हमारा

इक रोज़ मिला आलम-ए-मस्ती में जो हम से
तन्हा बुत-ए-बद-मस्त मय-आशाम हमारा

अज़ीज़ों तुम न कुछ उस को कहो हुआ सो हुआ

अज़ीज़ों तुम न कुछ उस को कहो हुआ सो हुआ
निपट ही तुंद है ज़ालिम की ख़ू हुआ सो हुआ

ख़ता से उस की नहीं नाम को ग़ुबार-ए-मलाल
मैं रो रो डाला है सब दिल से धो हुआ सो हुआ

मिर ख़ता या जफ़ा थी तिरी ये क्या है ज़िक्र
हुआ जो चाहिए फिर तो न हो हुआ सो हुआ

हँसे है दिल में ये ना-दर्द-मंद सब सुन सुन
तो दुख को इश्‍क़ के ऐ दिल न रो हुआ सो हुआ

सितम-गरो जो तुम्हें रहम की हो कुछ तौफ़ीक़
सितम का अपने तलाफ़ी करो हुआ सो हुआ

न सर-गुज़िश्‍त मिरी पूछ मुझ से कुछ ऐ बख़्त
तू अपने ख़्वाब-ए-फराग़त में सो हुआ सो हुआ

मोहब्बत एक तरफ़ की नरी समाजत है
मैं छोडूँ हूँ तिरी अब जुस्तुजू हुआ सो हुआ

बयान-ए-हाल से रूकता है ‘हसरत’ अब यारो
न पूछो उस से न कुछ तुम कहो हुआ सो हुआ

चाहे सो हमें कर तू गुनह-गार हैं ते

चाहे सो हमें कर तू गुनह-गार हैं तेरे
तक़दीर थी अपनी कि गिरफ़्तार हैं तेरे

मरते हैं कभी आ के हमारी भी ख़बर ले
आह ऐ बुत-ए-बे-दर्द ये बीमार हैं तेरे

नक़्द-ए-दिल-ओ-दीं-मुफ़्त में दे बैठेंगे आख़िर
हम आशिक़-ए-मुफ़लिस कि ख़रीदार हैं तेरे

ख़्वाहिश है ने बोसे की न आग़ोश से मतलब
दीदार के याँ सिर्फ़ तलब-गार हैं तेरे

है रू-ए-ज़मीं अर्सा-ए-महशर उन्हें हर रोज़
जो दिल-शुदा-ए-क़ामत-ओ-रफ़्तार हैं तेरे

हम वस्ल में और हिज्र में जलते रहे उन से
क्या दाग़-ए-जिगर ये गुल-ए-रूख़-सार हैं तेरे

सौगंद है ‘हसरत’ मुझे एजाज-ए-सुख़न की
ये सेहर हैं जादू हैं न अशआर हैं तेरे.

है याद तुझ से मेरा वो शरह-ए-हाल देना

है याद तुझ से मेरा वो शरह-ए-हाल देना
और सुन के तेरा उस को हँस हँस के टाल देना

कर कर के याद उस की बे-हाल हूँ निहायत
फ़ुर्सत ज़रा तू मुझ को तो ऐ ख़याल देना

उस ज़ुल्फ-ए-कज के उक़्दे हरगिज़ खुले न मुझ पर
क्यूँ उस को शाना कर के एक एक बाल देना

मैं मुद्दआ को अपने महमिल कहूँ हूँ तुझ से
गोश-ए-दिल अपना ईधर साहब-जमाल देना

इस उम्र भर में तुझ से माँगा है एक बोसा
ख़ाली पड़े न प्यारे मेरा सवाल देना

हम से रूखाइयाँ और मुँह झुलसे मुद्दई का
बोसा पे बोसा हर दम वूँ बे-सवाल देना

या रब किसी पे हरगिज़ आशिक़ कोई न हो जो
दिल हाथ दिल-बरों के है बद-मआल देना

वो मेहरबाँ कि हम को अल्ताफ़-ए-बर-महल से
पास अपने से था उस को उठने मुहाल देना

हम आप को तो इश्‍क़ में बर्बाद करेंगे

हम आप को तो इश्‍क़ में बर्बाद करेंगे
तासीर-ए-वफ़ा पर तुझे क्या याद करेंगे

याँ सख़्त दिलों में नहीं हम-दम कोई अपना
जा कोह में फ़रहाद को फ़रियाद करेंगे

महरूम न रक्खेगा हमें इश्‍क़-ए-बुताँ से
गो दाद न दें कुश्‍त-ए-बे-दाद करेंगे

ऐ दौर-ए-फ़लक मुझ को क़सम सर की है अपने
हम शाद कभी ये दिल-ए-ना-शाद करेंगे

गर सिलसिला-ए-इश्‍क़ में फ़रजंद-ए-ख़ल्फ़ हैं
हम ख़ाना-ख़राबी का घर आबाद करेंगे

कब पैरवी-ए-क़ैस करें इश्‍क़ ओ जुनूँ में
इस फ़न में कुछ अपना ही हम ईजाद करेंगे

हो हल्का-ब-गोश आह ओ फ़ुगाँ का मिरी मजनूँ
जब कान पकड़ याद हम उस्ताद करेंगे

‘हसरत’ यूँही आख़िर हुई ये फ़स्ल भी गुल की
कब कुंज-ए-कफ़स ये हमें आज़ाद करेंगे

इश्‍क़ में गुल के जो नालाँ बुलबुल-ए-ग़म-नाक है

इश्‍क़ में गुल के जो नालाँ बुलबुल-ए-ग़म-नाक है
गुल भी उस के ग़म में देखो किया गिरेबाँ-चाक है

दाग़-बर-दाग़ अश्‍क-बर-अश्‍क अपनी चश्‍म ओ दिल में है
क्या बला गुल-ख़ेज ऐ यारो ये मुश्‍त-ए-खाक है

ऐ खिज़र जाऊँ कहाँ मैं कूचा-ए-मय-ख़ाना छोड़
ख़ुश-दिली का मौलिद ओ मंशा ये ख़ाक-ए-पाक है

गर्क़-सर-ता-पा हूँ बहर-ए-बे-करान-ए-ख़ूँ में मैं
आश्‍ना पूछे है तो ये चश्‍म क्यूँ नम-नाक है

सर्व की निस्बत से उस क़द्द-ए-बला बाला को क्या
ख़ुश्‍क चोब-ए-पा बगल ये वो क़द-ए-चालाक है

हाए किन आँखों से देखूँ उस रूख-ए-रौशन पे ख़त
चश्‍मा-ए-ख़ुर्शीद में ये क्या ख़स-ओ-ख़ाशाक है

काफिर ओ मोमिन को रिक्क़त ग़म में है ‘हसरत’ के हाए
कुछ ख़ुदा का डर भी तुझ को ऐ बुत-ए-बे-बाक है

कब तलक हम को न आवेगा नज़र देखें तो 

कब तलक हम को न आवेगा नज़र देखें तो
कैसे तरसाता है ये दीदा-ए-तर देखें तो

इश्‍क़ में उस के कि गुज़रे हैं सर ओ जान से हम
अपनी किस तौर से हाती है गुज़र देखें तो

कर के वो जौर ओ सितम हँस के लगा ये कहने
आह ओ अफ़्गाँ का तिरी हम भी असर देखें तो

सब्र हो सकता है कब हम से वले मसलेहतन
आज़माइश दिल-ए-बेताब की कर देखें तो

ढब चढ़े हो मिरे तुम आज ही तो मुद्दत बाद
जाएँगे आप कहाँ और किधर देखें तो

किस दिलेरी से करे है तू फ़िदा जान उस पर
दिल-ए-जाँ-बाज़ तिरा हम भी हुनर देखें तो

क्या मजाल अपनी जो कुछ कह सकें हम तुझ से और
तुझ को भर कर नज़र ऐ शोख़ पिसर देखें तो

हो चलीं ख़ीरा तो अख़तर-शुमरी से आँखे
शब हमारी भी कभी होगी सहर देखें तो

इश्‍क़ के सदमे उठाने नहीं आसाँ ‘हसरत’
कर सके कोई हमारा सा जिगर देखें तो

करे आशिक पे वो बेदाद जितना उस का जी चाहे

करे आशिक पे वो बेदाद जितना उस का जी चाहे
रखे दिल को मिरे ना-शाद जितना उस का जी चाहे

हमें भी सब्र ख़ातिर-ख़्वाह दाद-ए-हक़ है उल्फ़त में
वो दे जौर ओ जफ़ा की दाद जितना उस का जी चाहे

ये मज़लूम-ए-मोहब्बत दाद-रस हरगिज़ न पावेगा
करे दिल-दाद और फ़रियाद जितना उस का जी चाहे

अदम है और वजूद उस मुश्‍त-ए-पर का भी मसावी सा
सितम हम पर करे सय्याद जितना उस का जी चाहे

बला-ए-नागहाँ गिरिया गिरफ़्तारी नहीं ग़ाफिल
वो हम ग़म से मिरे आज़ाद जितना उस का जी चाहे

नहीं है सर-नविश्‍त उस की लब-ए-जाँ-बख़्श-शीरीं की
करे जाँ-कंदनी फ़रहाद जितना उस का जी चाहे

हमें ‘हसरत’ फ़रामोशी भी उस की यादगारी है
करे गो हम का कम-तर याद जितना उस का जी चाहे

सीना तो ढूँड लिया मुत्तसिल अपना हम ने

सीना तो ढूँड लिया मुत्तसिल अपना हम ने
नहीं मालूम दिया किस को दिल अपना हम ने

अह्द क्या कर के तिरे दर से उठे थे क़िस्मत
फिर दिखाया तुझे रू-ए-ख़जिल अपना हम ने

मेरी आलूदगियों से न कर इक राह ऐ शैख़
कुछ बनाया तो नहीं आब-ओ-गिल अपना हम ने

सख़्त काफ़िर का दिल अफ़्सोस न शरमाया कभी
पूजा जूँ बुत तो बहुत संग-दिल अपना हम ने

पानी पहुँचा सके जब तक मिरी चश्‍म-ए-नम-नाक
जल बुझा पाया दिल-ए-मुश्‍तइल अपना हम ने

बाद सौ-ए-रंजिश बेजा के न पाया ब-ग़लत
न पशेमान तुझ मुन्फ़इल अपना हम ने

दर ग़रीबी न था कुछ और मयस्सर ‘हसरत’
इश्‍क़ की नज्र किया दीन ओ दिल अपना हम न.

यार इब्तिदा-ए-इश्‍क़ से बेज़ार ही रहा

यार इब्तिदा-ए-इश्‍क़ से बेज़ार ही रहा
बे-दर्द दिल के दर पिए आज़ार ही रहा

जिस दिन से दोस्त रखता हूँ उस को हिजाब-ए-हुस्न
अपना हमेशा दुश्‍मन-ए-दीदार ही रहा

ये इश्‍क़-ए-पर्दा-दर न छुपाया छुपा दरेग़
सीता हमेशा मैं लब-ए-इजहार ही रहा

क़ैद-ए-फ़रंग-ए-जुल्फ़ न काफ़िर को हो नसीब
जो वाँ फँसा हमेशा गिरफ़्तार ही रहा

जाँ-बख़्श था जहाँ का मसीहा-ए-लब तिरा
लेकिन मैं उस के दौर में बीमार ही रहा

गर क़त्ल-ए-बे-गुनाह था मंज़ूर यार को
मरने पे अपने मैं भी तो तय्यार ही रहा

दौरना-ए-लुत़्फ मैं तिरे ऐ मुबहविस-नवाज़
महरूम वस्ल से ये गुनह-गार ही रहा

‘हसरत’ हमेशा उस की शब-ए-इंतिज़ार में
जूँ ताल-ए-रक़ीब मैं बेदार ही रहा

Share