चिन्तामणि जोशी

चिन्तामणि जोशी की रचनाएँ

आड़ू-बेड़ू-घिङारू

चूल्हा सुलगते ही
घेर लेते थे माँ को
और चूल्हे को भी
लेकिन माँ के पास
आटा ही कितना होता था
बमुश्किल
आधी रोटी हिस्से आती थी
मडुवे की
आड़ू ने कभी
भूख का अहसास नहीं होने दिया

खेलते थे बचपन में
घंटों-घंटों तक
भूल कर सब कुछ
जब थक जाते
टूट पड़ते थे उस पर
बेड़ू ने कभी
ऊर्जा का ह्रास नहीं होने दिया

नापते थे
नन्हे-नन्हे कदम
दुपहरी में
स्कूल से घर तक
पथरीली राहों को
सूख जाते थे
होंठ-जीभ-गला
घिङारू ने कभी
प्यास का आभास नहीं होने दिया

इसीलिए
तम्हारा
मुझे
आड़ू-बेड़ू-घिङारू कहना
उतना आहत नहीं करता
जितना
अपने ‘आड़ू-बेड़ू-घिङारू’ का
अपनी जमीन से
विलुप्त होते जाना
और
उदार आयातित
‘पॉलिश्ड सेब’ का
गली-गाँव-कूचे तक
छा जाना।

(आड़ू-बेड़ू-घिङारू – पर्वतीय क्षेत्र में पाये जाने वाले गरीब के फल और व्यक्ति को हेय दर्शाने वाला लोक प्रचलित मुहावरा।)

 

गोपू का कीड़ा

गाँव में पैदा हुआ गोपू
पला-बढा
ठीक से न लिखा
न पढा
सारा बचपन बह गया
गोपू गरीब रह गया

शादी हुई
गरीब की बीबी ठहरी
कुछ दिन सभी की भाभी हुई
दबंगों की उंगलियों पर नहीं नाची
छिनाल कहाई
कुलटा कहाई
दागी कहाई
गोपू ठहरा मेहनतकश
रोज रोजी कमाता
गरीबी धोनी थी पसीने से
हड्डी-पसली तपाता

अचानक
भटक गये उसके डग
न जाने कब
कच्ची शराब के अड्डों की तरफ
एक दिन मैंने कहा
तुम तो ऐसे न थे गोपू
कहने लगा-
भाई
दिन भर बहुत थकता हूँ
शाम को
दो गिलास गरम-गरम चखता हूँ
गम गलत करता हूँ

बचपन में
गोपू ग्वाला आता था
बूढी गोपुली आमा को बताता था-
आमा
आदमी के शरीर में तीन कीड़े होते हैं
एक दिमाग में
एक दिल में
एक पेट में
एक भी कीड़ा मर गया
तो आदमी मर जाता है

आज गोपू की निष्प्राण देह को
घेर कर खड़े हैं ग्रामीण
मैं समझ नहीं पा रहा
किसने मारा गोपू का कीड़ा
कौन सा कीड़ा मरा
दिमाग का
दिल का
या फिर पेट का?

पूस आया

सुन बे
सपनों के सौदागर

रात के अंतिम पहर
मढैया की दीवारों पर सनसनाती
तीखी हवा की थपक से
वह उठ गई है अचकचा कर

उधड़ी छत पर तनी चादर
टाट वाली झटक डाली
फैला रही है
पेट में घुटने घुसेड़े
तीनों के तन पर

पलायित है कंत
लाने को वसंत
प्राण की लेने परीक्षा
इस बरस भी पूस आया
सबसे पहले
उसी के घर।

खड़ी हैं स्त्रियां

पहाड़ जांच रहा है
अपनों की जिजीविषा
परख रहा है
अपने से अपनत्व
बदल रहा है रंग
दरक रहा है
धधक रहा है
बुला रहा है
तबाही के बादलों को
घटा रहा है
अपने सीढ़ीनुमा खेतों की उर्वरा
सुखा रहा है
फलदार पेड़ों की प्रजातियां
भेज रहा है
जंगलों से जानवरों के झुंड
आबादी में
पुरुष हार रहा है
भाग रहा है
लेकिन अभी भी
फाड़ रही हैं
जंगली भालू के जबड़े को
अपने होंसले-हंसिये से
दिखती हैं
भीमल, खड़क, बांज के पेड़ों पर
धान, मड़वा, चींणा के खेतों में
स्त्रियां
स्त्रियां
अभी भी जातीं हैं समूह में
लाती हैं-चारा बटोर कर
अपने डंगरों के लिए
कांठों की जिबाली और
चढ़ती उतरती ढलानों पर जिन्दा
जंगलों से

स्त्रियां
अभी भी खड़ी हैं
पलायन के पहाड़ के सम्मुख
सीना तान कर

जब तक खड़ी हैं स्त्रियां
तब तक खड़ा है पहाड़।

मजदूर

सुबह काम पर जाते हुए
गुजरता हूँ मिस्त्री-मजदूरों की भीड़ से
बस अड्डे के फुटपाथ पर
पिच्च-पीच पान, फट-फटाक तमाखू
जल्दी-जल्दी बतियाना
मोबाइल पर
‘सब ठीक बा
अच्छे दिन आएंगे
तो फुर्सत से बतियाएंगे
अभी टैम नहीं
परदेश में कमाना है
टैम खराब है
मुनियां का खयाल रखना’
अच्छा लगता है
भीड़ से उठती श्रम की सुगन्ध
गुजरती है नाक के पास से
कान में कह जाती है
निर्माण पलता है इनके हाथों में
और तेरी गोद में

उनकी जेब में सूता-फीता
हाथों में छैनी-हथोड़ी, करनी, गिरमाला, गल्ता
देख कर टटोलता हूँ
अपने कंधे का झोला
लाल-काली स्याही की कलमें
रंगीन चॉक, किताब, डायरी,
मार्कर, स्टेप्लर, कटर
सब तो है मेरे पास भी
लेकिन पत्नी का रखा
दो पराठे, थोड़ा साग, अचार की फाँक
वाला खाने का डिब्बा
और छने पानी की बोतल
फर्क करते हैं
उसमें और मुझमें

दोपहर में
फीकी चाय के प्याले में
पाँच रुपए का बिस्किट
मिट्टी सने हाथों से डुबो कर खाता मजदूर
चोटी पर होता है
मैं तलहटी में
उसे देखने के लिए
गरदन पूरी पीछे खींचनी पड़ती है
सीने में सिकुड़ा सम्मान
उर्ध्वगमन करता है
आंखें बड़ी हो जातीं हैं।

अघोरी का नाटक

हड्डी का टुकड़ा हाथ में लिये
तथाकथित अघोरी
भावनाओं में बह रहा था
और
नाटकीय अंदाज में
कह रहा था-
यह संसार एक रंगमंच है- बच्चा!
यह कोई सामान्य अस्थि नहीं
विगत दशक की
दुर्दान्त ‘ट्रेजेडी’ का अवशेष है
मैं साफ देख रहा हूँ –
इस अस्थि का अतीत
इसका धारक तो जैसे
गुणों की खान था
बाँका जवान था
सौम्यता का प्रतीक था
नीतिरत, निर्भीक था
उसने उच्च लक्ष्य निर्धारित कर
परोपकार का जामा पहना
लक्ष्य प्राप्ति हेतु –
वणिक का जामा पहन
धनवृद्धि की
गरीबों के मसीहा का
ढोंग रच कर
झोपड़ों में घुसा
फोड़े का दर्द
मवाद साफ कर
दूर करने का नाटक किया
और रक्त चूसा
भ्रष्टाचार के पर्वत से
टकराने का नाटक किया
पर्वत फटा
वह अन्दर धँसा
भ्रष्टाचारी शैल की
गर्म पर्तों के बीच
उसकी त्वचा झुलस गयी
मुँह काला हो गया
एक दिन
भ्रष्टता की गर्त में धँसा
उसका सिर
ऊपरी पर्त से
ऊपर उठा तो
भयंकर ‘ट्रेजेडी’ हुई
धर्म के ठेकेदारों ने उसे
शिवलिंग का संज्ञा दी
ढोंगियों का विरोधी
चिता में झोंक आया
तुम भी धोखा खा गये बच्चा!
इसे अधजली लकड़ी समझ कर
उठा लाये
खैर –
नाटक का शेषांश अभिनीत करो
ले जाओ इसे
चूल्हे पर धरो
कल इसकी राख को
मानव कल्याणार्थ आयोजित
यज्ञ की भस्म बताएंगे
जन सामान्य के माथे पर लगाएंगे
मोटी रकम कमाएंगे
कीमा-कलेजी-कबाब
सब आएगा –
आत्मा ही परमात्मा है बच्चा!
इम्पोर्टेड विदेशी शराब
हलक से नीचे उतरेगी
आह! मन बाग-बाग होगा
आत्मा तृप्त होगी हमारी
और उसे शान्ति मिलेगी।

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