जगदीश चतुर्वेदी

जगदीश चतुर्वेदी की रचनाएँ

समाधिस्थ

गुम्बदों पर अन्धेरा ठहर गया है
एक काली नदी बहती है अंतस्तल से
निबिड़ अन्धकार में।

कगारों पर पड़े हैं कटे हुए परिन्दों के अनगिनत पंख
और उन पगचिन्हों के निशान
जो शान्ति की खोज में निर्वासित घूमते रहे।

इतना वक़्त नहीं रहा है अब कि इतिहास को
मुट्ठी में क़ैद किया जाए

चिनार के दरख़्तों से घायल संगीत की लहरें उठती हैं
और तलहटी में फैल जाती हैं
कुछ अश्वारोही जो निकले थे दिग्विजय करने
अपने अश्वों के नथुनों से लगातार निकलते फेन को देखकर
मर्माहत हो गए हैं।

एक समय जो विश्वजेता होता है
वो दूसरे क्षण कितना निरीह हो जाता है
जैसे घायल नेपोलियन जंग से टूटा हुआ लौटा हो
और फ़ौजी डॉक्टर के हाथों में
मासूम बच्चा बन गया हो।

कितने ही युद्ध शरीर पर छो़ड़ देते हैं निशान
और घाव भरने के साथ
ईर्ष्या और शत्रुता के कई गहरे घाव
अपने आप कुंद हो जाते हैं।
कितने ही तवारीख़ के पन्ने केवल ईर्ष्या से भरे हैं
सच लगता है केवल गौतम बुध
जो ईर्ष्या और रोग और आभिजात्य के
नक़ली मुखौटों से मुक्ति पा सका था।

सुख भी उतना ही तकलीफ़देह है जितना दुख
सुख भी बहुत अकेला कर जाता है
मानो दुख के समय
किसी आत्मीय की सान्त्वना के अभाव में
सिसकता हुआ एक रोगी कक्ष।

शान्ति के वृक्षों को तलाशते हुए
कई संत शरीर और नदियों के पाट
दीमक और काई के शिकार हो गए
पर शान्ति न मिली
किसी प्रकृति वनखण्ड या वातावरण से
परांगमुख होकर
शान्ति खड़ी उसका इन्तज़ार करती रही
एक अन्धेरी नदी के किनारे
जहाँ कनेर के लाल फूलों पर कोयल कूक रही थी
और
चम्पा का लम्बा दरख़्त
सिर पर गिरा रहा था
गोल, चमकीले, श्वेत, चम्पई फूल।

ताज़े गुलाब का उन्माद

मैंने गुलाब को छुआ
और उसकी पंखुड़ियाँ खिल उठीं
मैंने गुलाब को अधरों से लगाया
और उसकी कोंपलों में ऊष्मा उतर आई।

गुलाब की आँखॊं में वसन्त था
और मेरी आँखॊं में उन्माद
मैंने उसे अपने पास आने का आह्वान दिया
और उसने
अपने कोमल स्पर्श से मेरी धमनियों में
स्नेह की वर्षा उड़ेल दी।

अब गुलाब मेरे रोम-रोम में है
मेरे होठों में है
मेरी बाहों में है
और उसकी रक्तिम आभा
आकाश में फैल गई है

और
बिखेर गई है मादक सुगन्ध
अवयवों में
और उगते सूरज की मुस्कुराहट में।

मिलन के दो रूप

मिले,
हम तुम मिले
ऊष्मा की तन्द्रिल दोपहरी में ।

श्वासों में नमी आई
आँखें गोचर सत्य पर भर आईं
और हम तुम देखते रहे
चुपचाप
अनाहूत क्षणों का मिलन !

मिले,
आज हम फिर मिले
अपरिचित बनकर

आँखों ही आँखों में धाराएँ बह गईं
अधरों के कोनों में सूजन उभर आई
हमें विश्वास हुआ
कि जैसे, हम तुम मिले
हमारे शव मिले ।
मूक निष्प्राण शव !

साँझ के फूल

किरमिची से फूल :
तुम्हारी साँवली छवि पर उतरता
सद्य:स्नाता साँझ का
मोहक, मन्दिर प्रतिबिम्ब !

चाहता हूँ
एक पल को बाँध लूँ मैं
(अंजुरियों में)
रूप का इतना घना सैलाब
— कस लूँ बाहुओं में
अनछुआ यौवन !

दिन बहुत बीते
तुम्हारे रूप का प्रतिबिम्ब केवल
पा सका हूँ ।

चाहता हूँ
साँझ के ये किरमिची से फूल
अपनी देह में, रग में
कहीं भीतर जहाँ स्पर्श करती है
तुम्हारी ये मदिर छवि
सहेजूँ रख लूँ !

मैं नहीं चाहता हूँ छोड़ना
ये साँझ का सुख
ये तुम्हारा किरमिची-सा गात

चाहता हूँ एक युग तक बाँधना
यह साँझ —
और उससे भी बहुत सुन्दर
तुम्हारा रूप !

बेबीलोन के खण्डहरों में-1

अम्मान (जार्डन) से बग़दाद जाते हुए

यह विशाल मरुस्थल
कभी समाप्त भी होगा या नहीं
एक मरणान्तक चुप्पी में तैरता हुआ मरूप्रदेश
मेरी आँखों को काटता हुआ
चाँदनी में डूबा हुआ है ।

जार्डन का ख़ूबसूरत शहर
बहुत पीछे छूट गया है
अम्मान को देखकर शिमला की
पहाड़ियाँ याद आ गईं थीं ।

पर यह मरूस्थल कभी समाप्त नहिं होगा
कभी समाप्त भी होगा या नहीं…
पूरी रफ़्तार से भाग रही है लम्बी हडसन कार
हम चार यात्री
चले जा रहे हैं
अरब की लम्बी यात्रा पर
विशाल मरूस्थल से गुज़रते हुए ।

प्रतीक्षा में हूँ
फिर कब होगा सवेरा
और हम हारुन-उल-रशीद के
शहर में होंगे

साथ होगी टाइग्रिस
और उसके किनारे पर
झूलता हुआ बग़दाद ।

 

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