जगदीश रावतानी आनंदम की रचनाएँ

कुदरत का ये करिशमा भी क्या बेमिसाल है

कुदरत का ये करिशमा भी क्या बेमिसाल है
चेहरे सफेद काले लहू सब का लाल है

हिन्दू से हो सके न मुस्लमां की एकता
दूरी बनी रहे ये सियासत की चाल है

धरती पे आदमी ने बसाई है बस्तियां
इंसानियत का आज भी दुनिया में काल है

इक दूसरे के वास्ते पैदा हुए है हम
तेरा जो हाल है वही मेरा भी हाल है

दिन ईद का है आके गले से लगा मुझे
होली पे जैसे तू मुझे मलता गुलाल है

गो मैं तेरे जहाँ में ख़ुशी खोजता रहा

गो मैं तेरे जहाँ में ख़ुशी खोजता रहा
लेकिन ग़मों-अलम से सदा आशना रहा

हर कोई आरजू में कि छू ले वो आसमाँ
इक दूसरे के पंख मगर नोंचता रहा

आँखों में तेरे अक्स का पैकर तराश कर
आइना रख के सामने मैं जागता रहा

कैसे किसी के दिल में खिलाता वो कोई गुल
जो नफरतों के बीज सदा बीजता रहा

आती नज़र भी क्यूं मुझे मंजिल की रोशनी
छोडे हुए मैं नक्शे कदम देखता रहा

सच है कि मैं किसी से मुहव्बत न कर सका
ता उम्र प्रेम ग्रंथ मगर बांचता रहा

दिल अगर फूल सा नहीं होता

दिल अगर फूल सा नहीं होता
यूँ किसी ने छला नहीं होता

था ये बेहतर कि कत्ल कर देती
रोते रोते मरा नहीं होता

दिल में रहते है दिलरुबाओं के
आशिकों का पता नहीं होता

ज़िन्दगी ज़िन्दगी नहीं तब तक
इश्क जब तक हुआ नहीं होता

पाप की गठरी हो गई भारी
वरना इतना थका नहीं होता

होश में रह के ज़िन्दगी जीता
तो यूँ रुसवा हुआ नही होता

जुर्म हालात करवा देते है
आदमी तो बुरा नहीं होता

ख़ुद से उल्फत जो कर नहीं सकता
वो किसी का सगा नहीं होता

क्यों ये दैरो हरम कभी गिरते
आदमी ग़र गिरा नहीं होता

जिंदगी को सजा नहीं पाया

जिंदगी को सजा नहीं पाया
बोझ इसका उठा नहीं पाया

खूब चश्मे बदल के देख लिए
तीरगी को हटा नहीं पाया

प्यार का मैं सबूत क्या देता
चीर कर दिल दिखा नहीं पाया

जो थका ही नही सज़ा देते
वो खता क्यों बता नहीं पाया

वो जो बिखरा है तिनके की सूरत
बोझ अपना उठा नहीं पाया

आईने में खुदा को देखा जब
ख़ुद से उसको जुदा नहीं पाया

नाम “जगदीश” है कहा उसने
और कुछ भी बता नहीं पाया

पचास पार कर लिए अब भी इंतज़ार है

पचास पार कर लिए अब भी इंतज़ार है
मेरे लिए भी क्या कोई उदास बेकरार है

गुरुर टूटने पे ही समझ सका सच्चाई को
जो है तो बस खुदा को ज़िन्दगी पे इख्तियार है

मेरे लबो पे भी ज़रूर आएगी हंसी कभी
न जाने कब से मेरे आईने को इंतज़ार है

मैं नाम के लिए ही भागता रहा तमाम उम्र
वो मिल गया तो दिल मेरा क्यों अब भी बेकरार है

मैं तेरी याद दफ़न भी करूँ तो तू बता कहा
के तू ही तू फकत हरेक शकल में शुमार है

अभी तो हाथ जोड़ कर जो कह रहा है वोट दो
अवाम को पता है ख़ुद गरज वो होशियार है

डगर-डगर नगर-नगर मैं भागता रहा मगर
सुकूँ नहीं मिला कहीं न मिल सका करार है

वो क्यो यूं तुल गया है अपनी जान देने के लिए
दुखी है जग से या जुड़ा खुदा से उसका तार है

कभी तो आएगी मेरे हयात में उदासियाँ
बहुत दिनों से दोस्तों को इसका इंतज़ार है

Share