जगदीश व्योम की रचनाएँ

अपने घर के लोग

औरों की भर रहे तिजोरी
अपने घर के लोग

सच कहना तो ठीक
मगर
इतना सच नहीं कहो
जैसे सहती रहीं पीढ़ियाँ
तुम भी वही सहो

आजादी है, बोलो
लेकिन
कुछ भी मत बोलो
जनता के मन में
सच्चाई का विष
मत घोलो

नियति-नटी
कर रही सदा से
ऐसे अजब प्रयोग

राजा चुप
रानी भी चुप है
चुप सारे प्यादे
सिसक रहे सब
सैंतालिस से
पहले के वादे

घर का कितना
माल-खजाना
बाहर चला गया
बहता हुआ पसीना
फिर
इत्रों से छला गया

जो बोला,
लग गया उसी पर
एक नया अभियोग

सहम गई है हवा
लग रहा
आँधी आएगी
अहंकार के छानी-छप्पर
ले उड़ जाएगी

भोला राजा रहा ऊँघता
जनता बेचारी
सभासदों ने
कदम-कदम पर
की है मक्कारी

कोई अनहद उठे
कहीं से,
हो ऐसा संयोग

जंग लड़ेंगे हम

जंग वायरस ने छेड़ी है
जंग लड़ेंगे हम
और जंग में
विजयी होकर ही
निकलेंगे हम ।

घर में रहकर
वाच करेंगे
इसकी चालों को
आश्रय देंगे
भूखे, प्यासे,
बिन घरवालों को
कर इसको कमज़ोर
प्राण इसके
हर लेंगे हम ।

अजब तरह का
ये दुश्मन है
कुशल खिलाड़ी है
छोटा है पर
छिपी पेट में
इसके दाढ़ी है
छिपकर
वार कर रहा है,
लेकिन सँभलेंगे हम ।

घुट्टी पीकर
चला चीन से
दुनिया में छाया
पूरा विश्व
अभी तक इसको
पकड़ नहीं पाया
बड़े जतन से
जाल बिछा
इसको जकड़ेंगे हम ।

मचा हुआ कुहराम
हर जगह
बाहर औ भीतर
कोस रही है
दुनिया इसको
पानी पी-पीकर
डरना नहीं
व्योम इससे
जल्दी उभरेंगे हम ।

जंग वायरस ने छेड़ी है ….

पानी को पानी कह पाना

इतना भी
आसान कहाँ है !
पानी को पानी कह पाना !

कुछ सनकी
बस बैठे ठाले
सच के पीछे पड़ जाते हैं
भले रहें गर्दिश में
लेकिन अपनी
ज़िद पर अड़ जाते हैं
युग की इस
उद्दण्ड नदी में
सहज नहीं उल्टा बह पाना !
इतना भी…. !!

यूँ तो सच के
बहुत मुखौटे
क़दम-क़दम पर
दिख जाते हैं
जो कि इंच भर
सुख की ख़ातिर
फ़ुटपाथों पर
बिक जाते हैं
सोचो !
इनके साथ सत्य का
कितना मुश्किल है रह पाना !
इतना भी…………. !!

जिनके श्रम से
चहल-पहल है
फैली है
चेहरों पर लाली
वे शिव हैं
अभिशप्त समय के
लिए कुण्डली में
कंगाली
जिस पल शिव,
शंकर में बदले
मुश्किल है ताण्डव सह पाना !
इतना भी……..  !!

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