जय चक्रवर्ती

जय चक्रवर्ती की रचनाएँ

पिता

घर को घर रखने मे
हर विष पीते रहे पिता

आँखों की गोलक में
संचित
पर्वत से सपने
सपनों में
सम्बन्धों की खिड़की
खोले अपने
रिश्तों की चादर जीवन-भर
सीते रहे पिता

अपनों के साये
पथ में
अनचीन्हें कभी हुए
कभी बिंधे
छाती में
चुपके अपने ही अंखुए
कई दर्द-आदमक़द
पल-पल जीते रहे पिता

फ़रमाइशें, जिदें,
जरूरतें
कंधों पर लादे
एक सृष्टि के लिए
वक्ष पर –
एक सृष्टि साधे
सबको भरते रहे
मगर खुद रीते रहे पिता

ज़िन्दगी चादर एक फटी

बहुत संभाली फिर भी –
टुकड़े-टुकड़े रही बंटी
कहाँ –कहाँ पर सियेँ
ज़िन्दगी चादर एक फटी

आग पेट की ही
जीने को हम मजबूर हुए
आसमान में उड़ने वाले
सपने चूर हुए

अरमानों को कंधा देते
सारी उम्र कटी

नहीं रुचा परदेस
और घर भी न रहा अपना
अनुबंधों की गर्म-धूप में
नित्य पड़ा तपना

अग्नि–परीक्षाओं की सीमा
तिल-भर नहीं घटी

मिला दुखों का स्नेह
दूरियों ने की बड़ी दया
कभी प्यार का झोंका कोई
छूकर नहीं गया

रही फूलती –फलती
पीड़ाओं की पंचवटी

मेरे गाँव में

खुल गया है बंधु!
शॉपिंगमॉल मेरे गाँव में

लगी सजने कोक,पेप्सी
ब्रेड, बर्गर और
पिज्जा की दुकानें
आँख मे पसरे हुए हैं
स्वप्न
मायावी–प्रगति का छत्र तानें
आधुनिकता का बिछा है
जाल मेरे गाँव में

हँस रहें हैं
पत्थरों के वन
सिवानों और खेतों के वदन पर
ढूँढती दर-दर
सुबह से शाम गौरैया
वही घर–वही छप्पर
हैं हताहत कुएं, पोखर,
ताल मेरे गाँव में

उत्सवों की पीठ पर
बैठे हुए हैं
बुफ़े, डीजे और डिस्को
स्नेह, स्वागत,
प्यार या मनुहार वाले स्वर
यहाँ अब याद किसको
मौन है अब गाँव की
चौपाल मेरे गाँव में

न्यू इंडिया है ये

एक हाथ मे बाइक दूजे मे
मोबाइल है
न्यू इंडिया है, ये इसका-
‘लाइफ-स्टाइल’ है

नहीं ‘फेस-टू-फेस’ कहीं
मिलता कोई अपना
फॉलो होता सिर्फ
फेसबुक पर हरेक सपना
‘मेल’ और ;मैसेज़’ मे सिमटे
सब रिश्ते-नाते –
आभासी–चेहरों पर
‘आभासी स्माइल’ है

टीवी की आँखों मे
बसने की लेकर आशा
सीख रही पीढ़ी
संस्कारों की नूतन भाषा
‘हेलो’ ‘हाय’ ‘टाटा’
‘ओके वाली ‘मेमोरी’ से-
हुई ‘डिलीट’
प्रणाम-नमस्ते वाली ‘फ़ाइल‘ है

चढ़ा मीडिया के कंधों
बाज़ार शिकारी है
शयन-कक्ष से पूजाघर तक
इसकी यारी है
गाँव-शहर ‘मॉडर्न’ हुए
सब बदल गए चेहरे-
जो जितना लक़दक़
उतनी ऊँची ‘प्रोफ़ाइल‘ है

खत नहीं आया

खत नहीं आया बहुत दिन से
किसी का खत नहीं आया

खत कि जिनमे
स्नेह की
सौगात होती थी
मनाने की-
रूठने की
बात होती थी
ज़िन्दगी की राह के ये मीत
किसने इन्हें भरमाया !

खत कि जो
दुख-सुख
अकेले मे बंटाते थे
हम उन्हें सुनते
कभी
हम भी सुनाते थे
इस मधुर –अनुबंध पर
किसकी न जाने पड़ गई छाया !

भोगने को रह गए
अब
शब्द कुछ छूंछे
नेह-सीझे
अक्षरों का
कौन दुख पूछे
डस गई ‘राजी-खुशी-
शुभकामना‘ सब ‘हेलो’ की माया

 

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